कांग्रेस के स्टार प्रचारक राहुल गांधी अब तक चुनाव दंगल से गायब

कांग्रेस के इकलौते राजकुमार राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने लोकसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद जब से पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया है, वे ईद का चांद हो गए. वे न केवल लोकसभा चुनाव हारे बल्कि अपनी परंपरागत सीट अमेटी से भी स्मृति ईरानी से हार बैठे. उनकी लाज तो केरल की वायनाड सीट से कैसे तैसे बच गई लेकिन शायद इस हार के गम को वे अब तक नहीं भुला पाए. यही वजह रही कि वे लोकसभा सत्र में भी ‘मिस्टर इंडिया’ ही बने रहे. अब जब से हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों की तिथियों की घोषणा हुई है, स्टार प्रचारक होने के बावजूद वे अब … Read more

हरियाणा: जहां BJP कभी खाता तक नहीं खोल पायी, क्या वहां गोल कर पाएंगे संदीप सिंह

हरियाणा में विधानसभा चुनाव (Haryana Assembly Election-2019) की चौसर बिछ गई है और प्यादे भी अपनी-अपनी चाल चलने को तैयार हैं. हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों पर 21 तारीख को चुनाव होने हैं. चुनावों के बीच प्रदेश में कुरुक्षेत्र जिले की पेहोवा विधानसभा सीट की कहानी अपने आप में ही बहुत कुछ कहती है. इस सीट से भाजपा कभी भी चुनाव नहीं जीत पाई है. यहां साल 991 के बाद से या तो कांग्रेस या फिर क्षेत्रीय पार्टी इंडियन नेशनल लोक दल (INLD) का ही कब्जा रहा है. पिछले विधानसभा चुनाव में यहां इनोलो के जसविंदर सिंह संधू (Jaswinder singh sandhu) ने बीजेपी के जय भगवान शर्मा को 10 हजार … Read more

संसद के पिछले सत्र की तरह आसान नहीं होगा नागरिकता कानून (NRC) पास कराना

असम में NRC लागू होने के बाद 19 लाख लोग भारतीय नागरिकता से वंचित हो गए. हालांकि कुछ खामियां भी रही लेकिन ये दंश आसान नहीं. असम में NRC लागू होने के तुरंत बाद कई राज्यों में एनआरसी लागू करने की मांग उठ खड़ी हुई है. इनमें बीजेपी शासित प्रदेशों के साथ ऐसे भी प्रदेश हैं जहां कांग्रेस या अन्य सरकारें काबिज हैं. पंजाब, राजधानी दिल्ली, पं.बंगाल, उत्तर प्रदेश कुछ ऐसे ही राज्य हैं. हाल में कोलकाता में एक सभा को संबोधित करते हुए भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी कह चुके हैं कि घुसपैठियों को हर हाल में देश के बाहर निकाला जाएगा. माना ये भी जा रहा है कि संसद के अगले सत्र में नागरिकता कानून को आवश्यक रुप से लागू कराया जाएगा.

संसद के पिछले सत्र में पूरी उम्मीद थी कि केंद्र सरकार नागरिकता कानून बिल पेश करेगी लेकिन सरप्राइज देते हुए मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 पेश कर दिया और जम्मू कश्मीर में ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया. बहरहाल अब कहा जा रहा है कि नवंबर में होने वाले शीतकालीन सत्र में सरकार नया नागरिकता कानून पेश करेगी. हालांकि ये अभी तक नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी केंद्र सरकार को राज्यसभा में बहुमत हासिल नहीं है. उसके बाद भी मोदी 2.0 सरकार तीन तलाक और अनुच्छेद 370 व 35ए जैसे अहम बिल पास कराने में सफल हो गयी लेकिन नागरिकता कानून पास करा लेगी, इसमें काफी संयश है.

अमित शाह और हिमंता बिस्वा सरमा ताल ठोक कर कह चुके हैं कि नागरिकता कानून पास करेंगे और पाकिस्तान, बांग्लादेश से आए घुसपैठियों को देश से बाहर करेंगे लेकिन सरकार की कई सहयोगी पार्टियां खुद इस बिल का विरोध कर रही हैं. असम में सरकार की सहयोगी पार्टी असम गण परिषद ने तक इस बिल का विरोध किया है. वहां ये बात इतनी बढ़ गई है कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी अकेले जंग में उतरने का मन बना रही है. हालांकि वहां बीजेपी की सेहत को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला.

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भाजपा की दूसरी सहयोगी पार्टी जनता दल यूनाइटेड यानि बिहार में नितिश कुमार की जेडीयू भी इस बिल के खिलाफ है. नागरिकता बिल को अगर लोकसभा में पास कराना हो तो भाजपा को किसी भी सहयोगी पार्टी की जरूरत न होगी लेकिन राज्यसभा में उनके बिना काम नहीं चलेगा. जानकारों की माने तो कई सहयो​गी पार्टियों ने तीन तलाक और अनुच्छेद 370 व 35ए पर भी विरोध जताया था लेकिन विपक्ष की कई पार्टियों के प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन के चलते ये बिल पास हो गए.

