गहलोत के फैसले का पायलट ने किया खुलकर विरोध, पूनिया ने कहा- जनता के साथ विश्वासघात

Sachin Pilot

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. राजस्थान की गहलोत सरकार द्वारा लिये गए निकाय प्रमुखों के चुनाव के लिये हाईब्रिड फॉर्मूला लागू करने के फैसले का अब खुलकर विरोध शुरू हो गया है. खुद गहलोत सरकार के मंत्रियों और विधायकों के बाद अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट (Sachin Pilot) ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया है. मीडिया के पूछे जाने पर सचिन पायलट ने कहा कि मैनें भी यह निर्णय अखबार में पढा है. जहां तक प्रत्यक्ष से बदलकर अप्रत्यक्ष चुनाव कराने की बात थी वहां तक तो सही था, पर यह जो नया निर्णय शहरी विकास मंत्रालय का आया है यह सही नहीं है, मैं इससे सहमत नहीं हूं. … Read more

गहलोत सरकार का एक ओर चौंकाने वाला फैसला, जयपुर, कोटा और जोधपुर में अब होंगे दो-दो निगम और महापौर

Heads of Bodies

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार ने प्रदेश में होने वाले निकाय चुनावों को लेकर पिछले चार दिन में एक के बाद एक तीन बड़े फैसले लेकर सबको चौंका दिया है. पहले प्रत्यक्ष चुनाव के फैसले पर यू टर्न लेते हुए अप्रत्यक्ष चुनाव का फैसला, फिर हाईब्रिड फैसले द्वारा पार्षद का चुनाव लडे बिना या हारे हुए प्रत्याशी का सीधे मेयर या नगर अध्यक्ष का चुनाव लड़ने का फैसला लिया गया. अब राज्य सरकार ने एक और चौंकाने वाला निर्णय लेते हुए जयपुर, कोटा और जोधपुर में दो-दो नगर निगम और दो-दो महापौर की घोषणा कर दी है. इनमें जयपुर में पहला हेरिटेज निगम कहलाएगा, जबकि दूसरा ग्रेटर जयपुर … Read more

वीडियो खबर: गहलोत के हाइब्रिड फॉर्मूले का पायलट गुट के मंत्रियों ने किया विरोध

राजस्थान सरकार (Rajasthan Government) द्वारा स्थानीय निकायों में अध्यक्ष, सभापति और महापौर के चुनाव में हाईब्रिड फॉर्मूले को लागू करने के एक दिन बाद बदलाव के खिलाफ अब सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस में ही बगावत के सुर उठने लगे. खुद गहलाेत सरकार (Gehlot Government) के दाे मंत्री, खाद्य नागरिक-आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा (Ramesh Meena) और परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास (Pratap Singh Khachariyawas) ने पार्षद का चुनाव लड़े बिना या हारे हुए प्रत्याशी काे मेयर या सभापति बनाए जाने के फैसले का विराेध किया.

निकाय प्रमुखों के चुनाव पर उठे विरोध पर बोले धारीवाल- कोई नये नियम नहीं बनाए, 9 महीने पहले सार्वजनिक कर दी थी जानकारी

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. राजस्थान की गहलोत सरकार द्वारा स्थानीय निकायों में अध्यक्ष, सभापति और महापौर के चुनाव में हाईब्रिड फॉर्मूले को लागू करने के एक दिन बाद ही खुद गहलोत सरकार के मंत्री और विधायकों द्वारा इस फैसले के विरोध करने पर स्वायत्त शासन मंत्री शांति धारीवाल (Dhariwal) ने कहा कि सवाल तो तब उठना चाहिए जब नए नियम बनाए हों, वर्ष 2009 में जो नियम थे वही इस बार लागू हैं. हमने नौ माह पहले ही इसकी जानकारी सार्वजनिक कर दी थी, लेकिन बहुत से लोगों ने नियम ही नहीं पढ़े, इसलिए अब वो चर्चा कर रहे हैं. बता दें, निकाय प्रमुखाें के चुनाव के तरीके में किए गए बदलाव … Read more

अब निकाय क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति बन सकेगा मेयर, सभापति और पालिकाध्यक्ष

