शरद पवार के खिलाफ ईडी की जांच से महाराष्ट्र में राजनीतिक तूफान

महाराष्ट्र (Maharastra) में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक घोटाले में मनी लांड्रिंग की जांच शुरू कर दी है, जिसमें NCP प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar), उनके भतीजे अजित पवार, राकांपा नेता ईश्वरलाल जैन, शिवाजीराव नलावडे, कांग्रेस नेता मदन पाटिल, दिलीपराव देशमुख, शिवसेना नेता आनंदराव अडसुल सहित 75 लोगों के नाम हैं. मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने इस संबंध में एफआईआर दर्ज की थी. उसी के आधार पर ईडी ने सोमवार को इन्फोर्समेंट केस इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज करते हुए प्रारंभिक जांच शुरू की है. यह मामला 2007 से 2011 के दौरान महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव (एमएससी) बैंक में हुए करीब 1000 करोड़ रुपए के घोटाले से … Read more

वीडियो खबर: राजस्थान विधानसभा उपचुनाव में खींवसर बनी हॉट सीट

राजस्थान (Rajasthan) की खींवसर (Khivansar) और मंडावा (Mandawa) सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव (Assembly By Election) की तारीख का ऐलान हो चुका है. अब सभी की नजरें उम्मीदवारों के नामों की घोषणा पर टिक गई हैं. टिकट के दावेदार उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं के पास लॉबिंग शुरू कर दी है. इसी कड़ी में खींवसर सीट के लिए रालोपा से सम्भावित उम्मीदवार हनुमान बेनीवाल (Hanuman Beniwal) के छोटे भाई नारायण बेनीवाल (Narayan Beniwal) भी क्षेत्र में बहुत सक्रिय हो गए हैं.

वीडियो खबर: खींवसर में जीत की हैट्रिक लगा चुके बेनीवाल से कैसे पार पाएगी कांग्रेस

राजस्थान (Rajasthan) की खींवसर और मंडावा (Mandawa) सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव की तारीख का ऐलान हो चुका है. सभी की नजरें उम्मीदवारों के नामों की घोषणा पर टिक गई हैं. उपचुनाव में खींवसर सीट को हॉट सीट माना जा रहा है. पिछले तीन विधानसभा चुनावों में जीत की हैट्रिक लगा चुके हनुमान बेनीवाल (Hanuman Beniwal) के नागौर से लोकसभा सांसद चुने जाने से खींवसर सीट खाली हुई है. यहां बेनीवाल से पार पाना BJP और Congress दोनों के लिए ही टेड़ी खीर साबित होने वाला है.

महाराष्ट्र-हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के हालात अलग-अलग

महाराष्ट्र (Maharastra) और हरियाणा (Haryana) में विधानसभा चुनावों की तारीख तय हो गयी है. महाराष्ट्र की 288 और हरियाणा की 90 सीटों पर 21 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव होने हैं. नतीजें 24 अक्टूबर को आएंगे. दोनों राज्यों में भाजपा की स्थिति तो पिछले बार की तरह काफी मजबूत है लेकिन कांग्रेस की दोनों प्रदेशों में स्थिति में जमीन-आसमान का फर्क है. हरियाणा में एक तरफ कांग्रेस के सभी दिग्गज, पूर्व विधायक और स्थानीय कार्यकर्ता तक चुनाव टिकट पाने की लाइन में लगे हुए हैं. वहीं दूसरी तरफ, महाराष्ट्र में कांग्रेस के पास एक इकलौती सीट को छोड़ 287 सीटों पर खड़े करने के लिए उम्मीदवार तक नहीं है.

