दिल्ली विधानसभा चुनाव: खास रहा है ‘नई दिल्ली’ सीट का इतिहास, लगातार तीन मुख्यमंत्री दे चुकी, अब चौथा मुख्यमंत्री देने जा रही है

पिछले 11 सालों में इस सीट ने दिल्ली की जनता को दिए तीन मुख्यमंत्री, देश के प्रतिष्ठित निर्वाचन क्षेत्रों में से एक मानी जाती है ये सीट, अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी जैसे दिग्गज़ भी लड़ चुके हैं यहां से लोकसभा चुनाव

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पॉलिटॉक्स ब्यूरो. देश की राजधानी दिल्ली में विधानसभा चुनाव का आगाज हो चुका है. 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा के लिए 8 फरवरी को मतदान होगा और 11 को आएंगे नतीजे. ऐसे में दिल्ली की चर्चित विधानसभा सीट ‘नई दिल्ली‘ का जिक्र करना जरूरी है. देश की राजधानी दिल्ली में नई दिल्ली सीट का इतिहास काफी खास है. 2008 में अस्तित्व में आई इस सीट ने दिल्ली को तीन मुख्यमंत्री दिए हैं और चौथा देने की तैयारी में है. एक बात काबिले गौर है कि इस सीट को अस्तित्व में आए केवल 11 साल ही हुए हैं. हां, लोकसभा क्षेत्र के मामले में ये सीट सालों से देश के सबसे प्रतिष्ठित निर्वाचन क्षेत्रों में से एक मानी जाती है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, बीजेपी के भीष्म पितामह लाल कृष्ण आडवाणी जैसे दिग्‍गज नेता यहां से सांसद रहकर इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.

बात करें नई दिल्ली विधानसभा सीट के स्वरूप की तो इस क्षेत्र में 1 लाख 44 हजार 509 कुल मतदाता हैं, जिनमें 79047 पुरुष और 65461 महिलाएं हैं. इनमें 80 साल से ऊपर के वोटर्स की संख्या 2301 तो 344 दिव्यांग मतदाता हैं वहीं 10 हजार मतदाता झुग्गी-झोपड़ी वाले हैं. इस इलाके में केंद्र सरकार में कार्यरत कर्मचारियों की संख्या अधिक है.

नई दिल्ली विधानसभा सीट साल 2008 में अस्तित्व में आई. इस सीट पर सबसे पहले उस समय तक दिल्ली की लगातार दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी कांग्रेस की शीला दीक्षित ने नामांकन दाखिल किया और जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार और दिल्ली की 8वीं मुख्यमंत्री बनीं. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार विजय जौली को 13962 मतों से पटखनी दी. इससे पहले शीला दीक्षित ने दो बार गोल मार्किट से चुनाव लड़ा. जिसमें दीक्षित ने 1999 में बीजेपी के कीर्ति आजाद और उससे पहले 2003 में बीजेपी की पूनम आजाद को मात दी. सुषमा स्वराज के बाद शीला दीक्षित दिल्ली की दूसरी महिला मुख्यमंत्री बनी थीं. उन्होंने इतिहास रचते हुए लगातार तीन बार दिल्ली की सत्ता संभाली. इस चुनाव में कांग्रेस ने 70 में से 43 सीटों पर कब्जा जमाया.

2013 में राजनीति में एक नया नवेला चेहरा शीला दीक्षित के रास्ते में रोडा बनकर उभरा और उसका नाम था अरविंद केजरीवाल. सियासत में पहली बार कदम रख रहे केजरीवाल ने पहली बार में ही शीला दीक्षित के सामने नई दिल्ली सीट से पर्चा भरा. शीला दीक्षित एक जाना माना लोकप्रिय चेहरा थीं लेकिन बावजूद इसके अरविंद केजरीवाल ने सबको चौंकाते हुए 25,864 वोटों से शीला दीक्षित को हरा दिया जो कि अविश्वसनीय था. शीला दीक्षित के साथ खुद कांग्रेस को भी ये हार पचा पाना मुश्किल रहा. केजरीवाल की पार्टी ने 70 में से 28 सीटों पर कब्जा जमाया. वहीं बीजेपी ने 31 सीटें जीतीं. कांग्रेस का इन चुनावों में सफाया हो गया और पार्टी 8 सीटों पर सिमट गई. इसके बाद आप ने कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई और अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के 9वें मुख्यमंत्री के रूप में सीएम पद की शपथ ग्रहण की.

