शरद पवार का बड़ा खुलासा- “मोदी ने दी थी साथ काम करने की ऑफर, मैंने कहा मुमकिन नहीं”, सुप्रिया के लिए था मंत्री पद का प्रस्ताव

(Sharad Pawar's Big Disclosure)

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष शरद पवार ने बड़ा खुलासा (Sharad Pawar’s Big Disclosure) करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘साथ मिलकर’ काम करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया. वहीं शरद पवार ने उन खबरों को खारिज कर दिया कि मोदी सरकार ने उन्हें देश का राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव दिया था. पवार ने बताया, “हां लेकिन, मोदी के नेतृत्व वाली कैबिनेट में सुप्रिया को मंत्री बनाने का एक प्रस्ताव जरूर मिला था.”

बता दें, सुप्रिया सुले एनसीपी प्रमुख शरद पवार की बेटी हैं और पुणे जिला में बारामती से लोकसभा सदस्य हैं. पवार ने कहा (Sharad Pawar’s Big Disclosure) कि उन्होंने मोदी को साफ तौर पर कह दिया कि उनके लिए प्रधानमंत्री के साथ मिलकर काम करना संभव नहीं है. पवार ने नेशनल चैनल एबीपी के मराठी चैनल एबीपी माझा को दिए इंटरव्यू में कहा, “मोदी ने मुझे साथ मिलकर काम करने का प्रस्ताव दिया था. मैंने उनसे कहा कि हमारे निजी संबंध बहुत अच्छे हैं और वे हमेशा रहेंगे लेकिन मेरे लिए साथ मिलकर काम करना संभव नहीं है.”

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर चल रहे घटनाक्रम के बीच शरद पवार ने पिछले महीने दिल्ली में पीएम मोदी से मुलाकात की थी (Sharad Pawar’s Big Disclosure). मोदी कई मौके पर पवार की तारीफ कर चुके हैं. हाल ही में पिछले महीने राज्यसभा के 250वें सत्र को सम्बोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा था कि संसदीय नियमों का पालन कैसे किया जाता है इस बारे में सभी दलों को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) से सीखना चाहिए .

पवार ने आगे कहा कि 28 नवंबर को जब उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उस समय अजित पवार को शपथ नहीं दिलाने का फैसला ‘सोच समझकर’ लिया गया. पवार ने कहा, “जब मुझे अजित के देवेंद्र फडणवीस को दिए गए समर्थन के बारे में पता चला तो सबसे पहले मैंने ठाकरे से संपर्क किया. मैंने उन्हें बताया (Sharad Pawar’s Big Disclosure) कि जो हुआ वह ठीक नहीं है और उन्हें भरोसा दिया कि मैं इस बगावत को दबा दूंगा.”

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पवार ने बताया (Sharad Pawar’s Big Disclosure), “जब एनसीपी में सबको पता चला कि अजित के कदम को मेरा समर्थन नहीं है, तो जो पांच-दस विधायक अजित के साथ गए थे, उनपर दबाव बढ़ गया और वो वापस लौट आए.” एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि परिवार में क्या किसी ने अजित से फडणवीस को समर्थन देने के उनके फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए बात की थी, लेकिन परिवार के सभी सदस्यों का मानना था कि अजित ने गलत किया. उन्होंने कहा, “बाद में मैंने उनसे कहा कि जो कुछ भी उन्होंने किया वह क्षम्य नहीं है. जो कोई भी ऐसा करेगा उसे परिणाम भुगतान होगा और आप अपवाद नहीं हैं.” पवार ने यह भी बताया कि, “उनके साथ एनसीपी में एक बड़ा हिस्सा है, जिसकी उनमें आस्था है.”

