पिछले एक साल से मेरा रेप कर रहा था चिन्मयानंद, आखिर क्यों नहीं हो रही गिरफ्तारी: पीड़िता

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में शाहजहांपुर की एलएलएम छात्रा ने आखिर स्वामी चिन्मयानंद (Swami Chinmayanand) पर रेप का आरोप लगा दिया. इसके साथ ही यह भी कहा कि चिन्मयानंद साल भर तक उसका शोषण करते रहे. उन्होंने कई लड़कियों की जिंदगी खराब की है. मेरे पास इसके सबूत हैं, जिनमें वीडियो क्लिप भी शामिल है. किसी ने उनके खिलाफ आवाज नहीं उठाई, उन सभी लड़कियों की तरफ से पहली बार मैं आवाज उठा रही हूं. पीड़िता 11 घंटे तक एसआईटी की पूछताछ के बाद पत्रकारों से बात कर रही थी.

पीड़िता ने आरोप लगाया कि शाहजहांपुर पुलिस (Shajhapur Police) ने इस मामले की रिपोर्ट दर्ज नहीं की. मेरे पिता जिला मजिस्ट्रेट के पास यौन उत्पीड़न की शिकायत करने पहुंचे, तब डीएम इंद्र विक्रम सिंह ने उनको धमकाते हुए कहा कि गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दो. जिला प्रशासन से कोई सहायता नहीं मिलने के बाद उसे दिल्ली पहुंचकर एफआईआर दर्ज करवानी पड़ी. दिल्ली पुलिस ने दक्षिण दिल्ली के लोधी रोड पुलिस थाने पर जीरो नंबर से एफआईआर दर्ज कर उसे उत्तर प्रदेश के डीजीपी के साथ भेज दिया था.

चिन्मयानंद पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री हैं, उप्र के कद्दावर भाजपा नेता (BJP Leader) हैं और शुकदेवानंद विधि महाविद्यालय के चेयरमैन और प्रबंध समिति के अध्यक्ष हैं, जहां पीड़िता पढ़ रही थी. शाहजहांपुर में चिन्मयानंद का भव्य आश्रम है. पीड़िया का आरोप है कि उसके साथ जिला प्रशासन की कोई सहानुभूति नहीं है. उसने सबसे पहले 23 अगस्त को फेसबुक पर एक वीडियो वायरल करते हुए चिन्यानंद का नाम लिए बगैर कई लड़कियों की जिंदगी बर्बाद करने के आरोप लगाए थे. चिन्मयानंद को उसने संत समाज का बड़ा नेता कहते हुए संबोधित किया था. इसके बाद वह पहले राजस्थान, फिर दिल्ली पहुंची थी.

बड़ी खबर: सुप्रीम कोर्ट नहीं करेगी चिन्मयानंद पर लगे यौन शोषण के आरोपों की जांच, SIT गठन के आदेश

इस बीच कुछ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाकर इस मामले में अदालत से स्वतः संज्ञान लेने का अनुरोध किया था. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उप्र सरकार ने तीन सितंबर को SIT का गठन किया था. एसआईटी का नेतृत्व आईजी नवीन अरोड़ा कर रहे हैं. इस मामले में शाहजहांपुर पुलिस ने 27 अगस्त को चिन्मयानंद के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली थी.

उप्र पुलिस की एसआईटी ने रविवार दोपहर बाद से पीड़िता के परिजनों के बयान दर्ज करना शुरू किया. पीड़िता ने बताया कि एसआईटी उससे करीब 11 घंटे पूछताछ कर चुकी है. सबकुछ बताने के बाद भी स्थानीय पुलिस ने अब तक चिन्मयानंद को गिरफ्तार नहीं किया है. पीड़िता के मुताबिक कॉलेज होस्टल के जिस कमरे में वह रहती थी, उसे पुलिस ने सील कर दिया है. उस कमरे को मीडिया की मौजूदगी में खोला जाना चाहिए. पीड़िता के पिता का कहना है कि उनकी बेटी ने जो आरोप लगाए हैं, वे सही हैं.

