यूपी के चुनावी दंगल में ताल ठोकने को बेताब बड़े अफसर, ऐसे में फिर उठी ‘कूलिंग ऑफ पीरियड’ की मांग

उत्तरप्रदेश का चुनावी दंगल, सूबे के बड़े अफसर ले रहे हैं VRS, अफसरों को कहां से मिल रही है राजनीति में कूदने की प्रेरणा? मोदी सरकार ने वैष्णव, आरके सिंह, एस जयशंकर, हरदीप सिंह पुरी को दिए अहम मंत्रालय, ऐसे में फिर उठने लगी मांग- नौकरी छोड़ कर सीधे चुनाव लड़ने पर लगे रोक, कूलिंग ऑफ पीरियड प्रावधान नहीं होने के कई बड़े खतरे

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चुनावी दंगल में ताल ठोकने को बेताब बड़े अफसर
चुनावी दंगल में ताल ठोकने को बेताब बड़े अफसर
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Politalks.News/UttarpradeshChunav. उत्तरप्रदेश सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों (Assembly Election) से पहले अधिकारियों का स्वैच्छिक रिटायरमेंट (VRS) के लिए आवेदन देने का सिलसिला तेज हो गया है. प्रवर्तन निदेशालय (ED) के संयुक्त निदेशक और उत्तर प्रदेश पुलिस के चर्चित अधिकारी राजेश्वर सिंह (Rajeshwar singh) ने वीआरएस के लिए आवेदन दे दिया है और कहा जा रहा है कि, ‘वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) की टिकट पर दिल्ली से सटे एनसीआर क्षेत्र की किसी सीट से चुनाव लड़ेंगे. हाल ही में कानपुर (Kanpur) में कमिश्नर नियुक्त हुए असीम अरुण (Asim Arun) ने भी वीआरएस लेने की बात कही है और बताया जा रहा है कि अरुण कन्नौज सदन की सीट से भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं.

अचानक बढ़ा अफसरों के राजनीति में कूदने का चलन
सियासी गलियारों में चर्चा है कि मोदी सरकार द्वारा अफसरों को प्रभाावी मंत्री बनाए जाने के बाद अफसरों के राजनीति में कूदने का चलन बढ़ा है. ऐसे में अब इस पर रोक लगाने की मांग भी उठने लगी है. आपको बता दें, राजनीति में उतरने के लिए कूलिंग ऑफ पीरियड नहीं होने से अफसर जिस पार्टी में जाना चाहते हैं उससे सम्बंध अच्छा रखने के लिए कहीं ना कहीं समझौता भी तो करेंगे ही, जिससे राजकाज का काम प्रभावित होता है. हालांकि अभी तो यूपी के इलेक्शन में अधिकारियों ने उतरने की तैयारी कर ली है.

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अफसरों को कहां से मिल रही है राजनीति में कूदने की प्रेरणा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को वीआरएस लेकर चुनाव लड़ने की प्रेरणा आखिर मिल कहां से रही है? जीवन भर अपने करियर, ट्रांसफर-पोस्टिंग और सुरक्षित भविष्य की चिंता में रहने वाले अधिकारी अचानक राजनीति जैसा असुरक्षित क्षेत्र कैसे चुन रहे हैं? सियासी चर्चा है कि पहले भी अधिकारी चुनाव लड़ते रहे हैं लेकिन ऐसा लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने जितनी बड़ी मात्रा में रिटायर और स्वैच्छिक रूप से रिटायर अधिकारियों को राजनीति में लाकर महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया है, उससे बाकी के अधिकारियों को ज्यादा प्रेरणा मिली है और यही कारण है कि ज्यादातर अधिकारी भाजपा के साथ ही जुड़ रहे हैं.