आखिर फडणवीस क्यों बने 80 घंटे के मुख्यमंत्री, क्या सच में था ये ड्रामा? हेगड़े ने किया बड़ा खुलासा

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. महाराष्ट्र (Maharashtra) में 23 नवंबर को चोरी छिपे रातों-रात सरकार बनाकर सुबह 8.05 पर मुख्यमंत्री की शपथ लेकर देवेंद्र फडणवीस ने विपक्ष सहित पूरे देश की जनता तक को चौंका दिया था, लेकिन 80 घंटे बाद उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए इस्तीफा भी दे दिया. इसके बाद राज्य में महाविकास अघाड़ी गठबंधन वाली ‘शिराकां’ सरकार बन गई. अब इस घटना के 10 दिनों के बाद भारतीय जनता पार्टी के सांसद अनंत कुमार हेगड़े (Ananth Hegde) ने इस राज़ से पर्दा उठाते हुए एक बार फिर राजनीतिक हकचल तेज कर दी कि आख्रिर क्यों फडणवीस 4 दिन दिनों के लिए सीएम बने. हेगड़े ने बताया कि देवेंद्र फडणवीस केंद्र … Read more

महाराष्ट्र में उद्दव ठाकरे के ‘हाथ’ में आई ‘घड़ी’, 169 विधायकों का समर्थन मिला बहुमत परीक्षण में

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्दव ठाकरे के ‘हाथ’ में आखिर ‘घड़ी’ आ ही गई. उद्दव सरकार ने आज विधानसभा में बहुमत साबित करते हुए 288 में से 169 विधायकों के समर्थन से फ्लोर टेस्ट (Uddhav Floor Test) पास कर लिया है. उद्दव ठाकरे के भाई राज ठाकरे की पार्टी मनसे और सीपीएम के एक- एक एवं असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के दो विधायकों सहित कुल चार विधायकों ने किसी के पक्ष में वोटिंग नहीं करते हुए तटस्थ रहे. वहीं विपक्ष की पार्टी बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में सदन का वॉकआउट कर दिया और सदन के बाहर जमकर नारेबाजी की. बता दें, सुप्रीम कोर्ट के … Read more

महाराष्ट्र: पहले से अधिक ताकतवर बनकर राजनीति में उभरे हैं अजित पवार, फिर बनेंगे ठाकरे राज में उपमुख्यमंत्री!

Ajit Pawar NCP

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. महाराष्ट्र में गुरुवार से ठाकरे राज का आगाज हो गया है. ठाकरे परिवार से पहली बार मुख्यमंत्री बने उद्वव ठाकरे ने आज मुम्बई के शिवाजी पार्क में 70000 से ज्यादा लोगों की मौजूदगी में महाराष्ट्र के 18वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. उद्वव के साथ महाविकास अघाड़ी के 6 अन्य विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली. इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि अजित पवार का इस नई सरकार में क्या रोल होगा? क्या उन्हें फिर से उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया जाएगा या उनके लिए कोई और भूमिका चुनी जाएगी. इस मसले पर शपथ ग्रहण समारोह से पहले जब मीडिया ने अजित पवार से सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि वह आज शपथ नहीं लेने जा रहे हैं.

महाविकास अघाड़ी की सत्ता के इस गठबंधन में एनसीपी का एक अहम रोल है जिसके बिना सरकार बनाना तो क्या सोचना भी दूर की कोड़ी था. महाराष्ट्र की राजनीति में बीते 23 से 26 नवम्बर के बीच क्या-क्या हुआ और किस तरह शरद पवार ने अपने राजनीतिक कौशल से बीजेपी को धराशायी किया ये किसी से छिपा नहीं है. महाविकास अघाड़ी गठबंधन की सरकार के फॉर्म्युले में इकलौते उपमुख्यमंत्री का पद एनसीपी के खाते में आया है. ऐसे में यह देखना काफी दिलचस्प है कि अजित पवार मंत्रिमंडल में शामिल होते हैं या नहीं और मंत्रिमंडल में शामिल होते हैं तो क्या उपमुख्यमंत्री का पद उनके पास फिर आएगा? वैसे सूत्रों की मानें तो अजित पवार उपमुख्यमंत्री के रूप में कैबिनेट का हिस्सा बनने जा रहे हैं अगर ऐसा नहीं होने वाला होता तो एनसीपी से कोई ओर गुरुवार को उद्वव ठाकरे की शपथ के बाद ही उपमुख्यमंत्री की शपथ ले चुका होता. वैसे भी अजीत पवार के राजनीतिक अनुभव को देखते हुए उपमुख्यमंत्री से कम पर अजीत मानेंगे ऐसा कहना मुश्किल है.

