‘गांधी ने गांधी को दिया इस्तीफा, फिर से गांधी बना अध्यक्ष’

एक कहावत बड़ी मशहूर है ‘तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर’. ऐसा ही कुछ कांग्रेस पार्टी में हो रहा है. सोनिया गांधी ने 16 दिसम्बर, 2017 को जब गांधी परिवार के युवराज राहुल गांधी की ताजपोशी की थी यानि उनको पार्टी की कमान संभलायी थी तब ये निश्चित था कि कांग्रेस केवल वंशवाद आगे बढ़ा रही है. ऐसे में तय था कि कांग्रेस की सियासत की बागड़ौर केवल गांधी परिवार के हाथों में रहेगी. लोकसभा चुनाव-2019 में मिली करारी हार के बाद नैतिकता के आधार पर जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.

राहुल गांधी ने ये इस्तीफा यूपीए चैयरपर्सन सोनिया गांधी को सौंपा. यानि एक गांधी को. उसके बाद शुरू हुई नए अध्यक्ष की तलाश. राहुल गांधी ने साफ तौर पर कहा कि अब पार्टी की बागड़ौर किसी गैर गांधी को सौंपी जाए लेकिन अब हुआ पहले से भी बड़ा झोल और एक बार फिर अध्यक्ष बन गयी सोनिया गांधी. यानि गांधी के बाद फिर गांधी. ऐसे में सीधे तौर पर कहा जाए तो इस्तीफा लेने वाला भी गांधी, देने वाला भी गांधी और नया अध्यक्ष भी गांधी.

इससे पहले जिस व्यक्ति का नाम अध्यक्ष पद पर सबकी पसंद था और उसे सभी का समर्थन भी मिल रहा था, वो भी था एक गांधी यानि प्रियंका गांधी. वहीं जिस नाम का सबसे ज्यादा समर्थन किया जा रहा है, वो भी गांधी. सीधे तौर पर कहा जाए तो कांग्रेस में फिर से गांधियों का वंशवाद शुरू हो गया जो बड़ी मुश्किल से लाइन पर आने वाला था. राहुल गांधी के इस्तीफे और पार्टी कमान संभालने को प्रियंका के इनकार के बाद लगने लगा था कि अब कांग्रेस को जो नया अध्यक्ष मिलेगा, निश्चित तौर पर कोई गैर गांधी ही होगा. इस लिस्ट में अशोक गहलोत सबसे आगे रहे लेकिन उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया.

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वजह रही कि राजनीति के जादूगर गहलोत को साफ तौर पर पता था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष भले ही बन जाएं लेकिन पर्दे के पीछे और महत्वपूर्ण फैसलों में कलम केवल राहुल-सोनिया-प्रियंका यानि गांधी परिवार की ही चलेगी. ऐसे में उन्होंने बड़ा पद लेने की जगह राजस्थान की राजनीति में ही ध्यान देना उचित समझा. पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह का भी यही सोचना है. अपनी बेबाकी के लिए जाने जाने वाले अमरिन्दर के हितों का टकराव सीधे गांधी परिवार से होगा, इसलिए उन्होंने अपना नाम कभी आगे ही नहीं आने दिया. इसके दूसरी ओर, उन्होंने प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाने का विकल्प भी सुझा दिया.

कांग्रेस अध्यक्ष के नए नाम की इस लिस्ट में मुकुल वासनिक, सुशील शिंदे और मलिकार्जुन खडगे का नाम भी शामिल था लेकिन 5 ग्रुप की बैठक के बावजूद इनमें से किसी का नाम तय न हो सका. वहीं इस लिस्ट में युवाओं के तौर पर राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट और पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भी था लेकिन सीनियर्स के अनुभव के सामने न तो युवाओं की रणनीति काम आयी और न ही उनकी युवा सोच.