इस बिल की सबसे अधिक मार पश्चिम बंगाल में पड़ने वाली है. यहां 2022 में विधानसभा चुनाव हैं और बंगाल में पड़ौस देश बांग्लादेशियों के ऐसे लोगों की भरमार है जो घुसपैठ कर सालों से वहां रह रहे हैं. बंगाल की शेरनी और टीएमसी प्रमुख मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बात को भली भांति जानती है कि अगर NRC लागू हुआ तो किसी भी सूरत में उनका स्थानीय सत्ता का मुखिया बनना संभव नहीं. ऐसे में वे अग्र पंक्ति में आकर इस बिल का विरोध कर रही हैं. इसके लिए ममता दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah) से मिलकर भी आई हैं लेकिन वहां से उन्हें कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला.

भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष की विचारधारा पर काम करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी यूपी में कथित घुसपैठियों की पहचान शुरू कर दी है. उत्तर प्रदेश और दिल्ली से सटे कुछ इलाकों में घुसपैठियों की संख्या बहुतायत में बताई जा रही है. यही वजह है कि दिल्ली भाजपा अध्यक्ष और बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने भी राजधानी में एनआरसी की मांग को तेज किया.

केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों के इस कदम से लोगों में खौफ भी है. वजह है कि असम में एनआरसी को सुप्रीम कोर्ट मॉनिटर कर रही थी. यहां जो कुछ भी हो रहा था, वो कानूनी प्रक्रिया के तहत हो रहा था. अब अन्य राज्यों में ऐसा हो, ये अभी तक साफ नहीं है. अभी तक की तस्वीर देखें तो उत्तर प्रदेश में ये अभियान पुलिस प्रशासन ने संभाल रखा है लेकिन उनकी निगरानी करने वाला कोई तंत्र नहीं है. न ही इसके लिए कोई नियम बनाया गया है. कुल मिलाकर पुलिस राज से सबको परेशान होने का खतरा दिख रहा है.

दो भाईयों की लड़ाई में कहीं शरद पवार के हाथ न लग जाए छीका

महाराष्ट्र (Maharastra) में विधानसभा चुनाव की तारीख तय हो चुकी है. यहां विधानसभा की 288 सीटों पर प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला 24 अक्टूबर को हो जाएगा. मतदान 21 अक्टूबर को होगा. पिछली बार की तरह इस बार भी यहां दो भाई आपस में सीटों की लड़ाई लड़ रहे हैं. इस बार लड़ाई पहले से गहरी है. यहां सत्ता का बंटवारा भी हो रहा है जिसके लिए बड़ा भाई तैयार तो छोटा भाई नाखुश है. महाराष्ट्र के ये दोनों भाई हैं शिवसेना और भाजपा. वि.स. चुनावों को अब कुछ ही दिन शेष हैं लेकिन दोनों के बीच सीट बंटवारे को लेकिन सहमति नहीं बन पायी. साथ ही शिवसेना सत्ता में … Read more

राहुल गांधी ने कहीं राजनीति से संन्यास तो नहीं ले लिया?

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) इन लंबे समय से सियासी पटल पर नजर नहीं आ रहे हैं. लोकसभा चुनाव में हार के बाद वे ऐसे गायब हुए जैसे ओस की बूंद रोशनी पड़ते ही गायब हो जाती है. लोकसभा में भी वे ज्यादा नहीं दिखे. हां, वे दो बार अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड जरूर गए थे और उसके बाद उनका नाम जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक (Satyapal Malik) से तीखी नोक-झोंक के चलते काफी उछला था. अब लंबे समय से वे कहीं भी नहीं दिख रहे. यहां तक की वे कांग्रेस पदाधिकारियों की बैठक तक में शामिल नहीं हुए. ऐसे में सत्ताधारी पक्ष तो छोडिए खुद की पार्टी तक में ये चर्चाएं गर्म है कि आखिर राहुल गांधी इन दिनों क्या कर रहे हैं? कहीं वे राजनीति की मोह माया से दूर होकर अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सत्य का ज्ञान करने तो नहीं पहुंच गए.

प्रश्न बड़ा सरल सा है लेकिन जवाब उतना ही कठिन. पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद उन्हें कांग्रेस कार्य समिति में बतौर सदस्य शामिल किया गया लेकिन कांग्रेस की अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) की बुलाई बैठक से भी राहुल गांधी नदारद रहे. यहां तक कि राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम सचिन पायलट के बीच सत्ता को लेकर चल रहे संकट में भी प्रियंका (Priyanka Gandhi) और सोनिया ने दोनों नेताओं से बात की जबकि इससे पहले राजस्थान (Rajasthan) और मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) व कमलनाथ (Kamalnath) के बीच राहुल गांधी ने ही सुलह कराई थी. लेकिन इस बार वे बीच में आए ही नहीं.