Mayor Chairman

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा धारा 370 हटाये जाने के बाद बदले महौल से चिंतित राजस्थान की गहलोत सरकार ने दो दिन पहले नगर निकाय चुनाव पर यु-टर्न लेने के बाद अब इन चुनावाें काे लेकर एक अाैर बड़ा निर्णय लिया है. जिसके तहत अब पार्षद के चुनाव में हिस्सा लिए बिना अथवा यह चुनाव हारा हुअा प्रत्याशी भी मेयर (Mayor), सभापति (Chairman) या पालिकाध्यक्ष चुना जा सकेगा. गहलोत सरकार ने महापौर, सभापति और पालिकाध्यक्ष बनने के लिए पार्षद चुनाव लडऩे की अनिवार्यता समाप्त कर दी है. अब निकाय क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति दावेदारी कर सकेगा, लेकिन जिस वर्ग के लिए सीट आरक्षित होगी, उसी वर्ग का … Read more

वीडियो खबर: निकाय चुनाव पर कांग्रेस के यू टर्न पर BJP का हल्लाबोल

राजस्थान (Rajasthan) में गहलोत सरकार ने निकाय चुनाव से पहले यू-टर्न लेते हुए फैसला लिया कि अब पार्षद ही महापौर और निकाय प्रमुख का चुनाव करेंगे. इससे पहले प्रदेश सरकार ने प्रत्यक्ष चुनाव कराने का समर्थन किया था और इसे चुनावी घोषणा पत्र में शामिल ​भी किया था. अब BJP इस पर पलटवार कर रही है. पूर्व मंत्री और मालवीय नगर विधायक कालीचरण सर्राफ ने थूंककर चाटने वाला कदम बताया.

महाराष्ट्र में कारगर होगी भाजपा के निशान पर सहयोगी पार्टियों को लड़ाने की रणनीति?

Partner Parties Maharashtra BJP

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (Maharashtra) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सहयोगी पार्टियों (Partner Parties) के साथ तालमेल बनाने का एक नया फार्मूला बनाया है. इस फार्मूले के तहत सहयोगी पार्टियां भाजपा के निशान पर चुनाव मैदान में उतरेंगी. ऐसा ही कुछ भाजपा ने दिल्ली में खाली हुई राजौरी सीट पर सहयोगी अकाली दल के साथ किया. यहां अकाली दल के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा गठबंधन में तो थे लेकिन लड़े भाजपा के कमल के निशान पर और ​जीतने के बाद भाजपा विधायक बन गए. ऐसा ही कुछ भाजपा महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा चुनाव में करने जा रही है.

महाराष्ट्र (Maharashtra) में बीजेपी 150 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. 124 सीटों पर शिवसेना और अन्य 14 सीटें अन्य तीन छोटी सहयोगी पार्टियों (Partner Parties) के लिए छोड़ी है. अब भाजपा (BJP) के नए फार्मूले के अनुसार ये सभी 14 उम्मीदवार अपनी पार्टी के नहीं बल्कि मोदी लहर का फायदा उठाने के लिए बीजेपी के निशान पर चुनाव लड़ रहे हैं. हालांकि ये सभी नेता अपनी पार्टियों के लिए हैं लेकिन इनमें से जो भी जीतकर विधानसभा पहुंचेगा, विधायक भाजपा का ही कहलाएगा.

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अब देखा जाए तो महाराष्ट्र (Maharashtra) में भाजपा 150 पर नहीं बल्कि 164 सीटों पर चुनाव लड़ रही है क्योंकि निशान तो ‘कमल’ ही है. इस फार्मूले से भाजपा को फायदा ये होगा कि अगर बीजेपी के 164 में से अधिकतर विधायक जीतकर सदन में पहुंचते हैं तो अकेले सरकार बनाने के पार्टी के प्रयासों को बल मिलेगा.

दूसरी ओर, सहयोगी पार्टी (Partner Parties) के वे नेता जो समर्पित तो अपनी पार्टी के लिए हैं लेकिन चुनाव भाजपा के लिए लड़ रहे हैं, जीतने के बाद उनकी पार्टी से अलग होना मुश्किल होगा. वो इसलिए कि समय पड़ने पर अगर कोई भी टकराव की स्थिति आती है तो उनके पास भाजपा में जाने या फिर विधानसभा से इस्तीफा देने के अलावा कोई अन्य विकल्प न होगा. अगर वे भाजपा में शामिल होते हैं तो ठीक. अगर इस्तीफा देते हैं तो उस सीट पर फिर से चुनाव होगा और फिर से चुनावी रण में उतरना कितना मुश्किल होगा, इसका उन्हें भली भांति अंदाजा होगा.