सबसे पहले बात करें हरियाणा की तो यहां 90 सीटों पर विधानसभा चुनाव होने हैं. चुनावों की पूरी जिम्मेदारी प्रदेशाध्यक्ष कुमारी शैलजा और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथों में है. यहां हुड्डा अपने करियर की अंतिम पारी खेलने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते इसलिए एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं. चर्चा है पार्टी आलाकमान ऐसे तमाम नेताओं को चुनाव में उतारेगी जो जीत सकते हैं. इनमें लोकसभा का चुनाव लड़ चुके करीब-करीब सारे नेता विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं. कांग्रेस चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा इस बार सोनीपत से लोकसभा चुनाव हारे थे लेकिन विधानसभा चुनाव में उनका टिकट पक्का है. हालांकि वे वर्तमान विधायक हैं. उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा रोहतक लोकसभा सीट से मामूली अंतर से हारे थे. उनका भी टिकट फाइनल ही है.

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कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला कैथल सीट से चुनावी जंग में ताल ठोकेंगे. कांग्रेस विधायक दल की नेता रही किरण चौधरी भी चुनाव में उतरने को तैयार है. हरियाणा जनहित कांग्रेस का विलय कर कांग्रेस में शामिल हुए कुलदीप बिश्नोई और उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई सहित चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री के.अजय यादव का विधानसभा चुनाव में उतरना करीब-करीब पक्का है. कुल मिलाकर कहा जाए तो राज्यसभा सांसद और कांग्रेस की हरियाणा ईकाई की अध्यक्ष कुमारी शैलजा को छोड़ सारे बड़े पार्टी नेता विधानसभा चुनाव में उतर रहे हैं.

अब आते हैं महाराष्ट्र पर जहां कांग्रेस के पास उम्मीदवारों का टोटा ही पूर्ण संकट है. यहां पार्टी का कोई भी बड़ा नेता विधानसभा चुनाव लड़ने का इच्छुक नहीं है. इसकी वजह है कि यहां पार्टी के अधिकतर नेता दो बार से ज्यादा लोकसभा चुनाव हार चुके हैं. शरद पवार की पार्टी एनसीपी से गठजोड़ होने के बाद भी इनके जीतने की संभावना लगभग क्षीण है. गौर करने वाली बात ये है कि यहां चुनावों से पहले ही सोशल मीडिया पर भाजपा-शिवसेना एलायंस की जीत का माहौल है. ऐसे में कांग्रेस नेता चुनावी मैदान में उतरने से घबरा रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी के बड़े नेताओं का भाजपा या शिवसेना में शामिल होने से स्थिति और भी बदतर हो चली है.

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बहरहाल, कांग्रेस के पास जो बड़े नेता बचे हैं, उनमें से अशोक चव्हाण को छोड़ कोई भी चुनाव लड़ने को राजी नहीं. महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण तक चुनाव नहीं लड़ना चाहते. दिग्गज़ नेता सुशील शिंदे, पूर्व सांसद राजीव सातव भी इस दंगल से बचते फिर रहे हैं. आलाकमान पूर्व सांसद रह चुके रजनी पाटिल, मिलिंद देवड़ा, संजय निरूपम और प्रिया दत्त को महाराष्ट्र चुनाव में उतारना चाहता है लेकिन इनमें से कोई भी आगे नहीं आना चाहता. कांग्रेस की इस फटे हाल हालत को देखते हुए सियासी गलियारों में ये मैसेज पहले से ही पहुंच गया है कि प्रदेश में कांग्रेस ने जंग से पहले ही हथियार डाल हार मान ली. ये स्थिति कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी, महासचिव प्रियंका गांधी और पूर्व पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए संकट की घड़ी साबित हो रही है.

खींवसर सीट पर नारायण बेनीवाल की तगड़ी दावेदारी, समर्थक देने लगे अग्रिम बधाई

राजस्थान (Rajasthan) की खींवसर और मंडावा (Mandawa) सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव की तारीख का ऐलान हो चुका है. 21 अक्टूबर चुनाव की तारीख घोषित होते ही दोनों सीटों पर राजनीतिक हलचल अचानक से से बहुत तेज हो गई है. अब सभी की नजरें उम्मीदवारों के नामों की घोषणा पर टिक गई हैं. टिकट के दावेदार उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं के पास लॉबिंग शुरू कर दी है. इसी कड़ी में खींवसर सीट के लिए रालोपा से सम्भावित उम्मीदवार हनुमान बेनीवाल के छोटे भाई नारायण बेनीवाल भी क्षेत्र में बहुत सक्रिय हो गए हैं.

