अरुण जेटली का शनिवार को निधन हो गया. भारतीय राजनीति से एक शानदार व्यक्तित्व चला गया. अरुण जेटली अत्यंत बुद्धिमान वकील थे और इस समय राजनीति की जो कायापलट हुई दिखाई देती है, उसमें अरुण जेटली की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका थी. कांग्रेस केंद्रित राजनीति को भाजपा केंद्रित करने में नरेन्द्र मोदी, अमित शाह के साथ ही अरुण जेटली के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. अरुण जेटली का जन्म 28 दिसंबर 1952 को दिल्ली में हुआ. वह वकील महाराज किशन जेटली और रतन प्रभा जेटली के पुत्र थे. दिल्ली के सेंट जेवियर्स स्कूल में 1957 से 1969 तक उन्होंने स्कूल की शिक्षा पूरी की और 1973 में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से कॉमर्स ग्रेजुएट हो गए. 1977 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय कानून की डिग्री हासिल की. कॉलेज में पढ़ते हुए वह अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय रहे. 1974 में वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संगठन के अध्यक्ष भी रहे.

जब अरुण जेटली दिल्ली विवि छात्रसंघ के अध्यक्ष थे, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी. अरुण जेटली अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े थे और राजनीतिक गतिविधियों में भी सक्रिय थे. 25 जून 1975 को पुलिस दिल्ली के नारायणा स्थित घर में उन्हें गिरफ्तार करने के लिेए पहुंच गई थी. अरुण जेटली पुलिस को देखकर छिप गए और घर के पिछले दरवाजे से निकल कर एक मित्र के यहां पहुंच गए, रात वहीं गुजारी.

अगले दिन 26 जून की सुबह अरुण जेटली करीब दो सौ छात्रों को साथ लेकर कुलपति के कार्यालय के सामने इकट्ठा हुए, सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया. वहां पहली बार अरुण जेटली ने सरकार के खिलाफ भाषण दिया. छात्रों ने इंदिरा गांधी का पुतला जलाया और आपातकाल के खिलाफ नारे लगाए. थोड़ी ही देर में तत्कालीन डीआईजी पीएस भिंडर पुलिस फोर्स लेकर पहुंचे और पूरे परिसर को घेर लिया. अरुण जेटली गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिए गए.

जिस सेल में अरुण जेटली को रखा गया था, उसमें अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, केआर मलकानी सहित 14 राजनीतिक कैदी रह रहे थे. इस तरह तिहाड़ जेल के उस सेल से अरुण जेटली का राजनीतिक सफर शुरू हुआ, जो केंद्र सरकार में शीर्ष पर पहुंचने के बाद सांसे रुकने पर ही थमा. अरुण जेटली यारबाज थे. दोस्ती करते थे और निभाते थे. विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से उनकी मित्रता रही. फैशन से उनका लगाव था. लड़कियों से बहुत शर्माते थे, इसलिए उन्होंने किसी लड़की से दोस्ती नहीं की. मंच पर प्रभावशाली भाषण देते थे, लेकिन मंच से नीचे उतरने के बाद वह ज्यादा बात नहीं करते थे.

अरुण जेटली को फिल्म देखने का बहुत शौक था. पड़ोसन फिल्म उन्हें बहुत पसंद थी, जिसे उन्होंने कई बार देखा. उन्हें कई बार फिल्मों के संवाद दोहराते हुए देखा गया है. तिहाड़ जेल में दिग्गज नेताओं के साथ रहते हुए उनके राजनीतिक जीवन की नींव पड़ी. आपातकाल खत्म होने के बाद जनता पार्टी बनी. जेल से रिहा होने के बाद अरुण जेटली का जीवन भी राजनीति के प्रति समर्पित हो गया. 1977 में जब जनता पार्टी बनी, तो जेटली उसके कार्यकारिणी सदस्य बनाए गए. वाजपेयी चाहते थे कि जेटली 1977 का लोकसभा चुनाव लड़ें, लेकिन जेटली की उम्र निर्धारित आयुसीमा से एक साल कम पड़ गई. तब जेटली ने अपनी कानून की शिक्षा पूरी की.