संसद का सत्र भी इस बार काफी लंबा चला लेकिन उसमें भी राहुल गांधी की भागीदारी कम रही. संसद में कांग्रेसी खेमा उनके अनुच्छेद 370 पर बोलने का इंतजार करता रहा लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी. यहां तक की नेता प्रतिपक्ष की सीट भी अधीर रंजन चौधरी (Adhir Ranjan Choudhary) को संभाला दी गई है.

अब हरियाणा (Haryana) और महाराष्ट्र (Maharastra) में विधानसभा चुनाव सहित अन्य 17 राज्यों की 64 सीटों पर उपचुनाव का बिगुल बज गया है. तारीखें तय हो चुकी हैं और आचार संहिता लागू हो गई है. नेताओं की दावेदारी भी शुरू हो गई है. चुनाव होने में अब सिर्फ कुछ दिन बचे हैं लेकिन यहां भी राहुल गांधी की कोई सक्रियता नहीं दिख रही. अगले कुछ महीनों में झारखंड और दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव होने हैं. आम तौर पर चुनाव से पहले ही राज्यों में नेताओं के दौरे शुरू हो जाते हैं. मोदी-शाह झारखंड और महाराष्ट्र में चुनावी रैलियां भी कर चुके हैं लेकिन पार्टी के स्टार प्रचारक होने के बावजूद राहुल गांधी अभी तक चुनावी माहौल से दूर हैं. यहां तक की राहुल गांधी सोशल मीडिया पर भी पहले की तरह एक्टिव नहीं हैं.

इस बात से भी सभी वाकिफ हैं कि खराब स्वास्थ्य की वजह से सोनिया गांधी प्रचार कार्यों में नहीं उतरेंगी. वहीं पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने अपने आपको उत्तर प्रदेश तक ही सीमित किया हुआ है. ऐसे में हरियाणा-महाराष्ट्र सहित अन्य दोनों राज्यों और उपचुनावों में प्रचार का मोर्चा राहुल गांधी को ही संभालना है. इसके बावजूद राहुल गांधी का कहीं कोई पता नहीं है. उनके न किसी राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल होने खबर आ रही है, न ही किसी राज्य पर दौरे की और न ही विदेश दौरों की कोई खबर आ रही है.

कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की इस मृतप्राय: सोच का फायदा सत्ताधारी पक्ष पूरी तरह से कैश कराने की जुगाड़ में लगा हुआ है. इन सभी बातों से बेखबर विपक्ष के नेताओं के साथ राहुल गांधी जम्मू कश्मीर दौरे से क्या लौटे, राजनीति के ‘मिस्टर इंडिया’ बन गए. हालांकि उन्हें जम्मू हवाई अडडे से ही वापिस लौटा दिया गया था. उड़ती-उड़ती खबर आ रही है कि महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर सोनिया-राहुल-प्रियंका पदयात्रा करने वाले हैं लेकिन इसकी अधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है.

अब हमारा प्रश्न फिर से वहीं आकर खड़ा हो गया है कि आखिर राहुल गांधी इन दिनों कर क्या रहे हैं? कांग्रेस के कई सीनियर नेताओं से संपर्क साधने का प्रयास हुआ लेकिन वहां से भी कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला. अब हमारे साथ-साथ कांग्रेस को भी इंतजार है कि आखिर कब टीम के कप्तान आकर मैदान पर खड़े होते हैं और अपनी फिल्डिंग सजाते हैं.

महाराष्ट्र-हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के हालात अलग-अलग

महाराष्ट्र (Maharastra) और हरियाणा (Haryana) में विधानसभा चुनावों की तारीख तय हो गयी है. महाराष्ट्र की 288 और हरियाणा की 90 सीटों पर 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव होने हैं. नतीजें 24 अक्टूबर को आएंगे. दोनों राज्यों में भाजपा की स्थिति तो पिछले बार की तरह काफी मजबूत है लेकिन कांग्रेस की दोनों प्रदेशों में स्थिति में जमीन-आसमान का फर्क है. हरियाणा में एक तरफ कांग्रेस के सभी दिग्गज, पूर्व विधायक और स्थानीय कार्यकर्ता तक चुनाव टिकट पाने की लाइन में लगे हुए हैं. वहीं दूसरी तरफ, महाराष्ट्र में कांग्रेस के पास एक इकलौती सीट को छोड़ 287 सीटों पर खड़े करने के लिए उम्मीदवार तक नहीं है.

