हिंदी चैनल की एक एंकर के मुंह से निकली बात और राहुल व कांग्रेस से सबक ले उद्धव ने नहीं बनने दिया आदित्य को ‘शिवसेना का राहुल गांधी’

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. कहते हैं किस्मत एक मौका सबको देती है लेकिन ये सामने वाले पर निर्भर करता है कि कोई तो उसे बाहें फैलाकर स्वीकार करता है और कोई उस मौके को गवां देता है. ऐसा ही कुछ देखने को मिला आदित्य ठाकरे और राहुल गांधी के राजनीतिक करियर में. महाराष्ट्र की उद्दव सरकार में नए नवेले केबिनेट मंत्री बने आदित्य ठाकरे और राहुल गांधी के राजनीति करियर में एक बात काफी समान है. दोनों के पास एक समान मौके आए जब वे राजनीति में और आगे बढ़ सकते थे लेकिन राहुल गांधी ने वो मौका गवां दिया जबकि आदित्य ठाकरे ने इस मौके को अपने हाथ से नहीं जाने दिया. हालांकि आदित्य को ये मौका प्रदेश की राजनीति में मिला वहीं राहुल गांधी को राष्ट्रीय राजनीति में. दरअसल राहुल गांधी को ये मौका मिला 2009 में, जब राहुल गांधी अमेठी सीट से आम चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे, उस वक्त उनके पास प्रधानमंत्री बनने का स्वर्णिम मौका था लेकिन पार्टी ने डॉ.मनमोहन सिंह को लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री पद के लिए चुना.

हालांकि माना यही जाता है कि राहुल गांधी तो प्रधानमंत्री बनना चाहते थे लेकिन उस समय कांग्रेस अध्यक्ष और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी नहीं चाहती थी कि ऐसा हो. लेकिन शायद यहां सोनिया और राहुल दोनों से एक बड़ी गलती हो गई, राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री बनने का मौका तो खोया ही, मंत्री बनने तक की जेहमत नहीं उठाई. अगर वे ऐसा करते या सिर्फ मंत्री भी बन जाते तो 2013-14 में जब देशभर में मोदी लहर छाई तो उनकी छवि केवल एक सांसद के तौर पर अपरिपक्व नेता की ही नहीं बनी रहती. विपक्ष ने भी उनकी कमजोर और नासमझ समझे जाने वाले नेता वाली छवि को जमकर भुनाया. यहां तक की विपक्ष ने उन्हें ‘पप्पू’ के नाम तक से संबोधित किया.

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चूंकि राहुल गांधी चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए थे तो ये मानना जायज है कि सोनिया गांधी के बाद पार्टी की बागड़ोर और कांग्रेस की विरासत राहुल गांधी के हाथ में ही आनी है. शायद इसलिए राहुल गांधी को मंत्री पद अपने लिए छोटा लग रहा हो, लेकिन कांग्रेस ने राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद 2019 में हुआ लोकसभा चुनाव उनके चेहरे पर ही लड़ा या यूं कहा जाए कि अगर कांग्रेस इस आम चुनाव में अगर बहुमत ला पाती तो शायद राहुल ही प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार होते. लेकिन कहते हैं ना, ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत.’

ऐसी ही कुछ परिस्थितियां आदित्य ठाकरे के सामने भी रहीं. उद्दव ठाकरे के बाद पर्दे के पीछे की राजनीति और शिवसेना की बागड़ोर सीधे-सीधे आदित्य ठाकरे के हाथ में आना स्वभाविक है. लेकिन शायद उद्धव ठाकरे ने समय रहते कांग्रेस और राहुल गांधी से सबक लेते हुए ना सिर्फ सक्रिय राजनीति में उतारा बल्कि पहले चुनाव में ही आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री का दावेदार भी घोषित कर दिया. लेकिन, चूंकि अब तक आदित्य राजनीति में बिलकुल नए हैं और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में वर्ली सीट से उतरकर सक्रिय राजनीति में उतरने वाले ठाकरे परिवार के पहले सदस्य हैं. उनके पास सक्रिय राजनीति के न के बराबर अनुभव को देखते हुए गठबंधन में शामिल एनसीपी और कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री मानने से साफ इंकार कर दिया और ना चाहते हुए भी उनके पिता उद्दव ठाकरे को सत्ता की कुर्सी संभालनी पड़ी.