पिछले तीन विधानसभा चुनावों में लगातार जीत की हैट्रिक लगा चुके हनुमान बेनीवाल के नागौर से लोकसभा सांसद चुने जाने से खींवसर सीट पर उपचुनाव होगा. राजस्थान में जाट लैंड मानी जाने वाली मंडावा और खींवसर सीटों पर होने वाले उपचुनाव में खींवसर सीट को हॉट सीट माना जा रहा है. लोकसभा में बना RLP और BJP का गठबंधन इस विधानसभा उपचुनाव में भी बना रहेगा या नहीं, इसको लेकर राजीनतिक क्षेत्रों में सबसे ज्यादा चर्चा है.

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खींवसर सीट से RLP के उम्मीदवार के चुनावी मैदान में उतरने की पूरी संभावना है और RLP से उम्मीदवार सांसद हनुमान बेनीवाल (Hanuman Beniwal) ही तय करेंगे. ऐसे में स्थानीय हलकों में नारायण बेनीवाल को उम्मीदवार बनाये जाने की चर्चाएं जबरदस्त हैं. हालांकि कई ओर भी उम्मीदवार खींवसर से विधायक बनने की मंशा पाले हुए हैं. बीजेपी के कई नेता और कार्यकर्ता इस बात पर अड़े हुए हैं कि लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जब आरएलपी के लिए पूरी सीट छोड़ दी तो अब खींवसर में आरएलपी को भाजपा के लिए सीट छोडऩी चाहिए.

बता दें, सोमवार को ही आरएलपी के राष्ट्रीय संयोजक और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि उपचुनाव को लेकर उनकी पहले ही भाजपा नेताओं से बात हो चुकी है. राजस्थान की मंडावा सीट पर भाजपा और खींवसर सीट पर आरएलपी चुनाव लड़ेगी. हालांकि अंतिम निर्णय भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से चर्चा के बाद लिया जाएगा. हनुमान बेनीवाल के इस बयान के बाद आरएलपी समर्थक नारायण बेनीवाल को खींवसर विधानसभा के नये विधायक के रूप में देख रहे हैं.

सांसद हुनमान बेनीवाल के छोटे भाई नारायण बेनीवाल (Narayan Beniwal) फिलहाल खींवसर क्षेत्र के क्रय-विक्रय सहकारी समिति के अध्यक्ष हैं. नारायण बेनीवाल शुरू से ही अपने बड़े भाई के साथ हर चुनावी जंग में साथ खड़े रहे हैं. यूनिवर्सिटी के चुनाव से लेकर सभी विधानसभा और सांसद के चुनाव में नारायण बेनीवाल ने बड़े भाई का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया है. हनुमान बेनीवाल के सांसद बनने के बाद से ही आगामी विधानसभा उपचुनाव के मद्देनजर नारायण बेनीवाल क्षेत्र में सक्रिय हो गए थे.

चुनाव आयोग द्वारा उपचुनाव की घोषणा करने के बाद से नारायण बेनीवाल क्षेत्र में और अधिक सक्रिय हो गए हैं. हर बड़े राजनेता के तरह नारायण बेनीवाल भी क्षेत्र के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी एक्टिव हैं. उन्होंने हर दिन की नई-नई पोस्ट डालकर क्षेत्र की जनता से जुड़ने की कवायद शुरू कर दी है. नारायण बेनीवाल के नाम पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है. यहां तक कि उनके समर्थक और जानकार उन्हें खींवसर से विधायक बनने की अग्रिम बधाइयां तक देने लग गए हैं.