सबसे पहले बात करें हरियाणा की तो यहां 90 सीटों पर विधानसभा चुनाव होने हैं. चुनावों की पूरी जिम्मेदारी प्रदेशाध्यक्ष कुमारी शैलजा और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथों में है. यहां हुड्डा अपने करियर की अंतिम पारी खेलने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते इसलिए एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं. चर्चा है पार्टी आलाकमान ऐसे तमाम नेताओं को चुनाव में उतारेगी जो जीत सकते हैं. इनमें लोकसभा का चुनाव लड़ चुके करीब-करीब सारे नेता विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं. कांग्रेस चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा इस बार सोनीपत से लोकसभा चुनाव हारे थे लेकिन विधानसभा चुनाव में उनका टिकट पक्का है. हालांकि वे वर्तमान विधायक हैं. उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा रोहतक लोकसभा सीट से मामूली अंतर से हारे थे. उनका भी टिकट फाइनल ही है.

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कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला कैथल सीट से चुनावी जंग में ताल ठोकेंगे. कांग्रेस विधायक दल की नेता रही किरण चौधरी भी चुनाव में उतरने को तैयार है. हरियाणा जनहित कांग्रेस का विलय कर कांग्रेस में शामिल हुए कुलदीप बिश्नोई और उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई सहित चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री के.अजय यादव का विधानसभा चुनाव में उतरना करीब-करीब पक्का है. कुल मिलाकर कहा जाए तो राज्यसभा सांसद और कांग्रेस की हरियाणा ईकाई की अध्यक्ष कुमारी शैलजा को छोड़ सारे बड़े पार्टी नेता विधानसभा चुनाव में उतर रहे हैं.

अब आते हैं महाराष्ट्र पर जहां कांग्रेस के पास उम्मीदवारों का टोटा ही पूर्ण संकट है. यहां पार्टी का कोई भी बड़ा नेता विधानसभा चुनाव लड़ने का इच्छुक नहीं है. इसकी वजह है कि यहां पार्टी के अधिकतर नेता दो बार से ज्यादा लोकसभा चुनाव हार चुके हैं. शरद पवार की पार्टी एनसीपी से गठजोड़ होने के बाद भी इनके जीतने की संभावना लगभग क्षीण है. गौर करने वाली बात ये है कि यहां चुनावों से पहले ही सोशल मीडिया पर भाजपा-शिवसेना एलायंस की जीत का माहौल है. ऐसे में कांग्रेस नेता चुनावी मैदान में उतरने से घबरा रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी के बड़े नेताओं का भाजपा या शिवसेना में शामिल होने से स्थिति और भी बदतर हो चली है.

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बहरहाल, कांग्रेस के पास जो बड़े नेता बचे हैं, उनमें से अशोक चव्हाण को छोड़ कोई भी चुनाव लड़ने को राजी नहीं. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण तक चुनाव नहीं लड़ना चाहते. दिग्गज़ नेता सुशील शिंदे, पूर्व सांसद राजीव सातव भी इस दंगल से बचते फिर रहे हैं. आलाकमान पूर्व सांसद रह चुके रजनी पाटिल, मिलिंद देवड़ा, संजय निरूपम और प्रिया दत्त को महाराष्ट्र चुनाव में उतारना चाहता है लेकिन इनमें से कोई भी आगे नहीं आना चाहता. कांग्रेस की इस फटे हाल हालत को देखते हुए सियासी गलियारों में ये मैसेज पहले से ही पहुंच गया है कि प्रदेश में कांग्रेस ने जंग से पहले ही हथियार डाल हार मान ली. ये स्थिति कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी, महासचिव प्रियंका गांधी और पूर्व पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए संकट की घड़ी साबित हो रही है.

महाराष्ट्र: ‘क्या सच में भारत-पाक के बंटवारे से भी मुश्किल है भाजपा-शिवसेना गठबंधन’

Pressure politics

महाराष्ट्र (Maharastra) में होने वाले विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा हो चुकी है. 288 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले चुनावों में 21 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे और 24 अक्टूबर को नतीजे घोषित होंगे. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और एनसीपी ने गठबंधन कर सीटें आपस में बांट ली है. दोनों ने 125-125 सीटों पर सहमति बना अन्य 38 सीटें अन्य सहयोगी पार्टियों के लिए छोड़ दी. भाजपा सत्ताधारी पार्टी है और शिवसेना सहयोगी पार्टी, इसके बावजूद दोनों में सीटों के बंटवारे का मंथन समुद्र-मंथन से भी मुश्किल लग रहा है. पार्टी के एक नेता ने तो गठबंधन पर यहां तक कहा है कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना (BJP-Shiv Sena Alliance) के बीच महज 288 सीटों का बंटवारा करना भारत-पाक के बंटवारे से भी मुश्किल फैसला लग रहा है.

