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ओवैसी से राजभर ने किया किनारा, अब ‘शिव-रावण’ से आस, बोले- किसी के जाने से नहीं पड़ता फर्क

28 अक्टूबर 2021
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ओवैसी से राजभर ने किया किनारा, अब ‘शिव-रावण’ से आस, बोले- किसी के जाने से नहीं पड़ता फर्क

Politalks.News/UttarPradesh. जैसा की पॉलिटॉक्स पहले ही बता चुका है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा. बीजेपी हो या कांग्रेस, सपा हो या बसपा इन सभी पार्टियों को प्रदेश के अन्य छोटे दलों की कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में जरुरत जरूर है. सियासी जानकारों का कहना है कि योगी सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी चरम पर है तो वहीं सपा में अब पहले जैसे बात नहीं रही कि वह एकतरफा चुनाव जीत जाए. तो कांग्रेस पार्टी प्रदेश के साथ साथ देश में अपने वजूद को मजबूत करने पर तूली है तो बसपा प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन तलाशने की … Read more

Politalks.News/UttarPradesh. जैसा की पॉलिटॉक्स पहले ही बता चुका है कि उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा. बीजेपी हो या कांग्रेस, सपा हो या बसपा इन सभी पार्टियों को प्रदेश के अन्य छोटे दलों की कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में जरुरत जरूर है. सियासी जानकारों का कहना है कि योगी सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी चरम पर है तो वहीं सपा में अब पहले जैसे बात नहीं रही कि वह एकतरफा चुनाव जीत जाए. तो कांग्रेस पार्टी प्रदेश के साथ साथ देश में अपने वजूद को मजबूत करने पर तूली है तो बसपा प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है. बुधवार को सुभासपा और सपा के ‘नव गठबंधन’ ने सभी दलों को पुनः नई रणनीति पर विचार करने को मजबूर कर दिया है. तो सबसे बड़ा झटका लगा है तो वो है AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को.

बिहार विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाली AIMIM ने यूपी विधानसभा चुनाव के लिए ओमप्रकाश राजभर के ‘भागीदारी संकल्प मोर्चा’ के तहत चुनाव लड़ने की बात कही थी. उस समय दोनों AIMIM और सुभासपा के साथ आने के संकेत के बाद सपा और बीजेपी की नींद उड़ गई थी. जिसके बाद हाल ही के कुछ दिन पहले सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने बीजेपी के साथ जाने के संकेत दिए थे लेकिन अब उन्होंने सपा के साथ हाथ मिलाकर ओवैसी को तगड़ा झटका दे दिया है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पहले ही ये संकेत दे दिए थे कि वे आगामी चुनाव में छोटे छोटे दलों के साथ समझौता करेंगे ना कि किसी बड़े दल के साथ. तो राजभर ने भी यह साफ़ किया था कि वे उस पार्टी के साथ गठबंधन करने को तैयार हैं जो सत्ता में आने पर उनकी मांगों को पूरा कर सके.

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विधानसभा चुनाव करीब आने से पहले ही एक साथ हाथ में हाथ मिलाये ओवैसी और राजभर का साथ ख़त्म हो गया है. ओवैसी के साथ गठबंधन टूटने से संबंधित सवाल पूछे जाने पर राजभर ने कहा था कि ‘राजनीति में कोई भी चीज स्थायी नहीं हैं. हम जिस भी पार्टी के साथ जाएंगे उसके लिए हम ओवैसी से भी बात करेंगे’. लेकिन देखिये राजभर तो पीछे की गली से ओवैसी को अकेला छोड़कर सपा के साथ मिल गए. अब ओवैसी का सपा के साथ जाना मुश्किल ही नहीं  नामुमकिन सा है. लेकिन ये भी सही है राजनीति में कुछ भी संभव है जब महाराष्ट्र में कांग्रेस और शिवसेना मिलकर सरकार चला सकते हैं तो….

इस पूरे मामले पर जब एक मीडिया संस्थान ने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी से बात कि तो उन्होंने कहा कि, ‘किसी के आने या जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. अब राजभर के मन में क्या था और क्यों वो सपा के साथ गए इसका कारण मेरी समझ के बाहर है’. ओवैसी ने आगे कहा कि, ‘हमारी पार्टी आगामी चुनाव में 100 सीटों पर पूरे दमखम से चुनाव लड़ेगी, और ऐसा कोई जरूरी नहीं है कि केवल मुसलमानों को ही टिकट देंगे, बल्कि सारी बिरादरी के लिए हम तैयार हैं’.

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असदुद्दीन ओवैसी ने आगे कहा कि, ‘अगर हमें कोई राजनीतिक तौर पर अछूत समझता है तो फिर इसका फैसला जनता तय करेगी’. वहीं राजभर से टूट और अन्य दलों से गठबंधन को लेकर ओवैसी ने कहा कि, ‘हमारी शिवपाल सिंह यादव और चंद्रशेखर रावण से बात चल रही है’. हालांकि शिवपाल सिंह यादव खुद सपा के साथ जाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में ओवैसी के पास अकेले चुनाव लड़ने के अलावा कोई काम नहीं बचता. वहीं प्रमुख विपक्षी दलों द्वारा AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को बीजेपी की B टीम बताया जाना उन्हें रास नहीं आया.

ओवैसी ने आगे BJP की बी टीम बताये जाने वाले सवाल पर कहा कि, ‘कुछ लोग कहते हैं कि बीजेपी की बी टीम हूँ लेकिन मैं अगर बीजेपी की बी टीम हूं तो 2014 , 2017 और 2019 में बीजेपी कैसे जीत गई. तब तो मैं उत्तरप्रदेश में भी नहीं था’. ओवैसी ने आगे कहा कि, ‘अगर तृणमूल कांग्रेस असम की कांग्रेस नेता को अपने पाले में ले आती हैं या लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी के बारे में कुछ बोलते हैं तब तो उन्हें कोई बीजेपी की बी टीम नहीं कहता’. ओवैसी ने आगे कहा कि, ‘देश की कोई भी पार्टी यह नहीं चाहती है कि देश में मुसलमानों की एक लीडरशिप तैयार हो’.

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यूपी विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुलता को मद्देनजर रखते हुए ओवैसी अपनी पार्टी की यहाँ अलग पहचान बनाना चाहते हैं. ओवैसी ने भले ही 100 सीटों पर अपना प्रत्याशी उतारने का एलान कर दिया हो. लेकिन उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि बिना किसी सहयोगी पार्टी के इतने बड़े राज्य में पार पाना आसान नहीं है. वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यह भली भांति जानते हैं कि इस बार का चुनाव बीजेपी के सिरदर्द वाला होगा.

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