RCA: वैभव गहलोत के अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ, अब शायद ही कोई दूसरा डूडी बने

जैसा कि पॉलिटॉक्स अपने दर्शकों को शुरू से बताता आ रहा है कि अपने पुत्र के लोकसभा में मिली करारी हार के ज़ख्म पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) RCA अध्यक्ष का मरहम लगाने की पुरजोर तैयारी में लगे हुए हैं. मुख्यमंत्री गहलोत की यह जादूगरी अब कामयाब होने के कगार पर है. सीएम पुत्र वैभव गहलोत (Vaibhav Gehlot) के RCA के निर्विरोध अध्यक्ष बनने की तस्वीर अब पूरी तरह साफ हो गई है. सोमवार को दिन भर चली राजनीतिक सुनवाई के बाद चुनाव अधिकारी आरआर रश्मि (RR Rashmi) ने देर रात लगभग 2 बजे RCA चुनाव के लिए फाइनल वोटर लिस्ट जारी कर दी.

चुनाव अधिकारी द्वारा जारी हुई इस वोटर लिस्ट के सामने आने के बाद में जहां सीएम गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत का राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के अध्यक्ष बनने का रास्ता साफ हो गया है वहीं पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी (Rameshwar Dudi) का पत्ता कट चुका है. अब मंगलवार से नामांकन भरना शुरू होगा और बुधवार दोपहर तक नामांकन भरे जा सकेंगे, चुनाव के लिए वोटिंग चार अक्टूबर को होगी. यहां पॉलिटॉक्स का आकलन ये है कि वैभव गहलोत निर्विरोध RCA अध्यक्ष चुने जाएंगे, क्योंकि रामेश्वर डूडी के हश्र के बाद सरकार के खिलाफ बगावत करने की हिम्मत अब शायद ही कोई जुटा पाये.

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सोमवार देर रात जारी हुई वोटर लिस्ट में ललित मोदी (Lalit Modi) गुट या कहें वर्तमान नांदू गुट के अलवर, नागौर और श्रीगंगानगर तीनों जिलों को अयोग्य ठहराया दिया गया गया है. इन जिला संघों में दोनों गुट में से किसी को भी मान्यता नहीं दी गई है. इन तीनों जिलों संघों का कोई भी प्रतिनिधि RCA का चुनाव नहीं लड़ सकता है. ऐसे में अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी जता चुके पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी का पत्ता भी कट चुका है क्योंकि वे नागौर जिला क्रिकेट संघ से प्रतिनिधित्व कर रहे थे. वहीं वैभव के अध्यक्ष बनने का रास्ता खुल चुका है क्योंकि वे राजसमंद जिला क्रिकेट संघ से कोषाध्यक्ष के रूप में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

वहीं, पूर्व नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेस के दिग्गज नेता और हाल ही में चुने गए नागौर क्रिकेट संघ (Nagaur Cricket Association) के अध्यक्ष रामेश्वर डूडी ने सोमवार को वोटरलिस्ट जारी होने से पूर्व आरोप लगाया कि आरसीए चुनाव (RCA Election) में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि सीपी जोशी भले ही क्रिकेट का तजुर्बा रखते हैं, लेकिन उनका रवैया और तरीका ठीक नहीं रहा. कोई भी संस्था गुटबाजी से आगे नहीं बढ़ सकती है. यही हाल कई सालों से RCA का हो रहा है, RCA पार्टी से काफी ऊपर है.

रामेश्वर डूडी ने आगे कहा कि RCA में शामिल जिला संघ के पदाधिकारी अन्य राजनीतिक पार्टियों से भी जुड़े हुए हैं, इसलिए इसका कांग्रेस पार्टी से कोई लेना देना नहीं है. डूडी ने कहा कि हजारों युवाओं के भाग्य और उनकी भावनाओं की कद्र करते हुए हम एक जाजम पर बैठकर सकारात्मक सोच के साथ फैसला लेने को तैयार हैं. वहीं भाजपा के नेता और कोटा जिला संघ के सचिव आमिन पठान ने कहा कि RCA के कुछ जिला संघों पर आज भी ललित मोदी का दखल है. उन्होंने कहा कि पर्दे के पीछे ललित मोदी ही काम कर रहे हैं. पठान ने आरोप लगाया कि रामेश्वर डूडी का क्रिकेट से कोई लेना देना नहीं हैं.

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चुनाव अधिकारी आरआर रश्मि द्वारा RCA चुनाव के लिए जारी जिला वाइज वोटर लिस्ट: –

  • अजमेर : इलियास कुरैशी, राजेश भडाना, गुंजन शर्मा
  • अलवर : अयोग्य ………
  • बांसवाडा : महेश सर्राफ, नृपजीत सिंह, राजकुमार सिंह
  • बारां : सूर्यकांत शुक्ला, रजेश गुप्ता, सुरेश ठाकार
  • बाडमेर : हेमाराम चौधरी, देवाराम चौधरी, आजाद सिंह
  • भरतपुर : अरुण सिंह, शत्रुध्र तिवारी, ब्रजराज भोंट
  • भीलवाड़ा : रामपाल शर्मा, महेन्द्र नाहर, नरेन्द्र ओझा
  • बीकानेर : अशोक अहोरी, रतन सिंह, चंदू पानिया
  • बूंदी : शक्ति प्रकाश माथुर, राज कुमार माथुर, राम शंकर सारंगी
  • चित्तौडगढ़ : जाकिर हुसैन, शक्ति सिंह राठौर, धर्मेन्द्र मुंद्रा
  • चूरू : मुरारी लाल शर्मा, सुशील शर्मा, दीन दयाल सारस्वत
  • दौसा : शोभना गुर्जर, ब्रज किशोर उपाध्याय, विनय जैन
  • धौलपुर : सुशील राना, सुमेन्द्र तिवारी, भूपेन्द्र राना
  • डूंगरपुर : शैलेश चौबीसा, हर्षवद्र्धन सिंह, जितेन्द्र श्रीमाली
  • हनुमानगढ़ : संजीव बेनिवाल, हेतराम धर्निया, राजीव गोदारा
  • जयपुर : महेश जोशी, डॉ. बिमल सोनी, समीर शर्मा
  • जैसलमेर : विमलेश पुरोहित, विमल शर्मा, हरिवल्लभ बोहरा
  • जालोर : संजय माथुर, सतीश व्यास, अनिल शुक्ला
  • झालावाड़ : मो. इमरान, फारुख अहमद, हश्मत हुसैन
  • झुन्झुनूं : राजेन्द्र सिंह राठौर, आरबी चौमाल, रमेश शर्मा
  • जोधपुर : मोहन सिंह जोधा, राम प्रकाश चौधरी, अंजनि कुमार माथुर
  • करौली : सुरेश पाल, शिव चरण माली, राजेश सारस्वत
  • कोटा : अरविंदर सिंह कपूर, अमीन पठान, अशोक रजवानी
  • नागौर : अयोग्य
  • पाली : एश्वर्य सिंह कटोच, धर्मवीर सिंह शेखावत, रवि प्रकाश
  • राजसमंद : डॉ. सीपी जोशी, गिरिराज सनाड्य, वैभव गहलोत
  • सवाई माधोपुर : किशोर रूंगटा, डॉ. सुमित गर्ग, गणेश गोयल
  • सीकर : कृष्ण कुमार नीमावत, सुभाष जोशी, रमेश भोजक
  • सिरोही : सत्यम मीना, संयम लोढा, रातेनद्र सिंह देवरा
  • श्रीगंगानगर : अयोग्य
  • टोंक : निर्मल गंगवाल, अनंत व्यास, इम्तियाज अली खान
  • उदयपुर : मनोज भटनागर, महेन्द्र शर्मा, महिपाल सिंह
  • प्रतापगढ़ : हेमंत मीना, पिंकेश जैन, संदीप शर्मा
  • सलीम दुर्रानी …….. पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी
  • गगन खोड़ा…………..पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी

RCA अध्यक्ष पद की दौड़ में अब डूडी आये खुलकर सामने

राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) में अध्यक्ष पद के लिए मचे बवाल के बीच अब रामेश्वर डूडी (Rameshwar Dudi) खुलकर सामने आ गये हैं. डूडी ने कहा है कि, “अगर जिला संघ चाहेंगे तो लड़ूंगा अध्यक्ष का चुनाव, फिर चाहे सामने कोई भी हो”. अपने इस बयान से रामेश्वर डूडी ने सीधे-सीधे मुख्यमंत्री के पुत्र वैभव गहलोत को चुनौती दी है. क्योंकि RCA में अध्यक्ष पद के लिए अभी तक वैभव गहलोत के अलावा किसी ओर का नाम सामने नहीं आया है.

