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पंजाब में कांग्रेस का ‘नो CM फेस' दांव, क्या गुटबाजी के बीच यही बनेगा जीत का फॉर्मूला?

23 सितंबर 2026
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पंजाब में कांग्रेस का ‘नो CM फेस' दांव, क्या गुटबाजी के बीच यही बनेगा जीत का फॉर्मूला?

2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने अपनाई सामूहिक नेतृत्व की रणनीति, पिछली बार CM फेस के बावजूद मिली थी करारी हार, क्या चेहरा छिपाकर पार्टी अंदरूनी खींचतान को साध पाएगी?

Punjab Congress: पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो चुकी है. आम आदमी पार्टी की सरकार के सामने विपक्षी दल अपनी-अपनी रणनीति को धार देने में जुटे हैं. इसी बीच कांग्रेस ने पंजाब में एक अहम रणनीतिक फैसला लिया है. पार्टी चुनाव मैदान में किसी एक नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किए बिना सामूहिक नेतृत्व में उतरेगी. कांग्रेस के पंजाब प्रभारी सचिन पायलट ने साफ किया है कि पार्टी चुनाव से पहले CM फेस घोषित नहीं करेगी और चुनावी अभियान सामूहिक नेतृत्व में चलाया जाएगा.

यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब पंजाब कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और गुटबाजी को लेकर लंबे समय से खींचतान चर्चा में रही है. पायलट की जिम्मेदारी संभालने के बाद पार्टी ने सार्वजनिक तौर पर एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है. हालिया प्रदर्शन के दौरान पंजाब कांग्रेस के कई प्रमुख नेता एक मंच पर दिखाई दिए और सामूहिक नेतृत्व की रणनीति को समर्थन दिया.

‘एक चेहरा’ नहीं, सामूहिक नेतृत्व पर दांव

कांग्रेस की नई रणनीति का मूल उद्देश्य चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर होने वाली संभावित खींचतान से बचना दिखाई देता है. पार्टी का संदेश है कि चुनाव किसी एक नेता के नाम पर नहीं, बल्कि संगठन और सामूहिक नेतृत्व के आधार पर लड़ा जाएगा. चुनाव के बाद विधायक दल और पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री पद को लेकर फैसला करेंगे.

इस रणनीति में राहुल गांधी को भी चुनावी अभियान के प्रमुख चेहरों में रखा गया है. पंजाब चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा और मुख्यमंत्री का फैसला चुनाव के बाद किया जाएगा. दरअसल, पंजाब कांग्रेस के सामने चुनौती केवल सत्ता में वापसी की नहीं, बल्कि चुनाव से पहले संगठन को एक मंच पर बनाए रखने की भी है. ऐसे में किसी एक नेता को सीएम फेस घोषित करने से दूसरे दावेदारों या उनके समर्थक खेमों में असंतोष पैदा होने की आशंका पार्टी के लिए रणनीतिक चिंता का विषय हो सकती है.

कांग्रेस के लिए यह फॉर्मूला नया नहीं

बिना मुख्यमंत्री चेहरे के चुनाव लड़ने की रणनीति कांग्रेस पहले भी अपना चुकी है. 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पार्टी ने किसी एक नेता को औपचारिक CM फेस बनाकर चुनाव नहीं लड़ा. तीनों राज्यों में कांग्रेस सत्ता बनाने में सफल रही, हालांकि मध्य प्रदेश में पार्टी 114 सीटों के साथ बहुमत से दो सीट दूर रही और बाद में सरकार बनाई. राजस्थान में भी कांग्रेस 100 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी.

कर्नाटक में भी 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया था. चुनाव प्रचार में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार दोनों प्रमुख राज्य स्तरीय चेहरों के तौर पर सामने रहे. चुनाव परिणाम के बाद पार्टी ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया.