चिन्मयानंद के वकील ने कहा कि यह आरोप ब्लैकमेल करने और बदनाम करने की साजिश है. कुछ दिन पहले अज्ञात लोगों ने पांच करोड़ रुपए का मांग करते हुए फोन किया था. इस मामले की जांच उप्र पुलिस कर रही है. बहरहाल चिन्मयानंद पर रेप के आरोप नए नहीं हैं. आठ साल पहले भी शाहजहांपुर की एक महिला ने रेप का आरोप लगाया था. वह महिला चिन्मयानंद के आश्रम में रहती थी. उप्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद उनके खिलाफ मुकदमा वापस ले लिया गया था. इस फैसले को पीड़िता ने हाईकोर्ट में चुनौती थी. हाईकोर्ट से इस मामले में स्थगन मिला हुआ है.

चिन्मयानंद की उम्र 72 वर्ष है. उन्होंने इस मामले की तुलना भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर (Kuldeep Sanger) के मामले से की है. कुलदीप सेंगर फिलहाल रेप, हत्या और हत्या के प्रयास के आरोपों में जेल में बंद हैं. चिन्मयानंद ने कहा कि उन्हें भी सेंगर की तरह झूठे मामले में फंसाया जा रहा है. दूसरी तरफ चिन्मयानंद के खिलाफ आरोप लगाने वाली पीड़िता के परिजनों का कहना है उनका हस्र भी उन्नाव (Unnao Case) की पीड़िता के परिवार की तरह हो सकता है. उन्नाव की पीड़िता के परिवार के कुछ सदस्यों की संदिग्ध तरीके से हत्या हो चुकी है.

‘ना रोटी ना रोजगार, चारों तरफ हाहाकार’

मोदी 2.0 सरकार के कार्यकाल को 100 दिन पूरे हो गए हैं. एक तरफ तो बीजेपी के नेता इस छोटे से अंतराल में केंद्र सरकार द्वारा कई ऐतिहासिक फैसले लिए जाने का बखान करने से नहीं थक रहे, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस गिरती अर्थव्यवस्था को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र की भाजपा सरकार पर निशाना साध रही है. पिछले एक साल में अर्थव्यवस्था का ग्राफ 8 फीसदी से 5 फीसदी (कथित तौर पर 3 फीसदी पर) तक आ गिरा. विदेशी निवेशकों की निकासी इसकी सबसे अहम वजह बताई जा रही है जिसके चलते बेरोजगारी बढ़ती जा रही है. कांग्रेस के बड़े नेताओं ने सोशल मीडिया पर मोदी के 100 … Read more

पलवल विधानसभा सीट पर इस बार करण सिंह दलाल को करना पड़ सकता है हार का सामना

हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 (Haryana Assembly Election) – पलवल (Pawal) विधानसभा सीट हरियाणा (Haryana) में विधानसभा चुनावों (Assembly Election) की तिथि की घोषणा अभी नहीं हुई है, ऐसी संभावना है की हरियाणा में नवंबर माह में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं. इसके मद्देनजर विभिन्न दलों ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. संभावित प्रत्याशियों ने जनसंपर्क अभियान छेड़ दिया है, प्रचार साधनों के माध्यम से वे उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. आज हम आपको हमारी खास रिपोर्ट में हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 में हरियाणा के पलवल जिले की पलवल (Palwal) विधानसभा सीट के जमीनी हालात से रुबरु करवाएंगे. हरियाणा के पलवल (Palwal) जिले के अंदर तीन विधानसभा सीटें आती … Read more

‘राहुल गांधी की कप्तानी जाते ही टीम के प्लेयर्स किए जा रहे रिटायर्ड हर्ट’

कहते हैं टीम का पूरा भार कप्तान के कंधों पर टिका रहा है. अगर कप्तान आउट हो जाए तो टीम का संभल पाना मुश्किल होता है. वर्तमान में कांग्रेस के भीतरी हालात और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पर ये कहावत एकदम सटीक बैठती है. राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा क्या दिया, उनके करीबी माने जाने वाले तकरीबन सभी नेताओं पर गाज गिरने लगी है. उनकी जी हजुरी करने वाले सभी नेताओं को प्रमुख पदों से हटाया जा रहा है. चूंकि अब सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बन गयी हैं, ऐसे में अब राहुल की टीम के खिलाड़ियों को रिटायर कर नयी ​टीम बनायी जा रही है. कुमारी शैलजा (Kumari Selja) को हरियाणा का प्रदेशाध्यक्ष बना इसकी शुरुआत भी हो चुकी है.