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प्रदेश के पूर्व उप मुख्यमंत्री अजित पवार बारामती से वर्तमान विधायक हैं. एनसीपी का गढ़ कहे जाने वाले इस विधानसभा क्षेत्र से अजित पवार के खिलाफ भाजपा-शिवसेना सहित कुल 10 उम्मीदवारों ने दांव लगाया लेकिन अजित पवार ने भारी मतों से एक तरफा जीत दर्ज कर अपनी परम्परागत सीट पर विजयी सफर को जारी रखा. अपनी बेबाक छवि और अपने चाचा शरद पवार की तरह परिश्रमी और न थकने वाले अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले अजीत पवार फिर से एक बार सुर्खियों में छाए हुए हैं. आइए जानते हैं उनके राजनीतिक, सामाजिक और निजी जीवन की कहानी…

अजीत अनंतराव पवार का जन्म 22 जुलाई, 1959 को देवलि प्रवर, अहमदनगर में हुआ. उनके पिता अनंतराव पवार शरद पवार के बड़े भाई थे जो शुरूआत में मुंबई में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता वी. शांताराम के फिल्म स्टूडियो ‘राजकमल स्टूडियो’ के लिए काम किया करते थे. अजीत जब अपने स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे तब अपने पिता की असामयिक मृत्यु के कारण उन्हें अपनी शिक्षा छोड़नी पड़ी और वे अपने परिवार की देखभाल करने लगे. वे केवल माध्यमिक विद्यालय स्तर तक शिक्षित हैं. अजीत के पढ़ाई के समय में ही शरद पवार सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी में एक नामी राजनीतिक व्यक्ति बन गए थे.

अजित पवार (Ajit Pawar) ने साल 1982 में राजनीति में प्रवेश किया और कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के बोर्ड में चुने हुए. इसके बाद साल 1991 में वे पुणे डिस्ट्रिक्ट कॉपरेटिव बैंक के चैयरमैन बने. अजित पवार पहली बार 1995 में बारामती से लोकसभा सांसद भी निर्वाचित हुए, बाद में उन्होंने शरद पवार के लिए यह सीट खाली कर दी थी. 1991 से 1992 के बीच वे नाइक सरकार में कृषि राज्य मंत्री, अपने चाचा शरह पवार की सरकार में पॉवर एवं प्लानिंग मंत्री बने. कांग्रेस की विलासराव देशमुख सरकार में केबिनेट मंत्री और सुशील कुमार शिंदे सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रहे.

महाराष्ट्र की बारामती विधानसभा सीट पर पिछले 52 सालों में सिर्फ दो ही लोग विधायक बने. यह दोनों ही पवार परिवार के हैं, शरद पवार और अजित पवार (Ajit Pawar). चाचा शरद और भतीजे अजित इस सीट पर छह-छह बार एमएलए बन चुके हैं. पवार परिवार ने इस सीट को आठ बार कांग्रेस के लिए और चार बार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के लिए फतह किया. शरद पवार सन 1967 से 1990 तक निरंतर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और विजयी हुए. इसके बाद में अजित पवार ने भी दो बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते. बाद में शरद पवार ने कांग्रेस छोड़ दी और एनसीपी बनाई. तब से लेकर अब तक चार बार अजित पवार एनसीपी से यहां जीतते रहे हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में अजित सातवीं बार बारामती से जीते हैं.

90 के दशक में विदेशी मूल की सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने का विरोध करने पर शरद पवार को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था. उसके बाद 24 मई, 1999 को शरद पवार ने पीए संगमा और तारिक अनवर के साथ मिलकर एनसीपी की स्थापना की. उसके बाद अजित पवार ने अपने चाचा के साथ पार्टी की बागड़ौर संभालने में मदद की. बाद में साल 2010 में कांग्रेस-एनसीपी की सरकार में अजित पवार (Ajit Pawar) पहली बार महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री बने. हालांकि सितंबर 2012 में एक घोटाले के चलते उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन बाद में एनसीपी ने एक श्वेत पत्र जारी किया और कहा कि अजित पवार बेदाग हैं.

