रावत ने मांगी मुक्ति तो हरीश को मिलेगा प्रसाद! आलाकमान को दिया जन्मभूमि-कर्मभूमि का तर्क

पंजाब का 'पंगा' बना कांग्रेस आलाकमान के गले की फांस! अब हरीश रावत ने लगाई गुहार- मुझे पंजाब से दो मुक्ति तो मैं उत्तराखंड पर दे पाऊं ध्यान, कर्मभूमि और जन्मभूमि का खेला इमोशनल कार्ड, पंजाब-उत्तराखंड में होने हैं एक साथ चुनाव, रावत की जिम्मेदारी मिल सकती है हरीश को! इधर चुनौती भी कम नहीं होंगी नए हरीश के सामने, कैप्टन का गुस्सा, चन्नी-सिद्धू का पंगा और अब सिद्धू की पत्नी का बयान!

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हरीश रावत ने लगाई गुहार
हरीश रावत ने लगाई गुहार
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Politalks.News/Punjab. एक तरफ जहां पंजाब कांग्रेस पूरी तरह बिखरी पड़ी है, वहीं पंजाब प्रभारी हरीश रावत ने आलाकमान से गुहार लगाई है कि मुझे पंजाब से मुक्ति दी जाए. दरअसल अगले साल फरवरी में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं उनमें उत्तराखंड और पंजाब भी शामिल हैं. हरीश रावत पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हैं तो उत्तराखंड में अघोषित सीएम पद के उम्मीदवार भी हैं. ऐसे धर्म संकट के बीच रावत ने आलाकमान से पंजाब की जिम्मेदारी उनसे वापस लेने की फरियाद लगाई है. विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही समय बचा है ऐसे में हरीश रावत की मांग वाजिब भी लगती है.

हरीश रावत काफी लंबे समय से पंजाब की राजनीति में सक्रीय हैं और उनसे ज्यादा प्रदेश कांग्रेस के हालातों को कोई भी अच्छे से नहीं जानता. ऐसे में कांग्रेस आलाकमान के सामने एक नई मुसीबत आकर खड़ी हो गई है. ऐसा नहीं है कि आलाकमान ने इसके लिए रणनीति नहीं बनाई होगी लेकिन जिसे भी वह पंजाब का प्रभारी बनाएंगे उसके लिए पंजाब कांग्रेस में फैले रायते को समेटना मुश्किल होगा. हालांकि पॉलिटॉक्स इसको लेकर पहले भी संकेत दे चुका है साथ ही ये भी बता चुका है गहलोत सरकार के मंत्री हरीश चौधरी को पंजाब का प्रभारी बनाया जा सकता है. ऐसे में चौधरी की राह भी आसान नहीं होगी. एक तरफ तो सिद्धू और चन्नी की बयानबाजी, कैप्टन का नई पार्टी बनाने की घोषणा, अब नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी और पूर्व विधायक नवजोत कौर ने भी विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा प्रकट की है इस सबके बीच चौधरी को रणनीतिक कौशल दिखाना पड़ेगा.

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पंजाब कांग्रेस में मचा घमासान इतना लंबा खिंच जाएगा आलाकमान को इसकी भनक भी नहीं थी. आलाकमान ने कभी नहीं सोचा होगा कि सिद्धू की प्रदेशाध्यक्ष के रूप में ताजपोशी और अमरिंदर की जगह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाये जाने के बाद रायता समेटने की जगह और फ़ैल जाएगा. सिद्धू और अमरिंदर के बीच सियासी जंग किसी से छिपी नहीं है. लेकिन किसी ने ये भी नहीं सोचा था की सिद्धू की नए मुख्यमंत्री चन्नी से भी नहीं बनेगी. हालांकि आलाकमान की दखलंदाजी के बाद सिद्धू थोड़े शांत जरूर नजर आये लेकिन, अब चन्नी ने सिद्धू को दो टूक कह दी है.’मैं मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए तैयार हूं सिद्धू खुद मुख्यमंत्री बने और दो महीने में सारे काम पूरे करें’. पंजाब कांग्रेस की आपसी खींचतान को देखते हुए हरीश रावत भी भर चुके हैं. हरीश रावत को भी अंतर्मन से यही लगता है कि अब मैं इस झमेले से दूर रहूंगा तभी उत्तराखंड चुनाव में फोकस कर पाऊंगा. रावत ने आलाकमान के सामने कर्मभूमि और जन्मभूमि का मार्मिक तर्क भी दिया है.

हरीश रावत ने आज सुबह ही ट्वीट करते हुए लिखा कि, ‘मैं आज एक बड़ी उपापोह से उबर पाया हूंँ. एक तरफ मेरे सामने जन्मभूमि के लिए मेरा कर्तव्य है, तो दूसरी तरफ कर्म भूमि पंजाब के लिए मेरी सेवाएं हैं, ऐसे में स्थितियां जटिलत्तर होती जा रही हैं. क्योंकि ज्यौं-जयौं चुनाव आएंगे, दोनों जगह व्यक्ति को पूर्ण समय देना पड़ेगा’. रावत ने आगे कहा कि, ‘मैं जन्मभूमि के साथ न्याय करूं तभी कर्मभूमि के साथ भी न्याय कर पाऊंगा. मैं, पंजाब कांग्रेस और पंजाब के लोगों का बहुत आभारी हूंँ कि उन्होंने मुझे निरंतर आशीर्वाद और नैतिक समर्थन दिया’. रावत ने आगे लिखा कि, ‘मैं लीडरशिप से प्रार्थना करता हूं कि अगले कुछ महीने मैं उत्तराखंड को पूर्ण रूप से समर्पित रह सकूं. इसलिए पंजाब में जो मेरा वर्तमान दायित्व है, उस दायित्व से मुझे अवमुक्त कर दिया जाय’.