लोकसभा चुनाव-2019 में पार्टी की हुई बुरी गत की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए जब राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश की थी, तभी राहुल गांधी के करीबियों में कुर्सी खिसकने का भय घर कर गया था. यही वजह है कि पार्टी के सीनियर नेताओं के साथ यूथ कांग्रेस और अन्य नेताओं ने राहुल गांधी से इस्तीफा वापिस लेने की गुहार लगायी. यहां तक की कई राज्यों की प्रदेश कमेटियों ने तो उनके इस्तीफे की पेशकश को ही ठुकरा दिया लेकिन राहुल गांधी अपने फैसले पर अड़े रहे. नतीजा, आखिरकार सोनिया गांधी को ही कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान संभालनी पड़ी.

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अब टीम का कप्तान नया और अनुभवी है तो टीम तो नए सिरे से चुननी ही थी. ऐसे में राहुल गांधी के सिपेहसालार खिलाड़ी एक-एक कर बाहर होने लगे या फिर यूं कहें, बाहर किए जाने लगे. पार्टी के युवराज के त्यागपत्र देते ही कुछ ने अपने आप ही इस्तीफे दे दिए और कुछ के इस्तीफे रखवा लिए गए. सोनिया के कमान संभालते ही राहुल के बेहद करीबी माने जाने वाले हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर (Ashok Tanwar) को हटा सोनिया की खास कुमारी शैलजा को उनका स्थान दिया गया. इससे पहले हरियाणा में लोकसभा चुनाव में करारी शिखस्त के बाद भी तंवर ने इस्तीफा देने से सीधे सीधे मना कर दिया था. राहुल गांधी की शह पर ही तंवर पिछले 6 साल से अपने पद पर बने हुए थे. अपने संबंधों के चलते राहुल गांधी खुद चाहते हुए भी इस बारे में कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे.

वहीं मुंबई क्षेत्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंग देवड़ा (Milling Deora) और दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन (Ajay Maken) ने राहुल गांधी के समर्थन में इस्तीफा पार्टी कमान को भेजा था, जिसे अब सोनिया गांधी ने मंजूर कर लिया है. अब देवड़ा की जगह एकनाथ गायकवाड़ को मुंबई क्षेत्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया है. वहीं राहुल गांधी के कार्यकाल में डॉ. अजय कुमार (Dr.Ajoy Kumar) को झारखंड का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था, उन्हें भी अपने पद से हटा दिया गया है. गुजरात की टीम में भी बदलाव के कयास हैं जहां राहुल के करीबी राजीव सातव (Rajeev Satava) प्रभारी हैं.

जिस तरह से एक-एक करके राहुल गांधी के करीबी नेताओं की छुट्टी हो रही है, उससे तो यही कयास लगाए जा रहे हैं कि इन सभी पदों पर सोनिया गांधी के खास लोगों की नियुक्ति की जाएगी. अब चूंकि कांग्रेस वर्किंग कमेटी में राहुल गांधी की एंट्री हो गयी है, ऐसे में उम्मीद तो ये भी जताई जा रही है कि राहुल अपनी टीम का साथ यूं तो नहीं छोड़ेंगे. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इन सभी नेताओं को बाद में एडजस्ट कर दिया जाएगा. मिलिंद देवड़ा, अजय माकन और डॉ.अजय कुमार को राहुल गांधी के कहने पर राष्ट्रीय टीम में जगह मिल सकती है. वहीं ज्योतिरादियत्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) को राष्ट्रीय टीम से निकाल मध्यप्रदेश भेजे जाने की संभावना है.