भाजपा का ये नया फार्मूला न केवल एकदलीय सरकार बनाने की दिशा में एक नया कदम है, बल्कि छोटे छोटे सहयोगी दलों को खत्म करने जैसा भी है. कर्नाटक में कुछ ऐसा देखने को मिला जहां 16 विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दिया और बीजेपी को वहां एक दलीय सरकार बनाने का मौका मिला. गोवा में भी ऐसा ही हुआ जहां कांग्रेस के 10 विधायक प्रदेश भाजपा (BJP) में शामिल हो गए और वहां भी एक दलीय सरकार बन गई. राजस्थान भी इससे अछूता नहीं है. यहां गहलोत सरकार ने बसपा के 6 विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कर एक दलीय सरकार बनाने में सफलता हासिल की. हालांकि ये जोड़ तोड़ वाली राजनीति कही जाएगी लेकिन बीजेपी का नया फार्मूला कहीं न कहीं इसी रणनीति से प्रेरित है.

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अगर मान लें कि महाराष्ट्र (Maharashtra) में भाजपा (BJP) की सहयोगी पार्टियों (Partner Parties) के सभी 14 प्रत्याशी जीतकर विधानसभा पहुंचते हैं तो भाजपा के चुनाव चिन्ह पर लड़ने की वजह से वे भाजपा के विधायक के तौर पर जाने जाएंगे. अगर वे सभी के सभी किसी मतभेद के चलते सदन की सदस्यता से इस्तीफा देते हैं तो ये स्थिति भाजपा के लिए बहुत फायदा देने वाली साबित होगी. ऐसे में बहुमत के लिए 14 नंबर कम रह जाएंगे यानि बहुमत 145 विधायकों पर मिलेगा. अगर भाजपा के पास इतने विधायक हैं तो वो अकेले अपने दम पर सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी. अगर कुछ विधायक कम रह भी जाएंगे तो भाजपा के चाणक्य अमित शाह इतना तो करने में सफल हो ही जाएंगे कि शिवसेना के कुछ नेताओं को अपनी ओर मिला सकें.

अगर महाराष्ट्र (Maharashtra) में भाजपा (BJP) का ये (Partner Parties) नया फार्मूला एकदम सटीक काम करेगा तो शिवसेना का इतने सालों का वर्चस्व लुप्तप्राय होने की कगार पर आ जाएगा. अगर सच में ऐसी फिल्म बनती है जैसी सोची है तो निश्चित तौर पर भाजपा का सभी 29 राज्यों में सरकार बनाने का सपना बीजेपी के लिए और करीब आ जाएगा.

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राजस्थान (Rajasthan) में गहलोत सरकार ने निकाय चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण फैसले पर यू-टर्न लेते हुए नया फैसला लिया कि अब पार्षद ही करेंगे महापौर और निकाय प्रमुख का चुनाव. गहलोत केबिनेट (Gehlot Cabinet) की एक अहम बैठक में ये फैसला लिया गया.

भाजपा के चाणक्य और वरिष्ठ रणनीतिकार अमित शाह का एक और पराक्रम

Amit Shah

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री या यूं कहें कि भाजपा के चाणक्य और वरिष्ठ रणनीतिकार अमित शाह (Amit Shah) की रणनीति सफल होने के बाद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) भी संघ परिवार के नियंत्रण में आ गया है. इसके लिए खामोशी से चालें चली जा रहीं थीं और आखिरकार बगैर किसी घमासान के बीसीसीआई से श्रीनिवासन की बिदाई होने और कोलकाता के क्रिकेटर पूर्व कप्तान सौरव गांगुली बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर चुने जाने का रास्ता बन गया है. बीसीसीआई को अपने नियंत्रण में लाने के लिए अमित शाह ने पहले से रणनीति तैयार कर ली थी. पिछले एक हफ्ते से उस पर चुपचाप अमल हो रहा था. इससे पहले भारतीय क्रिकेट पर चेन्नई के उद्योगपति श्रीनिवासन का दबदबा माना जाता था.

इससे पहले तक भाजपा की तरफ से अरुण जेटली ही थे, जिनका क्रिकेट की राजनीति में आंशिक दखल था. वह दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन (DDCA) के अध्यक्ष पद से ही संतुष्ट थे. उन्होंने क्रिकेट की राजनीति में अपना पूरी तरह दखल बनाने की कोशिश कभी नहीं की. तमाम धांधलियों में फंसे बीसीसीआई पर श्रीनिवासन का अच्छा दखल था और पिछले कुछ दिनों से नई कार्यकारिणी बनाने के लिए बातचीत चल रही थी. अमित शाह (Amit Shah) ने जरा भी जाहिर नहीं होने दिया कि उनकी क्रिकेट में कोई रुचि है. उनके इशारे पर अनुराग ठाकुर सक्रिय थे. बीसीसीआई में तख्तापलट की भूमिका बन चुकी थी. पर्दे के पीछे उन लोगों का चुनाव हो रहा था, जिन्हें बीसीसीआई में पदाधिकारी बनाना है.

