स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी को कैसे किया चारों खाने चित?

लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोर रही है. पार्टी ने 2014 से भी ज्यादा सीटें जीतकर इतिहास रचा है. बीजेपी के 303 उम्मीदवार चुनाव जीते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत की. उन्होंने गांधी परिवार का गढ़ मानी जाने वाली उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पटकनी देकर सबको चौंका दिया है. स्मृति ने राहुल गांधी को 55,122 वोटों के अंतर से शिकस्त दी.

यह दूसरा मौका है जब अमेठी से गांधी परिवार के किसी सदस्य को हार झेलनी पड़ी है. इससे पहले 1977 के लोकसभा चुनाव में संजय गांधी को हार का सामना करना पड़ा था. तब जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को पटकनी दी थी. हालांकि राजनीतिक विश्लेषक 1977 के चुनाव में संजय गांधी की हार को राहुल गांधी के मुकाबले अप्रत्याशित नहीं मानते, क्योंकि उस समय आपातकाल लागू करने की वजह से पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा था. तब लोग संजय गांधी को ही आपातकाल का सूत्रधार मानते थे.

कई लोग अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत की तुलना 1977 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से इंदिरा गांधी के खिलाफ राजनारायण की जीत से कर रहे हैं. अलबत्ता राजनारायण की जीत में उनकी मेहनत से ज्यादा इंदिरा गांधी के खिलाफ आपातकाल लगाने का गुस्सा था. इस लिहाज से देखें तो स्मृति ईरानी की जीत राजनारायण और रविंद्र प्रताप सिंह से बड़ी है. इस बार के चुनाव में मोदी की आंधी तो थी, लेकिन राहुल गांधी या कांग्रेस के खिलाफ गुस्से जैसी कोई बात नहीं थी.

अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत विशुद्ध रूप से पांच साल तक सक्रियता, कड़ी मेहनत और रणनीति का नतीजा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में हारने के बावजूद स्मृति ईरानी अमेठी से ठीक वैसे ही जुड़ी रहीं, जैसे वे ही वहां की सांसद हों. 2014 से 2019 के बीच उन्होंने करीब 60 बार अमेठी का दौरा किया जब​कि अमेठी से सांसद चुने गए राहुल गांधी इस दौरान 20 बार भी वहां नहीं गए.

केंद्र में मंत्री होने बावजूद स्मृति ईरानी ने अमेठी को पूरा समय दिया. इस दौरान उन्होंने बीजेपी के स्थानीय नेताओं और संघ के स्वयंसेवकों को साथ लेकर संगठन को मजबूत किया. खासकर कांग्रेस के दलित और पिछड़ी जातियों के वोट बैंक में सेंध लगाई. साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने जोर—शोर से प्रचार किया. उनकी मेहनत नतीजों में साफतौर पर दिखाई दी. अमेठी की पांच में चार सीटों पर बीजेपी ने फतह हासिल की.

विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ ‘गुमशुदा सांसद’ का नारा दिया. वे जब भी अमेठी गईं, उन्होंने लोगों को यह समझाया कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के यहां से जीतने के बावजूद क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ है. स्मृति की अगुवाई में बीजेपी अमेठी में इतना सब करती रही और इस दौरान कांग्रेस हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही. दरअसल, कांग्रेस को यह भरोसा था कि अमेठी गांधी परिवार का गढ़ है और स्मृति ईरानी यहां कितने भी हाथ-पैर मार लें, चुनाव में जीत राहुल गांधी की ही होगी.

अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत में उनके चुनाव प्रबंधन का बड़ा योगदान है. एक ओर कांग्रेस ने यह सोचकर चुनाव लड़ा कि यह सीट तो पार्टी का गढ़ है तो दूसरी ओर स्मृति ईरानी ने एक-एक बूथ के हिसाब से रणनीति तैयार की. सूत्रों के अनुसार उन्होंने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए कई डमी प्रत्याशी भी खड़े किए. आपको बता दें कि अमेठी में स्मृति ईरानी और राहुल गांधी के अलावा 25 दूसरे उम्मीदवार भी मैदान में थे. इन्हें मिले वोटों का जोड़ स्मृति की जीत के अंतर के आसपास ही है.

