कांग्रेस ने 20 साल तो लेफ्ट ने 34 साल बंगाल पर किया राज, उसके बाद सत्ता से दूर, कांग्रेस 50 सालों से सत्ता वापसी तो बीजेपी नई पारी खेलने का कर रही इंतजार
पश्चिम बंगाल की सामाजिक संरचना देश में सबसे अलग है और यही वजह राजनीतिक पार्टियों के उदय और अस्त होने की वजह बना. इसका ताजा उदाहरण ये है कि देश की आजादी के पश्चात देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल पर दो दशक तक राज किया. इसके बाद स्थानीय वाम दलों की सरकार ने 34 साल सियासत खेली और अब तृणमूल कांग्रेस की ममता सरकार ने सत्ता की गद्दी की बागड़ौर संभाली. पश्चिम बंगाल की राजनीति में ये भी एक रोचक संयोग है कि जो भी यहां सत्ता से एक बार बाहर हुआ, वो कभी लौटकर सत्ता अधिग्रहण नहीं कर सका. कांग्रेस भी पिछले 50 सालों से सत्ता वापसी की राह तक रही है लेकिन आलम ये है कि कांग्रेस विपक्ष छोड़िए, विधानसभा की एक सीट तक बचा पाने में विफल रही है.
यह भी पढ़ें: वसुंधरा राजे का यू-टर्न: कहा- बातों का अलग अर्थ निकालने वाले सफल नहीं होते
50 सालों से कांग्रेस को वापसी का इंतजार
वर्ष 1947 में देश के बंटवारे के साथ बंगाल का भी विभाजन हो गया. भारत को पश्चिम बंगाल मिला और पूर्वी बंगाल पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में चला गया. तब बंगाल का 67% हिस्सा पाकिस्तान को और 37% हिस्सा भारत को मिला था. 1952 में पहली बार पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए. 238 में से 150 सीटें कांग्रेस ने जीत ली. सीपीआई वाले लेफ्ट फ्रंट को 41 और जनसंघ वाले राइट ब्लॉक को 13 सीट मिलीं. पीएम जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी के पर्सनल डॉक्टर रहे बिधान चंद्र रॉय मुख्यमंत्री बने.
पश्चिम बंगाल में लगातार 20 साल और कुल 25 साल कांग्रेस सरकार में रही, लेकिन 1977 के बाद वो अपना सीएम नहीं बना पाई. उसके बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में लेफ्ट ने 294 में से 231 सीटें जीत कांग्रेस को सत्ता से बहुत दूर कर दिया. सके बाद लेफ्ट ने 34 साल तक सत्ता में रहकर संगठन को इतना मजबूत कर लिया कि कांग्रेस के लिए दोबारा उठना लगभग असंभव हो गया.
यह भी पढ़ें: बंगाल चुनाव: हिंन्दुओं के अस्तित्व की अंतिम लड़ाई या सियासी ध्रुवीकरण?
साल 1998 में ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस पार्टी का निर्माण किया और 2014 में देशभर में मोदी आंधी के बावजूद ममता ने बंगाल में सरकार बनायी और तब से अब तक उन्होंने हार का सामना नहीं किया. मौजूदा समय में बीजेपी प्रमुख विपक्षी पार्टी बनकर विधानसभा में विराजमान है.
जो एक बार गया, फिर नहीं लौटा
आंकड़ों पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि बंगाल के लोगों का जब एक बार किसी से मन भर जाता है, फिर वो उसे हमेशा के लिए खारिज कर देते हैं. 1972 के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो एक बात स्पष्ट है कि जो भी पार्टी सत्ता से बाहर गयी है, वो फिर कभी नहीं लौटी. बीते 50 सालों से कांग्रेस और 15 सालों से लेफ्ट को सत्ता वापसी का इंतजार है, जबकि बीजेपी को पहली बार सत्ता की बागड़ौर तय करनी है.
यह भी पढ़ें: भवानीपुर बना कुरुक्षेत्र! ‘दीदी’ की साख vs सुवेंदु की धाक-कौन पड़ेगा किस पर भारी?
चेहरे पर होता है पश्चिम बंगाल का चुनाव
पश्चिम बंगाल की बांग्ला संस्कृति कुछ इस तरह की है कि यहां चुनाव राष्ट्रीय नेतृत्व पर नहीं, बल्कि स्थानीय चेहरों पर होता है. बंगाल में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों पॉपुलर हैं जबकि पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भी अच्छी पैठ है लेकिन चुनाव यहां ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के चेहरों पर लड़ा जा रहा है. कांग्रेस के पास इस बार भी कोई बड़ा चेहरा नहीं है. यही वजह रही कि 2021 विधानसभा में कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ गठबंधन किया था और 92 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन खाता तक नहीं खुल सका. इस बार राज्य की सभी सीटों पर कांग्रेस अकेले लड़ रही है लेकिन मुकाबले से बाहर मानी जा रही है. अब देखना ये है कि पश्चिम बंगाल की जनता ममता बनर्जी के साथ जाती है या सुवेंद्र अधिकारी के. दोनों के बीच मुकाबला भी रोचक होना तय है.