ये बयान दिया है शिवसेना नेता संजय राउत (Sanjay Raut-Shiv Sena) ने जो सीट बंटवारे से जुड़ी परेशानियों से भली-भांति परिचित हैं. राउत ने कहा, ‘इतना बड़ा महाराष्ट्र है लेकिन ये जो 288 सीटों का बंटवारा है, ये भारत पाकिस्तान के बंटवारे से भी भयंकर है. यदि हम सरकार में होने के बजाय विपक्ष में होते तो तस्वीर दूसरी होती.’ उन्होंने ये भी कहा कि फिलहाल इस बारे में मंथन चल रहा है लेकिन सीटों के बंटवारे पर जो भी फैसला होगा, उसे तुरंत मीडिया को बताया जाएगा.

वैसे महाराष्ट्र की आंतरिक राजनीति को देखा जाए तो राउत के इस बयान से इत्तफाक रखा जा सकता है. विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे का ये विवाद अभी का नहीं बल्कि लोकसभा चुनावों से भी पहले का है. लोकसभा चुनावों में भाजपा और शिवसेना चाहें एक साथ चुनावी जंग लड़ रही थी लेकिन शिवसेना अपने मुखपत्र ‘सामना’ के जरिए लगातार भाजपा और उनकी नीतियों पर हमला कर रही थी. महाराष्ट्र में भाजपा सत्ताधारी पार्टी है और पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने शिवसेना सहित कांग्रेस और एनसीपी तीनों को एक साथ पटखनी देते हुए 288 में से 122 सीटों पर कब्जा कर लिया. शिवसेना भाजपा की आधी सीटों तक ही पहुंच सकी और 63 पर सिमट गयी. कांग्रेस को 42 और एनसीपी को 41 सीटें मिली.

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लोकसभा चुनाव 2019 में दोनों पार्टियों ने 25-23 के अंतर से चुनाव लड़ा और कुल 41 सीटों पर कब्जा किया. उसके बाद से शिवसेना बीजेपी से 144-144 सीटों पर हक मांगने लगी. सियासी गलियारों में इस खबर से भी बाजार गर्म रहा कि शिवसेना चुनाव जीतने की स्थिति में ढाई-ढाई साल दोनों पार्टियों के मुख्यमंत्री बिठाने के जुगाड़ में है. हालांकि भाजपा ने इस बात पर कभी मुहर नहीं लगाई. इसके बाद शिवसेना ने आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री प्रत्याशी बताना शुरू कर दिया और प्रचार भी उसी तरह से हुआ.

हाल में एक मीडिया कार्यक्रम में महाराष्ट्र के भाजपायी मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने मुख्यमंत्री पद किसी को देने और सांझा करने से साफ इंकार कर दिया. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि गठबंधन की स्थिति में शिवसेना चाहे तो डिप्टी सीएम बना सकती है. लेकिन हमारी बात अभी भी वहीं अटकी है…भाजपा-शिवसेना के बीच सीटों का बंटवारा.

उद्दव ठाकरे ने बीच का रास्ता निकालते हुए भाजपा से 150-130 के अनुसार सीट बांटने के बारे में बात की लेकिन भाजपा ​अपने सहयोगी को केवल 110 सीटों पर निपटाना चाहती है. अपने ठस से मस न होने की वजह ये भी है कि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव-2014 में भाजपा ने अकेले अपने दम पर तीनों विपक्षी पक्षों को धूल चटाई थी. हालांकि सरकार शिवसेना से गठजोड़ करके ही बनाई लेकिन शिवसेना को हमेशा ये बात याद रही कि भाजपा की सरकार केवल और केवल शिवसेना के सहयोग से बन पायी है.

अब इन चुनावों में भी शिवसेना इस बात का अहसास भाजपा को करा रही है कि अकेले दम पर वो प्रदेश में सरकार नहीं बना सकती और उन्हें शिवसेना के साथ की जरूरत है. हालांकि कहीं न कहीं शिवसेना को इस बात का अहसास भी है कि वो खुद भी आदित्य ठाकरे के नेतृत्व में कांग्रेस, एनसीपी के साथ मोदी आंधी का सामना नहीं कर पाएंगे. ठीक ऐसा ही इल्म भाजपा को भी है कि तीन पुरानी पार्टियों को अकेले टक्कर दे पाना बिना किसी सहारे के पहाड़ चढ़ने जैसा है. यही वजह है कि शिवसेना के इतने आघातों के बाद भी भाजपा गठबंधन के लिए पूरी तरह से तैयार है.

बड़ी खबर: नहीं बन पाई सहमति, शायद अब शिवसेना की जरूरत नहीं बीजेपी को

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने तो करोड़ों लोगों की आवाजों पर अपने कान बंद करते हुए आजाद भारत के सीने पर एक लाल लकीर खींचते हुए हिंदूस्तान-पाकिस्तान बना दिया लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का ये अटूट बंधन बंधा रहेगा या टूट जाएंगा, जल्दी ही मोदी-शाह बिग्रेड इससे पर्दा उठा देगी.