लेकिन उद्धव ठाकरे जो कि शायद अपने बेटे के राजनीतिक करियर को लेकर चिंतित थे, ने कोई मौका ना गंवाते हुए आदित्य को पहले मंत्रिमंडल विस्तार में ही केबिनेट मंत्री बनाया आउट इस तरह महाराष्ट्र में एक नया राजनीतिक इतिहास रच गया कि महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी भी सरकार में पिता मुख्यमंत्री और बेटा केबिनेट मंत्री रहा हो. इस तरह उद्धव ने समय रहते अपने बेटे आदित्य ठाकरे के राजनीतिक भविष्य को सेट कर दिया. आदित्य अभी युवा हैं और मंत्री बनने के बाद उन्हें जो भी जिम्मेदारी दी जाएगी, वे निभाते-निभाते एक पूर्ण राजनीतिज्ञ बनने की ओर अग्रसर होंगे. यानि अगले चुनावों में जब वे मैदान में उतरेंगे तो उनके पास सक्रिय राजनीति का पूरे 5 साल का अनुभव होगा. वहीं राहुल गांधी ने केवल पार्टी की जिम्मेदारियां निभाई हैं जो सक्रिय राजनीति से पूरी तरह उलट है. दोनों में जमीन और आसमान का फर्क है.

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यहां एक बात का जिक्र करना बेहद जरूरी है कि महाराष्ट्र चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक कवरेज के दौरान हिंदी चैनल की एक एंकर ने आदित्य ठाकरे को ‘शिवसेना का राहुल गांधी‘ कहकर संबोधित किया था. एंकर ने ऐसा क्यों कहा, ये उपर दी गई परिस्थितियों को देखकर समझा जा सकता है और इसमें कोई दोराय भी नहीं है. पर शायद ये बात उद्दव ठाकरे और उनकी पत्नी रश्मि ठाकरे के दिमाग में बैठ गई और उन्होंने तय किया कि कुछ भी हो जाए, आदित्य को देश का नया राहुल गांधी नहीं बनने देंगे. यानि विपक्ष को कहने का कोई मौका नहीं देंगे. यही वजह रही कि उन्होंने आदित्य को एक राजनीतिज्ञ के तौर पर तराशने का काम शुरु कर दिया और चुनाव से पहले मुख्यमंत्री के दावेदार रहे आदित्य चुनाव के बाद अपने पिता की सरकार में मंत्री बन गए. अब महाराष्ट्र में जब तक उद्दव सरकार टिकी रहेगी, आदित्य को मजबूत और समझदार नेता के तौर पर उनकी पकड़ मजबूत होती रहेगी.

दिल्ली में टूटेगा अरविंद केजरीवाल का तिलिस्म या फिर इतिहास रचेगा झाडू के सर’ताज’!

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. देश की राजधानी दिल्ली में आगामी दो महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं. यहां सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी के अलावा भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, जदयू, एनसीपी के साथ कई अन्य पार्टियां दिल्ली के जंगी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं. लोकसभा में प्रदेश की सभी सातों सीटों पर बीजेपी का कब्जा हुआ है. इस हिसाब से पार्टी प्रदेशाध्यक्ष मनोज तिवारी के नेतृत्व में भाजपा की स्थिति काफी मजबूत है. वहीं हरियाणा, महाराष्ट्र और हाल ही के झारखंड चुनाव परिणामों से उत्साहित और दिल्ली की गद्दी पर लगातार 15 साल सत्ता पर आसीन रही कांग्रेस कमतर तो नहीं कही जा सकती लेकिन आम आदमी पार्टी के मुखिया और वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) की चुनौती से पार पाना नाकों चने चबाना जैसा साबित हो सकता है.

दरअसल, अरविंद केजरीवाल दिल्ली के दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं जिन्होंने सत्ता के पांच साल पूरे किए हैं. इससे पहले केवल कांग्रेस की शीला दीक्षित ही एकमात्र मुख्यमंत्री रही हैं जो दिल्ली की सत्ता पर पूरे पांच साल काबिज रहीं. इतना ही नहीं, उनके नाम लगातार 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड भी दर्ज है. दिल्ली में कांग्रेस के 15 सालों के तिलिस्म को तोड़ने का सेहरा अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) के सिर पर बंधा. साल 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में आप पार्टी दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी. राजनीति में अनाड़ी अरविंद केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी में अधिकांश खिलाड़ी अनुभवहीन ही थे. इसके बावजूद उनकी पार्टी ने पहले ही चुनाव में 70 में से 28 सीटों पर अपना कब्जा जमाया जिसने दिल्ली की जनता को ही नहीं बल्कि भाजपा और कांग्रेस दोनों को भी अचंभे में डाल दिया.