उत्तर प्रदेश में पांच पत्रकारों के खिलाफ वैमनस्य फैलाने का मामला दर्ज

उत्तर प्रदेश पुलिस (Uttarpradesh Police) ने पांच पत्रकारों के खिलाफ फर्जी खबरें फैलाने और सामाजिक तनाव पैदा करने के आरोप में मामला दर्ज किया है. इस संबंध में बिजनौर पुलिस (Bijnor Police) ने रिपोर्ट दर्ज की है. इन पांच पत्रकारों में से दो की पहचान आशीष कुमार (Ashish Kumar UP) और शकील अख्तर (Shakeel Akhtar UP) के रूप में की गई है. एक स्थानीय अखबार का संवाददाता (Reporter) है, दूसरा टीवी के एक समाचार चैनल से जुड़ा हुआ है. तीन अज्ञात पत्रकार हैं. आशीष कुमार और अख्तर पर आरोप है कि उन्होंने तितरवाला गांव में रहने वाले एक वाल्मीकि परिवार के खिलाफ फर्जी खबरें फैलाकर सामाजिक मेल-जोल तोड़ने का प्रयास … Read more

फेल हुआ गहलोत का कानून प्रबंधन

राजस्थान पुलिस (Rajasthan Police) निकम्मी बन गई है या अपराधियों को वारदात करने की छूट दे दी गई है. जयपुर (Jaipur) में एक अखबार वितरक की हत्या और पुलिस द्वारा पत्रकार की पिटाई का विवाद थमा भी नहीं था कि बहरोड़ पुलिस थाने से कुछ लोग अंधाधुंध गोलियां चलाकर एक दुर्दांत अपराधी को छुड़ा ले गए.

जन तंत्र पर भारी गन तंत्र, उधर गहलोत और पायलट उलझे राजनीतिक रस्साकस्सी में

कहते हैं कि मजबूत सरकार विकास के पथ पर रहती है और मजबूर सरकार झगड़ों में उलझ कर विकास के पथ से भटक जाती है. कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है इन दिनों राजस्थान (Rajasthan) में, यहां सरकार में वर्चस्व की लड़ाई का खामियाजा प्रदेश में बिगड़ी कानून व्यवस्था के रूप में देखने को मिल रहा है. मरुधरा में जनतंत्र (Public System) पर अपराधियों का गन तंत्र (Gun System) भारी पड़ रहा है. गुंडे-मवालियों के सामने खाकी लाचार और कमजोर नजर आ रही है. राजधानी में इंसाफ मांग रहे लोगों पर लाठी बरसाई जा रही है तो बहरोड़ में खुलेआम लॉक-अप में फायरिंग कर अपराधियों को छुड़ाया जा रहा है तो वहीं सीकर में सरेआम बंदूक की नोक पर बैंक को लूटा जा रहा हैं. आखिर क्या हो गया है अमन-चैन वाले प्रदेश राजस्थान को?

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट (Sachin Pilot) के बीच की तनातनी का संघर्ष अब सतह पर है. नौबत यहां तक आ गई है कि अब सरकार के दोनों सिपहसालार एक दूसरे के खुशियों के पल से भी कन्नी काटने लगे हैं. शनिवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सीएम सचिन पायलट के जन्मदिन के मौके पर मुख्यमंत्री पहले दिल्ली और बाद में जैसलमेर में घूम रहे थे. इस दौरान उन्हें प्रदेश में पिछले तीन दिन से बिगड़ी कानून व्यवस्था का ख्याल भी नहीं आया. इससे पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के जन्मदिन के मौके पर सचिन पायलट भी कुछ ऐसा ही कर चुके हैं. इससे दोनों के बीच का मनमुटाव फिर जगजाहिर हो चुका है.

बड़ी खबर: AICC की बैठक के बाद गहलोत और पायलट ने की सोनिया से मुलाकात, गहलोत के चेहरे पर मायूसी तो कॉन्फिडेंट दिखे पायलट

पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट ने अपने जन्मदिन के अवसर पर शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की जिसमें वह नाकाम रहे और उनका यह प्रदर्शन फीका ही रहा. हालांकि पीसीसी से सभी जिलों में जनप्रतिनिधियों को जयपुर भीड़ लेकर आने का संदेश दिया गया था और उम्मीद थी 20,000 से ज्यादा भीड़ जुटाने की लेकिन जयपुर में 5000 नेता और कार्यकर्ता ही उपस्थित हुए. प्रदेश सरकार के छः मंत्रियों सहित करीब 12 विधायकों ने ही पीसीसी जाकर पायलट को बधाई दी जबकि कुछ नेताओं ने विवाद से बचते हुए बधाई देने के लिए पीसीसी के बजाय पायलट के घर को चुना. क्योंकि इस बात पर भी नजर रखी जा रही थी कि कौन-कौन से बड़े नेता पायलट को बधाई देने पहुँचते हैं. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की खींचतान का सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है, जनप्रतिनिधियों की सबसे बडी फांस की किसकी बोलें और किसकी नहीं. यही कारण रहा कि मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार पायलट के जन्मदिन की रौनक फिकी रही आखिर वर्तमान नेतृत्व से पंगा कौन ले?