‘राहुल गांधी की कप्तानी जाते ही टीम के प्लेयर्स किए जा रहे रिटायर्ड हर्ट’

कहते हैं टीम का पूरा भार कप्तान के कंधों पर टिका रहा है. अगर कप्तान आउट हो जाए तो टीम का संभल पाना मुश्किल होता है. वर्तमान में कांग्रेस के भीतरी हालात और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पर ये कहावत एकदम सटीक बैठती है. राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा क्या दिया, उनके करीबी माने जाने वाले तकरीबन सभी नेताओं पर गाज गिरने लगी है. उनकी जी हजुरी करने वाले सभी नेताओं को प्रमुख पदों से हटाया जा रहा है. चूंकि अब सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बन गयी हैं, ऐसे में अब राहुल की टीम के खिलाड़ियों को रिटायर कर नयी ​टीम बनायी जा रही है. कुमारी शैलजा (Kumari Selja) को हरियाणा का प्रदेशाध्यक्ष बना इसकी शुरुआत भी हो चुकी है.

लोकसभा चुनाव-2019 में पार्टी की हुई बुरी गत की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए जब राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश की थी, तभी राहुल गांधी के करीबियों में कुर्सी खिसकने का भय घर कर गया था. यही वजह है कि पार्टी के सीनियर नेताओं के साथ यूथ कांग्रेस और अन्य नेताओं ने राहुल गांधी से इस्तीफा वापिस लेने की गुहार लगायी. यहां तक की कई राज्यों की प्रदेश कमेटियों ने तो उनके इस्तीफे की पेशकश को ही ठुकरा दिया लेकिन राहुल गांधी अपने फैसले पर अड़े रहे. नतीजा, आखिरकार सोनिया गांधी को ही कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान संभालनी पड़ी.

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अब टीम का कप्तान नया और अनुभवी है तो टीम तो नए सिरे से चुननी ही थी. ऐसे में राहुल गांधी के सिपेहसालार खिलाड़ी एक-एक कर बाहर होने लगे या फिर यूं कहें, बाहर किए जाने लगे. पार्टी के युवराज के त्यागपत्र देते ही कुछ ने अपने आप ही इस्तीफे दे दिए और कुछ के इस्तीफे रखवा लिए गए. सोनिया के कमान संभालते ही राहुल के बेहद करीबी माने जाने वाले हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर (Ashok Tanwar) को हटा सोनिया की खास कुमारी शैलजा को उनका स्थान दिया गया. इससे पहले हरियाणा में लोकसभा चुनाव में करारी शिखस्त के बाद भी तंवर ने इस्तीफा देने से सीधे सीधे मना कर दिया था. राहुल गांधी की शह पर ही तंवर पिछले 6 साल से अपने पद पर बने हुए थे. अपने संबंधों के चलते राहुल गांधी खुद चाहते हुए भी इस बारे में कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे.

वहीं मुंबई क्षेत्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंग देवड़ा (Milling Deora) और दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन (Ajay Maken) ने राहुल गांधी के समर्थन में इस्तीफा पार्टी कमान को भेजा था, जिसे अब सोनिया गांधी ने मंजूर कर लिया है. अब देवड़ा की जगह एकनाथ गायकवाड़ को मुंबई क्षेत्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया है. वहीं राहुल गांधी के कार्यकाल में डॉ. अजय कुमार (Dr.Ajoy Kumar) को झारखंड का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था, उन्हें भी अपने पद से हटा दिया गया है. गुजरात की टीम में भी बदलाव के कयास हैं जहां राहुल के करीबी राजीव सातव (Rajeev Satava) प्रभारी हैं.

जिस तरह से एक-एक करके राहुल गांधी के करीबी नेताओं की छुट्टी हो रही है, उससे तो यही कयास लगाए जा रहे हैं कि इन सभी पदों पर सोनिया गांधी के खास लोगों की नियुक्ति की जाएगी. अब चूंकि कांग्रेस वर्किंग कमेटी में राहुल गांधी की एंट्री हो गयी है, ऐसे में उम्मीद तो ये भी जताई जा रही है कि राहुल अपनी टीम का साथ यूं तो नहीं छोड़ेंगे. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इन सभी नेताओं को बाद में एडजस्ट कर दिया जाएगा. मिलिंद देवड़ा, अजय माकन और डॉ.अजय कुमार को राहुल गांधी के कहने पर राष्ट्रीय टीम में जगह मिल सकती है. वहीं ज्योतिरादियत्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) को राष्ट्रीय टीम से निकाल मध्यप्रदेश भेजे जाने की संभावना है.