गौरतलब है कि हाल ही में RCA सचिव आरएस नांदू की मदद से नागौर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष चुने जाने के बाद पहली बार जब रामेश्वर डूडी जयपुर आरसीए कार्यालय पहुँचे थे तब पत्रकारों से बातचीत में डूडी ने कहा था कि, “अगर वैभव गहलोत (Vaibhav Gehlot) RCA में आते हैं तो निर्विरोध कार्यकारिणी चुनी जाएगी.” साथ ही डूडी ने कहा था कि, “ललित मोदी का राजस्थान में कोई पट्टा नहीं है. जोशीजी सीनियर लीडर हैं, आरसीए उनके नेतृत्व में काम करेगा”. लेकिन रामेश्वर डूडी के आरसीए अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने के उक्त ताजा बयान के बाद यह बात विचारणीय है कि आखिर कांग्रेस के दिग्गज नेता डूडी की कौनसी बात पर अपनी ही प्रदेश सरकार के आला नेताओं से सहमति नहीं बन पाई है. यहां हमारा इशारा खींवसर विधानसभा सीट के लिए होने उपचुनाव से है.

पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी से जब पूछा गया कि आप नागौर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं और इस जिले की कार्यकारिणी को बीसीसीआई की शर्त के अनुसार आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी के कारण मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष और आरसीए अध्यक्ष सीपी जोशी गुट ने सस्पैंड कर रखा है, ऐसे में आप चुनाव कैसे लड़ सकते हैं? इस पर डूडी ने अपने तल्ख अंदाज में कहा कि, “बीसीसीआई या जोशी कब तक ललित मोदी-ललित मोदी गाते रहेंगे, ललित मोदी करीब दो साल पहले ही क्रिकेट से खुद को अलग कर चुके हैं. अब मोदी न तो नागौर जिला क्रिकेट संघ से जुड़े हैं और न ही किसी अन्य क्लब से, इससे संबंधित कागजात आरसीए को उपलब्ध कराए जा चुके हैं.”

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बता दें, मुख्यमंत्री गहलोत की अपने पुत्र वैभव गहलोत को आरसीए का निर्विरोध अध्यक्ष बनवाने की मंशा पर बीते रविवार को ही संकट के बादल मंडरा गए थे. वैभव के राजसमंद जिला क्रिकेट संघ के कोषाध्यक्ष बनने पर सीपी जोशी गुट द्वारा आयोजित लंच पार्टी में 5 जिला संघों के सचिवों सहित कुछ पदाधिकारियों का न पहुंचना इस बात का साफ संकेत था की वैभव के RCA अध्यक्ष बनने की राह उतनी आसान नहीं है जितनी गहलोत और जोशी ने सोची थी. अब इस पर कांग्रेस के ही दिग्गज नेता रामेश्वर डूडी का उक्त बयान मुख्यमंत्री गहलोत के मंसूबो पर पूरी तरह पानी फेरने जैसा है.

मीडिया के सवाल पर रामेश्वर डूडी ने साफ कहा कि जरूरत पड़ी और जिला क्रिकेट संघ ने कहा तो मैं चुनाव जरूर लडूंगा, फिर सामने चाहे कोई भी हो. डूडी ने ये बयान देकर ये तो साफ कर दिया है कि उनके सामने कोई भी हो, वे पीछे हटने वाले नहीं हैं. बता दें, वर्तमान में डूडी नागौर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं जिसे आरसीए अध्यक्ष सीपी जोशी ने सस्पैंड कर रखा है.

जैसा कि विदित है कि आरसीए चुनाव की दो-दो तारीखें सामने आ रही हैं. चुनाव अधिकारी टी.एस.कृष्णामूर्ति ने बीसीसीआई की डेडलाइन 28 सितम्बर को ध्यान में रखते हुए एक दिन पहले 27 सितम्बर को आरसीए का चुनाव कराने की घोषणा कर दी है. दूसरी ओर, आरसीए के वर्तमान अध्यक्ष सीपी जोशी ने 4 अक्टूबर को चुनाव कराने की घोषणा की है. ऐसे में एक बार फिर आरसीए में विवाद की स्थिति बन गयी है. हालांकि फाइनल फैसला चुनाव अधिकारी को करना है. ऐसे में 27 सितम्बर को चुनाव होने की संभावना अधिक है, अगर ऐसा होता है तो वैभव गहलोत स्वतः ही अध्यक्ष पद की रेस से बाहर हो जाएंगे.

वहीं सीपी जोशी की तय तारीख 4 अक्टूबर को भी अगर चुनाव होते हैं, तो भी रामेश्वर डूडी को मनाए बिना वैभव गहलोत का आरसीए अध्यक्ष बनना नामुमकिन ही है, और रामेश्वर डूडी को किस तरह मनाया जाएगा यह तस्वीर आने वाले दिनों में साफ होगी.

वैभव को निर्विरोध RCA अध्यक्ष बनाने की मुहिम को झटका, चुनाव तिथि पर सस्पेंस बरकरार

येन-केन प्रकारेण मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के पुत्र वैभव गहलोत (Vaibhav Gehlot) को निर्विरोध RCA का अध्यक्ष बनाने की सीपी जोशी (CP Joshi) की मुहिम को झटका लगा है. हुआ यूं कि वैभव गहलोत के राजसमन्द जिला क्रिकेट एसोसिएशन का कोषाध्यक्ष बनने पर लंच पार्टी के बहाने समस्त जिला कार्यकारिणी और उनके पदाधिकारियों को रविवार को जयपुर बुलाया गया था, जिससे वैभव गहलोत को निर्विरोध RCA अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनाई जा सके. लेकिन जोशी की इस लंच डिप्लोमेसी में पांच जिला कार्यकारिणी के सचिव अनुपस्थित रहे, इसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि RCA को नया अध्यक्ष चुनाव के माध्यम से ही मिलेगा. उधर आरसीए के वर्तमान … Read more

सिंधिया ने इंदौर में दिखाया राजनीतिक कौशल, कार्यकर्ताओं में दिखा जबरदस्त क्रेज

कहते हैं सत्ता के लिए जो बन पड़े वो कम है, अपने एक दिन के दौरे पर इंदौर (Indore) पहुंचे कांग्रेस (Congress) के दिग्गज नेता और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) ने अपने राजनीतिक कौशल की सियासी चाल से मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) की राजनीति को फिर से गरमा दिया. रविवार को इंदौर में सिंधिया ने उनके प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले सुरेश पचौरी (Suresh Pachouri), दिग्विजयसिंह (Digvijay Singh) और कमलनाथ (Kamalnath) गुट के नेताओं से अलग-अलग उनके घर जाकर मुलाकात की और साथ ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं से वन टू वन मुलाकात कर एक तरह से शक्ति प्रदर्शन भी किया. जिसके बाद से मध्यप्रदेश के राजनीतिक गलियारों में भी हलचलें तेज हो गई.

मध्यप्रदेश कांग्रेस की पॉलिटिक्स में इन दिनों राजनीतिक रस्साकस्सी का दौर लगातार जारी है. इसी बीच इंदौर में रविवार को कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का मालवा की सियासत में एक अलग ही अंदाज देखने को मिला. एक दिन के दौरे पर इंदौर पहुंचे कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी अलग राजनीतिक चाल से सभी को चौंका दिया. कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल ज्योतिरादित्य सिंधिया का इंदौर पहुंचने पर कार्यकताओं ने जमकर स्वागत किया. सिंधिया ने इंदौर में पार्टी के तमाम खेमों के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मुलाकात की.

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ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इंदौर पहुंचते ही अलग-अलग गुटों के नेताओं के घर पर जाकर मुलाकात की. एयरपोर्ट से सबसे पहले सिंधिया सीधे सुरेश पचौरी के गुट से आने वाले विधायक संजय शुक्ला के घर पहुंचे और करीब एक घंटे तक सिंधिया ने संजय शुक्ला के साथ चर्चा की. ना सिर्फ चर्चा की बल्कि इस दौरान सिंधिया ने नाश्ता भी किया. इसके बाद सिंधिया इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष दिवंगत शशिन्द्र जलधारी के घर वालों से मिलने उनके घर पहुंचे और परिवार को ढांढस बंधाया.