सीएम अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम व पीसीसी चीफ सचिन पायलट के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई अब शायद अंतिम दौर में पहुंच चुकी है. मुख्यमंत्री गहलोत जहां दिल्ली दरबार में प्रदेश में नया पीसीसी चीफ और एक डिप्टी सीएम और बनाने की अर्जी लगा चुके हैं तो वही गाहे-बगाहे पायलट खेमा भी सरकार की मुखालफत का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहा है. बहराल हम बात कर रहे हैं कि दोनों नेताओं की आपसी खिंचतान का सीधा खामियाजा प्रदेश की जनता को उठाना पड़ रहा है. वरना मुख्यमंत्री जी को इस बिगड़ी कानून व्यवस्था को संभालने के बजाय इस तरह पायलट के जन्मदिन पर राजधानी छोड़कर जाने की नौबत नहीं आती. जबकि दिल्ली या जैसलमेर में कोई ऐसा अतिआवश्यक काम भी नहीं था की जिसे टाला नहीं जा सकता था.

प्रदेश के मुखिया अशोक गहलोत के पास गृह विभाग भी है ऐसे में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी भी गहलोत के ही कंधों पर है लेकिन पिछले 3 महीने और ख़ासकर गतसप्ताह में प्रदेश में हुए अपराध और उनके तरीकों पर नजर डाले तो पुलिस लाचार और नाकाम नजर आती है. मुख्यमंत्री गहलोत जहां राजधानी में पुलिस अधिकारियों को कानून व्यवस्था का पाठ पढ़ा रहे थे तो उसी वक़्त अलवर में बदमाश उसकी बखिया उधेड़ने का प्लान बना रहे थे. प्रदेश के इतिहास में शायद पहली बार हुई बहरोड़ थाने में फायरिंग कर अपराधी को छुड़ाने की घटना के बाद गहलोत के कंट्रोल वाली पुलिस की कलई खुल गई है. मुख्यमंत्री के चहेते डीजीपी अपराध पर अंकुश लगाने में अब तक विफल साबित हुए हैं. ऐसे में राजनीतिक स्थिरता का फायदा अब अपराधी उठा रहे हैं और आम जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.

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अचानक बदले समीकरण

सोनिया गांधी के अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में सत्ता के केंद्र बदल गए. सोनिया के विश्वस्त माने जाने वाले अशोक गहलोत को मानो अभय दान मिल गया हो. राहुल गांधी जहां युवा नेतृत्व की बात करते थे तो ऐसे में सचिन पायलट आत्मविश्वास के साथ रेस में खुद को बरकरार रखे हुए थे. इसी कारण गहलोत खेमे में थोड़ा भय भी था कि कहीं किसी दिन नेतृत्व परिवर्तन का फरमान न आ जाये. लेकिन सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद तो गहलोत खेमा अधिक पॉवरफुल हो गया है. इसीलिए पहले जो नेता और कार्यकर्ता सचिन पायलट का खुल कर समर्थन करते थे यहां तक कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाये जाने की खुलकर पैरवी करते थे उनमें से कुछ एक को छोड़कर ज्यादातर उनके जन्मदिन के मौके पर भी कन्नी काटते नजर आये.