मोदी सरकार ने अफसरों को दिए अहम मंत्रालय
पिछले साल ही प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी दूसरी सरकार का पहला मंत्रिमंडल विस्तार किया तो ओड़िशा काडर के आईएएस अधिकारी रहे अश्विनी वैष्णव को रेल, संचार और आईटी जैसे तीन भारी भरकम मंत्रालय दिए गए. वैष्णव 1994 बैच के आईएएस हैं. उनके बैच और उनके ही काडर की आईएएस अधिकारी अपराजिता सारंगी अभी भाजपा की लोकसभा सांसद हैं. इसिलिए इसमें कोई हैरानी नहीं है कि उनके बैच के ही आईएएस अधिकारी और कानपुर के कमिश्नर असीम अरुण भी चुनाव लड़ना चाहते हैं. अश्विनी वैष्णव के अलावा आरके सिंह, एस जयशंकर, हरदीप सिंह पुरी जैसे अनेक पूर्व नौकरशाह, जो नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री हैं वे भी नए अधिकारियों के नौकरी छोड़ कर चुनाव लड़ने की प्रेरणा बने हैं.

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अरविंद शर्मा की हुई थी राजनीति में शानदार एंट्री
आपको याद दिला दें, पिछले साल प्रधानमंत्री कार्यालय के अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी अरविंद शर्मा ने आनन-फानन में वीआरएस लिया और उनको उत्तरप्रदेश भेजा गया. लखनऊ पहुंचने के चंद दिनों बाद ही शर्मा विधान परिषद के सदस्य बन गए और पार्टी के उपाध्यक्ष भी बन गए. सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की रही कि प्रधानमंत्री कार्यालय में नौकरी करना हर नौकरशाह का सपना होता है. लेकिन अरविंद शर्मा पीएमओ छोड़ कर उत्तर प्रदेश में राजनीति करने गए. उनकी धमाकेदार एंट्री भी करवाई गई हालांकि वे मंत्री नहीं बन सके. माना जा रहा है कि आगे अगर भाजपा की सरकार आती है तो अरविंद शर्मा को बड़ी भूमिका मिलेगी क्योंकि वे गुजरात से लेकर दिल्ली तक प्रधानमंत्री के करीबी अधिकारी रहे हैं.

पुरानी मांग: नौकरी छोड़ कर सीधे चुनाव लड़ने पर लगे रोक
सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह बहुत चिंताजनक प्रवृत्ति है, जो तेजी से बढ़ रही है. आईएएस, आईपीएस या राज्य सेवा के अधिकारी सरकारी नौकरी छोड़ कर सीधे चुनाव मैदान में कूद रहे हैं. इस परिपाटी पर रोक लगाने की जरुरत है. माना जाता है कि इससे सरकारी सेवा की गुणवत्ता पर अभी असर होगा और राजनीति भी प्रभावित होगी. सरकार अधिकारियों की सेवा शर्तों में कई तरह के नियंत्रण के उपाय हैं. जैसे सरकारी सेवा छोड़ कर तत्काल किसी निजी कंपनी में नौकरी ज्वाइन करने के लिए अधिकारियों को कूलिंग ऑफ पीरियड से गुजरना होता है. कुछ मामलों में सरकार कूलिंग ऑफ पीरियड को माफ भी कर देती है लेकिन उसके लिए भी एक प्रक्रिया से गुजरना होता है. उसी तरह की कोई व्यवस्था अधिकारियों के चुनाव लड़ने पर भी होनी चाहिए. अभी कूलिंग ऑफ पीरियड का कोई प्रावधान नहीं होने की वजह से अधिकारी चुनाव से ऐन पहले इस्तीफा देते हैं या स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेते हैं और चुनाव में कूद जाते हैं.

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कूलिंग ऑफ पीरियड नहीं होने के खतरे
आपको बता दें, सरकारी सेवा में ‘कूलिंग ऑफ पीरियड’ नहीं होने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि अधिकारी अपनी सेवा के दौरान समझौता कर सकता है. वह जिस पार्टी के साथ चुनाव लड़ना चाहता है उसके प्रति उसका रवैया अलग हो सकता है. वह उस पार्टी के नेता के साथ अपने संबंध बेहतर करने के लिए अपने कामकाज में समझौता कर सकता है. दूसरा खतरा यह है कि वह जिस पार्टी से जुड़ेगा उसके साथ सरकार की गोपनीय बातें साझा कर सकता है. इसलिए यह प्रावधान होना चाहिए कि चाहे अधिकारी इस्तीफा दे, वीआरएस ले या सेवा से रिटायर हो, वह दो साल या तीन साल तक चुनाव नहीं लड़ पाएगा.

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