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SIR पर सियासी घमासान: चुनाव आयोग की आंतरिक आपत्तियों पर विपक्ष के सवाल, बीजेपी ने किया पलटवार

23 सितंबर 2026
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SIR पर सियासी घमासान: चुनाव आयोग की आंतरिक आपत्तियों पर विपक्ष के सवाल, बीजेपी ने किया पलटवार

14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद बढ़ी राजनीतिक बहस, ममता-अखिलेश ने उठाए सवाल; बीजेपी ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया का किया बचाव

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है. चुनाव आयोग के भीतर SIR और मतदाता सूची से जुड़े कुछ फैसलों पर चुनाव आयुक्तों की ओर से लिखित आपत्तियों की एक रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग को घेरा है. वहीं बीजेपी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग का बचाव किया है.

पूरे विवाद का केंद्र एक रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं. रिपोर्ट में मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने तथा कुछ प्रक्रियागत बदलावों से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया है.

हालांकि, किसी अधिकारी की ओर से किसी फैसले पर आपत्ति दर्ज किया जाना अपने आप में चुनावी अनियमितता या चुनाव में हेरफेर साबित नहीं करता. इसी बिंदु पर चुनाव आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण है, जिसने कहा है कि आयोग के भीतर विचार-विमर्श और मतभेद निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं.

ममता ने किया तीखा हमला 

रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं. विपक्ष का तर्क है कि यदि आयोग के भीतर ही महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज की गई थीं, तो इन पर सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और बीजेपी पर तीखा राजनीतिक हमला किया. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की और SIR के बाद हुए चुनावों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. ममता बनर्जी ने यह आरोप भी लगाया कि मतदाता सूची में बदलाव का इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किया गया. हालांकि, ये उनके राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता.

अखिलेश यादव ने भी उठाए सवाल

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग के भीतर बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज होना गंभीर विषय है. अखिलेश यादव ने 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का भी संदर्भ दिया. उन्होंने दावा किया कि समाजवादी पार्टी के समर्थक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की शिकायतें पार्टी की ओर से चुनाव आयोग के सामने रखी गई थीं.

बचाव में बीजेपी: आरोपों को बताया राजनीतिक हमला

विपक्ष के आरोपों पर बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने चुनाव आयोग का बचाव किया. उन्होंने कहा कि चुनावी हार के बाद विपक्ष लगातार संवैधानिक संस्थाओं को निशाना बना रहा है. पात्रा ने चुनाव आयोग के भीतर हुई चर्चाओं और आपत्तियों को निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया. उन्होंने यह भी कहा कि आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसके फैसले निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए.

पात्रा ने पश्चिम बंगाल के आंकड़ों का हवाला देते हुए विपक्ष के ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर सवाल उठाया. बीजेपी का तर्क है कि जिन सीटों पर बड़ी संख्या में मतदाता नाम हटाए जाने की बात कही जा रही है, वहां चुनाव परिणामों को केवल मतदाता सूची में बदलाव से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा.

आखिर क्या है SIR और विवाद की वजह?

SIR मतदाता सूची के व्यापक पुनरीक्षण की प्रक्रिया है. इसका उद्देश्य मतदाता सूची में पात्र मतदाताओं को शामिल करना और अपात्र, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं से संबंधित रिकॉर्ड को अपडेट करना है. विवाद तब बढ़ा जब विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं. विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और किसी भी पात्र मतदाता को अपना नाम सूची में बनाए रखने या बहाल कराने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए. दूसरी ओर चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक नियमित संवैधानिक प्रक्रिया है और इसका उद्देश्य सूची को अधिक सटीक बनाना है.

दरअसज, रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज 14 लिखित आपत्तियों का उल्लेख है. इन आपत्तियों को लेकर राजनीतिक दल अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं.

ऐसे में इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल राजनीतिक आरोपों से अलग हैं. क्या SIR की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप हुई? क्या किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया? आपत्तियों पर आयोग ने क्या निर्णय लिया? और क्या किसी अनियमितता की स्वतंत्र जांच या न्यायिक स्तर पर पुष्टि हुई है? अब इस मुद्दे पर विपक्ष सत्ताधारी पार्टी को घेरने की पूरजोर कोशिश कर रहा है. देखना होगा कि अब ये सियासी बयानबाजी किस स्तर तक पहुंचती है ओर क्या दवाब में आकर केंद्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कोई एक्शन लेता है या फिर नहीं.


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