इसके बाद सिंधिया यहां से सीधे एमएलए विशाल पटेल से मिलने उनके घर पहुंचे. विशाल पटेल पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के काफी करीबी माने जाते हैं, ऐेसे में सिंधिया और विशाल पटेल की मुलाकात भी जमकर चर्चाओं में रही. मुलाकात का दौर यहीं खत्म नहीं हुआ बल्कि सिंधिया ने इसके बाद इंदौर से सांसद का चुनाव लड़ चुके पंकज संघवी और मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी कहे जाने वाले इंदौर शहर कांग्रेस अध्यक्ष विनय बाकलीवाल से भी घर जाकर मुलाकात की.

इस दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि इंदौर मेरा घर है और मालवा से मेरा खास लगाव है. मध्य प्रदेश और देश में कांग्रेस संगठन को पुनर्जीवित करना बहुत जरूरी है. हांलाकि अलग-अलग गुटों के नेताओं से मिलने के पीछे की वजह क्या थी, इसका सिंधिया ने जवाब नहीं दिया. सिंधिया ने कहा कि इंदौर से उनका अलग लगाव है ऐसे में वे कार्यकर्ताओं से मुलाकात करने और उनकी समस्याओं को सुनने के लिए पहुंचे हैं. लोगों की परेशानी और उनकी आवाज़ को शासन, प्रशासन और सरकार तक हम पहुंचाएंगे.

इसके बाद बारी आई सिंधिया के शक्ति प्रदर्शन की, इंदौर के रंगून गार्डन में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने करीब दो घंटे तक कांग्रेस कार्यकर्ताओं से सिलसिलेवार मुलाकात की. इसके लिये बनाए गए विशाल पंडाल में सिंधिया की तस्वीरों के अलावा, उनके दिवंगत पिता माधवराव सिंधिया और सूबे के मुख्यमंत्री कमलनाथ के पोस्टर प्रमुखता से लगाये गये थे. सिंधिया से मुलाकात के लिए समर्थकों और नेताओं का जमावड़ा लगा. खास बात तो यह थी कि इंदौर ही नहीं मालवा और निमाड़ के कई सिंधिया समर्थक भी इस कार्यक्रम में मुलाकात के लिए बेताब नजर आए.

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इस दौरान सिंधिया ने मंच पर ही एक-एक कार्यकर्ता से वन टू वन मुलाकात शुरू की. सिंधिया जब मंच पर मौजूद थे तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भी स्टेज पर चढ़ने की होड़ लग गई, मंच पर चढ़ने के लिए कार्यकर्ता बेकाबू हो गए और हंगामा शुरू कर दिया. देखते ही देखते बात कुर्सियां उछालने तक जा पहुंची. कार्यकर्ताओं ने एक-दूसरे पर कुर्सियां उछालनी शुरू कर दीं. ज्योतिरादित्य सिंधिया कार्यकर्ताओं की इस हरकत से नाराज हो कर मंच से उतर गए और कार्यक्रम से चले गए.

बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं से ज्योतिरादित्य सिंधिया की इस मुलाकात को राजनीतिक के जानकार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल सिंधिया के शक्ति प्रदर्शन के तौर देख रहे हैं. कार्यक्रम के बाद सिंधिया ने संवाददाताओं से कहा, “मैंने करीब 3,000 कांग्रेस कार्यकर्ताओं से आज सीधी मुलाकात की, अपना खून-पसीना बहाकर सूबे में कांग्रेस की सरकार बनवाने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं की आन-बान-शान कायम रखना मेरा फर्ज है. केवल मध्यप्रदेश में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में कांग्रेस संगठन को फिर से जीवित करना अति महत्वपूर्ण है. इस काम के लिये सभी कांग्रेस नेताओं ने संकल्प लिया है.” वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर दावेदारी के सवाल पर सिंधिया ने कहा,‘‘पार्टी आलाकमान जो भी निर्णय लेगा, वह उन्हें स्वीकार होगा.’’

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की आहट के बीच अपने-अपने नेता को अध्यक्ष बनवाने के लिए गुटबाजी तेज हो गई है. राजधानी भोपाल से लेकर दिल्ली तक रस्साकस्सी चल रही है. ऐसे में मध्यप्रदेश कांग्रेस के दिग्गज सुरेश पचौरी, दिग्विजय सिंह और कमलनाथ गुट से जुड़े नेताओं से उनके घर जाकर अलग-अलग मुलाकात करने का सिंधिया का ये खास अंदाज राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना रहा. पचौरी गुट से ताल्लुक रखने वाले विधायक संजय शुक्ला के घर सिंधिया पहुंचे तो उनका जोरदार स्वागत किया गया. हालांकि बाद में संजय शुक्ला सफाई देते नजर आए और कहा कि उनको (सिंधिया) को बुलाया नहीं था वो उनकी मां की तबीयत पूछने घर पहुंचे थे. सिंधिया पार्टी के बड़े लीडर हैं ऐसे में वो घर आए तो उनका स्वागत किया गया.

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कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया की इंदौर में हुई इस लंच डिप्लोमेसी को लेकर बीजेपी ने भी पलटवार कर दिया है. बीजेपी के सांसद शंकर लालवानी का कहना है कि सिंधिया ये सब पीसीसी चीफ की कुर्सी पाने के लिए कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी और प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के आगे कांग्रेस में किसी की नहीं चलती, ये बात सिंधिया को भी समझनी चाहिए.

गौरतलब है कि कमलनाथ को राज्य विधानसभा चुनाव से करीब सात महीने पहले अप्रैल 2018 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था. अभी हाल ही में कमलनाथ ने दिल्ली में अपने एक बयान में कहा था कि मुख्यमंत्री बनने के ठीक बाद उन्होंने पार्टी आलाकमान के समक्ष प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने की पेशकश की थी. बहरहाल, मध्य प्रदेश कांग्रेस में सत्ता और संगठन के बीच जो खींचतान चल रही है उसके बाद सिंधिया की इस लंच डिप्लोमेसी के कई तरह के मायने निकाले जा रहे हैं. अब आने वाले दिनों में सिंधिया का ये खास अंदाज कौन से राजनीतिक समीकरणों को जन्म देता है यह देखना दिलचस्प होगा.

सीएम गहलोत को सोनिया गांधी की नसीहत, तो पायलट ने मारा नहले पर दहला

Coordination Committee for Gehlot and Pilot

दिल्ली (Delhi) में हुई AICC की अहम बैठक में कांग्रेस (Congress) की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने देश भर के आला नेताओं के साथ करीब पौने 3 घंटे तक मंथन किया. इस बैठक में प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और पीसीसी चीफ सचिन पायलट (Sachin Pilot) ने भी शिरकत की, वहीं प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे भी बैठक में मौजूद रहे. बैठक के बाद अविनाश पांडे ने मुख्यमंत्री गहलोत और पीसीसी चीफ सचिन पायलट के साथ बैठक की और प्रदेश के हालात पर मंथन किया. पार्टी सूत्रों की मानें तो सोनिया गांधी ने राजस्थान (Rajasthan) में कानून व्यवस्था (Law & Order) के हालात को लेकर गहरी नाराजगी … Read more

जन तंत्र पर भारी गन तंत्र, उधर गहलोत और पायलट उलझे राजनीतिक रस्साकस्सी में

कहते हैं कि मजबूत सरकार विकास के पथ पर रहती है और मजबूर सरकार झगड़ों में उलझ कर विकास के पथ से भटक जाती है. कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है इन दिनों राजस्थान (Rajasthan) में, यहां सरकार में वर्चस्व की लड़ाई का खामियाजा प्रदेश में बिगड़ी कानून व्यवस्था के रूप में देखने को मिल रहा है. मरुधरा में जनतंत्र (Public System) पर अपराधियों का गन तंत्र (Gun System) भारी पड़ रहा है. गुंडे-मवालियों के सामने खाकी लाचार और कमजोर नजर आ रही है. राजधानी में इंसाफ मांग रहे लोगों पर लाठी बरसाई जा रही है तो बहरोड़ में खुलेआम लॉक-अप में फायरिंग कर अपराधियों को छुड़ाया जा रहा है तो वहीं सीकर में सरेआम बंदूक की नोक पर बैंक को लूटा जा रहा हैं. आखिर क्या हो गया है अमन-चैन वाले प्रदेश राजस्थान को?