अजित पवार (Ajit Pawar) का विवादों से भी नाता रहा है. उनका नाम महाराष्ट्र में 1500 करोड़ रुपये के सिंचाई घोटाले से भी जुड़ा और वे इस मामले में आरोपी हैं. साल 2013 में अजित पवार की उनके एक बयान की वजह से काफी आलोचना की गई थी. दरअसल, अजित पवार ने सूखे को लेकर 55 दिनों तक उपवास करने वाले कार्यकर्ता पर विवादित टिप्पणी की थी. बाद में अपने इस बयान के लिए सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी. इसी तरह उन पर साल 2014 में बारामती में ग्रामीणों को धमकाने का भी आरोप लगा. दरअसल, 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान अजित पवार अपनी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के लिए प्रचार करने एक गांव में गए थे. यहां उन्होंने कथित तौर पर ग्रामीणों को धमकाया और सुले को वोट न देने की स्थिति में पानी की सप्लाई कटवाने की धमकी भी दी थी.

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अजित पवार (Ajit Pawar) अपने चाहने वालों के बीच ‘दादा’ के रूप में लोकप्रिय हैं. उन्होंने सोशल इंटरप्रिन्योर सुनेत्रा से शादी की है और उनके दो बच्चे पार्थ और जय पवार हैं. कहा जाता है कि अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा ही पर्दे के पीछे से उनका सारा चुनावी कामधाम देखती हैं और रणनीति बनाती हैं. अजित पवार खेती-किसानी के भी जानकार हैं. अजित पवार (Ajit Pawar) ने अपने बेटे पार्थ पवार को भी राजनीति में उतार दिया है. पार्थ ने 2019 में बारामती लोकसभा सीट से पहली बार चुनाव लड़ा और चुनाव हारने वाले अपने परिवार के पहले सदस्य बने.

अजित कुछ समय से अपने चाचा शरद पवार से नाराज चल रहे थे लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले महाराष्ट्र कॉपरेटिव बैंक घोटाले में उनके साथ शरद पवार का नाम भी घसीटे जाने के बाद उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. यहीं से उनके और शरद पवार के रिश्तों में नजदीकियां आने लगी. इसका परिणाम भी सकारात्मक रहा और पार्टी ने 56 सीटें अपने नाम कर सरकार बनाने में अहम भूमिका का निर्वाह किया.

ढलती उम्र के साथ शरद पवार का चुनावी दंगल में जोश काबिले तारीफ रहा लेकिन ये उनकी राजनीति की अंतिम पारी मानी जा रही है. लोकसभा के बाद विधानसभा चुनाव में न उतरकर उन्होंने इस बात के साफ संकेत दे दिए हैं. ऐसे में अजित पवार पार्टी के अगले उतराधिकारी भी बन सकते हैं.

महाराष्ट्र में शुरू हुआ ‘ठाकरे राज’, 6 अन्य नेताओं ने भी ली मंत्री पद की शपथ

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. महाराष्ट्र में 28 नवंबर का दिन ऐतिहासिक दिन रहा. आज से महाराष्ट्र में ‘ठाकरे राज’ की शुरूआत हो चुकी है. इसका साक्षी बना मुंबई का शिवाजी पार्क और करीब 70 हजार से ज्यादा लोग जहां गुरुवार शाम ठीक 6:40 बजे शिवसेना प्रमुख उद्दव बाला साहेब ठाकरे (Uddhav Maha CM) ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की. राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद और गोपनियता की शपथ दिलाई. उद्दव ठाकरे महाराष्ट्र के 18वें और ठाकरे परिवार के पहले मुख्यमंत्री बने. मी उद्धव बाळासाहेब ठाकरे… pic.twitter.com/rgbiHoFzlX — Office of Uddhav Thackeray (@OfficeofUT) November 28, 2019 उद्दव के साथ महाविकास अघाड़ी गठबंधन के 6 नेताओं ने भी … Read more