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बीजेपी को सबसे अधिक 31 सीटें मिली लेकिन बहुमत न मिलने के चलते सत्ता पाने से दूर रही. भ्रष्टाचार के मुद्दे को भुनाकर राजनीति में पहुंची आप आदमी ने जब कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई तो दोनों के बीच कई मुद्दों को लेकर खटास हमेशा रही. फिर वही हुआ जो होना था, 48 दिनों तक सीएम की कुर्सी संभालने के बाद अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और सरकार गिर गई. इस तरह दिल्ली के सबसे कम दिनों के लिए मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड भी केजरीवाल ने बना दिया.

फिर एक साल तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग लगने के बाद 2015 में दुबारा चुनाव हुए और इन चुनावों में दिल्ली के सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए केजरीवाल की पार्टी ने 67 सीटों पर अपना कब्जा जमाया. पिछले चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी रही बीजेपी केवल तीन सीटों पर सिमट गई. अन्य पार्टियों का खाता तक नहीं खुल सका. केजरीवाल दूसरी बार मुख्यमंत्री बने. अब कुछ दिनों में केजरीवाल सरकार के पांच साल पूरे होने वाले हैं.

अपने दूसरे कार्यकाल में अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर टिका टिप्पणी करने में रहते थे लेकिन वक्त रहते उन्होंने ये सब छोड़ दिल्ली की आंतरिक परिस्थितियों और विकास पर ध्यान देना शुरु किया. उनका ये निर्णय विपक्षियों पर इतना सटीक गिरा कि आज दिल्ली की जनता आप सरकार से काफी खुश दिख रही है. केजरीवाल सरकार ने आम जनता को शिक्षा, बिजली, वाईफाई, महिलाओं के फ्री बस सेवा, जैसी कई सुविधाओं में जमकर छूट दी जिससे जनता सरकार के गुण गा रही है. एक सर्वे के अनुसार दिल्ली की जनता ने बतौर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके कार्यों को 100 में से 100 और 10 में से 10 नंबर दिए.

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सत्ताधारी पार्टी के ये नतीजे चुनाव में भागीदार बनने वाली बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियां के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. ये जरूर है कि आम आदमी पार्टी के करीब 20 विधायकों पर भ्रष्टचार सहित कई आरोप लगे हैं और कुछ विधायक बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. इसके बावजूद सीएम अरविंद केजरीवाल और आप सरकार का जलवा कायम है. देखा जाए तो अभी भी केजरीवाल एंड टीम का राजनीतिक अनुभव केवल पांच साल या इससे थोड़ा ही अधिक है लेकिन उनकी ये टीम लंबे अनुभवी राजनीतिज्ञों को दिल्ली के जंगी मैदान में पछाड़ते हुए दिख रही है. अब देखना होगा कि बीजेपी और कांग्रेस या अन्य विपक्ष उनके मजबूत तिलिस्म को तोड़ पाएगा या फिर अरविंद केजरीवाल फिर से पूरी दिल्ली के विपक्ष पर झाडू फेरने में कामयाब होंगे.

दिल्ली में गौतम गम्भीर की लोकप्रियता और स्थानीय होने का मुद्दा भारी न पड़ जाए मनोज तिवारी पर

(Popularity of Gautam Gambhir)

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. दिल्ली में चुनावी दंगल शुरु होने में अभी कुछ समय बाकी है लेकिन राजधानी में घमासान का आगाज अभी से हो चुका है. लड़ाई है सपनों की, उम्मीदों की और सम्मान की. इसमें सबसे आगे हैं क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने गौतम गंभीर जो पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद हैं. गौतम की देश में एक बड़ी फैन फोलोइंग (Popularity of Gautam Gambhir) हैं और वे राजनीति में आते ही दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने का सपना आंखों में पाल बैठे हैं. हाल में एक मीडिया संस्थान ने जब गौतम से सवाल किया गया कि क्या वे उत्तर प्रदेश जैसी व्यवस्था पर सहमति जताएंगे जहां तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनने के लिए कहा गया था? इस पर गौतम ने गंभीर होते हुए कहा कि एक बड़ी जिम्मेदारी सम्मान की बात होगी और यह एक मुकम्मल सपना होगा.