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट (Sachin Pilot) के बीच की तनातनी का संघर्ष अब सतह पर है. नौबत यहां तक आ गई है कि अब सरकार के दोनों सिपहसालार एक दूसरे के खुशियों के पल से भी कन्नी काटने लगे हैं. शनिवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सीएम सचिन पायलट के जन्मदिन के मौके पर मुख्यमंत्री पहले दिल्ली और बाद में जैसलमेर में घूम रहे थे. इस दौरान उन्हें प्रदेश में पिछले तीन दिन से बिगड़ी कानून व्यवस्था का ख्याल भी नहीं आया. इससे पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के जन्मदिन के मौके पर सचिन पायलट भी कुछ ऐसा ही कर चुके हैं. इससे दोनों के बीच का मनमुटाव फिर जगजाहिर हो चुका है.

बड़ी खबर: AICC की बैठक के बाद गहलोत और पायलट ने की सोनिया से मुलाकात, गहलोत के चेहरे पर मायूसी तो कॉन्फिडेंट दिखे पायलट

पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट ने अपने जन्मदिन के अवसर पर शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की जिसमें वह नाकाम रहे और उनका यह प्रदर्शन फीका ही रहा. हालांकि पीसीसी से सभी जिलों में जनप्रतिनिधियों को जयपुर भीड़ लेकर आने का संदेश दिया गया था और उम्मीद थी 20,000 से ज्यादा भीड़ जुटाने की लेकिन जयपुर में 5000 नेता और कार्यकर्ता ही उपस्थित हुए. प्रदेश सरकार के छः मंत्रियों सहित करीब 12 विधायकों ने ही पीसीसी जाकर पायलट को बधाई दी जबकि कुछ नेताओं ने विवाद से बचते हुए बधाई देने के लिए पीसीसी के बजाय पायलट के घर को चुना. क्योंकि इस बात पर भी नजर रखी जा रही थी कि कौन-कौन से बड़े नेता पायलट को बधाई देने पहुँचते हैं. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की खींचतान का सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है, जनप्रतिनिधियों की सबसे बडी फांस की किसकी बोलें और किसकी नहीं. यही कारण रहा कि मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार पायलट के जन्मदिन की रौनक फिकी रही आखिर वर्तमान नेतृत्व से पंगा कौन ले?

सीएम अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम व पीसीसी चीफ सचिन पायलट के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई अब शायद अंतिम दौर में पहुंच चुकी है. मुख्यमंत्री गहलोत जहां दिल्ली दरबार में प्रदेश में नया पीसीसी चीफ और एक डिप्टी सीएम और बनाने की अर्जी लगा चुके हैं तो वही गाहे-बगाहे पायलट खेमा भी सरकार की मुखालफत का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहा है. बहराल हम बात कर रहे हैं कि दोनों नेताओं की आपसी खिंचतान का सीधा खामियाजा प्रदेश की जनता को उठाना पड़ रहा है. वरना मुख्यमंत्री जी को इस बिगड़ी कानून व्यवस्था को संभालने के बजाय इस तरह पायलट के जन्मदिन पर राजधानी छोड़कर जाने की नौबत नहीं आती. जबकि दिल्ली या जैसलमेर में कोई ऐसा अतिआवश्यक काम भी नहीं था की जिसे टाला नहीं जा सकता था.

प्रदेश के मुखिया अशोक गहलोत के पास गृह विभाग भी है ऐसे में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी भी गहलोत के ही कंधों पर है लेकिन पिछले 3 महीने और ख़ासकर गतसप्ताह में प्रदेश में हुए अपराध और उनके तरीकों पर नजर डाले तो पुलिस लाचार और नाकाम नजर आती है. मुख्यमंत्री गहलोत जहां राजधानी में पुलिस अधिकारियों को कानून व्यवस्था का पाठ पढ़ा रहे थे तो उसी वक़्त अलवर में बदमाश उसकी बखिया उधेड़ने का प्लान बना रहे थे. प्रदेश के इतिहास में शायद पहली बार हुई बहरोड़ थाने में फायरिंग कर अपराधी को छुड़ाने की घटना के बाद गहलोत के कंट्रोल वाली पुलिस की कलई खुल गई है. मुख्यमंत्री के चहेते डीजीपी अपराध पर अंकुश लगाने में अब तक विफल साबित हुए हैं. ऐसे में राजनीतिक स्थिरता का फायदा अब अपराधी उठा रहे हैं और आम जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.

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अचानक बदले समीकरण

सोनिया गांधी के अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में सत्ता के केंद्र बदल गए. सोनिया के विश्वस्त माने जाने वाले अशोक गहलोत को मानो अभय दान मिल गया हो. राहुल गांधी जहां युवा नेतृत्व की बात करते थे तो ऐसे में सचिन पायलट आत्मविश्वास के साथ रेस में खुद को बरकरार रखे हुए थे. इसी कारण गहलोत खेमे में थोड़ा भय भी था कि कहीं किसी दिन नेतृत्व परिवर्तन का फरमान न आ जाये. लेकिन सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद तो गहलोत खेमा अधिक पॉवरफुल हो गया है. इसीलिए पहले जो नेता और कार्यकर्ता सचिन पायलट का खुल कर समर्थन करते थे यहां तक कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाये जाने की खुलकर पैरवी करते थे उनमें से कुछ एक को छोड़कर ज्यादातर उनके जन्मदिन के मौके पर भी कन्नी काटते नजर आये.

गहलोत सरकार की शिकायत पहुंची हाईकमान तक, सोनिया ने दिये निर्देश

राजस्थान कांग्रेस (Rajasthan Congress) में गुटबाजी अपने चरम पर है. सरकार और संगठन में चल रही खिंचतान अब जगजाहिर है. राजस्थान कांग्रेस में आपसी खींचतान की खबर हाईकमान को भी लग गई है. हाल ही में पार्टी के कई पदाधिकारियों व नेताओं ने संगठन महासचिव वेणुगोपाल के जरिये कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) से सरकार के मंत्रियों की शिकायत की है. सोनिया गांधी ने अविनाश पांडे (Avinash Pandey) को वास्तविक रिपोर्ट देने के निर्देश दिए है. राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बने 8 माह से अधिक का समय हो चुका है. सरकार के मुखिया अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) हैं और संगठन के मुखिया हैं सचिन पायलट (Sachin Pilot).

गौरतलब है कि राजस्थान में चुनाव के पहले से अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चली तनातनी अभी तक मतलब सरकार बनने के बाद तक भी बदस्तूर जारी है. इसके अनेकों उदाहरण हैं जो कि कई मौकों पर साफ देखे गए हैं. फिर चाहे वो टिकट विरतण के समय की खींचतान हो या चुनाव जीतने के बाद कि मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए चली लम्बी तनातनी. या फिर पिछले 8 माह में सरकार या संगठन का कोई कार्यक्रम हो. ऐसा कोई अवसर नहीं गया होगा जहां पार्टी की अंदरूनी खींचतान को सबने महसूस नहीं किया हो.

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सूत्रों ने बताया राजस्थान (Rajasthan) में कांग्रेस का शासन आने के बाद से ही कांग्रेस का आम कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि पार्टी के पदाधिकारी भी सार्वजनिक तौर पर मंत्रियों के नहीं मिलने और काम नहीं करने को लेकर नाराज चल रहे थे. स्थानीय स्तर पर कई बार शिकायत किये जाने के बावजूद मंत्रियों का रवैया नहीं बदला तो पार्टी के कुछ नाराज पदाधिकारियों ने सरकार और मंत्रियों की आलाकमान से जुड़े नेताओं और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से मिलकर शिकायत की. वेणुगोपाल ने इसकी जानकारी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को दी.

बता दें, राजस्थान में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने के बाद कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि मंत्रियों के दरवाजे कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा खुले रहेंगे. जबकि प्रदेश में सरकार बनने के 8 माह बाद भी बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ताओं की सरकार से नाराजगी अब कांग्रेस के आलाकमान को भी बहुत खल रही है. सोनिया गांधी ने इस संबंध में पार्टी के प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे से वास्तविक रिपोर्ट मांगी है.

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पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के मुलाकात कर उन्हें भी यह रिपोर्ट दी थी कि सरकार के मंत्री न तो जिलों में जाते है और यदि जाते भी हैं तो सरकारी या निजी कार्यक्रम के बाद वापस आ जाते हैं. ये मंत्री कांग्रेस कार्यालय जाना तो दूर वहां के नेताओं से भी नहीं मिलते हैं. यही वजह थी कि हाल ही में राजीव गांधी के 75वें जन्मोत्सव के दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से कार्यकर्ता को तवज्जो देने और मंत्रियों को जिले में जाने, कांग्रेस कार्यकर्ताओं से मिलने के साथ ही उनकी समस्याएं दूर करने की बात कही थी.