अगर सीड्ब्ल्यूसी की एक ही दिन में दो बैठकों के बाद भी अगर कोई निष्कर्ष न निकलता तो पार्टी फिर से विपक्ष के निशाने पर आ जाती. शायद इसी डर से सोनिया गांधी को नए अध्यक्ष के चुनाव होने तक अंतरिम अध्यक्ष का दायित्व सौंप दिया. अब गौर करने वाली बात ये है कि चाहे कांग्रेस के नेता ये सोचकर खुश हो रहे हो कि चलो अब कुछ समय के लिए पार्टी के नए कप्तान की चिंता खत्म हुई लेकिन यह समस्या केवल टली है और वो भी कुछ समय के लिए. ज्यादा से ज्यादा चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने तक सोनिया अंतरिम अध्यक्ष का पद संभाल सकती हैं. उसके बाद से कांग्रेस की ये नोटंकी फिर से शुरू होगी और फिर से शुरू होगा गांधी बनाम गांधी का खेल.

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अब ये खेल कितना लंबा चलेगा, ये तो समय भी बताएगा लेकिन जो भी हुआ या जो होने वाला है, उससे एक बात तो एकदम साफ है कि गांधी परिवार के लोगों से पार्टी की बागड़ौर इतनी आसानी से नहीं फिसलने वाली. अगर जरा सी फिसल भी गयी जैसे कि राहुल गांधी के साथ हुआ है तो कांग्रेस के सिपेसालार फिर से इसे किसी न किसी गांधी के हाथों में थमा देंगे, फिर चाहें वो प्रियंका गांधी हो या सोनिया गांधी या फिर से राहुल गांधी.

प्रियंका को राजस्थान से राज्यसभा में भेजने की मांग

राजस्थान में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन लाल सैनी के निधन से खाली राज्यसभा सीट पर 26 अगस्त को उपचुनाव होगा, जिसके लिए नामांकन भरने की आखिरी तारीख 14 अगस्त है. पहले यह भाजपा की सीट थी, लेकिन अब राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस का बहुमत होने से यह सीट कांग्रेस को मिलना लगभग तय है. राजस्थान की सीट पर किसको उम्मीदवार बनाया जाए, इस पर कांग्रेस हाईकमान विचार कर रहा है. इस बीच राजस्थान से इस सीट पर प्रियंका गांधी को सांसद बनाकर राज्यसभा भेजने की अटकलें लगाई जा रही है.

पूर्व में इस सीट पर कांग्रेस की तरफ से डॉ. मनमोहन सिंह को उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा थी. मनमोहन सिंह असम से राज्यसभा सांसद थे. उनका कार्यकाल जून में समाप्त हो चुका है. मनमोहन सिंह को तमिलनाडु से राज्यसभा में भेजने की तैयारी चल रही थी, लेकिन वहां कांग्रेस की सहयोगी पार्टी द्रमुक ने खाली राज्यसभा सीट पर वाइको को चुने जाने का वादा कर लिया था, इसलिए मनमोहन सिंह को तमिलनाडु से राज्यसभा में नहीं भेजा जा सका. तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और द्रमुक ने राज्यसभा की तीन-तीन सीटें जीती हैं.

राजस्थान की राज्यसभा सीट पर उम्मीदवार के चयन की कवायद के बीच कांग्रेस विधायक खिलाड़ीलाल बैरवा ने कहा है कि प्रियंका गांधी वाड्रा को राजस्थान से राज्यसभा सदस्य बनाया जाना चाहिए. प्रियंका गांधी को राज्यसभा में भेजने के साथ ही उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से जो परिस्थितियां बनी हैं, उसमें कांग्रेस कार्यकर्ता परेशान हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में ख़िलाड़ीलाल बैरवा ने कहा कि वह नेक इंसान हैं, लेकिन आज के हालात को ध्यान में रखते हुए प्रियंका गांधी का कद बढ़ाया जाना जरूरी है. प्रियंका के राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय होने से पार्टी को मजबूती मिलेगी और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा. राजस्थान से प्रियंका गांधी का रिश्ता बनेगा, जिससे पार्टी के अंदरूनी मतभेदों पर भी विराम लगेगा.

चुनाव आयोग ने गुरुवार एक अगस्त को राजस्थान और उत्तर प्रदेश की एक-एक खाली राज्यसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा कर दी है. राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस का बहुमत होने से वह इस सीट को आसानी से जीतने की स्थिति में है, क्योंकि 200 सदस्यों वाली राजस्थान विधानसभा में वर्तमान में 198 सदस्य हैं जिसमें कांग्रेस के पास 100 सदस्य है तथा एक लोक दल, 11 निर्दलीय सदस्यों के समर्थन के साथ बसपा के 6 सदस्यों का समर्थन भी है, इस तरह उपचुनाव में यह सीट कांग्रेस की तय है. प्रियंका गांधी या मनमोहन सिंह या फिर कोई ओर, राज्यसभा में उनका कार्यकाल तीन अप्रैल 2024 तक रहेगा. चुनाव के लिए सात अगस्त को अधिसूचना जारी होने वाली है.