अब गौतम ने तो अपने मन की बात कह दी लेकिन इस बयान के बाद बीजेपी के दिल्ली प्रदेशाध्यक्ष मनोज तिवारी अति गंभीर हो गए हैं. इसकी वजह है, जो सपना राजनीति में कदम रखते ही गौतम गंभीर देख रहे हैं, वो ही सपना पिछले कई सालों से सांसद मनोज तिवारी भी देख रहे हैं और उसके लिए जी जान एक कर चुके हैं. एक समय वो भी था जब एक दिन ऐसा नहीं जाता था जब मनोज तिवारी दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और प्रदेश सरकार के अच्छे बुरे हर काम में नुक्स निकालने से नहीं चूकते थे, लेकिन पिछले कुछ महीनों से गौतम गंभीर ने ये काम बखूबी संभाला हुआ है. वे राजनीति में आने से पहले से ही आप सरकार पर भड़ास निकालकार अपने काम को बढ़िया अंजाम देते आए हैं.

गौतम गंभीर दिल्ली के स्थानीय स्थानीय (Popularity of Gautam Gambhir) हैं और स्टार क्रिकेटर रहने की वजह से दिल्ली के युवा उनके स्टाइल और बेबाक छवि के फैन हैं हालांकि मनोज तिवारी के चाहने वालों की भी दिल्ली में कमी नहीं है और वे गायकी के नाते उनकी पॉपुलर्टी भी कम नहीं हैं. लेकिन मनोज तिवारी बिहारी मूल के एक्टर एवं सिंगर हैं. दिल्ली विधानसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी भी हाई पावर एक्टिव मोड में है लेकिन गौतम और मनोज तिवारी की आपसी तनातनी इस एक्टिव मोड को लगातार आॅन-आॅफ कर रही है.

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दोनों के बीच अंदरूनी तौर पर चल रही जंग नई नहीं है. आम चुनावों के समय दोनों ने कभी एक दूसरे के लिए प्रचार नहीं किया. चुनाव जीतने के बाद जब प्रधानमंत्री पहली बार राजधानी पधारे थे तो उनके सम्मान में मनोज तिवारी अन्य 6 सांसदों को लेकर उनका स्वागत करने पहुंचे लेकिन गौतम ने समारोह से दूरी बनाए रखी. हाल में प्रदूषण कमेटी में गौतम के उपस्थित न होने से बवाल हुआ. उस दौरान गौतम को वरोदरा में जलेबी खाते हुए देखा गया और सोशल मीडिया पर भी उन्हें जमकर ट्रोल किया गया. उसी वक्त मनोज तिवारी के आवास वाली सड़क पर प्लेट में गंभीर का फोटो और जलेबी लिए कुछ कॉलेज युवकों ने प्रदर्शन किया था. अंदरूनी खबर यही थी कि ये प्रदर्शन तिवारी के कहने पर ही हुआ था ताकि सांसद गौतम की साख गिरे लेकिन इसका ज्यादा असर दिखा नहीं (Popularity of Gautam Gambhir). दोनों के बीच रार तो तब सार्वजनिक हुई जब मनोज तिवारी ने राजधानी में एनआरसी लागू करने की मांग की तो गौतम से अलग राय रखते हुए कहा कि इसमें कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए.

वैसे देखा जाए तो दिल्ली की जनता की पसंद कभी मनोज तिवारी रहे ही नहीं. इसकी वजह है कि तिवारी दिल्ली के संपर्क में कभी नहीं रहे. वे तो राजनीति करने दिल्ली आए हैं. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ और वे सपा नेता रहे. योगी आदित्यनाथ से चुनाव हारने के बाद उन्होंने बीजेपी का रूख किया और फिर जीते. उन्हें 2016 में दिल्ली की भाजपा इकाई का अध्यक्ष बनाया गया. वहीं गौतम के लिए दिल्ली तो घर के आंगन की तरह (Popularity of Gautam Gambhir) है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि गौतम के जब राजनीति में आने की सुगबुगाहट होने लगी थी, तभी दिल्ली की जनता ने उन्हें प्रदेश का भावी सीएम कहकर पुकारना शुरु कर दिया था. एक स्पोर्ट्समैन होने के नाते उनकी फैन फोलोइंग और लोकल उम्मीदवारी को देखते हुए ऐसा सोचना गलत भी नहीं है.