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अब बीसीसीआई के चुनाव की घोषणा हो चुकी है. 23 अक्टूबर को चुनाव होंगे. सोमवार को सौरव गांगुली ने अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल किया. इसके साथ ही अमित शाह के बेटे जय शाह ने सचिव पद के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है. दोनों का चुनाव जीतना तय है. चुनाव जीतने के बाद दोनों 10 महीने तक पद पर रहेंगे. सौरव गांगुली बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन (कैब) के अध्यक्ष हैं और जय शाह गुजरात के संयुक्त सचिव हैं. इन दोनों के अलावा इन पदों पर किसी अन्य व्यक्ति ने नामांकन दाखिल नहीं किया है. अनुराग ठाकुर के भाई अरुण धूमल ने कोषाध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद पर महेश वर्मा, संयुक्त सचिव पद पर जयेश जॉर्ज ने नामांकन दाखिल किया है. इस तरह बीसीसीआई बोर्ड में नई कार्यकारिणी लाने की कवायद पूरी हो गई है.

बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन फिलहाल बोर्ड या किसी राज्य के क्रिकेट संघ के अध्यक्ष नहीं हैं. फिर भी बीसीसीआई के मामलों में उनका दखल बना रहता है. वह कर्नाटक के ब्रजेश पटेल को अध्यक्ष बनाना चाहते थे, लेकिन शाह की रणनीति के चलते उनकी इच्छा पूरी नहीं हो सकी. ब्रजेश पटेल अब आईपीएल के गवर्नर बनेंगे. यह सब कैसे हुआ, इसकी कहानी कभी भी सामने नहीं आएगी. सूत्रों से जो जानकारियां छन-छनकर बाहर आ रही हैं, उससे चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. कोई सपने में भी नहीं सोच रहा था कि अमित शाह भारतीय क्रिकेट को अपने नियंत्रण में लेना चाहते हैं, क्योंकि संघ की विचारधारा में क्रिकेट को बढ़ावा देने की बात कभी नहीं सुनी गई.

अमित शाह के केंद्रीय गृहमंत्री बनने के बाद लगता है क्रिकेट में भी संघ की रुचि पैदा हो गई है. बीसीसीआई का तख्तापलट करने की जिम्मेदारी अनुराग ठाकुर को सौंपी गई थी, जो खुद क्रिकेट से जुड़े हुए हैं, जिससे कोई भी अमित शाह के इरादों को नहीं भांप सका. खामोशी से जो चालें चली गईं, उनमें सबसे पहले उन लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया गया, जिन्हें अरुण जेटली ने बढ़ावा दिया था. इनमें पत्रकार रजत शर्मा प्रमुख हैं, जिन्हें जेटली ने डीसीसीए अध्यक्ष बनवा दिया था. इसके बाद कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला के पर कतरे गए जिनका लंबे समय से बीसीसीआई पर दबदबा चला आ रहा था.

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जेटली के लोगों और राजीव शुक्ला को प्रभावहीन करने के बाद अकेले श्रीनिवासन बचे थे, जिनका दखल अभी भी बना हुआ था. उनके साथ समझौता कर लिया गया और उनके एक प्रत्याशी को शामिल कर लिया गया. यह समीकरण चुनाव की घोषणा से पहले तय कर लिया गया था. इससे कुछ दिन पहले मुंबई के एक पांच सितारा होटल में क्रिकेट दिग्गजों की गोपनीय बैठक हुई, जिसमें अनुराग ठाकुर भी शामिल थे. अमित शाह ने बीसीसीआई के प्रमुख पदों के लिए नाम तय करने का अधिकार ठाकुर को सौंपा था. ठाकुर पहले कुछ समय के लिए बीसीसीआई का अध्यक्ष पद कुछ दिनों के लिए संभाल चुके हैं. इस पूरी रणनीति में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि सीधे अध्यक्ष पद को निशाने पर नहीं लेना है, इसलिए सौरव गांगुली का नाम सामने आया.