वीडियो खबर: शरद पवार ने अमित शाह से छीना ‘चाणक्य’ का खिताब

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. महाराष्ट्र की राजनीति आज सोशल मीडिया पर टॉप ट्रेंडिंग पर है. #MahaThriller और #MaharashtraPoliticalDrama हैशटैग ट्वीटर पर वायरल हो रहा है. दोनों हैंशटैग से कुछ घंटों में 1.25 लाख से अधिक ट्वीट हो चुके हैं. कमेंट और रिट्वीट भी काफी हैं. एनसीपी के वरिष्ठ नेता नवाब मलिक ने सोशल मीडिया पर केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की खिंचाई करते हुए लिखा, ‘नितिन गड़करी कह रहे थे कि क्रिकेट और राजनीति में कुछ भी हो सकता है लेकिन शायद वे भूल गए कि शरद पवार ICC के अध्यक्ष रह चुके हैं’.

‘शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन भारतीय राजनीति की नई शुरुआत है’

#BjpMuktBharat

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. महाराष्ट्र में बीजेपी की देवेंद्र फडणवीस की सरकार क्या गिरी, लगने लगा है जैसे भाजपा की शोहरत गिरती जा रही है. महाराष्ट्र की राजनीति का ही असर है कि पिछले एक हफ्ते से महाराष्ट्र से जुड़े हैशटैग सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं. आज दिनभर से #BjpMuktBharat हैशटैग ट्वीटर पर ट्रेंडिंग में चल रहा है जिसपर पर हजारों की संख्या में ट्वीट, कमेंट और रिट्वीट हो चुके हैं. ये ट्वीट ‘बीजेपी मुक्त भारत’ को दर्शा रहे हैं. ये पूरी घटना महाराष्ट्र की परिस्थितियों का ही असर है. एक सोशल मीडिया यूजर ने तो यहां तक कहा है कि महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन भारतीय राजनीति की नई शुरुआत … Read more

महाराष्ट्र में बीजेपी का गेम ओवर हो गया ‘पवार’ गेम के आगे लेकिन चुनौतियां अभी बाकी

Pawar Game in Maharashtra

पॉलिटॉक्स ब्यूरो. गेम ओवर हो गया ‘पवार‘ गेम (Pawar Game) के आगे, महाराष्ट्र के नंबर गेम में भाजपा की यह हालत होनी ही थी. जिस तरह सत्ता पर काबिज होने के लिए उसने हक़ीकत को नज़रअंदाज कर उतावलापन दिखाया, उससे इस खेल में उसकी हार सुनिश्चित थी. बावजूद इसके उसने हर जरिये से हर हथकंडे अपनाने की कोशिश की और, जब अंतत: कोई चारा नहीं बचा तो 80 घंटे के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देकर शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार का रास्ता साफ करना ही पड़ा. अंतत: अब यह तय हो गया है कि महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन ‘महाविकास अघाड़ी‘ की सरकार बनने जा रही है और इस सरकार का नेतृत्व करेंगे शिवसेना के उद्धव ठाकरे, जो कि कल शाम 6.40 पर शिवाजी पार्क में मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे.

जाहिर है जब सरकार की सूरत साफ लग रही है, तो इस सरकार के भविष्य को लेकर बहस-मुबाहिसों का दौर भी शुरू हो गया है. बहुतों का मानना है कि बेमेल गठबंधन की यह सरकार ज्यादा दिनों तक चल नहीं पाएगी. कारण, एक तरफ शिवसेना जैसी कट्टर हिंदुत्वादी विचारधारा वाली पार्टी है तो दूसरी तरफ एकदम विपरीत विचारधारा वाली एनसीपी, कांग्रेस जैसी पार्टियां. वरिष्ठ भाजपा नेता नितिन गडकरी समेत कई नेताओं ने कहा है कि यह अवसरवादी सरकार होगी और बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी. वहीं कई तो अब भी इस खेल में भाजपा को ही विजेता बता रहे हैं, यह कहते हुए कि यह सरकार कुछ महीनों में जब गिर जाएगी, तो शिवसेना को अंतत: भाजपा के साथ आना ही होगा. तब उसकी अकड़ भी खत्म हो जाएगी और भाजपा का मुख्यमंत्री भी उसे स्वीकार करना पड़ेगा. इस प्रकार देर से ही सही भाजपा को अपने नेतृत्व में सरकार बनाने में भी कामयाबी मिल जाएगी और उसकी छवि भी ऐसी बनेगी कि सत्ता के लिए वह शिवसेना के आगे नहीं झुकी, समझौता नहीं किया, जबकि शिवसेना की छवि अवसरवादी की बनेगी कि सत्ता की खातिर इस हिंदुत्ववादी पार्टी ने उस विचारधारा वाली पार्टियों का हाथ थामा जो हिंदुत्व की विरोधी रही हैं.