केवल गौतम गंभीर ही मनोज तिवारी और सीएम पद के बीच का कांटा नहीं हैं, यहां पार्टी के विजय गोयल और रमेश विधुड़ी भी उनके प्रतियोगी हैं जो अंदरूनी तौर पर मुख्यमंत्री पद का दावा ठोक रहे हैं. सूत्रों से खबर तो ये भी है कि बीजेपी आलाकमान की सीएम पद पर पहली पसंद गौतम गंभीर ही हैं. उनका शालीन स्वभाव और बेबाकी प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को रास आती है लेकिन राजनीति में अनुभवहीनता नये नवेले नेता गंभीर के लिए उलटी जा रही है.

अब बीजेपी के चार नेता सीएम की कुर्सी पर बैठने का सपना तो देख रहे हैं लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी और वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से पार पाना है. दिल्ली में जिस तरह लगातार जनहीन के फैसले आ रहे हैं, उससे राजधानी की जनता बेहद खुश है. महिलाओं के लिए फ्री बस सुविधा, छात्रों के लिए फ्री वाईफाई, बिजली के बिलों में बेसिक छूट, सरकारी स्कूलों का बदला वातावरण और बेरोजगारों के लिए फ्री ट्रेनिंग सेंटर्स आप सरकार के ऐसे कुछ फैसले हैं जिन पर केंद्रीय सरकार पर भी सवाल नहीं उठा सकती. पिछले कुछ सालों में नरेंद्र मोदी पर सवाल दागने और लाइम लाइट में रहने की जगह केजरीवाल ने दिल्ली के विकास में जब से अपना फोकस किया, अगले चुनावों में जीत की जमीन तय करने में कामयाब होते दिख रहे हैं. ऐसे में उन्हें सत्ता की कुर्सी से हिला पाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है.

वैसे तो आम चुनावों में मोदी लहर ने पूरे देश के साथ-साथ दिल्ली की सभी सातों सीटों पर भी भाजपा को विजयश्री दिला दी. हालांकि इस जीत का क्रेडिट मनोज तिवारी लेने में कामयाब हुए. जबकि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यहां तिवारी की जगह गौतम गम्भीर भी होते तो भी सातों सीट बीजेपी ही जीतने वाली थी. इसी जीत से उत्साहित मनोज तिवारी स्थानीय तौर पर अपनी उम्मीदवारी पर काम कर रहे हैं और लगातार आलाकमान और शीर्ष पदाधिकारियों से संपर्क में हैं लेकिन गौतम गंभीर की लोकप्रियता (Popularity of Gautam Gambhir) और स्थानीय होने के मुद्दे के आगे शायद मनोज तिवारी पीछे रह जाएं.

निर्भया के दोषियों की फांसी टालने की एक और कोशिश, जानबूझकर निकाला जा रहा समय

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. 16 दिसम्बर, 2012 को देश की राजधानी दिल्ली की सड़क पर रात के अंधेरे में एक पैरामेडिकल स्टूडेंट के साथ ऐसा ऐसी हैवानियत हुई जिससे पूरा देश थर्रा गया. आज उस हादसे (Nirbhaya) को सात साल हो गए हैं लेकिन दोषी सजा से दूर हैं. निचली अदालत के बाद हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक निर्भया के सभी दोषियों को फांसी के फंदे पर लटकाने की सजा सुना चुका है लेकिन सभी चारों दोषी किसी ने किसी कानून सलाह के बहाने से सजा को टालने और समय निकालने की कोशिशों में लगे हैं. कहना गलत न होगा कि उनकी ये कोशिश सफल भी हो रही है. हाल ही के दिनों में जो भी किया जा रहा है, वो इस कोशिश का नया पैतरा है.

सभी आरोपी एक एक करके अपनी दया याचिका अलग अलग जगहों पर भेज रहे हैं जिससे केवल समय बर्बाद हो सके. दरअसल 5 मई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने उक्त सभी आरोपियों को दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई. सजा को टालने के लिए तीन अभियुक्तों मुकेश, विनय शर्मा और पवन गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की जिसे पिछले साल 9 जुलाई को कोर्ट ने खारिज कर दी. चौथे दोषी अक्षय सिंह ठाकुर ने इस संबंध में कोई याचिका नहीं लगाई. (Nirbhaya)

अब जैसे ही लगने लगा कि अब दोषियों को सजा जल्दी हो जाएगी, ऐन वक्त पर सबसे पहले विनय सिंह ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को दया याचिका भेजी. इस पर दिल्ली सरकार ने तत्काल संज्ञान लेने ते हुए याचिका खारिज करने की सिफारिश उप राज्यपाल के जरिए केंद्र को भेजी. जब केंद्र ने तत्काल इस याचिका को राष्ट्रपति के पास भेजा तो विनय की ओर से कहा गया कि इस याचिका पर उसके दस्तखत नहीं हैं और इसे उसकी अनुमति के बिना भेजा गया है. निश्चित तौर पर इस याचिका को लौटाया जाएगा और फिर से राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा जिसमें दो से तीन महीने या इससे भी ज्यादा समय लग सकता है.