सचिन पायलट ने कहा था कि राजीव गांधी संगठन को महत्वपूर्ण मानते थे और पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति उनके मन में बहुत सम्मान था. मुख्यमंत्रीजी आप कार्यकर्ताओं और विधायकों की सुनिए. जब कार्यकर्ता और विधायक आपके पास काम लेकर जाएं तो आप डीपीआर बनाने की बात नहीं कहकर तुरंत उसकी घोषणा कर दिया कीजिए. राजीव गांधी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि राजीव गांधी कहा करते थे कि हमेशा सरकार से ज्यादा संगठन को तवज्जो देनी चाहिए. अब यह बात भी आलाकमान के पास पहुंची है कि सरकार न तो प्रदेश कांग्रेस को तवज्जो दे रही है और ना ही कार्यकर्ताओं को.

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प्रदेश में सरकार ने अभी अपने एक वर्ष का कार्यकाल भी पूरा नहीं किया है और सरकार के प्रति इतनी जल्दी कार्यकर्ताओं में बढ़ती नाराजगी से अब पार्टी हाईकमान भी चिंता में है. हाईकमान कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की शिकायतों को इसलिए भी सही मान रहा है कि यदि सरकार का कामकाज अच्छा होता और कार्यकर्ता तथा जनता खुश होती तो लोकसभा चुनावों में राजस्थान की सभी 25 सीटों पर करारी हार का मुंह नहीं देखना पड़ता. इसीलिए अब सोनिया गांधी ने प्रभारी महासचिव अविनाश पांडे से स्थिति की वास्तविक रिपोर्ट तैयार करने को कहा है. जिससे कार्यकर्ताओं और आम जनता से दूरी बनाने वाले मंत्रियों के बारे में तथ्यात्मक रिपोर्ट सामने आ सके और उसी के अनुसार उन ओर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सके.

RCA तो सिर्फ बहाना, कहीं ओर ही है निशाना

राजस्थान क्रिकेट संघ RCA सीपी जोशी CP Joshi रामेश्वर डूडी Rameshwar Dudi वैभव गहलोत Vaibhav Gehlot कांग्रेस की अंदरूनी का एक नया मोर्चा खुल गया है. कहने को तो यह क्रिकेट संबंधी विवाद है, लेकिन इसकी गहराई में देखें तो यह कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति मालूम पड़ती है.

राजस्थान क्रिकेट संघ RCA सीपी जोशी CP Joshi रामेश्वर डूडी Rameshwar Dudi वैभव गहलोत Vaibhav Gehlot राजस्थान में कांग्रेस की अंदरूनी का एक नया मोर्चा खुल गया है. कहने को तो यह क्रिकेट संबंधी विवाद है, लेकिन इसकी गहराई में देखें तो यह कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति मालूम पड़ती है. राजनीति एक तरफ सीपी जोशी (CP Joshi) हैं, दूसरी तरफ रामेश्वर डूडी (Rameshwar Dudi). सीपी जोशी राजस्थान क्रिकेट संघ (RCA) के अध्यक्ष हैं. रामेश्वर डूडी नागौर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बन गए हैं. उधर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत भी राजनीति में जमीन तलाश रहे हैं और क्रिकेट संघ की तरफ उनकी निगाहें हैं. इस तरह क्रिकेट की राजनीति में कांग्रेस नेता आपस में भिड़े हुए हैं. इस बीच आरसीए के पूर्व अध्यक्ष ललित मोदी के समर्थकों का दखल भी बना हुआ है, जिससे मामला और भी ज्यादा उलझ गया है. कांग्रेस के नेता कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना की तर्ज पर राजनीति कर रहे हैं.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने आरसीए को निलंबित कर रखा है. सीपी जोशी आरसीए के अध्यक्ष हैं और इसके साथ ही विधानसभा अध्यक्ष भी हैं. देर-सवेर उन्हें एक पद छोड़ना होगा. इसको देखते हुए डूडी ने नागौर जिला क्रिकेट संघ का अध्यक्ष बनते हुए क्रिकेट की राजनीति में अपने कदम रख दिए हैं. डूडी के नागौर जिला क्रिकेट संघ (Nagaur District Cricket Association) अध्यक्ष चुने जाने के पीछे आरसीए के सचिव राजेन्द्र सिंह नांदू की भूमिका रही है, जो ललित मोदी के समर्थक हैं. ललित मोदी के आरसीए अध्यक्ष बनने के बाद नांदू सचिव बने हुए हैं. नांदू की पहल पर नागौर जिला क्रिकेट संघ भंग कर 8 अगस्त को डूडी को अध्यक्ष चुना गया. लेकिन सीपी जोशी इस चुनाव को मान्यता नहीं देते हैं. वहीं डूडी के समर्थक कहते हैं कि जोशी विधानसभा अध्यक्ष बन गए हैं, इसलिए उन्हें आरसीए अध्यक्ष पद छोड़ देना चाहिए.

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जोशी का कहना है कि नांदू ने जिस तरह से नागौर जिला क्रिकेट संघ के चुनाव कराए वह अवैध है. इसके बाद से ही डूडी जोशी विरोधी कांग्रेसी नेताओं से संपर्क साधने में जुटे हैं. वह खुद खुलकर सीपी जोशी के खिलाफ बयानबाजी नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनके समर्थक जोशी पर आरसीए से हटने का दबाव बनाए हुए हैं. डूडी को नांदू के साथ ही भाजपा नेता और आरसीए के कोषाध्यक्ष पिंकेश पोरवाल का समर्थन भी हासिल है. जोशी के बयान को डूडी ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है. जोशी का कहना है कि नांदू नाम का कोई व्यक्ति आरसीए में सचिव नहीं है. वह नागौर जिला क्रिकेट संघ से निर्वाचित हुए थे. आरसीए ने नागौर जिला क्रिकेट संघ और नांदू दोनों को निलंबित कर दिया है. वहीं, नांदू का कहना है कि जस्टिस लोढ़ा कमेटी की सिफारिश के अनुसार विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद जोशी आरसीए अध्यक्ष नहीं रह सकते हैं. उन्होंने कहा, मैं चुनाव में सचिव निर्वाचित हुआ हूं, जोशी को मुझे हटाने का अधिकार नहीं है.

जोशी 2017 में आरसीए के अध्यक्ष बने थे और कार्यकारिणी की पहली ही बैठक में उन्होंने नांदू को निलंबित कर दिया था. इसके बाद से नांदू और जोशी गुट के बीच विवाद अब तक जारी है. जोशी गुट ने आरसीए को फिर से मान्यता दिलाने के नाम पर ललित मोदी की अध्यक्षता वाले नागौर जिला संघ को भी निलंबित कर दिया था. नागौर में दोनों ही गुटों ने अलग-अलग जिला संघों का गठन किया है. नांदू का कहना है कि नागौर जिला संघ के चुनाव के लिए आरसीए की ओर से पाली जिला संघ के धर्मवीर को पर्यवेक्षक नियुक्त किया था. नागौर जिला संघ के अध्यक्ष शिवशंकर व्यास ने स्वास्थ्य संबंधी कारणों से इस्तीफा दे दिया था. उनके स्थान पर डूडी को अध्यक्ष बनाया गया है. डूडी स्टार क्लब के अध्यक्ष है और उनका चुनाव पूरी तरह वैध है.

वहीं आरसीए के संयुक्त सचिव और जोशी समर्थक महेन्द्र नाहर का कहना है कि हमें नागौर जिला संघ के चुनाव की जानकारी मीडिया से ही मिली. इस संबंध में नागौर जिला संघ ने हमसे कोई पत्राचार नहीं किया. नांदू जिस जिला संघ का सचिव होने का दावा कर रहे, उसे पहले ही निलंबित किया जा चुका है. चुनाव में आरसीए ने किसी को भी पर्यवेक्षक के रुप में नहीं भेजा. इस तरह नांदू ने डूडी को भी गुमराह किया है. महेन्द्र नाहर सी.पी.जोशी के समर्थक हैं.

