महिला आरक्षण और परिसीमन बिल: बीजेपी का मास्टर स्ट्रोक या झटका?

सियासत में यह संकेत साफ है कि यहीं से रखी जा चुकी है आगामी लोकसभा चुनाव के एजेंडे और रणनीति की मजबूत नींव

महिला आरक्षण कानून और परिसीमन से जुड़े 131वें संवैधानिक संशोधन विधेयक का लोकसभा में गिरना भारतीय राजनीति में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है. नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में यह शायद पहला मौका है जब कोई अहम सरकारी विधेयक सदन में पारित नहीं हो सका. सदन में हुए मतदान में कुल 528 वोट पड़े, जिसमें सत्ता पक्ष को 298 मत मिले, लेकिन दो-तिहाई बहुमत (352 वोट) का आंकड़ा पार नहीं हो पाया. अमित शाह और प्रधानमंत्री ने विपक्ष से समर्थन की अपील की, लेकिन विपक्ष ने महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने पर आपत्ति जताते हुए बिल का विरोध किया.

सियासी तौर पर देखा जाए तो विधेयक का गिरना भले ही सरकार के लिए झटका हो, लेकिन इसे बीजेपी की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है. हाल के चुनावों में पार्टी ने महिलाओं को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति बनाई और कई राज्यों में इसका लाभ भी मिला.

इसी क्रम में, बिल गिरने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की महिलाओं से माफी मांगते हुए विपक्ष को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि विपक्ष को इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी होगी.

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वहीं कांग्रेस की ओर से प्रियंका गांधी ने इस विधेयक को लेकर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने आरोप लगाया कि महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन को आगे बढ़ाने की रणनीति बनाई जा रही थी, जिससे सत्ता में बने रहने का रास्ता तैयार हो सके.

राहुल गांधी ने भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि वर्तमान स्वरूप में लाए गए विधेयक का विरोध कर रही है. उनका कहना है कि सरकार पुराने स्वरूप में बिल लाए, तो कांग्रेस उसका समर्थन करेगी.

अब यह मुद्दा सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आगामी चुनावों में बड़ा राजनीतिक हथियार बनने की ओर बढ़ रहा है, जहां एक ओर बीजेपी इसे महिलाओं के सम्मान से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति बता रहा है. राजनीतिक गलियारों में इस चर्चा से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसी घटनाक्रम से लोकसभा चुनाव की रणनीतिक पटकथा लिखी जा चुकी है.