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इसी बीच अक्षय सिंह ठाकुर ने एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करा दी जिसमें कोर्ट को फांसी की सजा पर पुनर्विचार करने को कहा गया है. याद दिला दें कि अन्य तीन की पुनर्विचार याचिका को कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है. खास बात ये भी है कि अक्षय सिंह के वकील एपी सिंह ने फांसी की सजा का विरोध काफी यूनिक तरीके से किया. उन्होंने याचिका में कहा, ‘दिल्ली में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है और शहर गैस चैंबर बन चुकी है. यहां का पानी भी जहरीला हो चुका है. प्रदूषित हवा और पानी के चलते पहले ही लोगों की उम्र कम होती जा रही है. ऐसे में फांसी की सजा की क्या जरूरत है’. (Nirbhaya)

याचिका में वेद, पुराण और उपनिषद आदि का भी हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया, ‘धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक सतयुग में लोग हजारों साल तक तीवित रहते थे. त्रेता युग में भी एक व्यक्ति हजार वर्ष तक जीता था लेकिन कलयुग में आदमी की आयु केवल 50 से 60 वर्ष तक सीमित रह गई है. ऐसे में फांसी की सजा की जरूरत नहीं है.

सभी को पता है कि ये उजूल फुजूल तर्क हैं जिस पर कोर्ट इसे खारिज करेगा लेकिन इससे दोषियों को फिर से समय मिल जाएगा क्योंकि मामला कोर्ट में चल रहा है. उसके बाद चारों दोषियों की अलग अलग क्षमा याचिकाएं राष्ट्रपति को भेजी जाएगी जिसमें साल, दो साल का वक्त जायां होना पक्का है. (Nirbhaya)

आखिर में सवाल केवल एक है कि कब तक इस निर्दयता पूर्ण कृत्य के बावजूद लचर न्याय प्रणाली और तमाम लूप का फायदा उठाकर ये दोषी फांसी का मामला टालते रहेंगे. जबकि देश चाहता है कि 16 दिसम्बर को इस कांड की 7वीं बरसी पर ये फांसी दी जाए. बता दें, इस निंदनीय कार्य में 6 आरोपी शामिल थे जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है. उसे डेढ़ साल बालगृह में रखने के बाद कानून का फायदा देकर रिहा कर दिया गया. एक आरोपी की जेल में मौत हो गई. अब ये चार कब तक इस सजा को टालने में सफल होते हैं, देश तो केवल इंतजार ही कर सकता है.

देश में भाजपा का सिकुड़ता राजनीतिक मानचित्र अच्छे भविष्य का सूचक नहीं, हर क्षेत्र में गिरने लगा ग्राफ

पॉलिटॉकस ब्यूरो. केंद्र में सत्ताधारी एनडीए की वापसी निश्चित तौर पर बीजेपी और नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के लिए काबिलेतारीफ सफलता की निशानी है लेकिन राज्यों में सिकुड़ते जा रहे पद चिन्ह निश्चित तौर पर संगठन के भविष्य के लिए अच्छी खबर नहीं है. नजदीकी से गौर किया जाए तो पिछले दो सालों में देश की आंतरिक राजनीति में भाजपा और एनडीए शासित प्रदेशों की संख्या में 31 फीसदी की गिरावट आई है. लगातार बढ़ती बेरोजगारी, मंदी और गिरती जीडीपी दर इसके प्रमुख कारण हैं. राजनीति की दृष्टि से देश में भाजपा शासित राज्यों की संख्या में गिरावट का दौर तो लगातार जारी रहा (No More BJP) लेकिन हाल में … Read more

कहीं महाराष्ट्र के लिए ‘सिद्धारमैया’ न बन जाए नाना पटोले!