इससे पहले तक कर्नाटक के ब्रजेश पटेल का नाम तय माना जा रहा था. गांगुली का नाम आने से अध्यक्ष पद के दो दावेदार हो गए. बीसीसीआई के पुराने दिग्गज गांगुली को लेकर चिंता में थे. गांगुली 195 मैचों में कप्तानी कर चुके हैं. उनकी कप्तानी में 97 मैच जीते गए. ब्रजेश पटेल के खाते में 21 टेस्ट और 10 एकदिवसीय मैच दर्ज हैं. गांगुली को लेकर प्रमुख चिंता यह थी कि उनका राजनीतिक रुझान स्पष्ट नहीं था. इसके अलावा वह खुलकर नहीं बता रहे थे कि उन्हें अध्यक्ष बनना है या नहीं.

श्रीनिवासन गुट पटेल के नाम पर जोर दे रहा था. इसके लिए अमित शाह ने भी हरी झंडी दे दी थी. लेकिन पर्दे के पीछे से कुछ लोगों ने दिल्ली से फोन किए. गांगुली को खुद अमित शाह (Amit Shah) ने बीसीसीआई के अध्यक्ष पद संभालने के लिए तैयार किया. पिछले शनिवार एक बैठक के बाद श्रीनिवासन की बाजी पलट गई. श्रीनिवासन को पहले धमकाया गया, फिर मना लिया गया. बाद में वह गांगुली का समर्थन करने पर राजी हो गए. उसके बाद अन्य पदाधिकारियों के नाम तय किए गए.

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अध्यक्ष पद का मसला सुलझने के बाद अन्य पदों पर खींचतान चल रही थी, तब अनुराग ठाकुर ने बताया कि भाजपा जय शाह को बीसीसीआई कार्यकारिणी में लाना चाहती है. इसके साथ ही उन्होंने अपने भाई अरुण धूमल काम आगे किया. दोनों पदों पर अमित शाह (Amit Shah) पहले ही मंजूरी दे चुके थे. इससे रजत शर्मा के बीसीसीआई की कार्यकारिणी में आने की संभावनाएं समाप्त हो गई. उन्हें बैठक में भी नहीं बुलाया गया.

सूत्रों के मुताबिक ब्रजेश पटेल के अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर हो जाने के बाद भी श्रीनिवासन कमजोर नहीं हुए थे. उन्होंने अपने दाव चतुराई से चले. दूसरी तरफ अनुराग ठाकुर के कमरे में देर रात तक बैठकें चली. इन बैठकों में निरंजन शाह, राजीव शुक्ला के अलावा श्रीनिवासन भी शामिल हुए. सभी इस बात पर एकमत हुए कि बीसीसीआई की कार्यकारिणी का निर्विरोध गठन होना चाहिए. तब ठाकुर ने रहस्योद्घाटन किया कि दादा (गांगुली) बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के लिए तैयार हो गए हैं. तब श्रीनिवासन ने ब्रजेश पटेल का नाम आईपीएल गवर्नर के लिए सुझाया, जिस पर ठाकुर ने हां भर दी. लेकिन इससे पहले उन्होंने उन वरिष्ठ नेताओं से फोन पर बात कर ली थी, जिनके इशारे पर ठाकुर बीसीसीआई में चालें चल रहे थे. श्रीनिवासन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) में बीसीसीआई के प्रतिनिधि बने हुए थे. वह खुद 70 वर्ष की आयु पार करने के कारण यह छोड़ना चाहते थे, लेकिन यह पद उन्होंने बीसीसीआई में अपना दखल बनाए रखने के लिए बचाकर रखा था.

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इस तरह एकदम खामोशी से बीसीसीआई में श्रीनिवासन का दबदबा समाप्त कर दिया गया. जहां वह अध्यक्ष पद पर अपना उम्मीदवार लाना चाहते थे, वहां पूरी कार्यकारिणी में उनका एक भी व्यक्ति शामिल नहीं हो सका. हालांकि वह ब्रजेश पटेल को आईपीएल गवर्नर बनवाने में सफल रहे. इस तरह क्रिकेट की राजनीति में भी अमित शाह की रणनीति सफल रही. अब संभव है कि सचिव होने के नाते अमित शाह (Amit Shah) के बेटे जय शाह पूरा कामकाज संभाल लें और भाजपा पश्चिम बंगाल में भाजपा सौरव गांगुली का राजनीतिक उपयोग करे. पश्चिम बंगाल में सौरव गांगुली का बहुत मान-सम्मान है. वह दादा कहलाते हैं. भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार को सत्ता से हटाना है, लेकिन इस राज्य में उसके पास कोई कद्दावर नेता नहीं है. सौरव गांगुली से भाजपा को काफी मदद मिल सकती है.