स्मृति ईरानी की मेहनत और रणनीति के अलावा राहुल गांधी की हार में उन नेताओं की भी कम भूमिका नहीं है, जिनके भरोसे कांग्रेस आलाकमान ने अमेठी को छोड़ रखा था. इनमें सबसे बड़ा नाम चंद्रकांत दुबे का है, जो अमेठी में राहुल गांधी के अघोषित नुमाइंदे थे. कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि दुबे ने उनकी बात राहुल गांधी तक नहीं पहुंचाई. अपनी उपेक्षा से आहत इन कार्यकर्ताओं ने चुनाव में अनमने ढंग से काम किया. नतीजतन राहुल गांधी न सिर्फ चुनाव हारे, बल्कि उन्हें किसी भी विधानसभा सीट पर बढ़त नहीं मिली. वे वोटों की गिनती में एक बार भी स्मृति ईरानी से आगे नहीं निकले.

कारण चाहे जो भी रहे हों, फिलहाल हकीकत यह है कि गांधी परिवार का गढ़ कही जाने वाली अमेठी सीट कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी है. गौरतलब है कि अमेठी के साथ कांग्रेस का सुनहरा अतीत जुड़ा रहा है. यह सिलसिला 1967 से शुरू हुआ था जब कांग्रेस के विद्याधर वाजपेयी ने अमेठी में पार्टी की जीत की नींव रखी थी. 1967 और 1971 के लोकसभा चुनाव में भी वाजपेयी यहां से चुनाव जीते. 1977 के चुनाव में जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को हराकर इस सीट पर फ​तह हासिल की.

अमेठी की बागडोर असली रूप से गांधी परिवार के हाथ में 1980 के लोकसभा चुनाव में आई. संजय गांधी ने यहां से जीत दर्ज की, लेकिन उनकी विमान हादसे में मौत हो गई. 1981 में राजीव गांधी ने यहां से चुनाव लड़ा और 1991 तक यहां से सांसद रहे. बम धमाके में राजीव गांधी के निधन के बाद कांग्रेस ने यहां से सतीश शर्मा को मैदान में उतारा. वे 1991 से लेकर 1998 तक यहां से सांसद रहे. 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के संजय सिन्हा ने सतीश शर्मा को शिकस्त दी.

1999 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी अमेठी से मैदान में उतरीं. उन्होंने बीजेपी के संजय सिन्हा को चुनाव में हराया और 2004 तक अमेठी की सांसद रहीं. 2004 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी यहां से मैदान में उतरे और लगातार तीन बार चुनाव जीते. 2019 के लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी हो हराकर अमेठी में गांधी परिवार के किले को ढहा दिया है.

इस बड़ी जीत के बाद स्मृति ईरानी का केंद्र की मोदी सरकार में कद बढ़ना तय माना जा रहा है. यह देखना रोचक होगा कि कद बढ़ने के बाद वे अमेठी पर कितना ध्यान देती हैं. यदि वे पिछले पांच साल की तरह ही यहां सक्रिय रहीं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इस सीट पर कांग्रेस के लिए वापसी करना मुश्किल हो जाएगा. वहीं अमेठी के एक बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या के बाद जिस तरह से स्मृति वहां पहुंची और उनकी अर्थी को कंधा दिया, उसे देखकर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गांधी परिवार की तरह वे भी इस सीट को अपना स्थायी ठिकाना बनाना चाहती हैं.

मोदी की आंधी ने ध्वस्त किए देश की राजनीति में दशकों से जारी ​मिथक

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लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत ने देश की राजनीति में वर्षों से जारी कई स्थापित मान्यताओं को ध्वस्त कर दिया है. चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करने पर साफ दिखाई देता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अब नए दौर में प्रवेश कर चुका है. आइए जानते हैं लोकसभा चुनाव से देश की राजनीति में आए आठ बड़े बदलावों के बारे में-

जाति का जंजाल तबाह:
यूपी और बिहार में बीजेपी को घेरने के लिए विपक्षी दलों ने तमाम जातिगत समीकरणों को साधते हुए महागठबंधन का निर्माण किया. महागठबंधन के निर्माण के बाद अंदेशा था कि बीजेपी को भारी नुकसान होगा लेकिन चुनावी नतीजे इससे बहुत उलट आए. कई ऐसे क्षेत्रों में बीजेपी ने जीत हासिल की जहां गठबधन का गणित बहुत मजबूत था. यूपी की मेरठ लोकसभा सीट पर मुकाबला इस बार बसपा के हाजी याकूब और बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल के बीच था. यहां जातिगत समीकरण पूरी तरह से हाजी याकूब के पाले में थे. उनकी जीत मेरठ से तय मानी जा रही थी लेकिन नतीजे राजेंद्र अग्रवाल के पक्ष में आए. बीजेपी के पक्ष में आया नतीजा साबित करता है कि दलितों ने भी इस बार मायावती का साथ छोड़ मोदी के नाम पर बीजेपी को वोट दिया है.

