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लोकसभा चुनाव में मैदान मारने के लिए राजनीतिक दलों के बीच जोर आजमाइश लगातार जारी है. चुनाव के आखिरी पड़ाव में अब सातवें चरण का मतदान होना बाकी है. इस दौरान पश्चिमी बंगाल खासा चर्चित बना हुआ है. देश के सबसे बड़े सियासी अखाड़े का रूप ले चुके वेस्ट बंगाल पर हर किसी की नजर बनी हुई है. पीएम नरेंद्र मोदी व बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के अलावा दिग्गज बीजेपी नेता यहां कमल खिलाने के लिए दम-खम लगाने में जुटे हैं लेकिन उनके सामने चट्टान सी चुनौती साफ देखी जा रही है.

पश्चिम बंगाल की ‘दीदी’ कही जाने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बीजेपी शीर्ष नेता अक्सर हर मंच से घेरते नजर आते रहे हैं. जिसमें पीएम मोदी-शाह की जोड़ी बैटल ऑफ बंगाल में डटी हुई है. जीतोड़ मेहनत और पूरे दम-खम के साथ प्रचार में जुटी बीजेपी के लिए ममता दीदी का गढ़ जीतना आसान नहीं लग रहा है. बीजेपी के लिए यहां मां, माटी और मानुष कैंपेन भारी चुनौती साबित हो रहा है. हांलाकि बीजेपी लगातार हिंदूवादी एंजेडे के साथ भी जनता के बीच विश्वास बनाने में जुटी है.

बीते छ: चरणों के लोकसभा चुनावों में पश्चिमी बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस व बीजेपी के बीच तनातनी देखी जा रही है. एक ओर पीएम मोदी-शाह और ममता दीदी के बीच जुबानी जंग शीर्ष पर है तो वहीं दूसरी तरफ टीएमसी समर्थकों के बीच यहां संघर्ष खूनी रूप भी लेता दिख रहा है. जिसके चलते लोकसभा चुनाव के पहले चरण के बाद से ही दोनों दलों के हिंसक सामने की खबरें अक्सर देखने की मिली है.

पश्चिमी बंगाल की राजनीतिक उठापटक ने यहां पूरे देश की नजर अपनी ओर खींचते हुए ममता दीदी पर आ टिकी है. आज पीएम मोदी व अमित शाह के बयानों में निशाने पर रहने के अलावा ममता बनर्जी देश और बंगाल की राजनीति के केंद्र में बनी हुई है. ऐसा नहीं है कि ममता बनर्जी का जो रूप आज दुनिया देख रही है वो इन्होंने अभी बीजेपी के खिलाफ अख्तियार किया है. स्कूल और कॉलेज के जमाने से ही ममता बनर्जी गर्म और विद्रोही तेवर की रही हैं. आइए जानते हैं ममता दीदी के सियासी सफर के बारे में कि दूध बेचने से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक का सफर उन्होंने कैसे तय किया.

कॉलेज में सिस्टम के विद्रोह ने दिलाई पहचान
फर्श से अर्श तक पहुंचने वाली ममता बनर्जी का जन्म कोलकाता में स्वंतत्रता सेनानी के घर हुआ था. पश्चिम बंगाल में ‘दीदी’ के नाम से मशहूर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्कूल के दिनों से ही राजनीति में कदम रख दिया था. जहां वे विद्यार्थियों की हर समस्या को बखूबी उठाती रहीं थी बल्कि न्याय मिलने तक संघर्षरत रहती थीं. इसके बाद आगे बढ़ते हुए ममता दीदी ने 70 के दशक में कांग्रेस के जरिए कॉलेज की राजनीति में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी.

पिता की मौत के बाद संभाला परिवार
ममता दीदी ने बचपन से ही कड़े संघर्ष का सामना करते हुए विपरित परिस्थितियों में जीवन यापन किया है. स्वतंत्रता सेनानी पिता की मौत के बाद ममता ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और भाई-बहनों के पालन पोषण के लिए दूध तक बेचा. दूध बेचने वाली एक दिन सूबे की सरताज बनेगी ये शायद ही किसी ने सोचा होगा. विपरित परिस्थितियों के बाद भी उन्होंने कॉलेज और सामाजिक समस्याओं को लेकर आवाज उठाने में पीछे नहीं रही और लगातार राजनीति में सक्रिय बनी रही.