24 मई 1982 को अरुण जेटली का विवाह कांग्रेस के बड़े नेता गिरधारी लाल डोगरा की बेटी संगीता के साथ धूमधाम से हुआ. गिरधारी लाल डोगरा दो बार जम्मू से सांसद रह चुके थे और जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी रह चुके थे. अरुण जेटली की शादी में अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गांधी दोनों शामिल हुए थे. वकालत में भी अरुण जेटली ने बहुत नाम कमाया. वह चोटी के वकील बने और सबसे महंगे वकीलों में शुमार हुए. अच्छा खाना, अच्छा पहनना उनके जीवन का मूल मंत्र रहा. हमेशा महंगी घडि़या खरीदते थे. उस जमाने में, जब लोग ओमेगा से आगे नहीं सोच पाते थे, तब उन्होंने पैटेक फिलिप घड़ी खरीदी थी. वह बहुत महंगे पेन रखते थे. मोंट ब्लांक पेन खरीदने का उन्हें बहुत शौक था. मोंट ब्लांक का नया मॉडल भारत में नहीं मिलता तो वह अपने मित्र राजीव नैयर से विदेश से मंगवाते थे. राजीव नैयर प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर के पुत्र हैं.

अरुण जेटली को कार चलाना नहीं आता था और उन्होंने कभी सीखा भी नहीं. जब तक उनकी हैसियत ड्राइवर रखने की नहीं हुई थी, तब तक उनकी कार उनकी पत्नी संगीता चलाती थी. छात्र जीवन में अरुण जेटली कभी कभी डिस्कोथेक में भी चले जाते थे. लेकिन उन्हें नाचना बिलकुल नहीं आता था. उस समय दिल्ली में एकमात्र डिस्कोथेक सेलर था. छात्र जीवन से ही उन्हें हमेशा अप टु डेट रहने का शौक था, जिसे वह ताउम्र निभाते रहे. हालांकि अंतिम दिनों में उनका चेहरा मोहरा काफी बदल गया था और मीडिया में उनकी ताजा तस्वीरें आना बंद हो गई थी.

अरुण जेटली अच्छे खाने के बेहद शौकीन थे. दिल्ली के सबसे पुराने क्लब रोशनारा क्लब का खाना उन्हें बहुत पसंद था. कनॉट प्लेस के मशहूर ‘क्वॉलिटी’ रेस्तराँ के चने भटूरों के वो ताउम्र मुरीद रहे. वह पुरानी दिल्ली की स्वादिष्ट जलेबियां, कचौड़ी और रबड़ी फ़ालूदा खाते हुए बड़े हुए, डायबिटीज होने से उनके ये सारे शौक़ जाते रहे और उनका भोजन मात्र एक रोटी और शाकाहारी भोजन तक सिमट कर रह गया. जब उन्होंने 2014 का बजट भाषण दिया था, तब पहली बार उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से बैठकर भाषण पढ़ने की अनुमति मांगी थी. सुमित्रा महाजन ने उन्हें बैठ कर भाषण पढ़ने की विशेष अनुमति दी थी. दर्शक दीर्घा में बैठी हुई उनकी पत्नी को अंदाज़ा हो गया कि कुछ गड़बड़ है, क्योंकि वह बार-बार अपनी पीठ छूने की कोशिश कर रहे थे, जहां दर्द की लहर उठ रही थी.

1989 में जब केंद्र में वीपी सिंह की सरकार बनी थी, तब 37 साल की उम्र में जेटली को भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बने. जनवरी 1990 से जेटली प्रवर्तन निदेशक भूरे लाल और सीबीआई के डीआईजी एमके माधवन के साथ बोफ़ोर्स मामले की जाँच करने कई बार स्विट्ज़रलैंड और स्वीडन गए लेकिन आठ महीने बाद भी उनके हाथ कोई ठोस सबूत नहीं लगा. तब एक सांसद ने तंज कसा था कि जेटली की टीम अगर इसी तरह विदेश में बोफ़ोर्स की जांच करती रही तो जल्द ही उन्हें ‘एनआरआई’ का दर्जा मिल जाएगा.

1991 के लोकसभा चुनाव में जेटली नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र से लालकृष्ण आडवाणी के चुनाव एजेंट थे. आडवाणी के सामने कांग्रेस ने फिल्म स्टार राजेश खन्ना को उतार दिया था. उस समय आडवाणी बड़ी मशक्कत के बाद मामूली अंतर से चुनाव जीत पाए थे. अदालतों मे उन्होंने आडवाणी के पक्ष में बाबरी मस्जिद विध्वंस का केस लड़ा और फिर मशहूर जैन हवाला केस में सफलतापूर्वक आडवाणी को बरी कराया. 90 के दशक में टेलीविज़न समाचारों ने भारतीय राजनीति के स्वरूप को ही बदल दिया. जैसे-जैसे टेलीविज़न की महत्ता बढ़ी, भारतीय राजनीति में अरुण जेटली का क़द भी बढ़ा. वर्ष 2000 में ‘एशियावीक’ पत्रिका ने जेटली को भारत के उभरते हुए युवा नेताओं की सूची में रखा. उसने जेटली को भारत का आधुनिक चेहरा बताया था, जिसकी छवि बिल्कुल साफ़ थी.