इतनी हड़बड़ी में क्यों मोदी 2.0? 100 दिन से पहले लिए कई बड़े फैसले

इसी हफ्ते मोदी सरकार के वर्तमान कार्यकाल को 100 दिन पूरे होने वाले हैं. लेकिन इस छोटे से अंतराल में मोदी 2.0 ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल, धारा 370 और 35ए, तीन तलाक, मोटर वाहन संशोधन विधेयक मोटर व्हीकल एक्ट, ट्रांसजेंडर बिल, नेशनल मेडिकल कमिशन बिल और RTI संशोधन, UAPA जैसे भारी भरकम बिल पहले सत्र में, एक ही महीने में दोनों सदनों से वास करवाकर लागू भी कर दिये. आखिर इतनी हड़बड़ी में क्यों है मोदी 2.0 सरकार..?

नरेंद्र मोदी की पॉपुलर्टी युवाओं में तेजी से बढ़ने का नतीजा ये है कि पिछली बार की तुलना में इस बार मोदी सरकार भारी बहुमत से केंद्र में सत्ता पर काबिल हुई. लेकिन पिछली बार और इस बार के मोदी सरकार के कार्यों में एक सबसे बड़ी असमानता जो दिख रही है, वो है काम करने में जल्दबाजी. सरकार बनने के तीन महीनों में ही मोदी सरकार और मंत्रीमंडल ने कई क्रांतिकारी फैसले लेकर सभी को चौंका दिया. हालांकि ये सभी कार्य जनता के लिए काफी अच्छे हैं लेकिन राजनीतिज्ञ विशेषज्ञ इस बात से जरूर हैरान हैं कि आखिर क्या वजह है कि मोदी सरकार अपने सभी फॉर्मूलों को जल्दी से जल्दी लॉन्च करना चाह रही है, आखिर ये हड़बड़ी क्यों?

गौरतलब है कि सबसे मुश्किल समझा जाने वाला जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल को धारा 370 और 35ए को हटाते हुए वर्तमान मोदी सरकार ने दोनों सदनों में एक तरफा वोटों से लागू कराने में सफलता हासिल की. वहीं तीन तलाक, मोटर वाहन संशोधन विधेयक मोटर व्हीकल एक्ट, ट्रांसजेंडर बिल, नेशनल मेडिकल कमिशन बिल और आरटीआई संशोधन, UAPA जैसे भारी भरकम बिल पहले सत्र में, एक ही महीने में दोनों सदनों से पास करवाकर लागू भी कर दिये. लेकिन अभी भी वही सवाल अपने उत्तर का इंतजार कर रहा है कि आखिर बीजेपी सरकार को ये सभी फैसले करने की इतनी जल्दी क्यों? क्योंकि सरकार बहुमत के साथ सत्ता में आयी है इसलिए डूबने का तो खतरा है नहीं फिर क्यों…?

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वजह है भारत की लगातार गिरती अर्थव्यवस्था (Indian Economy), आर्थिक मंदी वर्तमान सरकार के सामने सबसे बड़ा चेलेंज है. पिछले एक साल में भारत की जीडीपी 8 फीसदी से घटकर 5 फीसदी आ चुकी है. ये तो वो आकंड़े हैं जो कागजों में दिखते हुए हैं, जानकार बताते हैं कि एक्चुअल में GDP 3 फीसदी पर आ चुकी है (लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है). जबकि वर्ष की पहली तिमाही में ग्रोथ 0.8 फीसदी घटी है. इसकी वजह है कि नोटंबदी के बाद हजारों की संख्या में कारोबार बंद हो गए और लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं.

बता दें, वर्तमान में बेरोजगारी (Unemployment) इतनी ज्यादा बढ़ गयी है, जितनी पिछले 70 साल में कभी नहीं बढ़ी. एक रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा समय में करीब डेढ़ करोड़ लोग बेरोजगार होकर घर बैठे हैं. ऑटो उद्योग में साढ़े तीन लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं. आने वाले तीन सालों में ये संख्या 10 लाख तक जा सकती है. लाखों की संख्या में चमचमाती गाड़ियां शोरूम में खड़ी हैं लेकिन खरीदार नहीं हैं. ऐसे में पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों के ताले लगने की नौबत आ गयी है. रिसेल कार बाजार की हालत भी कुछ खास अच्छी नहीं है.