राज्यसभा सीट पर नामांकन की आखिरी तारीख 14 अगस्त होगी, 19 अगस्त तक नामांकन वापस लिए जा सकेंगे. उप्र की एक सीट पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर के इस्तीफे से खाली हुई है. वह सपा छोड़कर भाजपा में चले गए हैं. पूरी संभावना है कि नीरज शेखर भाजपा के कोटे से राज्यसभा में पहुंच जाएं.

देवड़ा ने सुझाए पायलट और सिंधिया के नाम, प्रियंका की संभावना से किया इनकार

पिछले लगभग 2 माह से नेतृत्वहीन चल रही कांग्रेस पार्टी को आगामी 10 अगस्त को होने वाली कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अपना नेता मिलने की सम्भावना प्रबल हो गई है. लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, तब से ही कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद को लेकर माथापच्ची जारी है. पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल द्वारा आगामी 10 अगस्त को कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक की जानकारी दिए जाने के साथ ही कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने पार्टी अध्यक्ष के लिए सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया के नामों का प्रस्ताव दिया है. देवड़ा … Read more

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक अगले हफ्ते

कांग्रेस के अगले अध्यक्ष के चयन पर अगले हफ्ते चर्चा होने की संभावना है. संसद सत्र के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक होगी, जिसमें पक्के तौर पर अगले अध्यक्ष के बारे में चर्चा होगी. हालांकि बैठक की सूचना देते हुए प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला इसकी पुष्टि नहीं की है, लेकिन विश्वसनीय सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस अगले अध्यक्ष के चुनाव को लेकर गंभीर है, क्योंकि राहुल गांधी इस्तीफा देकर पार्टी से हट गए हैं और सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा भी अध्यक्ष बनने की इच्छुक नहीं हैं.

कांग्रेस को ऐसे अध्यक्ष की जरूरत है जो मौजूदा परिस्थितियों में पार्टी में नई जान फूंक सके. बताया जाता है कि गांधी परिवार के विश्वस्त सलाहकार सैम पित्रोदा ने पिछले दो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें 134 वर्ष पुरानी पार्टी को नया रूप देने के लिए करीब 20 सुझाव दिए हैं. इसमें एक सुझाव यह है कि पार्टी को कार्पोरेट कंपनी की तर्ज पर ढाला जाए, जिसमें एक मुख्य तकनीकी अधिकारी की नियुक्ति हो, पार्टी का मानव संसाधन विभाग हो और हर पदाधिकारी की जिम्मेदारी तय हो.

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक आठ या 10 अगस्त को हो सकती है, जो कि संसद सत्र के समापन पर निर्भर है. इसमें राहुल गांधी से एक बार फिर इस्तीफे पर पुनर्विचार करने के लिए अनुरोध किया जाएगा. पार्टी अध्यक्ष के मुद्दे पर गुरुवार को कांग्रेस महासचिवों की बैठक हुई थी. प्रियंका गांधी वाड्रा ने कांग्रेस नेताओं से साफ कह दिया है कि अध्यक्ष पद के लिए उनके नाम का जिक्र न किया जाए.

गौरतलब है कि शशि थरूर और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा था कि प्रियंका को अध्यक्ष पद संभाल लेना चाहिए. महासचिवों की बैठक में एक महासचिव ने भी थरूर और कैप्टन की बात दोहराई, जिस पर प्रियंका ने साफ मना कर दिया. प्रियंका भी कांग्रेस महासचिव हैं. राहुल गांधी ने मई में इस्तीफा दिया था. कांग्रेस कार्यसमिति ने अब तक उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया है. कांग्रेस में उनके उत्तराधिकारी के चयन पर अब तक कोई औपचारिक बैठक भी नहीं हुई है.