1999 में जेटली को दिल्ली में अशोक रोड स्थित भाजपा मुख्यालय के बग़ल में सरकारी बंगला आबंटिक किया गया. उन्होंने अपना वह बंगला भाजपा नेताओं को दे दिया था, जिससे कि वे जरूरत होने पर दिल्ली में ठहर सकें. इसी बंगले में क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग की शादी हुई और वीरेंद्र कपूर, शेखर गुप्ता और चंदन मित्रा के बच्चों की भी शादियां हुईं. इस दौरान जेटली की घनिष्ठता नरेन्द्र मोदी से बढ़ी, जिसका बाद में उन्हें बहुत फायदा मिला.

गुजरात में भाजपा को 1995 में सरकार बनाने का मौका मिला था. तब नरेन्द्र मोदी को गुजरात से दिल्ली भेज दिया गया था. उस समय जेटली ने मोदी से दोस्ती बढ़ाई. उस समय मोदी अक्सर जेटली के कैलाश कालोनी स्थित बंगले में देखे जाते थे. जेटली हैसियत को बहुत महत्व देते थे. कौन किस तरह बात करता है, किस तरह के कपड़े पहनता है, कहां रहता है और किस तरह की गाड़ी से चलता है, इन बातों पर जेटली बहुत ध्यान देते थे.

भाजपा के एक पूर्व महासचिव ने कहा कि जरूरत से ज्यादा संभ्रांत होने के कारण जेटली कभी भाजपा के अध्यक्ष नहीं बन पाए. क्योंकि इसी लिए जनाधार नहीं बन पाया और वह कभी भी चुनाव नहीं जीत पाए. वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए भी नहीं थे. जेटली के पुराने दोस्त स्वपन दासगुप्ता कहते हैं कि जेटली ने ‘इमेज’ समस्या से जूझ रही बीजेपी को उभरते हुए मध्यम वर्ग में स्वीकार्यता दिलवाई.

अरुण जेटली हमेशा राज्यसभा से चुनकर संसद में पहुंचे. बहुत अच्छे वक्ता होने के बावजूद जनाधार नहीं होने से जननेता नहीं बन पाए. संसद में उनका प्रदर्शन इतना अच्छा था कि उन्हें भावी प्रधानमंत्री तक कहा जाता था. वह वाजपेयी की सरकार में भी मंत्री थे. जुलाई 2005 में अरुण जेटली पहली बार गंभीर रूप से बीमार पड़े और उन्हें ट्रिपल बाईपास सर्जरी करानी पड़ी.

जब लालकृष्ण आडवाणी ने अपने पद से इस्तीफ़ा दिया तो जेटली ने क़यास लगाया कि अब उनकी बारी आएगी. कुछ सालों पहले उनके समकालीन वैंकैया नायडू यह पद संभाल चुके थे लेकिन जेटली को निराश होना पड़ा. उनकी जगह उप्र के भाजपा नेता राजनाथ सिंह भाजपा अध्यक्ष चुन लिए गए. अरुण जेटली के घर एक खास कमरा ऐसा था, जहां वे अपने दोस्तों से मिलते थे. इस कमरे को जेटली डेन कहा जाता था. जो लोग वहां पहुंचते थे, उनमें सुहेल सेठ, वकील रेयान करंजावाला, राजीव नैयर, शोभना भरतिया, ज्योदिरादित्य सिंधिया शामिल हैं.

वाजपेयी के जमाने में जेटली को आडवाणी खेमे में माना जाता था. 2013 तक वह पूरी तरह नरेन्द्र मोदी के साथ हो गए थे. 2002 में गुजरात दंगों के दौरान जब वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म की नसीहत दी थी, तब जेटली ने मोदी का नैतिक समर्थन किया था. गुजरात दंगों के मामलों में भी उन्होंने मोदी की तरफ से वकालत की थी. 2014 में अमृतसर से लोकसभा का चुनाव हार जाने के बाद भी नरेन्द्र मोदी ने उन्हें मंत्रिमंडल में जगह दी और वित्त, रक्षा जैसे बड़े मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी सौंपी.

जेटली के वित्त मंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी और जीएसटी लागू करने का बड़ा फ़ैसला लिया था. इसके बाद जेटली का स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया. पिछले वर्ष जेटली की किडनी बदली गई थी, लेकिन वह ज्यादा दिन पूरी तरह स्वस्थ नहीं रह पाए. इसलिए उन्होंने 2019 का चुनाव भी नहीं लड़ा और मंत्री भी नहीं बने. इस समय अमित शाह को नरेंद्र मोदी के सबसे क़रीब माना जाता है लेकिन एक समय ऐसा भी था जब मोदी के सबसे करीब अरुण जेटली थे.

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