देश की सबसे बड़ी बिस्किट कंपनी पार्ले ने 10 हजार कर्मचारियों की छटनी की है. मीडिया सेक्टर से कर्मचारियों की छटनी बदस्तूर जारी है. अन्य सेक्टर्स की स्थिति भी जुदा नहीं है. वहीं एक बड़ा तबका वो भी है जो हाई सैलेरी से नीचे गिरकर प्राइमरी वेतन पर काम करने के लिए मजबूर है.

दूसरी ओर, भवन निर्माण उद्योग (प्रोपर्टी सेक्टर) करीब-करीब दीवालिया होने की कगार पर है. लाखों की संख्या में फ्लैट अपने खरीदारों का इंतजार करते हुए जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं. इनमें हाउसिंग बोर्ड, सरकारी और प्राइवेट सभी श्रेणी के घर शामिल हैं. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योजना के चलते सब्सिडी मिलने के बावजूद बिक्री के आंकड़े तेजी से नीचे गिर रहे हैं. मार्केट में घरेलू वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं और महंगाई अपने चरम पर है.

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नोटबंदी (Demonetization) के बाद लचर-पचर हालत में लागू की गयी GST ने व्यापारियों के घुटने ही तोड़ दिए जिसका असर सीधे-सीधे मजदूरों पर पड़ा. इससे लोगों और कारोबारियों को फायदा तो कम हुआ, नुकसान दो-तीन गुना हो गया. बैंकों का अरबों-खरबों रुपया कर्जदारों की मिली भगत के चलते डूब गया.

अब सरकार इस आर्थिक मंदी की मार पर से ध्यान हटाने के लिए ये सभी काम जल्दी जल्दी कर रही है. वजह है कि जिस तरह का माहौल चल रहा है, सरकार इस स्थिति को लंबे वक्त तक संभाल नहीं पाएगी. इसलिए सरकार बीच बीच में कश्मीर का पूर्ण विलय और बालाकोट जैसी राजनीतिक घटनाओं का सहारा ले रही है ताकि अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए समय तो मिल सके, साथ ही जनता का ध्यान भी भटकता रहे. अगर ऐसा नहीं हुआ तो ज्यों ही बेरोजगारी और महंगाई और बढ़ी, सारे देश में हा-हाकार मचना शुरू हो जाएगा. उसके बाद जनता की आवाज विपक्ष की आवाज बन सदन में गूंजेगी और सरकार सत्ता में रहते हुए भी जनता का विश्वास खो देगी. अगर ऐसा हुआ तो ज्यादा समय नहीं बीतेगा और सफलता के घोड़े पर सवार बीजेपी की हालात मौजूदा कांग्रेस की तरह हो जाएगा और पांच खरब की अर्थ व्यवस्था का सपना देखने वाली सरकार को सारी ताकत खुद को बचाने में खर्च करनी पड़ेगी.

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तेजी से नीचे गिरती भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) को संभालने और पटरी पर लाने के लिए ही सरकार भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से 1.7 लाख रुपये ले रही है ताकि ये गिरावट थम सके. इस फंड में से 70 हजार करोड़ बैंकों को दिए जाएंगे ताकि लोगों को आसानी से लोन दिया जा सके. वहीं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण (FM Nirmala Sitharaman) ऐसी घोषणाएं भी लागू करने जा रही हैं जिनसे भारत में विदेशी विनियोग में आसानी हो. गन्ना किसानों को 6 हजार करोड़ रुपये की सहायता देने की कोशिश हो रही है. वहीं 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलना तय हुआ है. भवन निर्माण और आयकर में भी रियायतों का पिटारा खोलने की तैयारी हो रही है.

देश के प्रमुख अर्थशास्त्री (Economist) सरकार को नई आर्थिक नीति बनाने की सलाह दे रहे हैं ताकि अर्थव्यवस्था (Indian Economy) को मजबूत बनाने के लिए साहसिक कदम उठाए जा सकें. माना जा रहा है कि सितम्बर महीने के पूरे दो हफ्ते केवल अर्थव्यवस्था के नाम किए जाएंगे ताकि जनता की सुगबुगाहट को सुलगने से समय रहते रोका जा सके. अगर जल्दी ही ऐसा न हुआ तो भारत सबसे ज्यादा युवाओं का देश तो होगा लेकिन वो केवल बेरोजगारी (Unemployment) की फौज से ज्यादा कुछ नहीं होगी.