क्या मोदी सरकार सच में पेश कर रही गलत डेटा या बेकार हो गई है 70 साल पुरानी NSC संस्था?

जीडीपी, बेरोजगारी दर और खर्च क्षमता की सभी रिपोर्ट्स को नकारा मोदी सरकार ने, गुणवत्ता पर उठाया संदेह, ये सभी आंकड़े 70 साल पुरानी सरकारी संस्था एनएससी द्वारा इक्ट्ठा किए गए

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पॉलिटॉक्स ब्यूरो. पिछले काफी समय से मोदी सरकार देश में व्याप्त आर्थिक मंदी के चलते विपक्ष के सवालों से घिरी हुई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश की जीडीपी जहां पिछले साल 7 फीसदी थी, उसके इस साल 6.5 फीसदी तक रहने की उम्मीद है. लेकिन मीडिया सूत्र तो कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि भाजपा सरकार अपनी जीडीपी दर को बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रही है. सिर्फ यही नहीं, बाकी के आंकड़े भी हकीकत से कोसों दूर हैं. ये बयान किसी और ने नहीं बल्कि जाने-माने अर्थशास्त्री और मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने दिया है. बता दें, इसी साल मई में सुब्रमण्यम ने अपने पद से इस्तीफा दिया. (National Statistical Commission)

अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा है कि 2011-12 से 2016-17 के बीच भारत की जीडीपी की वास्तविक दर केवल 4.5 फीसदी थी लेकिन इसको अधिकारिक रूप से 7 फीसदी से अधिक बताया गया. उन्होंने ये भी कहा कि सरकार आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ कर रही है. अकेले सुब्रमण्यम का बयान शायद कोई मायने नहीं रखे लेकिन इसी साल 28 जनवरी को पीसी मोहनन के नेशनल स्टेटिस्टिकल कमिशन (National Statistical Commission) यानि एनएससी से बतौर कार्यकारी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की घटना कुछ तो दाल में काला होने का संकेत जरूर है. केंद्र सरकार के नियंत्रण में कार्यरत एनएससी संस्था देश के अहम आंकड़ों की गुणवत्ता की जांच करती है. बता दें, पीसी मोहनन ने रोजगार से जुड़े आंकड़ों के प्रकाशन में हो रही देरी का विरोध करते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया था. उनके साथ NSC (National Statistical Commission) की एक सदस्या जे.लक्ष्मी ने भी अपना त्यागपत्र संस्था को सौंप दिया था.

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हलचल तो तब मची जब मोहनन के इस्तीफा देने के तीन दिन बाद बिजनेस से जुड़े एक अखबार में रोजगार के आंकड़े लीक हो गए जिसके अनुसार बेरोजगारी की दर बढ़कर 6.1 फीसदी हो गई जो पिछले 45 सालों में सबसे उच्चतम स्तर पर आ गई है. बेरोजगारी का ये आंकड़ा निश्चित तौर पर मोदी सरकार को परेशान करना वाला था और वो भी तब जब की तीन माह बाद मई में लोकसभा चुनाव सिर पर हों. हालांकि मोदी सरकार के अधिकारियों ने ये कहते हुए इन आंकड़ों को सिरे से खारिज कर दिया कि डेटा संग्रह करने की प्रक्रिया में कई तरह के दोष हैं और यह असली तस्वीर नहीं है. सरकार का तर्क था कि मुद्रा योजना के तहत हजारों करोड़ रुपये के कर्ज युवाओं को बांटे गए हैं जिनके आंकड़ों का संग्रह नहीं हुआ है.

इस मुद्दे पर अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा कि जीडीपी गणना की प्रक्रिया बदलने से आंकड़े ज्यादा आ रहे हैं जो वास्तविक नहीं है. बैंकों का क्रेडिट ग्रोथ नकारात्मक है, बेरोजगारी बढ़ी हुई है, लोगों का खर्च कम हो रहा है, ऐसे में जीडीपी वृद्धि दर सात फीसदी से अधिक कैसे हो सकती है. ऐसे में विशेषज्ञों ने भी संदेह जताते हुए कहा कि वास्तविक आंकड़े मोदी सरकार को पसंद नहीं आ रहे इसलिए केंद्र सरकार आंकड़े जारी ही नहीं कर रही. इसी क्रम में मोदी सरकार ने एनएसओ के 2017-18 के उपभोक्ता खर्च सर्वे डेटा को जारी नहीं करने का निर्देश दिया. वजह बताई कि डेटा की गुणवत्ता में कमी के चलते इन्हें जारी नहीं किया जाएगा. अब हालात ये है कि डेटा जारी न होने से देश में गरीबी और विषमता का आंकलन नहीं हो सकता. यह डेटा जून में जारी किया जाना था.

चूंकि डेटा जारी नहीं किया गया लेकिन एक अखबार में फिर डेटा लीक हो गया जिसमें दावा किया गया कि लोगों के खर्च करने की क्षमता में पिछले 40 वर्षों की तुलना में सबसे ज्यादा कमी आई है. एक बार फिर सरकार ने इन आंकड़ों को ये कहकर खारिज कर दिया कि ये सर्वे 2021-22 में होगा. इस रिपोर्ट को भी जून में आना था.