इतनी हड़बड़ी में क्यों मोदी 2.0? 100 दिन से पहले लिए कई बड़े फैसले

इसी हफ्ते मोदी सरकार के वर्तमान कार्यकाल को 100 दिन पूरे होने वाले हैं. लेकिन इस छोटे से अंतराल में मोदी 2.0 ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल, धारा 370 और 35ए, तीन तलाक, मोटर वाहन संशोधन विधेयक मोटर व्हीकल एक्ट, ट्रांसजेंडर बिल, नेशनल मेडिकल कमिशन बिल और RTI संशोधन, UAPA जैसे भारी भरकम बिल पहले सत्र में, एक ही महीने में दोनों सदनों से वास करवाकर लागू भी कर दिये. आखिर इतनी हड़बड़ी में क्यों है मोदी 2.0 सरकार..?

नरेंद्र मोदी की पॉपुलर्टी युवाओं में तेजी से बढ़ने का नतीजा ये है कि पिछली बार की तुलना में इस बार मोदी सरकार भारी बहुमत से केंद्र में सत्ता पर काबिल हुई. लेकिन पिछली बार और इस बार के मोदी सरकार के कार्यों में एक सबसे बड़ी असमानता जो दिख रही है, वो है काम करने में जल्दबाजी. सरकार बनने के तीन महीनों में ही मोदी सरकार और मंत्रीमंडल ने कई क्रांतिकारी फैसले लेकर सभी को चौंका दिया. हालांकि ये सभी कार्य जनता के लिए काफी अच्छे हैं लेकिन राजनीतिज्ञ विशेषज्ञ इस बात से जरूर हैरान हैं कि आखिर क्या वजह है कि मोदी सरकार अपने सभी फॉर्मूलों को जल्दी से जल्दी लॉन्च करना चाह रही है, आखिर ये हड़बड़ी क्यों?

गौरतलब है कि सबसे मुश्किल समझा जाने वाला जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल को धारा 370 और 35ए को हटाते हुए वर्तमान मोदी सरकार ने दोनों सदनों में एक तरफा वोटों से लागू कराने में सफलता हासिल की. वहीं तीन तलाक, मोटर वाहन संशोधन विधेयक मोटर व्हीकल एक्ट, ट्रांसजेंडर बिल, नेशनल मेडिकल कमिशन बिल और आरटीआई संशोधन, UAPA जैसे भारी भरकम बिल पहले सत्र में, एक ही महीने में दोनों सदनों से पास करवाकर लागू भी कर दिये. लेकिन अभी भी वही सवाल अपने उत्तर का इंतजार कर रहा है कि आखिर बीजेपी सरकार को ये सभी फैसले करने की इतनी जल्दी क्यों? क्योंकि सरकार बहुमत के साथ सत्ता में आयी है इसलिए डूबने का तो खतरा है नहीं फिर क्यों…?

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वजह है भारत की लगातार गिरती अर्थव्यवस्था (Indian Economy), आर्थिक मंदी वर्तमान सरकार के सामने सबसे बड़ा चेलेंज है. पिछले एक साल में भारत की जीडीपी 8 फीसदी से घटकर 5 फीसदी आ चुकी है. ये तो वो आकंड़े हैं जो कागजों में दिखते हुए हैं, जानकार बताते हैं कि एक्चुअल में GDP 3 फीसदी पर आ चुकी है (लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है). जबकि वर्ष की पहली तिमाही में ग्रोथ 0.8 फीसदी घटी है. इसकी वजह है कि नोटंबदी के बाद हजारों की संख्या में कारोबार बंद हो गए और लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं.

बता दें, वर्तमान में बेरोजगारी (Unemployment) इतनी ज्यादा बढ़ गयी है, जितनी पिछले 70 साल में कभी नहीं बढ़ी. एक रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा समय में करीब डेढ़ करोड़ लोग बेरोजगार होकर घर बैठे हैं. ऑटो उद्योग में साढ़े तीन लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं. आने वाले तीन सालों में ये संख्या 10 लाख तक जा सकती है. लाखों की संख्या में चमचमाती गाड़ियां शोरूम में खड़ी हैं लेकिन खरीदार नहीं हैं. ऐसे में पार्ट्स बनाने वाली कंपनियों के ताले लगने की नौबत आ गयी है. रिसेल कार बाजार की हालत भी कुछ खास अच्छी नहीं है.

देश की सबसे बड़ी बिस्किट कंपनी पार्ले ने 10 हजार कर्मचारियों की छटनी की है. मीडिया सेक्टर से कर्मचारियों की छटनी बदस्तूर जारी है. अन्य सेक्टर्स की स्थिति भी जुदा नहीं है. वहीं एक बड़ा तबका वो भी है जो हाई सैलेरी से नीचे गिरकर प्राइमरी वेतन पर काम करने के लिए मजबूर है.