हालांकि कांग्रेस ने भी अभी तक अपने प्रत्याशी की घोषणा नहीं की है, लेकिन जानकारों के अनुसार खींवसर से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरेन्द्र मिर्धा को टिकट दिया जाना लगभग तय माना जा रहा है. सूत्रों की मानें तो हरेन्द्र मिर्धा को दिल्ली बैठे आलाकमान सहित मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट से भी हरि झण्डी मिल चुकी है. ऐसे में खींवसर सीट पर होने वाला उपचुनाव का ये चुनावी दंगल ओर भी रोमांचक होगा.

फिलहाल सभी की नज़रें इन खींवसर और मंडावा सीटों के उम्मीदवारों के नामों की घोषणा पर टिकी हुई हैं. कौन सी पार्टी किसपर भरोसा जताते हुए उसे ‘जिताऊ’ उम्मीदवार मानकर चुनाव मैदान में उतारती है ये देखना दिलचस्प रहेगा. दोनों ही सीटें राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनी हुई है.

महाराष्ट्र: ‘क्या सच में भारत-पाक के बंटवारे से भी मुश्किल है भाजपा-शिवसेना गठबंधन’

Pressure politics

महाराष्ट्र (Maharastra) में होने वाले विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा हो चुकी है. 288 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले चुनावों में 21 अक्टूबर को वोट डाले जाएंगे और 24 अक्टूबर को नतीजे घोषित होंगे. प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और एनसीपी ने गठबंधन कर सीटें आपस में बांट ली है. दोनों ने 125-125 सीटों पर सहमति बना अन्य 38 सीटें अन्य सहयोगी पार्टियों के लिए छोड़ दी. भाजपा सत्ताधारी पार्टी है और शिवसेना सहयोगी पार्टी, इसके बावजूद दोनों में सीटों के बंटवारे का मंथन समुद्र-मंथन से भी मुश्किल लग रहा है. पार्टी के एक नेता ने तो गठबंधन पर यहां तक कहा है कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना (BJP-Shiv Sena Alliance) के बीच महज 288 सीटों का बंटवारा करना भारत-पाक के बंटवारे से भी मुश्किल फैसला लग रहा है.

ये बयान दिया है शिवसेना नेता संजय राउत (Sanjay Raut-Shiv Sena) ने जो सीट बंटवारे से जुड़ी परेशानियों से भली-भांति परिचित हैं. राउत ने कहा, ‘इतना बड़ा महाराष्ट्र है लेकिन ये जो 288 सीटों का बंटवारा है, ये भारत पाकिस्तान के बंटवारे से भी भयंकर है. यदि हम सरकार में होने के बजाय विपक्ष में होते तो तस्वीर दूसरी होती.’ उन्होंने ये भी कहा कि फिलहाल इस बारे में मंथन चल रहा है लेकिन सीटों के बंटवारे पर जो भी फैसला होगा, उसे तुरंत मीडिया को बताया जाएगा.

वैसे महाराष्ट्र की आंतरिक राजनीति को देखा जाए तो राउत के इस बयान से इत्तफाक रखा जा सकता है. विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे का ये विवाद अभी का नहीं बल्कि लोकसभा चुनावों से भी पहले का है. लोकसभा चुनावों में भाजपा और शिवसेना चाहें एक साथ चुनावी जंग लड़ रही थी लेकिन शिवसेना अपने मुखपत्र ‘सामना’ के जरिए लगातार भाजपा और उनकी नीतियों पर हमला कर रही थी. महाराष्ट्र में भाजपा सत्ताधारी पार्टी है और पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने शिवसेना सहित कांग्रेस और एनसीपी तीनों को एक साथ पटखनी देते हुए 288 में से 122 सीटों पर कब्जा कर लिया. शिवसेना भाजपा की आधी सीटों तक ही पहुंच सकी और 63 पर सिमट गयी. कांग्रेस को 42 और एनसीपी को 41 सीटें मिली.