विशेष रिपोर्ट : आखिर उद्वव ने पूरा किया बाला साहेब ठाकरे को दिया ‘शिवसैनिक को सूबे का मुख्यमंत्री’ बनाने का वचन

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में नई सरकार ही नहीं बन रही, बल्कि नई परंपरा भी शुरू हो रही है और यह परंपरा इस सरकार को स्थायित्व देती नजर आ रही है. जिस प्रकार नरेंद्र मोदी और अमित शाह की छत्रछाया में भाजपा का सफर चल रहा है, उससे विपक्ष ही नहीं उसके सहयोगी दलों में भी बेचैनी है. यह अलग बात कि उस बेचैनी को पहले ये न जाहिर कर रहे थे और न उससे बाहर निकलने की कोशिश. लेकिन पहले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे सूबों में आए नतीजों और फिर हरियाणा, महाराष्ट्र के परिणाम ने उन्हें इस दिशा में बढ़ने की खुराक दी है. झारखंड में आजसू ने यूं ही गर्दन ऊंची कर भाजपा से अलग होने का फैसला नहीं कर लिया. पासवान की पार्टी भी वहां 50 सीटों पर भाजपा से अलग ही चुनाव लड़ रही है, जबकि केंद्र में वह भाजपा के साथ सरकार में शामिल है. यानी सत्ता के साथ रहकर भी एनडीए के सहयोगी दल अब अपने भविष्य को लेकर गंभीर हैं.

इसी गंभीरता ने महाराष्ट्र में शिवसेना को उस मोड़ पर ला खड़ा किया कि उसे भाजपा के मुकाबले एनसीपी और कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने से गुरेज न हुआ. शिवसेना को इसके लिए कदम बढ़ाने में एनसीपी छत्रप शरद पवार ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई, हौसला देकर और रास्ता सुझाकर. यानी पर्दे के पीछे आज की स्थिति के लिए पवार ही मुख्य सूत्रधार हैं (Pawar Game). चिंगारी को हवा देकर उन्होंने महाराष्ट्र की सियासत को उस ओर मोड़ दिया, जहां भाजपा अब बिल्कुल अकेली पड़ गई और शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस विजेता के रूप में खड़ी हैं और विजेता कभी नहीं चाहेंगे कि आगे उनकी हार हो. वे पूरी कोशिश करेंगे कि उनकी साझा सरकार पूरे पांच साल चले. वैसे भी शिवसेना तो अब नहीं ही चाहेगी कि उसके नेतृत्व वाली सरकार अस्थिर हो जिसकी कमान उद्धव ठाकरे के हाथों में होगी. भाजपा के साथ लाभ का भ्रम तो उसका पहले ही टूट चुका है. गौरतलब है कि 2014 में जब शिवसेना अकेली लड़ी थी तो उसकी 68 सीटें आई थीं, जो इस बार साथ लड़ने पर 56 हो गईं.

बताया जाता है कि चुनाव से पहले भी शरद पावर ने भाजपा से परेशान शिवसेना को उसके पाले से बाहर रखने की प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष कोशिशें की थी, लेकिन यह परवान नहीं चढ़ पाया तब, हालांकि पवार अपने प्रयास में लगे रहे. प्रयास ही थे कि नतीजों के बाद अचानक ही शिवसेना के सुर बदल गए, प्रयास ही थे कि अब तक बाहर बैठकर ठकुराई करने वाले ठाकरे परिवार का सदस्य पहली बार चुनाव मैदान में उतरा. भविष्य के किन्तु-परन्तु के दृष्टिगत ही आदित्य ठाकरे को चुनाव मैदान में उतारा गया. दरअसल पवार ने उद्धव के दिमाग में यह बात डाल दी थी कि भाजपा के साथ रहने के कारण ही शिवसेना 68 से 56 पर आ गई और अगर साथ बना रहा तो अगले चुनाव में 26 पर आ जाए, इसमें संदेह नहीं होना चाहिए. पहले से किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में चल रहे उद्धव की आंखें पूरी तरह खुल गईं और उन्होंने खुल कर खेलना शुरू कर दिया. मोदी-शाह की भाजपा को लगा कि ऐसी घुड़की तो शिवसेना पहले भी देती रही है, झुकना क्या, हार कर उसे भाजपा के आगे झुकना ही होगा. वैसे भी मोदी शाह की जोड़ी अपने सामने वालों के आगे झुकना नहीं, उसे झुकाना पसंद करती है. लेकिन इस बार यह जोड़ी अपने खेल में मात खा गई और पवार अपने खेल में कामयाब हो गए.

