Tamilnadu Politics: देश के 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे कल तक आ जाएंगे. उससे पहले केवल एक ही चर्चा चहुंओर है - एग्जिट पोल और संभावित नतीजे. पश्चिम बंगाल के साथ तमिलनाडु भी अब तक 'कमल' खिलान से दूर रहा है. तमिलनाडु, जहां विस चुनाव मात्र एक आम लोकतांत्रिक कवायद नहीं, बल्कि आन-बान-शान की लड़ाई तक आ पहुंची है. यहां चुनाव प्रचार स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं, बल्कि लोकसभा सोटों के परिसीमन और केंद्र से राज्यों को मिलने वाले पैसों के बंटवारे जैसे बड़े राष्ट्रीय और संधीय मुद्दे भी चुनावी फिजा में गूंज रहे हैं.
ऐसा शायद पहली बार ही है, जब तमिलनाडु के नतीजों पर केवल स्थानीय जन की नहीं, बल्कि पूरे देश की नजरें गढ़ी हुई है. यहां मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन (मुथुवेल करुणानिधि स्टालिन) ऐसे दिग्गज नेताओं का सामना पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह जैसे राष्ट्रीय दिग्गजों से हो रहा है. स्टालिन सत्ता वापसी के लिए, जबकि बीजेपी सत्ता स्थापित करने के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं. हालांकि दोनों अब अपनी सरकार के कामकाज पर बड़े जनमत परीक्षण का सामना कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय राजनीति के चलते स्टालिन का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर है.
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तमिलनाडु 39 लोकसभा सीटों के साथ राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदलने की ताकत रखते हैं. यही वजह है कि अब तक हाथ से बाहर रहे इन राज्यों में 'कमल' का उदय बीजेपी के लिए सबसे बड़ा लक्ष्य है. राज्य में सत्ता विरोधी लहर एक खामोश लेकिन गहरा असर डालने वाली ताकत है. दोनों पार्टियों को साफ एहसास है कि मतदाता बदलाव चाहते हैं.
तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कलगम (डीएमके) 6 बार सत्ता में रहा, लेकिन दोबारा लगातार सत्ता में लौटने का मौका उसे सिर्फ एक बार मिला था, वह भी 1971 में. यही वजह है कि डीएमके ने भी बदलाव का बड़ा संदेश देने की कोशिश की है. वर्तमान में 234 सदस्यीय विधानसभा में उसके पास 133 सीटें हैं. इस बार जिन 164 सीटों पर पार्टी चुनाव लड़ रही है, उनमें करीब 60 नए चेहरों को उतारा गया है. पार्टी के लगभग 45 फीसद मौजूदा विधायकों को उनकी पुरानी सीटों से दोबारा टिकट नहीं दिया गया है. ऐसे में मौजूदा विधायक थोड़ा हैरान एवं नाराज हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.
तमिलनाड में कांग्रेस डीएमके की प्रमुख सहयोगी पार्टी है जो 28 सीटों पर चुनाव लड़ रही है लेकिन उनके अधिकांश उम्मीदवारों की नैया स्टालिन की पार्टी के भरोसे मैदान में है. बाकी सीटों पर डीएमके नीत सेक्युलर प्रोग्रेसिव अलायंस के अन्य दल चुनाव लड़ रहे हैं.
स्टालिन और डीएमके को भी उनकी अंदरूनी कमजोरियों की खामोश स्वीकारोक्ति है, लेकिन उसका असर उनके चुनाव प्रचार में बिल्कुल नहीं दिखता. यहां स्टालिन अब तक ताकत, भरोसे और आक्रामकता के साथ मैदान में नजर आए हैं. यहां बीजेपी की मौजूदगी ने स्टालिन को यह चुनाव 'दिल्ली दरबार' के खिलाफ सम्मान की लड़ाई के तौर पर पेश करने का मौका दिया है. इसके जरिए वे क्षेत्रीय पहचान और राज्य के गौरव को भी उभार रहे हैं.
स्टालिन को इस बार एसआईआर जैसी महत्वपूर्ण मुद्दे से भी दो चार होना पड़ा है. एसआइआर प्रक्रिया ने मतदाता सूची को करीब 11 फीसद घटा दिया. तमिलनाड़ु में वोटर सूची से नाम कटने की दर करीब 15 फीसद रही. वहां मतदाताओं की संख्या 6.41 करोड़ से घटकर 5.44 करोड़ रह गई, लेकिन डीएमके के कार्यकर्ताओं की मजबूत जमीनी निगरानी ने इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनने दिया.
हालांकि तमिलनाडु में बीजेपी संयमित भूमिका में है. वहां वह एआइएटीएमके की लगभग खामोश सहयोगी बनकर चल रही है केंद्रीय स्तर पर बीजेपी किसानों एवं ओबीसी वोट बैंक फैक्टर से भलीं भांति वाकिफ है और नहीं चाहती कि दोनों पार्टियों की ज्यादा नजदीकियों से एआईडीएमके को नुकसान हो.
ऐसे में अगर स्टालिन सत्ता बचाने में सफल रहते हैं, तो उन्हें इंडिया गठबंधन को दक्षिण भारत में मजबूत आधार मिलेगा और कांग्रेस को अपना सबसे भरोसेमंद क्षेत्रीय साथी भी. वहीं अगर बीजेपी को राज्य में बड़ी सफलता मिलती है तो यह देश की राजनैतिक तस्वीर बदल सकती है.
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