Nana Patole

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. कांग्रेस के नाना पटोले (Nana Patole) को महाराष्ट्र विधानसभा का स्पीकर चुना गया है. बताया जा रहा है कि गठबंधन सरकार को नाना पटोले का नाम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वायनाड सांसद राहुल गांधी ने सुझाया. उनके भारी दवाब के चलते ही नाना पटोले का नाम स्पीकर के लिए आगे बढ़ाया गया और बाद में उन्हें नियुक्त किया गया. जबकि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की स्पीकर के लिए पहली पसंद प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण थे. पहले चव्हाण का नाम मंत्री पद के लिए सामने आ रहा था लेकिन अंतिम समय में उनका नाम हटाया गया. वो इसलिए ही था क्योंकि सोनिया के निर्देश पर उनका … Read more

झारखंड: क्या अजय कुमार लगा पाएंगे केजरीवाल की नैया पार?

Ajoy Kumar with Arvind Kejriwal

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. जिस दिन डॉ.अजय कुमार (Ajoy Kumar) आम आदमी पार्टी में शामिल हुए थे, उसी दिन राजनीतिक पंडितों ने इसका असर सियासी समीकरणों पर पड़ने के संकेत दे दिए थे. अब ये सच होते दिखाई देने लगे हैं. अजय कुमार के दम पर ही आम आदमी पार्टी इसी महीने झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव में करीब 40 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रही है. राजधानी दिल्ली में बिहारियों की तादात ज्यादा होने से आप पार्टी का झारखंड में प्रदर्शन निश्चित तौर पर आगामी दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी असर डालेगा. ऐसे में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कांग्रेस से आप पार्टी में शामिल हुए अजय कुमार के … Read more

महाराष्ट्र में हारकर भी सिकंदर बनी NCP, हरियाणा में कांग्रेस ने जिंदा रखी आस

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. आमिर खान की एक फिल्म में एक डायलॉग था ”जो जीता वही सिकंदर”. बात भी सही है लेकिन महाराष्ट्र में NCP ने इस घारणा को गलत साबित कर दिया. भले ही प्रदेश में भाजपा और शिवसेना की स्पष्ट तौर पर एक तरफा सरकार बन रही है लेकिन यहां एनसीपी के शरद पवार हारकर भी सिकंदर बन गए. वहां जीतने के बाद भी भाजपा और शिवसेना के चर्चे नहीं है लेकिन सियासी गलियारों के साथ-साथ मीडिया संस्थानों में भी इस समय केवल और केवल शरद पवार छाए हुए हैं. वहीं हरियाणा में अस्तित्व खोती कांग्रेस ने अपने आपको जिंदा रहने में सफलता हासिल की. महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव से … Read more

उचाना कलां में जेजेपी प्रमुख दुष्यंत चौटाला देंगे चौधरी बीरेंद्र के राजनीतिक रसूख को चुनौती!

(Dushyant Chautala) (JJP)

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019: – जेजेपी (JJP) प्रमुख दुष्यंत चौटाला (Dushyant Chautala) पूरे जोश खरोश से कह चुके हैं कि इस बार हरियाणा में जेजेपी की सरकार बनेगी. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर भी जेजेपी पार्टी के साथ उनकी इस बात का भी समर्थन कर चुके हैं. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के लिए उनका जीतना भी तो जरूरी है और जिस सीट से चौटाला खड़े हैं, वहां प्रेमलता लगातार दूसरी बार अपनी पति चौधरी बीरेंद्र सिंह के राजनीतिक रसूख को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रही है. हरियाणा के जींद जिले में आने वाली उचाना कलां विधानसभा सीट पर इन दोनों राजनीतिज्ञ धुरंधरों में लगातार दो चुनाव हार … Read more

महाराष्ट्र में कारगर होगी भाजपा के निशान पर सहयोगी पार्टियों को लड़ाने की रणनीति?

Partner Parties Maharashtra BJP

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (Maharashtra) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सहयोगी पार्टियों (Partner Parties) के साथ तालमेल बनाने का एक नया फार्मूला बनाया है. इस फार्मूले के तहत सहयोगी पार्टियां भाजपा के निशान पर चुनाव मैदान में उतरेंगी. ऐसा ही कुछ भाजपा ने दिल्ली में खाली हुई राजौरी सीट पर सहयोगी अकाली दल के साथ किया. यहां अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा गठबंधन में तो थे लेकिन लड़े भाजपा के कमल के निशान पर और ​जीतने के बाद भाजपा विधायक बन गए. ऐसा ही कुछ भाजपा महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा चुनाव में करने जा रही है.