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लोकसभा चुनाव 2019 में दोनों पार्टियों ने 25-23 के अंतर से चुनाव लड़ा और कुल 41 सीटों पर कब्जा किया. उसके बाद से शिवसेना बीजेपी से 144-144 सीटों पर हक मांगने लगी. सियासी गलियारों में इस खबर से भी बाजार गर्म रहा कि शिवसेना चुनाव जीतने की स्थिति में ढाई-ढाई साल दोनों पार्टियों के मुख्यमंत्री बिठाने के जुगाड़ में है. हालांकि भाजपा ने इस बात पर कभी मुहर नहीं लगाई. इसके बाद शिवसेना ने आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री प्रत्याशी बताना शुरू कर दिया और प्रचार भी उसी तरह से हुआ.

हाल में एक मीडिया कार्यक्रम में महाराष्ट्र के भाजपायी मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने मुख्यमंत्री पद किसी को देने और सांझा करने से साफ इंकार कर दिया. हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि गठबंधन की स्थिति में शिवसेना चाहे तो डिप्टी सीएम बना सकती है. लेकिन हमारी बात अभी भी वहीं अटकी है…भाजपा-शिवसेना के बीच सीटों का बंटवारा.

उद्दव ठाकरे ने बीच का रास्ता निकालते हुए भाजपा से 150-130 के अनुसार सीट बांटने के बारे में बात की लेकिन भाजपा ​अपने सहयोगी को केवल 110 सीटों पर निपटाना चाहती है. अपने ठस से मस न होने की वजह ये भी है कि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव-2014 में भाजपा ने अकेले अपने दम पर तीनों विपक्षी पक्षों को धूल चटाई थी. हालांकि सरकार शिवसेना से गठजोड़ करके ही बनाई लेकिन शिवसेना को हमेशा ये बात याद रही कि भाजपा की सरकार केवल और केवल शिवसेना के सहयोग से बन पायी है.

अब इन चुनावों में भी शिवसेना इस बात का अहसास भाजपा को करा रही है कि अकेले दम पर वो प्रदेश में सरकार नहीं बना सकती और उन्हें शिवसेना के साथ की जरूरत है. हालांकि कहीं न कहीं शिवसेना को इस बात का अहसास भी है कि वो खुद भी आदित्य ठाकरे के नेतृत्व में कांग्रेस, एनसीपी के साथ मोदी आंधी का सामना नहीं कर पाएंगे. ठीक ऐसा ही इल्म भाजपा को भी है कि तीन पुरानी पार्टियों को अकेले टक्कर दे पाना बिना किसी सहारे के पहाड़ चढ़ने जैसा है. यही वजह है कि शिवसेना के इतने आघातों के बाद भी भाजपा गठबंधन के लिए पूरी तरह से तैयार है.

बड़ी खबर: नहीं बन पाई सहमति, शायद अब शिवसेना की जरूरत नहीं बीजेपी को

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने तो करोड़ों लोगों की आवाजों पर अपने कान बंद करते हुए आजाद भारत के सीने पर एक लाल लकीर खींचते हुए हिंदूस्तान-पाकिस्तान बना दिया लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का ये अटूट बंधन बंधा रहेगा या टूट जाएंगा, जल्दी ही मोदी-शाह बिग्रेड इससे पर्दा उठा देगी.

वीडियो खबर: बेनीवाल गढ़ में गठबंधन और उपचुनावों पर क्या बोले हनुमान

जाट लैंड खींवसर में 21 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा उप चुनावों पर बात करते हुए नागौर सांसद (Nagaur MP) और पूर्व खींवसर (Khinwsar) विधायक हनुमान बेनीवाल (Hanuman Beniwal) ने कहा कि पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में RLP की ओर से मैंने यहां जीत दर्ज की. चूंकि अब मैं बीजेपी गठबंधन (RLP-BJP Alliance) की ओर से लोकसभा में पहुंच गया हूं, ऐसे में खींवसर सीट से …

वीडियो खबर: मंडावा उपचुनाव में नरेंद्र खींचड़ ने किया जीत का दावा

किसी जमाने में कांग्रेस (Congress) का गढ़ मानी जाने वाली मंडावा विधानसभा (Mandawa Assembly) सीट से लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने वाले बीजेपी के नरेंद्र खींचड़ (Narendra Khichar) 2019 के आम चुनावों में झुंझुनू से सांसद चुनकर लोकसभा पहुंच गए. अब इस सीट पर 21 अक्टूबर को उप चुनाव होना है. कांग्रेस की ओर से खींचड़ से हारने वाली रीटा सिंह (Reeta Singh) को टिकट मिल सकता है. खींचड़ के लोकसभा पहुंचने का फायदा रीटा सिंह को मिल सकता है.