सियासी पर्यटन के दिन खत्म:
इस बार के चुनाव में यह तथ्य मुख्य रुप से नतीजों में उभरकर आया. पहले जिस प्रकार नेता क्षेत्र में पार्टियों के टिकट लेकर आते थे और पार्टी के दम पर जीत भी जाते थे, लेकिन उसके बाद क्षेत्र की सुध लेने पांच साल में एक बार भी नहीं आते थे, ऐसे नेताओं को 2019 के लोकसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा. हरियाणा की हिसार लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेसी उम्मीदवार भव्य विश्नोई को चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा. उनकी हार का प्रमुख कारण उनकी मां आदमपुर विधायक रेणुका विश्नोई और पिता कुलदीप विश्नोई का क्षेत्र से गायब रहना रहा. दूसरा उदाहरण डिंपल यादव को कन्नौज से मिली हार है. उन्होंने बीते पांच सालों में एक बार भी क्षेत्र की सुध नहीं ली. क्षेत्र के लोगों से उनका जुड़ाव न के बराबर रहा.

सिर्फ नाम से नहीं चलेगा काम:
भारतीय राजनीति में माना जाता रहा है कि दिग्गज़ उम्मीदवारों के सामने लड़ने वाला उम्मीदवार सिर्फ पार्टी की चुनावी प्रकिया को पूर्ण करने के लिए ही मैदान में होता है. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव ने इस थ्योरी को सिरे से खारिज किया है. इस बार देश के कई बड़े नेता अपेक्षाकृत छोटे प्रत्याशियों के सामने हारते हुए दिखे. मध्यप्रदेश के गुना लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेसी दिग्गज़ ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार हार का सामना करना पड़ा. उन्हें बीजेपी के नए नवेले प्रत्याशी केपी यादव ने करीब सवा लाख वोटों से मात दी.

बाहुबलियों की विदाई:
जरायम की दुनिया से निकले लोगों ने भारतीय राजनीति में अपनी जगह बनाई है लेकिन 2019 के चुनाव में जनता ने इन बाहुबली नेताओं को नकारा है. सीवान लोकसभा क्षेत्र से बाहुबली शहाबुद्दीन की पत्नी हीना साहब को जेडीयू की कविता सिंह से हार का सामना करना पड़ा. वहीं बिहार की मुंगेर लोकसभा क्षेत्र से मोकमा विधायक अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को बिहार सरकार के मंत्री ललन सिंह से हार झेलनी पड़ी. हालांकि इन नतीजों में अपवाद भी देखने को मिले. यूपी के गाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल अंसारी को जीत हासिल हुई. उन्होंने मोदी सरकार के मंत्री मनोज सिन्हा को मात दी.

राजपरिवारों के दिन लदे:
इस बार के लोकसभा चुनाव में जनता ने पूर्व राजपरिवारों के सदस्यों को नकारा है. यूपी के प्रतापगढ़ लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस की प्रत्याशी राजकुमारी रत्ना सिंह को करारी हार का सामना करना पड़ा. उन्हें बीजेपी के संगमलाल गुप्ता ने मात दी. राजस्थान के अलवर लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर भंवर जितेन्द्र सिंह को बड़ी हार का सामना करना पड़ा. उन्हें बीजेपी के बाबा बालकनाथ ने करीब सवा तीन लाख वोटों से हराया है.

रसातल में राजघरानों की राजनीति:
लोकसभा चुनाव के नतीजों में राजनीतिक घरानों के राजकुमारों को भी हार का सामना करना पड़ा. अमेठी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अपने चुनावी करियर में पहली हार का सामना करना पड़ा. उन्हें बीजेपी की स्मृति ईरानी ने मात दी. वहीं पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण के पौत्र जयंत चौधरी को बागपत लोकसभा क्षेत्र से बीजेपी के सत्यपाल सिंह से हार का सामना करना पड़ा.