महाराष्ट्र (Maharashtra) में बीजेपी 150 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. 124 सीटों पर शिवसेना और अन्य 14 सीटें अन्य तीन छोटी सहयोगी पार्टियों (Partner Parties) के लिए छोड़ी है. अब भाजपा (BJP) के नए फार्मूले के अनुसार ये सभी 14 उम्मीदवार अपनी पार्टी के नहीं बल्कि मोदी लहर का फायदा उठाने के लिए बीजेपी के निशान पर चुनाव लड़ रहे हैं. हालांकि ये सभी नेता अपनी पार्टियों के लिए हैं लेकिन इनमें से जो भी जीतकर विधानसभा पहुंचेगा, विधायक भाजपा का ही कहलाएगा.

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अब देखा जाए तो महाराष्ट्र (Maharashtra) में भाजपा 150 पर नहीं बल्कि 164 सीटों पर चुनाव लड़ रही है क्योंकि निशान तो ‘कमल’ ही है. इस फार्मूले से भाजपा को फायदा ये होगा कि अगर बीजेपी के 164 में से अधिकतर विधायक जीतकर सदन में पहुंचते हैं तो अकेले सरकार बनाने के पार्टी के प्रयासों को बल मिलेगा.

दूसरी ओर, सहयोगी पार्टी (Partner Parties) के वे नेता जो समर्पित तो अपनी पार्टी के लिए हैं लेकिन चुनाव भाजपा के लिए लड़ रहे हैं, जीतने के बाद उनकी पार्टी से अलग होना मुश्किल होगा. वो इसलिए कि समय पड़ने पर अगर कोई भी टकराव की स्थिति आती है तो उनके पास भाजपा में जाने या फिर विधानसभा से इस्तीफा देने के अलावा कोई अन्य विकल्प न होगा. अगर वे भाजपा में शामिल होते हैं तो ठीक. अगर इस्तीफा देते हैं तो उस सीट पर फिर से चुनाव होगा और फिर से चुनावी रण में उतरना कितना मुश्किल होगा, इसका उन्हें भली भांति अंदाजा होगा.

भाजपा का ये नया फार्मूला न केवल एकदलीय सरकार बनाने की दिशा में एक नया कदम है, बल्कि छोटे छोटे सहयोगी दलों को खत्म करने जैसा भी है. कर्नाटक में कुछ ऐसा देखने को मिला जहां 16 विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दिया और बीजेपी को वहां एक दलीय सरकार बनाने का मौका मिला. गोवा में भी ऐसा ही हुआ जहां कांग्रेस के 10 विधायक प्रदेश भाजपा (BJP) में शामिल हो गए और वहां भी एक दलीय सरकार बन गई. राजस्थान भी इससे अछूता नहीं है. यहां गहलोत सरकार ने बसपा के 6 विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कर एक दलीय सरकार बनाने में सफलता हासिल की. हालांकि ये जोड़ तोड़ वाली राजनीति कही जाएगी लेकिन बीजेपी का नया फार्मूला कहीं न कहीं इसी रणनीति से प्रेरित है.

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अगर मान लें कि महाराष्ट्र (Maharashtra) में भाजपा (BJP) की सहयोगी पार्टियों (Partner Parties) के सभी 14 प्रत्याशी जीतकर विधानसभा पहुंचते हैं तो भाजपा के चुनाव चिन्ह पर लड़ने की वजह से वे भाजपा के विधायक के तौर पर जाने जाएंगे. अगर वे सभी के सभी किसी मतभेद के चलते सदन की सदस्यता से इस्तीफा देते हैं तो ये स्थिति भाजपा के लिए बहुत फायदा देने वाली साबित होगी. ऐसे में बहुमत के लिए 14 नंबर कम रह जाएंगे यानि बहुमत 145 विधायकों पर मिलेगा. अगर भाजपा के पास इतने विधायक हैं तो वो अकेले अपने दम पर सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी. अगर कुछ विधायक कम रह भी जाएंगे तो भाजपा के चाणक्य अमित शाह इतना तो करने में सफल हो ही जाएंगे कि शिवसेना के कुछ नेताओं को अपनी ओर मिला सकें.

अगर महाराष्ट्र (Maharashtra) में भाजपा (BJP) का ये (Partner Parties) नया फार्मूला एकदम सटीक काम करेगा तो शिवसेना का इतने सालों का वर्चस्व लुप्तप्राय होने की कगार पर आ जाएगा. अगर सच में ऐसी फिल्म बनती है जैसी सोची है तो निश्चित तौर पर भाजपा का सभी 29 राज्यों में सरकार बनाने का सपना बीजेपी के लिए और करीब आ जाएगा.