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इसी प्रकर खुद रामेश्वर डूडी का कहना है कि, ‘मैं नागौर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष के रूप में जिले में क्रिकेट खेल को अधिक लोकप्रिय बनाने और जिले में क्रिकेट खेल एवं खिलाड़ियों की उन्नति के लिए कार्य करूंगा. मेरे नागौर जिला क्रिकेट संघ का अध्यक्ष निर्वाचित होने पर बधाई देने वाले सभी शुभचिंतकों का मैं धन्यवाद व्यक्त करता हूं. मैं हमेशा से क्रिकेट प्रेमी रहा हूं और अब क्रिकेट खेल की मुख्य धारा में आकर ग्रामीण क्षेत्रों में क्रिकेट खेल को बढ़ावा देने के लिए कार्य करूंगा. मैं आरसीए अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी जो कि अत्यंत अनुभवी एवं प्रेरक राजनेता, खेल प्रशासक और मार्गदर्शक हैं . उनके नेतृत्व एवं सानिध्य में क्रिकेट खेल एवं खिलाड़ियों के हित को नई दिशा देने में पूरी तरह सक्रिय एवं समर्पित रहूंगा.’

निशाना-1

इस विवाद के बीच जोधपुर से लोकसभा चुनाव हार चुके वैभव गहलोत भी अब क्रिकेट की राजनीति में आने का मौका तलाश रहे हैं. जोशी उनकी मदद करेंगे. शायद इसी लिए सीपी जोशी के सुझाव पर ही जोधपुर जिला क्रिकेट संघ को भंग कर अंतरिम समिति बना दी गई है. राज्य सरकार के सहकारिता विभाग ने इस बारे में आदेश जारी कर दिया है. अंतरिम समिति के संयोजक राजस्थान रॉयल्स (Rajasthan Royals) के उपाध्यक्ष राजीव खन्ना बनाए गए हैं, जो जोधपुर के हैं और गहलोत परिवार के काफी निकट माने जाते हैं. राजीव खन्ना को समिति का संयोजक बनाने के पीछे यह गणित मालूम पड़ता है कि वैभव को पहले जोधपुर जिला क्रिकेट संघ में पदाधिकारी बनाया जाएगा. उसके बाद आरसीए में जोशी का कार्यकाल समाप्त होने पर वैभव गहलोत (Vaibhav Gehlot) आरसीए के अध्यक्ष बन सकते हैं. लगता है यह गणित डूडी की समझ में आ चुका है, इसलिए उन्होंने भी अपनी रणनीति बदल दी है.

डूडी की अपनी राजनीतिक मजबूरी है. वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष होने के बावजूद नोखा विधानसभा सीट से पिछला विधानसभा चुनाव हार गए थे. उसके बाद से ही वह हार के कारणों की तलाश कर रहे हैं. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिला, सरकार बनी, फिर भी वह चुनाव क्यों हार गए. राजनीति में बने रहने के लिए वह नागौर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने. जोशी ने उनके निर्वाचन को ही अवैध ठहरा दिया, जिससे जोशी के साथ उनकी नाराजगी भी बढ़ी है. नागौर जिला क्रिकेट संघ उस वक्त सुर्खियों में आया था, जब ललित मोदी यहां से क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने थे. बाद में वह आरसीए के अध्यक्ष बने और बीसीसीआई में पदाधिकारी और आईपीएल के कमिश्नर बने थे.

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जोशी ने आरसीए अध्यक्ष बनने के बाद 24 जून 2017 को नवनिर्वाचित कार्यकारिणी की पहली बैठक में नागौर जिला क्रिकेट संघ को निलंबित कर दिया था. मोदी के खास माने जाने वाले राजेन्द्र नांदू को भी आरसीए के सचिव पद से हटा दिया था. यह कदम आरसीए का निलंबन खत्म करने के लिए उठाया गया था. गौरतलब है कि आरसीए ने निलंबन खत्म करने के लिए बीसीसीआई को पत्र लिखा था. बीसीसीआई ने 20 जून 2017 को जवाब दिया था कि ललित मोदी को पद से हटाने के बाद ही इसे स्वीकार किया जा सकता है.

राजस्थान क्रिकेट राजनीति में नया मोड़ उस समय आया जब नांदू गुट ने 22 सितंबर को आरसीए चुनाव कराने की बाद कही. इसके बाद सीपी जोशी ने मंगलवार 26 अगस्त को आरसीए कार्यकारिणी की बैठक बुलाई. इस बैठक से पहले डूडी अपने समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन करने पहुंच गए. तनाव की आशंका के मद्देनजर आरसीए अकादमी में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया. डूडी ने बैठक में भाग नहीं लिया और कहा कि वह ट्रायल देखने आए हैं. जोशी ने कहा, उनका पहला काम आरसीए से प्रतिबंध हटवाना है. प्रतिबंध हटते ही वह आरसीए अध्यक्ष पद छोड़ देंगे. उसके बाद नए चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी. फिलहाल चुनाव कराने की स्थिति नहीं है.

क्रिकेट की राजनीति में वैभव गहलोत के आने की संभावनाओं पर डूडी का कहना है कि आरसीए के विवाद को मिलकर सुलझाया जाएगा. चुनाव की प्रक्रिया जारी रहेगी. अगर वैभव गहलोत आरसीए में आते हैं तो निर्विरोध कार्यकारिणी चुनी जाएगी. उन्होंने कहा कि ललित मोदी का राजस्थान में कोई पट्टा नहीं है. जोशीजी सीनियर लीडर हैं. आरसीए उनके नेतृत्व में काम करेगा. वहीं नांदू का कहना है कि जोशी का कार्यकारिणी की बैठक बुलाना गलत है. लोगों को भ्रमित किया जा रहा है. जोशी अध्यक्ष पद पर नहीं रह सकते. इस तरह सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया जा रहा है. वहीं जोशी का कहना है कि कुछ लोग जो खुद को क्रिकेट प्रेमी बताते हैं, वे नहीं चाहते कि आरसीए से प्रतिबंध हटे. अभी भी ललित मोदी का क्रिकेट से जुड़ाव है. मेरी किसी से व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है. जो लोग नियम विरुद्ध काम करेंगे, उनके खिलाफ हम कानूनी कार्रवाई करेंगे.

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निशाना-2

गौरतलब है कि नोखा से चुनाव हारने के बाद डूडी नागौर में राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं. सूत्रों के अनुसार वह दिसंबर में खींवसर और मंडावा विधानसभा क्षेत्र में होने वाले उपचुनावों में खींवसर से चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. इसके लिए उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से चर्चा भी चल रही है. डूडी को अगर खींवसर से टिकट मिलता है तो इस बात की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि डूडी क्रिकेट की पिच से विधानसभा का चौका मारने में सफल हो जाएं, यहां विधानसभा का चौका से मतलब उपचुनाव के बाद सरकार के बचे हुए चार साल से है.

अब देखना ये है कि रामेश्वर डूडी क्रिकेट की अपनी इस पारी में कितना सफल हो पाते हैं. रामेश्वर डूडी जिला प्रमुख, बीकानेर से सांसद और नोखा से कांग्रेस विधायक रह चुके हैं. 2013 के विधानसभा चुनाव में सत्ता से बेदखल होने के बाद उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था. नांदू का दावा है कि डूडी का निर्वाचन पूरी तरह वैध है. जबकि जोशी पहले ही कह चुके के नांदू नाम के व्यक्ति का आरसीए से कोई लेना-देना नहीं है. जोशी की अध्यक्षता वाले आरसीए के अनुसार डूडी प्रदेश के किसी भी जिला क्रिकेट संघ के पदाधिकारी नहीं हैं. बहरहाल बीसीसीआई में आरसीए की मान्यता समाप्त होने के बाद राजस्थान में लंबे समय से घरेलू प्रतियोगिताएं भी ठप पड़ी है और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति क्रिकेट के बहाने सतह पर आ रही है.

ज्योतिरादित्य बनेंगे मुख्यमंत्री! पिता की भूल सुधारेंगे सिंधिया?

ज्योतिरादित्य बनेंगे मुख्यमंत्री चाहे सफर राजाशाही से राजपथ तक का हो या फिर शाही सिंघासन से सियासत तक का, इस राह पर चलना आसान नहीं है. आजादी से लेकर अब तक कई राजवंशो ने राजनीति में आने की कोशिस की लेकिन कुछ को सफलता मिली और कुछ सियासत के दावपेंच में उलझकर रह गए और वापस अपने-अपने महलों की और लौट गए. लेकिन उनमें से एक राजवंश ऐसा भी है जिसकी कई पीढ़ियां आज भी राजनीति में अपना अलग मुकाम रखती हैं. जिनकी रग-रग में राजनीती बसती है. जिनके भाषण से जनता ख़ुशी से झूम उठती है और जिसकी तीन पीडियों ने अपने अपने तरीके से राजनीती को कुछ न कुछ दिया है.