केंद्र और राज्य में अंतर साफ:
देश में आए लोकसभा चुनाव के नतीजों में जनता की प्रदेश और केंद्र को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिली. ओडिशा में बीजेपी को लोकसभा की 8 सीटों पर जीत हासिल हुई. लेकिन विधानसभा चुनाव में कोई खास कामयाबी नहीं हासिल कर पायी. विधानसभा चुनाव में पार्टी को केवल 22 सीटें ही मिली. यानी लोगों को केंद्र और राज्य की प्राथमिकताओं के बारे में पता है. वे मुद्दों को देखकर अलग—अलग फैसला लेने लगे हैं.

विकास का बोलवाला:
बीजेपी को मिले इस ऐतिहासिक जनादेश का अवलोकन किया जाए तो इसका प्रमुख कारण मोदी सरकार द्वारा लाई गई शौचालय स्कीम और उज्जवला योजना रही जिसका बीजेपी को जबरदस्त फायदा हुआ. इन योजना के लाभार्थियों ने मोदी पर पुनः विश्वास जताया है. उडीसा में नवीन पटनायक की जीत भी इसी ओर इशारा करती है. पूरे देश में मोदी की आंधी के बावजदू पटनायक अपना किला बचाने में कामयाब हो गए. उनके कार्यकाल के हुआ विकास इसकी बड़ी वजह है. पटनायक की सॉफ्ट छवि ने भी प्रदेश में मोदी लहर को धीमा करने का काम किया.

जीत के बाद काशी पहुंचे मोदी, विश्वनाथ के दर्शन कर कार्यकर्ताओं को कहा धन्यवाद

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लोकसभा चुनाव में जीत के बाद नरेंद्र मोदी पहली बार वाराणसी पहुंचे. यहां पहुंचकर उन्होंने सबसे पहले बाबा विश्वनाथ भोलेनाथ के दर्श किए. इसके बाद एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि आज की राजनीति पुराने ढर्रे पर चल रही है. देश में छूआछूत की राजनीति बढ़ती जा रही है. आज भी बीजेपी को अछूत माना जाता है. जबकि सबका साथ सबका विकास हमारा ध्येय है. हमने कमिंया हैं लेकिन इराके नेक हैं. आज रग-रग में विकास को लिए कोई दल है तो वह केवल भारतीय जनता दल है. बता दें कि काशी में यह मोदी का पहला विजयी भाषण है. इस मौके पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी … Read more

30 मई को शपथ लेंगे मोदी, शाम सात बजे राष्ट्रपति भवन में होगा भव्य समारोह

नरेंद्र मोदी सरकार का शपथ ग्रहण समारोह 30 मई को होगा. राष्ट्रपति भवन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 30 मई को शाम सात बजे प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाएंगे. समारोह राष्ट्रपति भवन में आयोजित होगा. कार्यक्रम में कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष शिरकत करेंगे. इनमें पड़ोसी देशों सहति अरब देशों के राष्ट्राध्यक्षों के भी आने की संभावना है. The President will administer the oath of office and secrecy to the Prime Minister and other members of the Union Council of Ministers at 7 pm on May 30, 2019, at Rashrapati Bhavan — President of India (@rashtrapatibhvn) May 26, 2019 … Read more

मोदी-शाह से मिले जगन रेड्डी, एनडीए में शामिल होगी वाईएसआर कांग्रेस!

लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद सियासी समीकरणों के बनना-बिगड़ना शुरू हो गया है. रविवार को आंध्र प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की. इस दौरान जगन ने पीएम मोदी को जीत की बधाई देते हुए आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के साथ ही केंद्र सरकार से अतिरिक्त फंड जारी करने की मांग की. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जगन मोहन रेड्डी ने पीएम मोदी को आंध्र प्रदेश की आर्थिक स्थिति के बारे में बताया और 30 हजार करोड़ रुपये के बकाए बिल का भुगतान करने का अनुरोध किया. इसके साथ ही दोनों नेताओं के … Read more

