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नेशनल टास्क फोर्स ने उठाया कोरोना संक्रमण से निपटने में सरकार के रवैये पर सवाल, लॉकडाउन को बताया क्रूर

01 जून 2020
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नेशनल टास्क फोर्स ने उठाया कोरोना संक्रमण से निपटने में सरकार के रवैये पर सवाल, लॉकडाउन को बताया क्रूर

पॉलिटॉक्स न्यूज. राज्य और केंद्र की मोदी सरकार चाहें कितना भी लॉकडाउन को कोरोना संकट में रामबाण बता रही हो लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स की राय इससे जुदा है. उनके अनुसार, लॉकडाउन एक क्रूर निर्णय था और कि लॉकडाउन की कठोर सख्ती, नीतियों में समन्वय की कमी की कीमत अब भारत को चुकानी पड़ रही है. कोरोना संक्रमण रोकने के लिए बने नेशनल टास्क फोर्स के विशेषज्ञों ने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये जानकारी दी है. एक्सपर्ट्स ने ये भी बताया कि भारत के कई जोन में अब कोरोना का सामुदायिक संक्रमण हो रहा है, इसलिए ये मानना गलत होगा कि मौजूदा हाल में कोरोना पर काबू कर पाना … Read more

पॉलिटॉक्स न्यूज. राज्य और केंद्र की मोदी सरकार चाहें कितना भी लॉकडाउन को कोरोना संकट में रामबाण बता रही हो लेकिन मेडिकल एक्सपर्ट्स की राय इससे जुदा है. उनके अनुसार, लॉकडाउन एक क्रूर निर्णय था और कि लॉकडाउन की कठोर सख्ती, नीतियों में समन्वय की कमी की कीमत अब भारत को चुकानी पड़ रही है. कोरोना संक्रमण रोकने के लिए बने नेशनल टास्क फोर्स के विशेषज्ञों ने पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ये जानकारी दी है. एक्सपर्ट्स ने ये भी बताया कि भारत के कई जोन में अब कोरोना का सामुदायिक संक्रमण हो रहा है, इसलिए ये मानना गलत होगा कि मौजूदा हाल में कोरोना पर काबू कर पाना संभव हो सकेगा.

मेडिकल क्षेत्र से जुड़ी तीन नामी मेडिकल संस्थाओं ने एक संयुक्त बयान वाले पत्र लिखने वालों में स्वास्थ्य मंत्रालय के पूर्व सलाहकार, एम्स, बीएचयू, जेएनयू के पूर्व और मौजूदा प्रोफेसर शामिल हैं जिसमें कोरोना पर अध्ययन के लिए गठित कमेटी के प्रमुख डॉ. डीसीएस रेड्डी और दिल्ली स्थित एम्स में कम्युनिटी मेडिसिन के प्रमुख और रिसर्च ग्रुप के सदस्य डॉ. शशिकांत के भी हस्ताक्षर हैं. कोविड-19 पर गठित नेशनल टास्क फोर्स के सदस्यों ने कोरोना संक्रमण से निपटने में सरकार के रवैये की आलोचना की भी है. संयुक्त बयान में कहा गया है कि अगर भारत सरकार शुरुआत में संक्रमण विशेषज्ञों की राय ली होती तो हालात पर ज्यादा प्रभावी तरीके से काबू पाया जा सकता था.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में इन विशेषज्ञों ने लिखा, ‘यदि इस महामारी की शुरुआत में ही, जब संक्रमण की रफ्तार कम थी, मजदूरों को घर जाने की अनुमति दे दी गई होती तो मौजूदा हालत से बचा जा सकता था. शहरों से लौट रहे मजदूर अब देश के कोने-कोने में संक्रमण ले जा रहे हैं, इससे ग्रामीण और कस्बाई इलाके प्रभावित होंगे, ज्यादा स्वास्थ्य व्यवस्थाएं उतनी मुकम्मल नहीं हैं. इस बयान में कहा गया है कि अगर भारत सरकार शुरुआत में संक्रमण विशेषज्ञों की राय ली होती तो हालात पर ज्यादा प्रभावी तरीके से काबू पाया जा सकता था.’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में इन विशेषज्ञों ने लॉकडाउन को क्रूर बताया है और कहा है कि लॉकडाउन की कठोर सख्ती, नीतियों में समन्वय की कमी की कीमत अब भारत को चुकानी पड़ रही है. पत्र में लिखा गया है कि ये सोचना कि इस स्तर पर कोरोना वायरस पर काबू पा लिया जा सकेगा हकीकत से परे होगा, क्योंकि भारत के कई कलस्टर में कम्युनिटी ट्रांसमिशन पूरी तरह से होने लगा है.

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गौरतलब है कि भारत में कम्युनिटी ट्रांसमिशन के संभावित सबूत पहले भी मिले थे. अप्रैल महीने में भारत की मेडिकल रिसर्च संस्था आईसीएमआर ने इस ओर इशारा किया था. हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने तब इसे नजरअंदाज कर दिया था. अप्रैल महीने में कोरोना महामारी पर निगरानी के लिए नेशनल टास्क फोर्स ने एक कमेटी गठित की थी.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी का भी कहना है कि उन्होंने जनवरी माह में कोरोना महामारी के खतरे से सरकार को अवगत कराया था लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. अब हालात ये हैं कि देश में कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या दो लाख के करीब पहुंच रहे है और साढ़े पांच हजार से ज्यादा को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है.

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