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RCA चुनाव की इनसाइड स्टोरी: सरकार है तो मुमकिन है

07 अक्टूबर 2019
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RCA चुनाव की इनसाइड स्टोरी: सरकार है तो मुमकिन है

लगभग एक महीने चले घमासान के बाद आखिर राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के चुनाव सम्पन्न हो गए. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत RCA के अध्यक्ष चुन लिए गए और अब वे BCCI में राजस्थान क्रिकेट का प्रतिनिधित्व करेंगे. अगले तीन साल तक वैभव RCA की पिच पर अपना राजनीतिक अनुभव मजबूत करेंगे. लेकिन असल में RCA चुनाव में चले इस घमासान में आखिर कौन जीता? वैभव गहलोत की जीत हुई या सरकार की? वैभव को जीत दिलाने वाले नेता, विधायक, मंत्री, IAS, IPS को मिलेगा इनाम? पीसीसी चीफ पायलट क्यों हुए नाराज? बेनीवाल ने सच में डूडी की मदद की या खुद का राजनीतिक फायदा उठाया? ये कुछ … Read more

लगभग एक महीने चले घमासान के बाद आखिर राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) के चुनाव सम्पन्न हो गए. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत RCA के अध्यक्ष चुन लिए गए और अब वे BCCI में राजस्थान क्रिकेट का प्रतिनिधित्व करेंगे. अगले तीन साल तक वैभव RCA की पिच पर अपना राजनीतिक अनुभव मजबूत करेंगे. लेकिन असल में RCA चुनाव में चले इस घमासान में आखिर कौन जीता? वैभव गहलोत की जीत हुई या सरकार की? वैभव को जीत दिलाने वाले नेता, विधायक, मंत्री, IAS, IPS को मिलेगा इनाम? पीसीसी चीफ पायलट क्यों हुए नाराज? बेनीवाल ने सच में डूडी की मदद की या खुद का राजनीतिक फायदा उठाया? ये कुछ ऐसे सवाल है जो RCA चुनाव के बाद अब मुंह बाए खड़े हैं.

ऐसे में सबसे पहले सवाल खड़ा होता है कि राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में सरकार और प्रशासन की क्या भूमिका रही? RCA के तत्कालीन अध्यक्ष और विधानसभा स्पीकर सीपी जोशी, कृषि मंत्री लाल चंद कटारिया, मुख्य सचेतक महेश जोशी, सालेह मोहम्मद, विधायक रफीक खान, संयम लोढ़ा, हेमाराम चौधरी और अशोक गहलोत के हनुमान माने जाने धर्मेंद्र राठौड़ तो मैदान में खुलकर बैटिंग कर ही रहे थे, लेकिन पवेलियन में बैठ कर कई मंत्री और विधायक भी वैभव के लिए सेटिंग कर रहे थे. जिनमें मंत्री उदय लाल आंजना, बीड़ी कल्ला, अशोक चांदना, विश्वेन्द्र सिंह, शांति धारीवाल, विधायक महेन्द्रजीत सिंह मालविया, अमीन कागज़ी आदि शामिल थे.

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उधर प्रशासन से पिछली सरकार में काफी परेशान रहे वर्तमान रजिस्ट्रार कोआपरेटिव नीरज के. पवन तो खुलेआम ही छोटे सरकार के लिए मैदान में डटे हुए थे. वहीं संजय दीक्षित, सीपी जोशी के खास भवानी, जयपुर पुलिस कमिश्नर और एसपी मोर्चे पर तैनात थे. आईएएस नीरज के पवन ने सभी वोटर सचिवों से वोटिंग के एक दिन पहले रात को रिज़ॉर्ट में मीटिंग की और उन्हें सेटल किया. तो कुछ जिला एसपी भी अंदरखाने फील्डिंग करते नज़र आए. ऐसे में ये तो साफ हो गया कि सरकार और प्रशासन बड़ी सरकार को खुश करने के लिए छोटे नवाब की बैटिंग पिच का मैदान तैयार कर रहे थे. वहीं मुख्यमंत्री गहलोत ने पर्दे के पीछे रहकर साम-दाम-दंड-भेद सभी हथियारों का उपयोग कर वैभव की इस राजनीतिक पारी खेलने में अंपायर की भूमिका निभाई.

लेकिन अब बड़ा सवाल यह है कि क्यों कांग्रेस नेता रामेश्वर डूडी कांग्रेस के ही नेता वैभव गहलोत को चुनौती देते नज़र आए. वहीं प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट का वह बयान की दोनों कांग्रेसी नेताओं को बैठकर मामला सुलझा लेना चाहिए था, तो ऐसा हुआ क्यों नहीं? ऐसे में सवाल तो यह भी खड़ा होता है कि खुद पायलट ने मामला सुलझाने के लिए पहल क्यों नहीं की, जब कि रामेश्वर डूडी तो उनके खास माने जाते हैं. तो कहीं इसके पीछे पायलट की शह तो नहीं थी, कहीं RCA की पिच पर गहलोत Vs पायलट का मैच तो नहीं चल रहा था.

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जबकि RCA चुनाव में नामांकन से पहले रामेश्वर डूडी को सेट करने के लिए गहलोत के मंत्रियों ने दो बार मीटिंग भी की थी और कहा तो यह भी गया कि इन मीटिंग्स के बाद रामेश्वर डूडी चुनाव में खड़े नहीं होने के लिए मान गए थे. फिर ऐसा क्या हुआ कि डूडी नामांकन भरने के लिए RCA कार्यालय पहुंचे. तीन-तीन बार एसएमएस स्टेडियम में हंगामा किया. ये ऐसे सवाल हैं जो प्रदेश कांग्रेस में चल रही छिछालेदार राजनीति को सतह पर लाते हैं.

इस सब के बीच एक मोहरा जो पूरे परिदृश्य में उभर कर सामने आया वो हैं नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल. बेनीवाल की शह पर ही रामेश्वर डूडी ने RCA में शक्ति प्रदर्शन किया. भले ही बेनीवाल ने इसे जाट संघर्ष का नाम दिया हो, लेकिन यह बात राजनीतिज्ञों के गले नहीं उतरती. क्योंकि बेनीवाल की ताकत के दम पर ही डूडी ने अपनी ताकत दिखाई, ऐसे में क्या डूडी के कंधे पर बंदूक रखकर बेनीवाल गहलोत पर निशाना नहीं साध रहे थे? परिणाम भले उलट आया हो लेकिन बेनीवाल जाट बाहुल्य खींवसर सीट पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव में जाट वोट बैंक को एकतरफा अपने भाई नारायण बेनीवाल के पक्ष में करने में तो शायद कामयाब हो ही जायेंगे.

खैर, RCA चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए चले इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए यह साबित कर दिया है कि “सरकार है तो मुमकिन है“.

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