भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया संबोधन के बाद देशभर में एक बार फिर लॉकडाउन, पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी और आर्थिक संकट को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है. सोशल मीडिया पर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या देश फिर से कोविड काल जैसी परिस्थितियों की ओर बढ़ रहा है. हालांकि, हकीकत इन आशंकाओं से थोड़ी अलग दिखाई देती है.
दरअसल, पीएम मोदी ने अपने संबोधन में देशवासियों से अपील की कि वे आने वाले समय की वैश्विक चुनौतियों को देखते हुए ईंधन की बचत करें, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करें, कार पूलिंग अपनाएं और जहां संभव हो वहां 'वर्क फ्रॉम होम' को प्राथमिकता दें. साथ ही उन्होंने एक वर्ष तक गैर-जरूरी स्वर्ण खरीद से बचने और विदेशी यात्राओं को सीमित रखने की भी सलाह दी.
प्रधानमंत्री मोदी की इस अपील के पीछे मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में संभावित उछाल माना जा रहा है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल और सोने के आयात से पूरा करता है. ऐसे में यदि वैश्विक संकट गहराता है तो इसका सीधा असर देश के विदेशी मुद्रा भंडार और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार फिलहाल एहतियाती आर्थिक रणनीति पर जोर दे रही है, न कि लॉकडाउन जैसी सख्त पाबंदियों की तैयारी पर.
सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे संभावित आर्थिक संकट का संकेत बता रहे हैं, जबकि विपक्ष सरकार पर निशाना साधते हुए इसे आर्थिक नीतियों की विफलता करार दे रहा है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी प्रधानमंत्री की अपील पर सवाल उठाए और कहा कि सरकार आम लोगों पर बोझ डाल रही है.
हालांकि, अब तक केंद्र सरकार की ओर से किसी भी प्रकार के लॉकडाउन, प्रतिबंध या सार्वजनिक गतिविधियों पर रोक को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह अपील मुख्य रूप से ऊर्जा संरक्षण, विदेशी मुद्रा बचत, फर्टिलाइजर इस्तेमाल कम करने और आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई है.
फिलहाल देश में लॉकडाउन की स्थिति नहीं है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए सरकार नागरिकों से सतर्क और जिम्मेदार व्यवहार अपनाने की अपील जरूर कर रही है.