अब सवाल ये आकर खड़ा हो गया है कि केवल गुणवत्ता का बहाना करके मोदी सरकार इन आंकड़ों को क्यों झुठला रही है. जबकि जो संस्था इन आंकड़ों को इक्कट्ठा कर रही है, वो सरकारी संस्था है और 1950 से अपना काम बखूबी कर रही है. एक बार मान भी लेते हैं कि सरकार गुणवत्ता पर भरोसा नहीं कर रही लेकिन वो गुणवत्ता क्या है, ये भी बता नहीं रही. सरकार को ऐसे कौनसे आंकड़े चाहिए, ये भी उनके विश्वसनियों के लिए समझ पाना मुश्किल है. तीन वरिष्ठ अधिकारियों के इस्तीफे इस बात का पुख्ता सबूत है.

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सरकार छोडिए, कोई भी भाजपा नेता ये मानने को तैयार नहीं है कि जीडीपी ग्रोथ घट रही है या बेरोजगारी बेलगाम घोड़े की तरह सरपट भागे जा रही है या फिर लोगों की खर्च करने की क्षमता लगातार घट रही है. सरकार का पूरा ध्यान केवल घर, सब्सिडी, शौचालय तक ही सीमित रहा है. इस बात को इस उदाहरण से समझ सकते हैं. सरकार ने ईड्ब्ल्यूएस केटेगिरी में घर लेने की क्षमता 1.20 लाख रुपये सालाना इनकम पर रखी है, यानि 10 हजार रुपया महीना. अगर वो बैंक से लोन लेकर जो कि सरकार खुद दिला रही है, 4500 रुपये की मासिक किश्त अदा करता है तो केवल 5500 रुपये में घर का पेट कैसे पाल सकता है. इस पर सरकार के सरकारी मुलाजिम तर्क दे रहे हैं कि हर साल इनकम बढ़ती है लेकिन मीडिया के आंकड़े जो ये बता रहे हैं कि पिछले तीन सालों में करीब सवा करोड़ लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा है, कुछ गले नहीं उतरता. इनमें 10 लाख तो केवल ऑटो सेक्टर और ढाई लाख से अधिक मोबाइल इंडस्ट्री से जुड़े लोग हैं.

हाल में एक खबर आई जिसमें कहा गया कि IT सेक्टर में 40 हजार से ज्यादा नौकरियां जनवरी से 15 नवंबर तक जा चुकी हैं. ये आंकड़े केवल 11 महीनों का है. ऑटो सेक्टर मंदी का अभाव झेल रहा है और कच्चा सामान बनाने वाली कंपनियों के ताले लग चुके हैं. वोडाफोन, आइडिया, रिलाइंस और सरकारी कंपनी बीएसएनएल जैसी प्रमुख नेटवर्क प्रदाता कंपनियां कंगाल हो चुकी है. हाल में दीवान हाउसिंग फाइनेंस लि. (DHFL) दिवालिया हो चुकी है. वहीं सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए में 80 हजार करोड़ घट गया है जो करीब 7.5 फीसदी है. 12 सहकारी बैंक मर्जन के कगार पर खड़े हैं. महंगाई लगातार बढ़ रही है. हाउसिंग लोन, पर्सनल लोन इतने नीचे आ चुके हैं जिनके पिछले 15 सालों में नहीं आए. इतना सब हो रहा है तो आखिर इसके पीछे क्या वजह है.

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आम आदमी से अगर इसकी गणना की जाए तो तेल, घी, साबुन से लेकर पेट्रोल, डीज़ल और गैस सिलेंडर सब के दाम बढ़ते जा रहे हैं. युवा बेरोजगार होकर इधर उधर भटक रहा है. प्राइवेट संस्थान की बात छोड़िए, बड़ी-बड़ी कंपनियां सड़कों पर आ गई है. और तो और, सरकार खुद 5 प्रमुख कंपनियों सहित एयर इंडिया में अपनी हिस्सेदारी बेच निजीकरण को बढ़ावा दे रही है. इतना सब होने के बाद भी वास्तवित रिपोर्ट अभी तक बाहर नहीं आ रही है.

अब इन बातों से जनता भी तंग आ चुकी है और सरकार केवल राजनीति खेलने में लगी हुई है. अगर एकबारगी मान लिया जाए कि सरकार रिपोर्ट पर विश्वास नहीं कर रही और सच में वास्तविक आंकड़े जुटाने में लगी है तो दो सवाल यहां जवाब मांगने के लिए खड़े हैं. पहला- अगर सब कुछ सही है तो निजीकरण को बढ़ावा क्यों और क्यों सरकार ने रिजर्व बैंक से इतना मोटा फंड स्थितियां सुधारने के लिए मांगा? दूसरा- जब सरकार खुद आंकड़े इक्ट्ठा करने में समय खपा रही है तो NSC (National Statistical Commission) जैसे बड़ी और पुरानी संस्था को अब तक क्यों चला रखा है जब इनके सभी रिसर्च खोखले और बेकार हैं? ऐसे कई सवाल हैं जो अभी तक मोदी सरकार के उत्तर का इंतजार कर रहे हैं लेकिन सच फिर भी वहीं खड़ा है कि मोदी सरकार वास्तविक आंकड़ों की गुणवत्ता की अभी भी खोज कर रही है.

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