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद ममता बनर्जी ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से इतिहास में मास्टर डिग्री ली और जोगेश चंद्र कॉलेज से कानून की पढ़ाई की. इसी दौरान उन्होंने खुद में राजनेता की छवि को पहचाना और राजनीति में भी सक्रिय हो गईं. उनकी मेहनत और लगन को देखते हुए उन्हें बंगाल कांग्रेस में महासचिव का पद दिया गया.

देश की सबसे युवा सांसद का खिताब
अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहने वाली ममता बनर्जी ने कॉलेज राजनीति से आगे कदम बढ़ना शुरू किया और पश्चिम बंगाल में साल 1976 से 1984 तक महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं. इसके बाद साल 1984 में अपने जीवन का पहला लोकसभा चुनाव जीतकर सबसे युवा सांसद का खिताब अपने नाम किया. जहां जादवपुर संसदीय सीट पर उनके सामने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कद्दावर उम्मीदवार और पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी थे. अपने करिश्माई व्यक्तित्व और शानदार भाषण की कला की बदौलत ममता युवाओं का मनपंसद चेहरा बन चुकी थी.

जादवपुर से मिली हार ने पहुंचाया कोलकाता
अपने जीवन के पहले लोकसभा चुनाव में सीपीएम के सामने बड़ी जीत हासिल करने के बाद तो ममता बनर्जी की लोकप्रियता ने दिल्ली तक में चर्चा बढ़ा दी. उनकी लगातार बढ़ती प्रसिद्धी को देखते हुए कांग्रेस उन्हें भारतीय युवा कांग्रेस का महासचिव पद दे दिया. जिसके बाद ममता ने जादवपुर से दूसरी बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन कांग्रेस विरोधी लहर के चलते उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

यहां मालिनी भट्टाचार्य द्वारा मिली शिकस्त के बाद उन्होंने केंद्र की राजनीतिक की ओर कदम बढ़ाने के लिए कोलकाता का रूख किया. जिसके बाद दक्षिण कोलकाता से लोकसभा चुनाव लड़ते हुए सीपीएम प्रत्यासी बिप्लव दास गुप्ता को भारी मतों से मात दी. इसके बाद जनता की चहेती बनी ममता दीदी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और लगातार 2009 तक कभी चुनाव ही नहीं हारी.

टकराव के कारण सिर्फ दो साल रहीं केंद्र में मंत्री
राजनीति के गुर सीख निपुण हो चुकी ममता बनर्जी की लोकप्रियता ने उन्हें केंद्रीय मंत्री मंडल तक में पहुंचाया. साल 1991 में कोलकाता से जीत के बाद उन्हें पहली बार केंद्रीय मंत्री बनाया गया. जिसमें उन्हें मानव संसाधन विकास और युवा मामलों के मंत्रालय का प्रभार दिया गया. लेकिन हमेशा युवाओं की आवाज बनी रही ममता बनर्जी यहां खुद को टिका पानी में नाकामयाब रही. युवाओं के मामले को लेकर उनकी प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव से टकराहट शुरू हो गई जिसके बाद उन्हें 1993 में ही मंत्री पद खोना पड़ा.

कांग्रेस से मनमुटाव के बाद खड़ी की तृणमूल कांग्रेस
कांग्रेस के टिकट पर जीत पहली बार मंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी को साल 1993 में मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा था जिसके बाद से ही कांग्रेस में उनकी खटपट देखी जा रही थी और साल 1996 के लोकसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पर सीपीएम की कठपुतली होने का आरोप लगाया. इसके बाद उनकी कांग्रेस से बगावत बढ़ी और आखिरकार साल 1997 में उन्होंने खुद को पार्टी से अलग कर लिया.

कांग्रेस से अलग होने के बाद ममता ने खुद की पार्टी खड़ी करने की सोची और इसके ठीक एक साल बाद 1 जनवरी 1998 को अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस बना ली. जिसके बाद पश्चिमी बंगाल की जनता के बीच ममता व तृणमूल का विश्वास बढ़ा औऱ साल 1998 के लोकसभा चुनाव में बंगाल की 8 सीटों पर जीत हालिल करने में कामयाबी मिली. इस जीत ने ममता बनर्जी को दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में मशहूर कर दिया.