दूसरी ओर, भवन निर्माण उद्योग (प्रोपर्टी सेक्टर) करीब-करीब दीवालिया होने की कगार पर है. लाखों की संख्या में फ्लैट अपने खरीदारों का इंतजार करते हुए जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं. इनमें हाउसिंग बोर्ड, सरकारी और प्राइवेट सभी श्रेणी के घर शामिल हैं. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री योजना के चलते सब्सिडी मिलने के बावजूद बिक्री के आंकड़े तेजी से नीचे गिर रहे हैं. मार्केट में घरेलू वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं और महंगाई अपने चरम पर है.

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नोटबंदी (Demonetization) के बाद लचर-पचर हालत में लागू की गयी GST ने व्यापारियों के घुटने ही तोड़ दिए जिसका असर सीधे-सीधे मजदूरों पर पड़ा. इससे लोगों और कारोबारियों को फायदा तो कम हुआ, नुकसान दो-तीन गुना हो गया. बैंकों का अरबों-खरबों रुपया कर्जदारों की मिली भगत के चलते डूब गया.

अब सरकार इस आर्थिक मंदी की मार पर से ध्यान हटाने के लिए ये सभी काम जल्दी जल्दी कर रही है. वजह है कि जिस तरह का माहौल चल रहा है, सरकार इस स्थिति को लंबे वक्त तक संभाल नहीं पाएगी. इसलिए सरकार बीच बीच में कश्मीर का पूर्ण विलय और बालाकोट जैसी राजनीतिक घटनाओं का सहारा ले रही है ताकि अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए समय तो मिल सके, साथ ही जनता का ध्यान भी भटकता रहे. अगर ऐसा नहीं हुआ तो ज्यों ही बेरोजगारी और महंगाई और बढ़ी, सारे देश में हा-हाकार मचना शुरू हो जाएगा. उसके बाद जनता की आवाज विपक्ष की आवाज बन सदन में गूंजेगी और सरकार सत्ता में रहते हुए भी जनता का विश्वास खो देगी. अगर ऐसा हुआ तो ज्यादा समय नहीं बीतेगा और सफलता के घोड़े पर सवार बीजेपी की हालात मौजूदा कांग्रेस की तरह हो जाएगा और पांच खरब की अर्थ व्यवस्था का सपना देखने वाली सरकार को सारी ताकत खुद को बचाने में खर्च करनी पड़ेगी.

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तेजी से नीचे गिरती भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) को संभालने और पटरी पर लाने के लिए ही सरकार भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से 1.7 लाख रुपये ले रही है ताकि ये गिरावट थम सके. इस फंड में से 70 हजार करोड़ बैंकों को दिए जाएंगे ताकि लोगों को आसानी से लोन दिया जा सके. वहीं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण (FM Nirmala Sitharaman) ऐसी घोषणाएं भी लागू करने जा रही हैं जिनसे भारत में विदेशी विनियोग में आसानी हो. गन्ना किसानों को 6 हजार करोड़ रुपये की सहायता देने की कोशिश हो रही है. वहीं 75 नए मेडिकल कॉलेज खोलना तय हुआ है. भवन निर्माण और आयकर में भी रियायतों का पिटारा खोलने की तैयारी हो रही है.

देश के प्रमुख अर्थशास्त्री (Economist) सरकार को नई आर्थिक नीति बनाने की सलाह दे रहे हैं ताकि अर्थव्यवस्था (Indian Economy) को मजबूत बनाने के लिए साहसिक कदम उठाए जा सकें. माना जा रहा है कि सितम्बर महीने के पूरे दो हफ्ते केवल अर्थव्यवस्था के नाम किए जाएंगे ताकि जनता की सुगबुगाहट को सुलगने से समय रहते रोका जा सके. अगर जल्दी ही ऐसा न हुआ तो भारत सबसे ज्यादा युवाओं का देश तो होगा लेकिन वो केवल बेरोजगारी (Unemployment) की फौज से ज्यादा कुछ नहीं होगी.

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छात्रसंघ चुनाव राजस्थान विश्वविद्यालय में छात्रसंघ का चुनाव प्रचार थम चुका है. चुनाव मंगलवार, 27 अगस्त को हैं. परिणाम अगले दिन यानि 28 अगस्त को घोषित किए जाएंगे. राजस्थान यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ अध्यक्ष के लिए 5 दावेदार मैदान में हैं. इनमें एनएसयूआई ने उत्तम चौधरी को और एबीवीपी ने अमित कुमार बड़बड़वाल को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बनाया है. एनएसयूआई के बागी मुकेश चौधरी और पूजा वर्मा भी मैदान में हैं, वहीं मनजीत बड़सरा निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपना भाग्य आजमा रहे हैं. इस बार के छात्रसंघ चुनावों में एक खास बात ये भी है कि अध्यक्ष पद के 5 दावेदारों में पूजा वर्मा एकलौती महिला उम्मीदवार हैं. अगर … Read more