पॉलिटॉक्स न्यूज़ के इस पहलु में हम आज बात कर रहे है सिंधिया परिवार की, ग्वालियर का ऐसा शाही परिवार जिसने आज़ादी के बाद अपने महलों में सिर्फ राजनीति को पनपने दिया. इसकी शुरुआत राजमाता विजयाराजे सिंधिया से हुई. ग्वालियर से लगातार आठ बार सांसद रही विजयाराजे सिंधिया का विवाह ग्वालियर के महाराजा जीवाजी राव सिंधिया से 21 फरवरी 1941 को हुआ था. पति के निधन के बाद वे राजनीति में सक्रिय हुई थी और 1957 से 1991 तक आठ बार ग्वालियर और गुना से सांसद रहीं. 25 जनवरी 2001 में उन्होंने अंतिम सांस लीं. विजयाराजे सिंधिया पहले कांग्रेस में थी लेकिन आपातकाल के बाद जब देशी रियासतों को समाप्त कर उनकी सम्पतियो को सरकारी घोषित कर दिया तब विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस छोड़ जनसंघ में शामिल हो गईं.

जीवाजीराव और विजयाराजे सिंधिया की 4 बेटियां और एक पुत्र था. विजयाराजे सिंधिया की दो बड़ी बेटियों का राजनीती से कोई खासा लगाव नहीं था. तीसरे नम्बर के उनके बेटे माधवराव सिंधिया भी राजनीती से जुड़े हुए थे और वे लगातार9 बार सांसद रहे. उनकी चौथी बेटी वसुंधरा राजे भी राजनीती से जुडी हुई हैं और दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, फिलहाल बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और झालावाड़ से विधायक हैं. उनकी 5वीं बेटी यशोधरा राजे भी राजनीती से जुडी हुई हैं, वे मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रह चुकी हैं और फिलहाल शिवपुरी से भाजपा विधायक हैं.

इस तरह राजमाता विजयाराजे के बाद उनके बेटे माधवराव सिंधिया ने भी सियासत में एंट्री की. माधवराव ने 1971 में जनसंघ के टिकट पर गुना से लोकसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस के प्रत्याशी को डेढ़ लाख वोटों के अंतर से पटखनी दी. इसके बाद उन्होंने 1977 के आम चुनाव में ग्वालियर लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा और ऐतिहासिक जीत दर्ज की. 1979 में मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई, जनवरी 1980 में देश में आम चुनाव का एलान हुआ. जनता पार्टी ने इंदिरा गांधी के खिलाफ राजमाता विजयाराजे को रायबरेली से चुनाव लड़वाने का एलान किया.

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दूसरी तरफ उस वक्त युवा सोच के माधवराव सिंधिया के कांग्रेस नेता संजय गांधी के साथ रिश्ते बेहतर हो रहे थे, तो उन्होंने अपनी मां विजयाराजे सिंधिया से इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने का अपना फैसला बदलने के लिए कहा. लेकिन विजयाराजे नहीं मानी और यहीं से मां बेटे के रिश्ते में दरार आ गई. ये रार इतनी बढ़ी की उसी 1980 के चुनाव में माधवराव ने पूरी तरह से कांग्रेस का दामन थाम लिया और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की. लेकिन दूसरी और विजयाराजे सिंधिया रायबरेली में इंदिरा गांधी से चुनाव हार गईं.

ठीक इसी वक्त देश की राजनीति में एक और नया मोड़ आया. 1980 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गठन हुआ. विजयाराजे सिंधिया जनसंघ के खंडहर पर खड़ी की गई इस नई-नवेली पार्टी की उपाध्यक्ष बनाई गईं. यहां से मां बेटे के रिश्ते में जो कड़वाहट पैदा हुई वो आजीवन बनी रही. यहां तक कि विजयाराजे सिंधिया अपने इकलौते बेटे माधवराव सिंधिया से इतनी खफा थीं कि उन्होंने 1985 में अपने हाथ से लिखी वसीयत में कह दिया था कि मेरा बेटा माधवराव सिंधिया मेरे अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं होगा. हालांकि 2001 में जब राजमाता का निधन हुआ तो मुखाग्नि माधवराव सिंधिया ने ही दी थी.

आपको बता दें, राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी पहले कांग्रेस में ही थीं, लेकिन इंदिरा गांधी ने जब राजघरानों को ही खत्म कर दिया और संपत्तियों को सरकारी घोषित कर दिया तो उनकी इंदिरा गांधी से ठन गई थी. इसके बाद वे जनसंघ में शामिल हो गई थी. जब उनके बेटे माधवराव सिंधिया ने जनसंघ छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा तो विजयाराजे अपने बेटे से काफी नाराज हो गई थीं. उस समय विजयाराजे ने कहा था कि इमरजेंसी के दौरान उनके बेटे के सामने पुलिस ने उन्हें लाठियों से पीटा था. उन्होंने अपने बेटे तक पर गिरफ्तार करवाने का आरोप लगाया था. दोनों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी थी और पारिवारिक रिश्ते खत्म होने लग गए. इसी के चलते विजयाराजे ने ग्वालियर के जयविलास पैलेस में रहने के लिए लिए अपने ही बेटे माधवराव से किराया भी मांगा था. हालांकि एक रुपए प्रति का यह किराया प्रतिकात्मक रूप से लगाया गया था.

माधवराव सिंधिया लगातार 9 बार संसद रहे और कभी नहीं हारे. उन्होंने अपना पहला चुनाव जनसंघ की तरफ से गुना से लड़ा और जीत दर्ज की. आपातकाल हटने के बाद 1977 में हुए चुनाव में वे निर्दलीय खड़े हुए और जनता पार्टी की लहर होने के बावजूद उन्होंने जीत दर्ज की. 1980 में वे कांग्रेस में शामिल हुए और तीसरी बार जीत दर्ज की. 1984 में माधवराव सिंधिया ने गुना के बजाए ग्वालियर से चुनाव लड़ा. ग्वालियर से उनके सामने बीजेपी के दिग्गज नेता और पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव में खड़े थे. लेकिन यहाँ भी माधवराव सिंधिया ने भारी मतों से जीत जीत दर्ज की.

1 जनवरी 1971 को माधवराव सिंधिया के घर एक राजकुमार ने जन्म लिया. जिसका नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया रखा गया. उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा दून स्कूल देहरादून से की और बाकि की पढाई के लिए वे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी चले गए. ज्योतिरादित्य के राजनितिक करियर की शुरुआत 2001 में हुई. 30 सितम्बर 2001 को उनके पिता माधवराव सिंधिया की एक हवाई हादसे में मौत हो गयी. उनकी मौत के बाद गुना लोकसभा सीट खाली हो गई. 18 दिसंबर 2001 को ज्योतिरादित्य सिंधिया औपचारिक रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और अपने पिता के धर्मनिरपेक्ष, उदार और सामाजिक न्याय मूल्यों को बनाए रखने का संकल्प लिया.

19 जनवरी 2002 को 30 साल की उम्र में ज्योतिरादित्य ने कांग्रेस की तरफ से गुना सीट से अपना नामांकन भरा और पहली जीत हासिल की. मई 2004 में उन्हें फिर से चुना गया और उन्होंने गुना से जीत दर्ज की. 2007 में केंद्रीय मंत्रिपरिषद में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल शानदार रहा. 2009 में लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए फिर से ज्योतिरादित्य को चुना गया और चुनाव जीतकर वे केन्द्र सरकार में वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री बने. बाद में वह बिजली राज्य मंत्री भी रहे. 2014 से एक बार फिर ज्योतिरादित्य गुना से लोकसभा पहुंचे लेकिन इस बार केन्द्र में मोदी सरकार थी.

2019 के लोकसभा चुनाव में इतिहास बदल गया और पहली बार सिंधिया परिवार से ज्योतिरादित्य सिंधिया को हार का मुंह देखना पड़ा. इसके बाद सिंधिया के समर्थकों ने उन पर कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की मांग करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया. उनके समर्थक चाहते हैं कि या तो वो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये जाएं या कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष. अब चूंकि सोनिया गांधी को एक बार फिर से CWC की बैठक में सर्वसम्मति से कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया गया है तो एक बार फिर से उनके समर्थकों ने उनके एमपी का मुख्यमंत्री बनाने का प्रेशर शुरू कर दिया है.