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राहुल के इस्तीफे के बाद से अब तक कांग्रेस को एक के बाद एक कई झटके लग रहे हैं. गोवा में कांग्रेस के विधायक सामूहिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए. कर्नाटक में जदएस-कांग्रेस सरकार भी गिर गई. कई राज्यों में पार्टी में गुटबंदी बढ़ रही है. यूपीए अध्यक्ष और पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी लोकसभा में सक्रिय हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कांग्रेस इस समय नेतृत्व विहीन है.

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस के कई नेताओं का दम निकला हुआ है. झारखंड, महाराष्ट्र और हरियाणा में कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. जम्मू-कश्मीर में भी जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने के आसार बन रहे हैं. इन परिस्थितियों में कांग्रेस के नए अध्यक्ष या अंतरिम अध्यक्ष का चुनाव जरूरी है.

सैम पित्रोदा की रिपोर्ट में कांग्रेस के पुनर्गठन के लिए मिशन 2020 तय करने के साथ ही शुरू में 60 दिन के कार्यक्रम प्रस्तावित किए गए हैं. इसके तहत केंद्र में ही नहीं, राज्यों में भी मुख्य तकनीकी अधिकारी नियुक्त करने का प्रस्ताव है. इन पर पार्ट को तकनीकी आधार पर संगठित करने की जिम्मेदारी रहेगी. वे सोशल मीडिया और आंकड़ों की जानकारी रखने वालों के संपर्क में रहेंगे. यह सुझाव कांग्रेस के डाटा एनालिटिक्स विभाग के नाकाम रहने के बाद आया है, जिसकी जिम्मेदारी 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रवीण चक्रवर्ती को सौंपी गई थी.

पित्रोदा ने कांग्रेस कार्यसमिति के पुनर्गठन का सुझाव देते हुए कहा है कि कांग्रेस कार्यसमिति को एक 10 सदस्यीय निदेशक मंडल का गठन करना चाहिए. इसमें बाहरी लोगों और विशेषज्ञों को भी नियुक्त किया जा सकता है. यह नया निदेशक मंडल हर तीन महीने में पार्टी अध्यक्ष और कांग्रेस कार्यसमिति के साथ बैठक करेगा और सलाह देगा.

पित्रोदा ने महासचिवों को राज्यों का प्रभार सौंपने की मौजूदा परिपाटी बदलने का सुझाव भी दिया है. उनका कहना है कि महासचिवों की जिम्मेदारी इस तरह तय होनी चाहिए, जैसे राजनीतिक महासचिव, प्रशासनिक महासचिव, वित्तीय और आर्थिक मामलों के महासचिव आदि. एक महासचिव को चुनाव का प्रभार सौंपा जा सकता है.

दिल्ली के राजनीतिक विश्लेषक एन. भास्कर राव ने कहा कि सैम पित्रोदा अच्छे टैक्नोक्रेट हो सकते हैं, लेकिन राजनीति के जमीनी हालात की जानकारी उनको नहीं है. इसलिए पार्टी को कार्पोरेट की तर्ज पर ढालने का उनका जो सुझाव है, वे कारगर नहीं हो सकते. पार्टी का जमीन से जुड़ना और संगठन का विस्तार करना बहुत जरूरी है. इसके लिए कांग्रेस को अपने सेवा दल जैसे आनुषांगिक संगठनों को भी सक्रिय करने की जरूरत है.

अब शत्रुघ्न सिन्हा ने भी सुझाया प्रियंका गांधी का नाम, पार्टी के लिए बताया पावर बूस्टर

पहले शशि थरूर फिर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और अब पूर्व भाजपा सांसद व कांग्रेस नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सबसे उपयुक्त बताया है. सिन्हा ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को पार्टी अध्यक्ष पद के लिए योग्य उम्मीदवार बताते हुए कहा है कि अगर ऐसा होता है तो ये कांग्रेस पार्टी और अन्य कार्यकर्ताओं के लिए पावर बूस्टर की तरह होगा बता दें, हाल ही में यूपी के सोनभद्र नरसंहार मामले पर शत्रुघ्न सिन्हा ने प्रियंका गांधी के एक्शन की जमकर तारीफ की थी. इससे पहले कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने प्रियंका गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद के योग्य बताते हुए … Read more

राजस्थान में गहलोत और पायलट की खींचतान और तेज होने के आसार

संसद सत्र के बाद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक होने की संभावना है. गुरुवार को आये कांग्रेस नेता रणदीव सुरजेवाला के ताजा बयान के अनुसार, ‘संसद सत्र के बाद होगी कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक.’ हालांकि सुरजेवाला ने यह भी कहा है कि बैठक का कोई एजेंडा अभी निर्धारित नहीं है. लेकिन पार्टी सुत्रों की मानें तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी की होने वाली इस बैठक में पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष पर फैसला हो सकता है.

सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष बनने की दौड़ से अशोक गहलोत और सचिन पायलट, दोनों ही बाहर हो चुके हैं, इसलिए अब राजस्थान में इन दोनों नेताओं के समर्थकों की खींचतान और बढ़ेगी. अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं और सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के साथ ही राज्य के उप मुख्यमंत्री भी हैं. दोनों खेमे राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गए हैं.

गहलोत खेमे ने एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत का हवाला देते हुए पायलट को किसी एक पद से हटाने के लिए अभियान तेज कर दिया है. गहलोत के समर्थक प्रदेश अध्यक्ष पद पर किसी जाट नेता की नियुक्ति चाहते हैं. इसके लिए अनौपचारिक कोशिशें शुरू हो गई है. लालचंद कटारिया, सुभाष महरिया या हरीश चौधरी में से किसी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए तगड़ी लॉबिंग हो रही है.

गौरतलब है कि अगले साल की शुरूआत में राज्य में स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव होने वाले हैं. सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री होने के साथ ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं और उनके पास पार्टी के उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित करने का अधिकार रहेगा. यह स्थिति गहलोत समर्थकों के लिए असुविधाजनक होगी. यही कारण है कि पायलट को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के प्रयास शुरू हो गए हैं. दूसरी तरफ पायलट समर्थकों ने गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को राज्य में एक भी सीट नहीं मिली, इसकी जिम्मेदारी गहलोत को लेनी चाहिए. हालांकि इस तरह के अभियान का बेअसर रहना तय है क्योंकि हाईकमान पहले ही मान चुका है लोकसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर राज्यों में मुख्यमंत्री नहीं हटेंगे.

पायलट के एक समर्थक का कहना है, पार्टी ने वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में जो बढ़त बनाई थी, वह गहलोत की कल्पनाशीलता से रहित और पुराने जमाने की राजनीति के कारण विफल हो रही है. निर्णय नहीं लिए जाने की वजह से नीतिगत गतिहीनता आ गई है. गहलोत के पिछले महीनों के कार्यकलापों से ऐसा नहीं लगता कि उससे पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने में मदद मिली हो. पायलट समर्थक इससे भी दुखी हैं कि गहलोत ने अब तक संवैधानिक पदों, आयोगों, कमेटियों में नियुक्तियां नहीं की हैं.

फिलहाल गहलोत सरकार आरपीएससी के लंबित पदों के भरने में लगी हुई है, जबकि लोकायुक्त पद अब तक खाली है. मदरसा बोर्ड और अल्पसंख्यक आयोग में मनोनयन से भरे जाने वाले पद भी खाली हैं. राज्य सूचना आयुक्त के पद पर भी अभी तक किसी की नियुक्ति नहीं हुई है. इस तरह कई पदों पर नियुक्तियां नहीं हो रही हैं और गहलोत और पायलट, दोनों का दिल्ली जाना-आना लगा रहता है. कांग्रेस में राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद हाईकमान में भी उथल पुथल है. अंतरिम अध्यक्ष की नियुक्ति करने में हाईकमान के नेताओं को पसीना आ रहा है.

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इस तरह राजस्थान में कांग्रेस के दो खेमे स्पष्ट हैं. उधर भाजपा की भी यही हालत है. एक वसुंधरा का खेमा और दूसरा अमित शाह के समर्थकों का खेमा. राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही पार्टियां अपसी मतभेदों से जूझ रही हैं. केंद्र में भाजपा मोदी-शाह के कारण मजबूत है, जबकि राज्य में कांग्रेस गहलोत के कारण मजबूत है. पायलट राजस्थान में कांग्रेस के नए नेता हैं और राजस्थान से उनका वैसा घनिष्ठ संबंध नहीं रहा है, जैसा गहलोत का रहा है. इसके बावजूद पायलट अगर गहलोत की जगह खुद को स्थापित करने की महत्वाकांक्षा पालते हैं और दोनों खेमों में टकराव की स्थिति बनती है, तो वह कांग्रेस के लिए ठीक नहीं है. भाजपा के रणनीतिकार तो यही चाहते हैं.