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खींवसर और मंडावा विधानसभा उपचुनाव सत्तारुढ़ कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती, उम्मीदवार सक्रिय

Rajasthan By-Election

केन्द्रीय चुनाव आयोग की हरियाणा-महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के साथ अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा उपचुनाव की घोषणा के साथ ही राजस्थान की खींवसर और मंडावा सीट पर होने वाले उप-चुनाव के लिए भी बिगुल बज गया है. अन्य राज्यों के साथ ही प्रदेश की दोनों विधानसभा सीटों के लिए भी 21 अक्टूबर को ही उप-चुनाव होगा. प्रदेश में होने वाले निकाय और पंचायत चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों के लिए ही खींवसर और मंडावा विधानसभा सीट पर जीत दर्ज करना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है. इन उपचुनाव में जितने वाली पार्टी को उसके बाद होने वाले निकाय व पंचायत चुनावों में इसका फायदा मिलना … Read more

भाजपा के आगे NDA से जुड़ी अन्य पार्टियां बेअसर

केंद्र में भाजपा का बहुमत बनने के बाद अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल पार्टियों की हैसियत नाम मात्र की रह गई है. भाजपा को सरकार में लाने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी की प्रेरणा से पहली बार 1998 में भाजपा के साथ अन्य राजनीतिक पार्टियों को जोड़ने की शुरूआत हुई थी. इस तरह NDA (National Democratic Alliance) ने आकार लिया. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी एनडीए के प्रधानमंत्री थे. सरकार पर सहयोगी पार्टियों का भी दखल था.

2004 में चुनाव बाद कांग्रेस ने भी बहुमत से काफी दूर रह जाने पर अन्य पार्टियों को जोड़कर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) बनाया और केंद्र में UPA (United Progressive Alliance) सरकार बनी. सोनिया गांधी और अन्य सहयोगी पार्टियों की सहमति से मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. इस सरकार को अगले लोकसभा चुनाव में भी जनता का समर्थन मिला. मनमोहन सिंह की सरकार दस साल चली. इस सरकार के आखरी महीनों में राहुल गांधी ने कुछ ऐसे रद्दी काम किए, जिनसे मनमोहन सिंह अपमानित हुए. उन पर सोनिया की कठपुतली होने का आरोप लगा.

2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) के तूफानी चुनाव प्रचार और भाजपा की आक्रामक रणनीति ने जनता को कांग्रेस का विकल्प दे दिया. नरेन्द्र मोदी ने सरकार संभाली. उस समय भाजपा के पास लोकसभा में बहुमत से कुछ सीटें कम थीं. फिर भी मोदी ने सरकार की कार्यप्रणाली बदल दी. एनडीए से जुड़ी अन्य पार्टियों का असर भी सरकार में बहुत कम हो गया. अब 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को स्पष्ट और पूर्ण बहुमत मिला हुआ है और एनडीए में शामिल अन्य सहयोगी दलों की उपस्थिति नाममात्र की रह गई है. वे केंद्र में एकदम अलग-थलग पड़ गए हैं.

NDA की सहयोगी शिवसेना महाराष्ट्र में मजबूत है. भाजपा-शिवसेना का मजबूत गठबंधन है. वहां पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को शिवसेना से ज्यादा सीटें मिली थीं. भाजपा ने नागपुर के चमकदार नेता देवेन्द्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाया. भाजपा पहले नंबर पर शिवसेना दूसरे नंबर पर आ गई. इससे पहले शिवसेना का स्थान भाजपा से ऊपर हुआ करता था. नब्बे के दशक में जब गठबंधन सरकार बनी थी, तब शिवसेना के मनोहर जोशी मुख्यमंत्री थे और गोपीनीथ मुंडे उप मुख्यमंत्री थे.

