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इसे कहते क्या हैं जनता का भरोसा तोड़ना और लोकंतंत्र की हत्या, कीमत विश्वास की या विश्वासघात की?

17 जुलाई 2020
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इसे कहते क्या हैं जनता का भरोसा तोड़ना और लोकंतंत्र की हत्या, कीमत विश्वास की या विश्वासघात की?

PoliTalks.News/Rajasthan. गजब का लोकतंत्र है. जनता अपने नेताओं पर कितना भरोसा करती है, उन्हें विधायक बनाती है और माननीय अपने फायदे के लिए जनता के भरोसे का सौदा कर देते हैं. कितना आसान सा हो गया है, जनता द्वारा चुनी गई सरकारों को पैसों के दम पर गिरा देना. यही नेता ईमानदारी का एक नया चेहरा लगाकर जनता के पास फिर से उनका वोट मांगने पहुंच जाते हैं. यह खेल देश में लंबे समय से चल रहा है, अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक दलों के बीच होने वाले आरोप प्रत्यारोप से सामने आता रहा है लेकिन पुख्ता सबूत के साथ कभी नहीं आया. लेकिन राजस्थान में तो गजब ही हो गया. … Read more

PoliTalks.News/Rajasthan. गजब का लोकतंत्र है. जनता अपने नेताओं पर कितना भरोसा करती है, उन्हें विधायक बनाती है और माननीय अपने फायदे के लिए जनता के भरोसे का सौदा कर देते हैं. कितना आसान सा हो गया है, जनता द्वारा चुनी गई सरकारों को पैसों के दम पर गिरा देना. यही नेता ईमानदारी का एक नया चेहरा लगाकर जनता के पास फिर से उनका वोट मांगने पहुंच जाते हैं. यह खेल देश में लंबे समय से चल रहा है, अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक दलों के बीच होने वाले आरोप प्रत्यारोप से सामने आता रहा है लेकिन पुख्ता सबूत के साथ कभी नहीं आया.

लेकिन राजस्थान में तो गजब ही हो गया. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सारे सबूतों के साथ खड़े हैं. कांग्रेस ने एसओजी को शिकायत दी. शिकायत पर जांच शुरू हुई. जांच के तहत उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट सहित कुछ विधायकों को नोटिस दिए गए. नोटिस तो मुख्यमंत्री को भी दिया गया. नोटिस में सरकार गिराने का षड़यंत्र, विधायकों की खरीद फरोख्त और राजद्रोह की धाराएं है. लेकिन नोटिस मिलते ही पायलट का नाराज होना. नोटिस को अपने आत्मसम्मान से जोड़ना और फिर 18 विधायकों के साथ बीजेपी की हरियाणा सरकार के क्षेत्र के एक होटल में चले जाना. कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं के द्वारा बुलाने पर भी नहीं आना. बहुत कुछ अपने आप में बयां कर रहा है.

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अशोक गहलोत भले ही मुख्यमंत्री हैं लेकिन वो इतने मुखर नहीं हो सकते थे कि पायलट को उपमुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष पद से विदाई करा दें. लेकिन सारे सबूतों के साथ पुख्ता इंतजाम कर चुके थे. जरूर ऑडियो को कांग्रेस नेताओं को सुनाया गया होगा, गांधी परिवार को भी सुनाया गया होगा और भी सबूत होंगे. कांग्रेस में चिंतन हुआ होगा, मनन हुआ होगा. तभी तो महसूस किया गया कि जो मध्य प्रदेश में हुआ, वही तो राजस्थान में करने की तैयारी थी, यानि सरकार का तख्ता पलट.

मध्य प्रदेश में कमलनाथ कमजोर पड़ गए, क्यों कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास नंबर गेम पूरा था. लेकिन राजस्थान में पेच फंस गया. पायलट का नंबर गेम पूरा होने से पहले ही मुख्यमंत्री गहलोत ने विधायकों की बाड़ेबंदी कर दी. सीएम गहलोत ने ऐसा शिंकजा कसा कि फिलहाल तो सारा प्लान ही चौपट हो गया. इसीलिए पॉलिटॉक्स ने 2 महीने पहले ही कह दिया था कि “राजस्थान में कोई सिंधिया बनने की कोशिश ना करे, यहां कमलनाथ नहीं अशोक गहलोत हैं“.