वैसे भी पवार राजनीति के घाघ खिलाड़ी हैं. सरकार गठन को लंबा खींचना भी उनकी चाल थी ताकि शिवसेना और भाजपा के बीच तल्खियां इतनी बढ़ जाए कि फिर वापस कदम खींचना दोनों के वश में न रह पाए (Pawar Game). इस बीच उन्होंने कांग्रेस को भी यह समझाने में कामयाबी हासिल कर ली कि महाराष्ट्र जैसे कॉरपोरेट बहुल राज्य में अगर वे सत्ता से दूर रही, तो इसका राजनीतिक नुकसान होगा. यह सच है कि कांग्रेस कदापि इस दिशा में विचार नहीं कर रही थी, लेकिन पवार ने सोनिया को अंतत: इसके लिए मना लिया. उद्धव ठाकरे को मनाने में उन्हें इस लिहाज से भी कामयाबी मिली कि दोनों के परिवार में रिश्तेदारी है. शरद पवार की सुपुत्री सुप्रिया सुले का उद्धव ठाकरे की मां के घर से रिश्ता है. यानी ईडी भेज कर पवार के पावर को काबू करने की कोशिश करने वाली भाजपा आखिरकार पवार के चक्रव्यूह में फंस गई.

इस पूरे प्रकरण में पवार योद्धा बनकर उभरे हैं (Pawar Game), इसमें कोई दो राय नहीं है. शिवसेना की तरफ से किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाने की जगह उद्धव ठाकरे को सरकार का नेतृत्व करने को राजी कर भी पवार ने सरकार के स्थायित्व को सुनिश्चित करने का प्रयास किया है. कांग्रेस को भी सरकार में शामिल कराकर उन्होंने कोई कसर न छोड़ने का ही इंतजाम किया है ताकि सरकार भी चले और हर पक्ष लाभान्वित हो. यह अलग बात कि सबसे ज्यादा लाभ में पवार ही होंगे, सरकार पर उनकी पकड़ इस लिहाज से भी ज्यादा होगी कि उद्धव के पास सरकार चलाने का तजुर्बा नहीं है. जाहिर है उन्हें दिशा-निर्देश पवार से ही मिलेगा और जब सरकार पर पकड़ पवार की होगी तो आर्थिक राजधानी मुंबई से मजबूत होने वाली उनकी सियासत भी और मजबूत ही होती जाएगी.

यानी मराठा छत्रप शरद पवार ने सरकार का इंतजाम भी कर दिया और मराठा राजनीति का खुद को सिरमौर भी साबित कर दिया (Pawar Game). भूलें नहीं कि ब्राह्मण मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को लेकर कहा गया था कि अपने शासनकाल में उन्होंने मराठा नेताओं को पार्टी के भीतर किनारे लगाने का काम किया और यह जाहिर भी हो चुका है अब. तो क्या भाजपा के लिए नई परिस्थितियों में चुनौती बढ़ेगी? आसार ऐसे हैं. बहरहाल, महाराष्ट्र में नई सरकार का इंतजार खत्म हो चुका है. हनीमून कब खत्म होगा, दावे के साथ इस वक़्त कोई कुछ नहीं कह सकता. जहांपनाह, सियासत के मंच पर हम तो सिर्फ दर्शक हैं, पट के पीछे हमेशा कुछ न कुछ तो चलता ही रहेगा.