अब महाराष्ट्र (Maharastra) में फिर विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. देवेन्द्र फड़नवीस की सरकार जनादेश हासिल करने के लिए मैदान में उतर चुकी है. कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद हो रहे प्रचार और मोदी की लोकप्रियता के मद्देनजर इस चुनाव में भाजपा के लिए शिवसेना की जरूरत पहले जैसी नहीं रही. शिवसेना ज्यादा सीटें मांग रही है और भाजपा अपनी सीटें ज्यादा रखने के लिए अड़ी हुई है. दोनों में खींचतान चल रही है और उद्धव ठाकरे भाजपा के लिए असुविधाजनक बयान देने लगे हैं. इससे लगता है कि दोनों पार्टियों गठबंधन लंबा नहीं चल पाएगा. हो सकता है आगे चलकर शिवसेना मुंबई और मराठवाड़ा तक सिमटकर रह जाए. इसके बाद उसका एनडीए में रहने या नहीं रहने का कोई मतलब नहीं रहेगा.

इसी तरह बिहार में खींचतान बनी हुई है. वहां एनडीए से जुड़ी पार्टी JDU के नेता नीतीश कुमार (Nitish Kumar) मुख्यमंत्री हैं और बिहार में उनका अच्छा खासा असर है. भाजपा उनकी सहयोगी पार्टी के रूप में सरकार में शामिल है. सुशील कुमार मोदी (Sushil Kumar) उप मुख्यमंत्री हैं. वहां 2020 में विधानसभा चुनाव होंगे. तैयार अभी से शुरू हो गई हैं. लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) जेल में हैं इसलिए RJD की ताकत पहले जैसी नहीं है. विभिन्न क्षेत्रों में अन्य पार्टियां प्रभावशाली हैं. कांग्रेस का भी ज्यादा दबदबा नहीं है. भाजपा वहां अपना जनाधार बढ़ाने में लगी है. इसी के तहत भाजपा के एक कोने से आवाज उठी है कि नीतीश कुमार को अब केंद्र में जिम्मेदारी संभालनी चाहिए. बिहार को भाजपा के लिए खाली छोड़ देना चाहिए.

गौरतलब है कि 2019 में दूसरी बार मोदी सरकार बनते समय नीतीश ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में JDU का एक मंत्री बनने की शर्त नहीं मानी थी और इस तरह JDU मोदी सरकार से बाहर रही. बिहार में नीतीश कुमार सुविधाजनक तरीके से सरकार चला रहे हैं. उन्हें भाजपा का सहयोग लेना पड़ रहा है. भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं. नीतीश कुमार पहले कांग्रेस के गठबंधन से जुड़े थे. बाद में वह खेमा बदलकर एनडीए में शामिल हो गए और भाजपा से तालमेल कर लिया. अब भाजपा के भीतर से ही उन्हें चुनौती मिलने वाली है.

इस तरह भाजपा पूरे देश को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेते हुए समान विचारधारा वाली अन्य छोटी पार्टियों को बेअसर कर रही है. इसमें उसे सफलता भी मिल रही है. महाराष्ट्र में सत्ता तक पहुंचने के लिए उसने धुर दक्षिणपंथी उग्र विचारधारा वाली शिवसेना से हाथ मिलाया तो बिहार में धर्म निरपेक्ष छवि वाले नीतीश कुमार के साथ गठजोड़ किया. भाजपा के रणनीतिकारों को पूरा भरोसा है कि कभी न कभी बिहार में भी भाजपा सरकार बना ही लोगी. नीतीश कुमार कब तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे. निकट भविष्य में राजनीतिक प्रेक्षकों की नजर नीतीश कुमार पर रहेगी. यह देखना रोचक होगा कि नीतीश कुमार भाजपा के राजनीतिक दाव से कैसे बचते हैं.