‘प्रियंका गांधी कांग्रेस पार्टी की बागडोर संभालने के लिए सबसे सही विकल्प’

शशि थरूर के बाद अब पंजाब के मुख्यमंत्री ने कैप्टन अमरिंदर सिंह ने फिर युवा नेतृत्व की वकालत करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रियंका गांधी के नाम की पैरवी की है. कैप्टन ने कहा- ‘कांग्रेस की बागडोर संभालने के लिए वह सही विकल्प होंगी‘. गौरतलब है कि राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद से ही कांग्रेस को नए अध्यक्ष की तलाश है. कांग्रेस के कई दिग्गज नेता प्रियंका गांधी के नाम की पैरवी कर चुके है.

बता दें, रविवार को कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा था कि उन्हें उम्मीद है कि पार्टी अध्यक्ष पद का चुनाव होने पर महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा इसमें अपनी किस्मत आजमाने को लेकर फैसला करेंगी. लेकिन साथ ही थरुर ने यह भी कहा कि यह गांधी परिवार का फैसला होगा कि प्रियंका इस पद के लिए चुनाव लड़ेंगी या नहीं. शशि थरूर ने कहा, ”प्रियंका गांधी के पास ‘स्वाभाविक करिश्मा’ है जो निश्चित तौर पर पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को प्रेरित और एकजुट कर सकता है. उनकी इसी खूबी के कारण कई लोग उनकी तुलना उनकी दादी और पूर्व पार्टी अध्यक्ष दिवंगत इंदिरा गांधी से करते हैं.”

सनद रहे, राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में हुई पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए मई के आखिरी सप्ताह में अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था जिसे बाद में जुलाई में ट्वीट पर सार्वजनिक भी किया था. इस्तीफा देने के साथ ही राहुल गांधी ने कहा था कि पार्टी नए अध्यक्ष की तलाश करे, जो गांधी परिवार से बाहर का हो. राहुल गांधी के इस्तीफे के दो महीने बीत जाने के बावजूद कांग्रेस किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंच सकी है. हालांकि अब अमरिंदर सिंह और थरूर जैसे वरिष्ठ नेताओं ने प्रियंका गांधी के नाम की पैरवी की है.

सोमवार को पत्रकारों से बात करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रियंका गांधी के नाम की पैरवी की. अमरिंदर सिंह ने कहा, ”पार्टी की बागडोर संभालने के लिए प्रियंका एक सही विकल्प होंगी, लेकिन यह सब कांग्रेस कार्य समिति (CWC) पर निर्भर करेगा, जो इसपर फैसला लेने के लिए अधिकृत है.” जब पत्रकारों ने कैप्टन से पूछा कि प्रियंका गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए उचित उम्मीदवार होंगी? तो उन्होंने कहा, ”निवर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही उस पर फैसला लेंगे. मुझे यकीन है कि जहां तक प्रियंका जी का संबंध है, उन्हें पार्टी का पूर्ण समर्थन मिलेगा.”

पत्रकारों से बातचीत में एक सवाल का जवाब देते हुए कैप्टन ने कहा कि प्रियंका गांधी पार्टी अध्यक्ष के लिए पूरी तरह उचित हैं, क्योंकि हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद संगठन को युवा व गतिशील नेतृत्व की जरूरत है और प्रियंका गांधी बुद्धिमान हैंं और उनमें किसी भी चुनौती को लेने और जीत के लिए संघर्ष करनेे का हौसला है. कैप्टन ने कहा कि राहुल गांधी द्वारा इस्तीफ़ा वापस लेने से इन्कार करनेे के बाद प्रियंका गांधी को उनकी जगह अध्यक्ष बनाना उचित कदम होगा.

गौरतलब है कि, कैप्टन अमरिंदर सिंह इससे पहले भी पार्टी की बागडोर किसी नौजवान नेता को देने की वकालत कर चुके हैं. उनका कहना है कि इस समय पर भारत की अधिकांश जनसंख्या युवा है और एक युवा नेता ही युवा मन की बात सुन कांग्रेस पार्टी को आगे बढ़ा सकता है.