एनडीए-यूपीए दोनों की रहीं सहयोगी
अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस के जरिए पश्चिमी बंगाल की जनता में ममता बनर्जी आखिर विश्वास बनाने में सफल रहीं और साल 1999 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद वो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए का हिस्सा बनी. एनडीए सरकार में उन्हें रेल मंत्रालय का जिम्मा दिया गया. इस दौरान अपने पहले रेल बजट में बंगाल में ज्यादा ट्रेन देने को लेकर उनपर पक्षपात का आरोप लगा और ममता का विवाद से रिश्ता बना.

इसके बाद साल 2001 में हथियारों की खरीद के लिए दलाली मामले और बीजेपी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण के घूस लेने के तहलका के खुलासा के बाद ममता बनर्जी ने खुद को एनडीए से अलग कर लिया. साल 2004 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जोरदार झटका लगा. ममता बनर्जी की पार्टी को यहां सिर्फ एक सीट पर जीत हासिल हो सकी और वो सीट थी खुद ममता बनर्जी की. इसके अलावा पार्टी कहीं नहीं जीत पाई.

सिंगूर प्लांट विरोध ने पहुंचाया केंद्रीय चर्चा में
साल 2004 के लोकसभा चुनाव, 2005 के नगर निगम चुनाव और 2006 के विधानसभा चुनाव में लगातार शिकस्त के बाद ममता बनर्जी को उनकी सियासी जमीन खिसकती दिखी. अब उन्हें वापिस लोगों में पार्टी का विश्वास बनाने के लिए एक मौके की दरकार थी और उन्हें ये अवसर आखिरकार साल 2006 के अंत में मिल ही गया. नवंबर 2006 में ममता बनर्जी ने सिंगूर में टाटा मोटर्स के प्रस्तावित कार निर्माण के परियोजना स्थल पर जाने से जबरन प्रशासन ने रोका तो उन्होंने इसे सीपीएम सरकार के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बना डाला.

मौके की नजाकत को पूरी तरह भांप ममता बनर्जी ने सियासी बिसात बिछा ली और पूरे राज्य में उनके कार्यकर्ताओं ने धरना प्रदर्शन और हड़ताल शुरू कर दी. ममता बनर्जी की मेहनत रंग लाई और इसका उन्हें बड़ा सियासी फायदा साल 2011 के विधानसभा चुनाव में मिला. जिसमें उन्होंने मां, माटी मानुष के नारे के जरिए 34 सालों के सीपीएम सरकार को बंगाल से उखाड़ फेंकने में कामयाबी हासिल की. ममता की पार्टी ने 294 में से 184 सीटों पर कब्जा कर बंगाल की सत्ता संभाली.

यूपीए से रिश्ता टूटने का कारण रहा नंदी ग्राम संघर्ष
प्रदेश की राजनीति के बाद ममता बनर्जी ने फिर से केंद्र का रूख किया और अबकी बार यूपीए से नाता जोड़ा था लेकिन चर्चित नंदी ग्राम हिंसा के बाद उन्होंने 18 सितंबर 2012 को यूपीए से भी किनारा कर लिया. नंदीग्राम में स्पेशल इकोनॉमिक जोन विकसित करने के लिए गांव वालों की जमीन अधिकृत की जा रही थी. इसी दौरान माओवादियों के समर्थन से गांव वालों ने पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई थी. जिसके बाद प्रदेश में जमकर हिंसा हुई. सीपीएम कार्यकर्ताओं की हिंसा पर रोकने के लिए ममता ने तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह व गृह मंत्री शिवराज पाटिल से मांग की थी, पर बात नहीं बन सकी.

मोदी विरोध के बाद बनी राष्ट्रीय नेता की छवि
साल 2014 में भारी बहुमत के साथ बीजेपी की सरकार बनी और नरेंद्र मोदी ने पीएम के रूप में देश की सत्ता संभाली. तभी से ही ममता बनर्जी लगातार एनडीए की मोदी सरकार की नीतियों की खिलाफत कर रही हैं. नोटबंदी और जीएसटी जैसे मुद्दों को लेकर ममता बनर्जी मोदी और शाह की जोड़ी पर हमला करती रही हैं. लेकिन बीजेपी और टीएमसी के बीच राजनीतिक कटुता उस वक्त शुरू हो गई जब बीजेपी ने बंगाल में खुद को मजबूत बनाने के लिए राज्य में राजनीतिक संघर्ष शुरू कर दिया. अपना जनाधार दरकता देख ममता बनर्जी भी पूरी ताकत से मोदी विरोध में जुट गईं और मोदी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने में कोलकाता से दिल्ली को एक कर दिया.

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