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दो पहियों पर चल रही ये सरकार दो महीने भी चल पाई और गठबंधन सरकार बनने के केवल 49 दिन बाद ये सरकार गिर गई. केजरीवाल जब दिल्ली विधानसभा में जनलोकपाल बिल लेकर आए तो कांग्रेस के समर्थन न करने से यह बिल पास नहीं हो सका और अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. सरकार गिर गई और करीब दो साल तक राजधानी में राष्ट्रपति शासन लग गया. इस दौरान दिल्ली के राज्यपाल ने बीजेपी और आप को सरकार गठन के लिए निमंत्रण भेजा लेकिन ऐसा हो न सका. बीजेपी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी और केजरीवाल ने बीजेपी से गठबंधन करने से साफ इनकार कर दिया.

2015 में फिर से चुनाव हुआ और एक बार फिर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने न सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरी दुनिया को चौंकाते हुए 70 में 67 सीटों पर जीत दर्ज की. बीजेपी तीन सीटों पर सिमट कर रह गई तो कांग्रेस का तो खाता तक नहीं खुला. इस तरह अरविंद केजरीवाल ने लगातार दूसरी बार नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. कांग्रेस ने इस सीट पर पूर्व मंत्री प्रो.किरण वालिया तो बीजेपी ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ की पूर्व अध्यक्ष नुपुर शर्मा को केजरीवाल के सामने उतारा था. केजरीवाल ने 31 हजार से अधिक वोटों से नुपुर शर्मा को हराया, कांग्रेस तीसरे नंबर पर रही. चुनाव में फतह करने के बाद केजरीवाल ने लगातार दूसरी बार और दिल्ली के 10वें मुख्यमंत्री के तौर पर सत्ता की कुर्सी संभाली.

अब अगले माह होने वाले 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक बार फिर अरविंद केजरीवाल ने नई दिल्ली सीट से नामांकन दाखिल किया है. इस बार उनके सामने बीजेपी की ओर से सुनील यादव मैदान में हैं. वहीं कांग्रेस ने रोमेश सभरवाल को अपना उम्मीदवार बनाया है. इस सीट का खौफ कहें या फिर केजरीवाल की पॉपुलर्टी, आप पार्टी की एक साथ 70 प्रत्याशियों की सूची आने के लगभग सप्ताहभर बाद भी दोनों ही पार्टियां नई दिल्ली सीट पर अपना उम्मीदवार घोषित नहीं कर पाईं. दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी अपने काम पर तो बीजेपी मोदी चेहरे पर चुनाव लड़ रही है. वहीं कांग्रेस ने शीला दीक्षित सरकार में हुए विकास कार्यों को ही अपना चुनावी आधार बनाया है.

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पॉलिटॉक्स का आंकलननई दिल्ली सीट पर केजरीवाल के सामने दोनों पार्टियों ने जिस तरह से अंतिम समय तक प्रत्याशी उतारने में ही इतना समय जाया कर दिया, मतलब साफ है कि केजरीवाल के सामने ताल ठोकने की हिम्मत कोई नेता नहीं कर पा रहा. दूसरी तरफ सोमवार को हुए अरविंद केजरीवाल के रोड़ शो में उमड़ी भीड़ इस बात का साफ संकेत देती है कि इस बार भी केजरीवाल इस नई दिल्ली सीट पर हैट्रिक जमाने वाले हैं. इस सीट पर सीएम अरविंद केजरीवाल के आस पास भी कोई नहीं भटकेगा बल्कि केजरीवाल की एक तरफा और बड़े अंतर से जीत तय मानी जा रही है. ऐसे में बीजेपी और कांग्रेस के प्रत्याशियों के लिए नई दिल्ली सीट किसी कब्रगाह से कम नहीं है. नतीजे आने पर स्थिति पूरी तरह से साफ हो जाएगी.