बड़ी खबर: – गहलोत और पायलट के बीच की खींचतान एक बार फिर उजागर

गौरतलब है कि कर्नाटक और गोवा के बाद भाजपा सुप्रीमो अमित शाह की नजर अब मध्य प्रदेश पर है. उधर शिवराज सिंह चौहान निर्दलीय विधायकों के साथ संपर्क बनाए हुए हैं. कमलनाथ सरकार को बमुश्किल बहुमत मिला हुआ है. ज्योतिरादित्य खेमा उपेक्षा से दुखी है और हाईकमान से लगातार शिकायत कर रहा है. ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक लगातार बैठकें कर रहे हैं. हाल ही में ज्योतिरादित्य ने दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात भी की थी. इसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि ज्योतिरादित्य को मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनाने के लिए अमित शाह सहयोग कर सकते हैं. वहीं सिंधिया की दूरभाष पर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से हुई लम्बी वार्ता भी इस बात को हवा दे रही है.

खैर, 2002 से 2019 तक लगातार गुना सीट की नुमाइंदगी लोकसभा में ज्योतिरादित्य सिंधिया करते आए हैं. 2019 में यह पहला मौका है जब ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार ने यह तय कर दिया की 1957 के बाद से पहली बार मध्यप्रदेश सिंधिया परिवार से कोई व्यक्ति संसद में नहीं पहुंचा है.

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दुखद संयोग: गत एक साल में एक प्रधानमंत्री और 7 मुख्यमंत्रियों ने दुनिया को किया अलविदा

एक दुखद संयोग है कि पिछले एक साल में देश के लगभग 10-12 बड़े नेताओं ने दुनिया को अलविदा कह दिया, जिनमे एक प्रधानमंत्री, 7 मुख्यमंत्री और कुछ केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. शनिवार को पूर्व वित्तमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली का 66 वर्ष की अवस्था में दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन (Death) हो गया. वह लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे. 9 अगस्त को सांस लेने में तकलीफ के बाद अरुण जेटली को एम्स में भर्ती कराया गया था. उनका अंतिम संस्कार रविवार को दिल्ली के निगम बोध घाट पर किया जाएगा.

यह एक दुखद संयोग ही है कि पिछले एक साल में हमने एक प्रधानमंत्री, 7 मुख्यमंत्री और कुछ केंद्रीय मंत्री रहे चुके शख्सियतों को खो दिया है. अगस्त, 2018 से लेकर अगस्त, 2019 तक में देश के तकरीबन दर्जन भर दिग्गज नेताओं ने दुनिया को अलविदा कह दिया. इनमें से ज्यादातर देश की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों यानी बीजेपी और कांग्रेस से जुड़े नेता थे और सभी का अपने-अपने समय का इतिहास रहा है. इनमें सबसे बड़ा नाम भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) का है, जिनका निधन 16 अगस्त, 2018 को दिल्ली के एम्स में ही हुआ था. इसके बाद एक के बाद एक नारायण दत्त तिवारी (Naranyan Dutt Tiwari), मदन लाल खुराना (Naranyan Dutt Tiwari), मदनलाल सैनी (Madan Lal Saini), मनोहर पर्रिकर (Manohar Parrikar), शीला दीक्षित (Sheila Dixit), जयपाल रेड्डी (Jaipal Reddy), सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj), जगन्नाथ मिश्रा (Jagannath Mishra), बाबू लाल गौर (Babu Lal Gaur) और अरुण जेटली (Arun Jaitley) जैसे दिग्गज नेताओं ने दुनिया को अलविदा कह दिया.

इसी अगस्त के महीने में ही बीजेपी के दो पूर्व मुख्यमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री क्रमश: सुषमा स्वराज, बाबूलाल गौर और अरुण जेटली का निधन हुआ. सुषमा स्वराज बीजेपी और दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री रही थीं जबकि मूलरूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के रहने वाले बाबू लाल गौर ने मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनकर एक इतिहास रचा था. अरुण जेटली बीजेपी की केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे. तीनों दिग्गजों का अपने-अपने समय का इतिहास रहा है.

वहीं इसी अगस्त के महीने में ही बिहार के तीन बार मुख्यमंत्री रहे जगन्नाथ मिश्र का निधन 19 अगस्त को दिल्ली के द्वारका में हुआ था. जगन्नाथ मिश्र पहले कांग्रेस पार्टी में रहे बाद में उन्होंने खुद की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का गठन किया.

बड़ी खबर: भाजपा के शीर्ष नेताओं के निधन के लिए कांग्रेस ने किया ‘मारक शक्ति’ का इस्तेमाल

जुलाई 2019 में कांग्रेस के दो बड़े नेता शीला दीक्षित और जयपाल रेड्डी दुनिया को अलविदा कहा. 20 जुलाई को हार्टअटैक के बाद दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित ने एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली. शीला दीक्षित 1998 से 2013 तक लगातार 15 सालों तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं. 2014 में उन्हें केरल का राज्यपाल भी बनाया गया था.

इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयपाल रेड्डी का पिछले महीने 28 जुलाई को हैदराबाद में निधन हो गया था. पूर्व केंद्रीय मंत्री जयपाल रेड्डी पिछले कई दिनों से खराब स्वास्थ्य की समस्या से गुजर रहे थे. गौरतलब है कि रेड्डी के निधन पर राज्यसभा में श्रद्धांजली देने के दौरान उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडु रो पड़े थे.

वहीं, इससे पहले 17 मार्च 2019 को बीजेपी के दिग्गज नेता और गोवा के 3 बार मुख्यमंत्री रहे मनोहर पर्रिकर का निधन हो गया था. पर्रिकर मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में रक्षा मंत्री रहे, रक्षा मंत्री बनने के लिये उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था. मनोहर पर्रिकर के रक्षा मंत्री रहते हुए भारतीय सेना ने दो बड़े ऑपरेशन को अंजाम दिया था. 2015 में म्यांमार की सीमा में भारतीय पैराकमांडो द्वारा घुसकर उग्रवादियों को मार गिराना और नवंबर 2017 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक. उनके समय के कठोर निर्णय और उनके काम के प्रति लगन ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया है.

राजस्थान से बीजेपी के राज्यसभा सांसद और राजस्थान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन लाल सैनी का 24 जून 2018 को हुआ था. सैनी को पार्टी के पूर्ण समर्पित सिपाही और बेहद सादगी भरा जीवन जीने के लिए ताड़ किया जाता है.

अक्टूबर 2018 में एक बीजेपी और एक कांग्रेस के बड़े दिग्गज नेताओं ने दुनिया से विदाई ली. 27 अक्टूबर 2018 को दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे मदन लाल खुराना का निधन हुआ था. खुराना राजस्थान के राज्यपाल भी रहे थे. मदन लाल खुराना अटल बिहारी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रह चुके थे.

कांग्रेस के बड़े नेता नारायण दत्त तिवारी ने 18 अक्टूबर 2018 को अंतिम सांस ली. कांग्रेस के दिग्गजों में नारायण दत्त तिवारी का नाम एक बड़ा नाम था. उनके नाम जो रिकॉर्ड है वो शायद उन्हीं के नाम रहेगा, वो भारत के एक मात्र नेता थे जो दो राज्यों उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के एक साथ मुख्यमंत्री रहे, इस लिहाज से उन्होंने एक इतिहास रचा था.

यह भी एक दुखद संयोग ही है कि एक नेता का मुख्यमंत्री (मनोहर पर्रिकर) रहते और 6 पूर्व मुख्यमंत्रियों (सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित, नारायण दत्त तिवारी, जगन्नाथ मिश्र, बाबू लाल गौर, मदन लाल खुराना) का एक साल से भी कम समय में निधन हो गया और सभी अपनी-अपनी पार्टी के दिग्गजों में शुमार थे.

इसमें भी अजब संयोग दिल्ली का है, एक साल के अंदर दिल्ली के चार बड़े नेताओं का निधन हुआ है. इनमें मदन लाल खुराना, शीला दीक्षित, सुषमा स्वराज और अरुण जेटली शामिल हैं. जिसमें से मदन लाल खुराना, सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित तीनों नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जबकि अरुण जेटली 1999 से 2012 तक दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष रहे हैं. ये चारों ही केंद्रीय मंत्री रहे चुके थे और इन चारों नेताओं का राज्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में भी दखल था.