छात्र राजनीति से निकले गजेंद्र सिंह शेखावत ने कैसे दी जादूगर को शिकस्त

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अशोक गहलोत. राजस्थान की राजनीति का वो चेहरा, जिसके आगे कोई नहीं टिका. उन्होंने राजस्थान में सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद कई नेताओं को ठिकाने लगाया. लेकिन राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत को इस बार लोकसभा चुनाव में एक ऐसे प्रत्याशी ने मात दी जो पांच साल पहले ही सक्रिय राजनीति में आया है. वो नाम है गजेंद्र सिंह शेखावत. हम यहां अशोक गहलोत की हार इसलिए बता रहे हैं क्योंकि जोधपुर संसदीय सीट पर उनके पुत्र वैभव गहलोत सिर्फ शारीरिक रुप से चुनाव लड़ रहे थे. यहां साख पूरी तरह से अशोक गहलोत की दांव पर थी.

अशोक गहलोत पांच बार जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं. वहां उनका जनाधार काफी मजबूत माना जाता है. यही वजह है कि अशोक गहलोत ने अपने वैभव के राजनीतिक पर्दापण के लिए जोधपुर को चुना. हालांकि पहले ये चर्चा थी कि वैभव गहलोत टोंक-सवाई माधोपुर से चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने पिछले काफी समय से यहां तैयारी भी की लेकिन अंत में अशोक गहलोत की तरफ से वैभव को जोधपुर से ही चुनाव लड़ाने का फैसला हुआ. लेकिन जिसने गहलोत के चूलें हिलाई, वैभव को उनके गढ़ में मात दी, वो गजेंद्र शेखावत कौन है. हम उनके जीवन परिचय के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं…

साल था 1967. जैसलमेर के शंकर सिंह शेखावत और मोहन कंवर के घर पुत्र का जन्म हुआ. नाम रखा गया गजेंद्र सिंह. गजेंद्र सिंह की शुरुआती शिक्षा जैसलमेर में हुई. स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद गजेंद्र सिंह कॉलेज शिक्षा के लिए जोधपुर आए. जोधपुर आना उनके जीवन का टर्निंग पांइट साबित हुआ. यहां आने के बाद वो बीजेपी के छात्र संघटन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े. छात्रों की समस्याओं को लेकर वो लगातार जोधपुर में संघर्षरत रहे.

1992 के जोधपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में गजेंद्र की लोकप्रियता को देखते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उन्हें अध्यक्ष पद का उम्मीदवार घोषित किया. नतीजे सामने आए तो गजेंद्र सिंह शेखावत ने इतिहास रच दिया था. वो सबसे ज्यादा मतों से जीतने का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके थे. उनकी जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि जब वे छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए, जोधपुर संसदीय सीट पर कांग्रेस का कब्जा था. अशोक गहलोत खुद सांसद थे. वो खुद छात्र राजनीति के दम पर मुख्य सियासत में आए थे. लेकिन तब किसी को यह इल्हाम नहीं था कि आने वाले समय में यह छात्र नेता जोधपुर की सियासत में एक नई इबारत लिखेगा.

गजेंद्र सिंह की जीत बड़ी थी तो जश्न भी बड़ा होने वाला था. उनके शपथ ग्रहण में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत पहुंचे थे. उस दौर में छात्रसंघ के कार्यालय उद्घाटन में मुख्यमंत्री का पहुंचना बहुत बड़ी बात थी. गजेंद्र ने अपने छात्रसंघ कार्यकाल में छात्रों के कल्याण के अनेक कार्य किए जिनमें अखिल भारतीय छात्र नेता सम्‍मेलन आयोजित किया जाना, विभिन्‍न सांस्‍कृतिक और खेलकूद के कार्यक्रम आयोजन किया जाना शामिल रहा.

इसके बाद वो 2001 में चोपासनी शिक्षा समिति की शिक्षा परिषद के सदस्‍य के रुप में सर्वाधिक मतों से निर्वाचित हुए. स्‍वदेशी जागरण मंच के तत्‍वाधान में 2000 से 2006 तक जोधपुर में स्‍वदेशी मेले का आयोजन किया गया. इन कार्यक्रमों की जिम्मेदारी गजेंद्र सिंह ने भी संभाली. इन कार्यक्रमों में लगभग 10 लाख लोग आए जिसके परिणामस्‍वरूप स्‍वदेशी उद्योग की चीजों की भारी बिक्री हुई. स्‍वदेशी मेले को काफी पसंद किया गया. इन कार्यक्रमों में गजेंद्र सिंह की पहचान जोधपुर के बाहर भी बनाई.