जरा याद कीजिए, एक महीने पहले का समय. राज्यसभा चुनाव का टाइम था. मुख्यमंत्री गहलोत ने कहा था कि कांग्रेस के विधायकों को खरीदने के लिए 25 करोड़ रूपए तक के ऑफर दिए जा रहे हैं, वहीं सचिन पायलट ने इस तरह की बात को खारिज कर अफवाह बताया था. गहलोत ने उस समय भी विधायकों की मजबूत बाड़ेबंदी करके कांग्रेस को राज्यसभा सीटें जितवाई थी. मुख्यमंत्री गहलोत के अनुसार खेल उस समय से ही चल रहा था. वो गेम प्लान 1 था. उस प्लान के फेल होते ही गेम प्लान 2 को अमल में लाया जा रहा था. प्लान 2 ठीक मध्य प्रदेश की तरह था. विधायकों का खेमा बनाकर सरकार को अल्पमत में लाया जाए और तख्ता पलट दिया जाए.

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लेकिन मुख्यमंत्री गहलोत राज्यसभा चुनाव के समय से ही चौकन्ने थे. उन्होंने पायलट का ही तख्ता पलट दिया. पायलट क्या थे, क्या हो गए. ना उपमुख्यमंत्री रहे, ना ही प्रदेशाध्यक्ष, विधायकी पर भी तलवार लटक रही है, बीजेपी में जाने से मना कर चुके हैं. एसओजी के सामने पूछताछ के लिए भी जाना है. अभी बहुत कुछ होना है. हर दिन कुछ नया सामने आना है.

सारे घटनाक्रम से एक बात तो सामने आ रही है कि पायलट के खिलाफ एक के बाद एक लिए गए निर्णयों के पीछे मुख्यमंत्री गहलोत के पास उनकी सरकार गिराने के इरादे से विधायकों की खरीद फरोख्त के प्रयासों के पुख्ता सबूत हैं. अगर एसओजी का नोटिस पायलट के आत्मसम्मान की बात था, तो यह नोटिस तो मुख्यमंत्री को भी मिला है. फिर अचानक अपने खेमे के विधायकों को लेकर हरियाणा जहां बीजेपी सरकार है, वहां बैठना और भी मामले को संदेहास्पद बना देता है. अब तक तीन ऑडियो जनता के बीच आ चुके हैं. इन तीनों ऑडियो में विधायकों की खरीद फरोख्त, सरकार गिराने के लिए नंबर गेम और पहली किस्त का विधायकों तक पहुंचने का जिक्र हो रहा है.

बुधवार को ही मुख्यमंत्री गहलोत ने सचिन पायलट का नाम लेकर कहा था कि वो बीजेपी के साथ मिलकर राजस्थान सरकार को गिराने के काम में लगे थे. मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि उनके पास पुख्ता सबूत हैं. गुरुवार को यह तीन ऑडियो अचानक मीडिया के पास पहुंच गए. अब राजस्थान की जनता अपने माननीयों की बातचीत सुन रही है. ऑडियो सही हैं या गलत, यह भी सामने आ जाएगा लेकिन इन तीन ऑडियो ने भूचाल खड़ा कर दिया है. यह तीनों ऑडियो भी एसओजी की जांच का हिस्सा बनेंगे.

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कांग्रेस ने विधानसभा स्पीकर को शिकायत दी थी कि पायलट और उनके साथ 18 विधायकों ने पार्टी विहप का उल्लघंन किया है. शिकायत मिलने के बाद स्पीकर ने सभी 19 लोगों को नोटिस जारी कर शुक्रवार यानि आज एक बजे तक जवाब मांगा है. वहीं पायलट खेमे ने हाई कोर्ट में इस नोटिस के खिलाफ याचिका लगाई है. जिस पर होई कोर्ट की डिविजन बैंच आज ही एक बजे से सुनवाई शुरू करेगी. जानकारों के अनुसार चूंकि हाई कोर्ट ने इस मामले में किसी भी प्रकार का कोई आदेश जारी नहीं किया है, ऐसे में स्पीकर अपनी कार्रवाई करने में स्वतंत्र है. स्पीकर द्वारा जारी किए गए नोटिस का जवाब नहीं मिलने पर वो चाहें तो पायलट सहित 18 विधायकों की विधानसभा सदस्यता भी समाप्त कर सकते हैं.

इस सारे राजनीतिक घटनाक्रम में कांग्रेस या पायलट का क्या होगा. यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है. लेकिन अगर आॅडियो सही हैं, तो एक बात तो साफ हो गई है कि लोकतंत्र की मंडी में हमारे माननीयों की ना सिर्फ बोली लगती है बल्कि वो जनता के विश्वास का गला घोंट कर खरीदे और बेचे भी जाते हैं. सबसे बड़ी बात की इन माननीयों ने जनता के विश्वास और भरोसे की कीमत भी तय कर दी. लेकिन यहां जो बात गौर करने वाली है वो यह कीमत जनता के विश्वास को जीतने की है या जीते हुए विश्वास के साथ ‘घात’ यानी विश्वासघात की है?

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