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हरीश रावत के इस बयान के बाद ये साफ़ है कि हरीश रावत पंजाब कांग्रेस में इतना पीस चुके हैं कि वह अपने गृह राज्य की और ध्यान भी नहीं दे पा रहे. ऐसे में उन्होंने आलाकमान से साफ तौर पर पंजाब प्रभारी पद से मुक्त करने की गुहार लगाई है. पंजाब का प्रभारी होने के नाते रावत यह अच्छी तरह से जानते हैं कि वहां पार्टी की क्या स्थिति है, और ऐसे में वह पंजाब की वजह से अपने राज्य को नहीं छोड़ सकते. वहीं सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के नई पार्टी बनाये जाने और बीजेपी को समर्थन दिए जाने वाले बयान ने रावत को शायद ऐसा करने पर मजबूर किया हो. क्योंकि रावत अमरिंदर के राजनीतिक कौशल को भलीभांति जानते हैं. सूत्रों की माने तो,’अमरिंदर पंजाब में हुई सियासी कलह के लिए हरीश रावत की असमंजस वाली स्थिति को जिम्मेदार मानते हैं’.

अब आलाकमान के सामने सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि इतने कम समय में आखिर पंजाब की कमान किसे सौपीं जाए. सूत्रों की माने तो, ‘राजस्थान सरकार में मंत्री हरीश चौधरी को यह जिम्मेदारी मिल सकती है. क्योंकि पंजाब में जब यह सियासी घमासान चल रहा था तब आलाकमान ने हरीश चौधरी को पर्यवेक्षक बनाकर पंजाब भेजा था. पंजाब पर्यवेक्षक के तौर पर चौधरी ने अपनी जिम्मेदारी काफी समझदारी से निभाई है और कहा जाता है कि हरीश चौधरी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के काफी करीब भी है. ऐसे में रावत की छुट्टी के बाद हरीश चौधरी को पंजाब का प्रभारी बनाया जा सकता है औऱ पॉलिटॉक्स इस बात की जानकारी पहले ही दे चुका है कि चौधरी को पंजाब का प्रभारी बनाया जा सकता है.

वहीं पंजाब की सियासत को पूरी तरह हिला देने वाले नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी एवं पूर्व विधायक नवजोत कौर ने आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने की गुहार लगाई है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक नवजोत कौर ने कहा कि, ‘विधायक के रूप में मेरे कार्यकाल के दौरान अमृतसर पूर्व निर्वाचन क्षेत्र में 100 करोड़ रुपये के कार्यों को किया गया. 2017 में भी अमृतसर पूर्व के लिए मेरे नाम की सिफारिश की गई थी और सिद्धू को कोई अन्य सीट चुनने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने मुझे तब चुनाव नहीं लड़ने दिया. अब अगर मौका मिला तो मैं यहां से दोबारा चुनाव लड़ूंगी’.

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साथ ही सिद्धू की पत्नी ने पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को चुनौती देते हुए कहा कि, ‘कैप्टन अमृतसर ईस्ट से सिद्धू के खिलाफ चुनाव लड़कर देखें, वह कितने लोकप्रिय हैं, उन्हें पता चल जाएगा’. कौर ने आगे कहा कि, ‘अकाली दल ने भी सिद्धू को खत्म करने की कोशिश की थी, लेकिन जब वो कामयाब नहीं हुए तो आप कौन? उस समय भी अकालियों ने सिद्धू का टिकट कटवाकर अरुण जेटली को अमृतसर से चुनाव लड़वाया था, लेकिन वहां की जनता ने सिद्धू के साथ हुई नाइंसाफी का बदला लिया और जेटली चुनाव हार गए थे’.

खैर कांग्रेस की रामायण खुद उनके नेताओं को समझ नहीं आ रही तो आप और हम तो एक आम नागरिक हैं. लेकिन इस सियासी कलह ने राजनीतिक विशेषज्ञों को यह सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया कि उत्तरप्रदेश ही नहीं इस बार पंजाब और उत्तराखंड में भी कड़ा और रोचक मुकाबला देखने को मिलेगा. पंजाब में बीजेपी का प्रभाव भले ही ना हो लेकिन अगर बीजेपी किसान आंदोलन का समाधान निकालकर अमरिंदर के साथ आती है तो उसकी कुछ संभावना बन सकती है. लेकिन सत्ता पर काबिज होने के बीजेपी और अमरिंदर को आम आदमी पार्टी से पार पाना होगा. क्योंकि आप ने तीनों ही राज्यों में चुनावी ताल ठोक रखी है.

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