2012 में उन्हें बीजेपी प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया. 2014 में बीजेपी जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से मजबूत उम्मीदवार की तलाश में थी जो चंद्रेश कुमारी को मात दे सके. बीजेपी की खोज गजेंद्र सिंह पर आकर रुकी. गजेंद्र मोदी लहर पर सवार होकर संसद पहुंचे. उन्होंने कांग्रेस की चंद्रेश कुमारी कटोच को भारी अन्तर से हराया.

उन्हें शुरुआत में लोकसभा की प्रमुख कमेटियों का सदस्य बनाया गया. लेकिन 2017 का साल उनके लिए बड़ी खुशी लेकर आया. उन्हें नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में जगह मिली. गजेंद्र सिंह को कृषि और किसान कल्याण विभाग का राज्य मंत्री बनाया गया. इसके बाद वो अपने काम के दम पर पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के चहेते हो गए.

2018 में राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष अशोक परनामी के इस्तीफा देने के बाद अमित शाह ने गजेंद्र सिंह शेखावत को पार्टी का अध्यक्ष पद बनाने का मन बनाया. लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनके नाम का विरोध किया. अमित शाह जानते थे कि वो वसुंधरा राजे के खिलाफ जाकर गजेंद्र को अध्यक्ष तो बना देंगे लेकिन इससे पार्टी के बीच आंतरिक कलह हो सकती है. इसलिए फिर बाद में राज्यसभा सांसद मदनलाल सैनी को प्रदेश अध्यक्ष के लिए चुना गया.

2019 के चुनाव में गजेंद्र सिंह शेखावत ‘ज्वॉइंट किलर’ बनकर उभरे. उन्होंने अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को भारी अंतर से हराया. यह हार वैभव गहलोत की नहीं अपितु अशोक गहलोत की है क्योंकि गहलोत इस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं. इसके बावजूद उनके पुत्र को करारी हार का सामना करना पड़ा. गजेंद्र सिंह शेखावत की इस बार की जीत उनका कद पार्टी के बीच बढ़ाएगी, इसमें कोई दोराय नहीं है. इस बार के मोदी मंत्रिमंडल में या तो गजेंद्र कैबिनेट मंत्री बनेंगे या फिर राजस्थान बीजेपी की कमान उनके हाथ में होगी, यह निश्चित है.

‘भारतीय भाग्यशाली हैं कि उनके पास मोदी हैं’

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लोकसभा चुनाव में जबरदस्त सफलता हासिल करने के बाद बीजेपी टीम के सेनापति नरेंद्र मोदी 30 मई को प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने जा रहे हैं. लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 300+ और एडीए को 350+ सीटें मिली हैं. उनके चुनाव जीतने के बाद विभिन्न देशों से बधाई संदेश आ रहे हैं. इस लिस्ट में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शामिल हैं. ट्रंप ने नरेंद्र मोदी को महान व्यक्ति बताते हुए कहा है कि भारतीय खुशनसीब हैं कि उनके पास मोदी है. अपने ट्वीटर हैंडल से मोदी को बधाई संदेश देते हुए ट्रंप ने कहा, ‘अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात हुई. उन्हें इतनी बड़ी जीत … Read more

तो क्या ये हिन्दुत्व की जीत है…

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लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्यसभा सांसद स्वप्न दास गुप्ता ने ट्वीट किया, ‘पश्चिम बंगाल में 40 फीसदी वोटों के साथ बीजेपी बंगाली हिंदुओं की पसंदीदा पार्टी बन गई है. टीएमएसी दूसरे समुदायों की पसंदीदा पार्टी है. इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा.’ तो क्या मोदी की अगुवाई में बीजेपी की यह अभूतपूर्व जीत हिंदुत्व की जीत है? दिल्ली यूनिवर्सिटी के राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रोफेसर सुनील कुमार चौधरी कहते हैं, ‘इतने बड़े नतीजों की बुनियाद किसी एक वजह पर नहीं बनती है. लेकिन, जनता का संदेश साफ है या तो आप परफॉर्म करिए या हाशिए पर जाइए! आपकी जो भी भूमिका जनता ने चुनी है, उसे निभाना पड़ेगा. विपक्ष … Read more