हालांकि इस रणनीति का चुनावी परिणाम हर जगह एक जैसा नहीं रहा. 2022 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में कांग्रेस ने बिना घोषित CM फेस के चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी को सत्ता हासिल नहीं हुई. इसलिए केवल CM फेस घोषित न करने को चुनावी सफलता का निश्चित फॉर्मूला मानना मुश्किल है.

पंजाब में पिछली बार ‘CM फेस’ के साथ उतरी थी कांग्रेस

पंजाब का पिछला विधानसभा चुनाव कांग्रेस की मौजूदा रणनीति को समझने के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है. फरवरी 2022 में राहुल गांधी ने चरणजीत सिंह चन्नी को कांग्रेस का मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया था, लेकिन चुनाव परिणाम कांग्रेस के पक्ष में नहीं रहे. आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस 18 सीटों पर सिमट गई. चन्नी खुद भी अपनी दोनों विधानसभा सीटों से चुनाव हार गए.

यानी पंजाब के संदर्भ में पिछला अनुभव यह जरूर दिखाता है कि CM फेस घोषित करना अपने आप में चुनावी सफलता की गारंटी नहीं है. लेकिन इसी तरह, अन्य राज्यों के अनुभव यह भी बताते हैं कि CM फेस न घोषित करना भी अपने आप में जीत की गारंटी नहीं है.

असली परीक्षा गुटबाजी को साधने की

पंजाब कांग्रेस के लिए इस बार सबसे बड़ी चुनौती रणनीति से ज्यादा उसके क्रियान्वयन की है. पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेदों की खबरें लगातार सामने आती रही हैं. सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने के पीछे भी संगठन को एकजुट करने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण रही है.

ऐसे में ‘नो सीएम फेस’ फॉर्मूला पार्टी के भीतर संभावित नेतृत्व संघर्ष को चुनाव तक टालने का एक तरीका भी बन सकता है. यदि सभी प्रमुख नेता एक साथ प्रचार करते हैं और संगठनात्मक एकजुटता कायम रहती है, तो पार्टी को एक साझा चुनावी नैरेटिव बनाने में मदद मिल सकती है. लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी जुड़ा है: क्या चुनाव तक सभी दावेदार और उनके समर्थक इसी सामूहिक नेतृत्व की लाइन पर कायम रहेंगे? क्योंकि चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी फिर से सामने आ सकती है.

पंजाब में बदलेगा कांग्रेस का चुनावी समीकरण!

पंजाब में कांग्रेस के सामने इस बार मुकाबला बहुस्तरीय राजनीतिक परिस्थितियों में होने जा रहा है. आम आदमी पार्टी सत्ता में है, जबकि बीजेपी और अकाली दल भी अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस के लिए केवल अंदरूनी एकता ही नहीं, बल्कि जनता के बीच अपने मुद्दों और संगठनात्मक ताकत को प्रभावी ढंग से पेश करना भी महत्वपूर्ण होगा.

कांग्रेस के ‘बिना सीएम फेस’ फॉर्मूले का फायदा यह हो सकता है कि पार्टी चुनाव से पहले किसी एक नेता के पक्ष या विपक्ष में बनने वाले गुटीय समीकरणों से बच सके. वहीं चुनौती यह होगी कि नेतृत्व को लेकर स्पष्टता के अभाव को विरोधी दल किस तरह चुनावी मुद्दा बनाते हैं और पार्टी खुद अपने अभियान में किस चेहरे तथा किस मुद्दे को सबसे प्रमुख बनाती है.

फिलहाल कांग्रेस ने अपना रास्ता साफ कर दिया है: पहले चुनाव, फिर मुख्यमंत्री. अब पंजाब की सियासत में असली सवाल यही है कि क्या सामूहिक नेतृत्व के नाम पर एकजुट दिखाई देने वाली कांग्रेस मतदान तक अपनी इस एकता को बनाए रख पाएगी और क्या यह रणनीति 2022 के अनुभव से अलग राजनीतिक परिणाम देने में मदद करेगी. इसका जवाब 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे ही देंगे

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