बिहार: क्या नीतीश कुमार एनडीए से बगावत करने की तैयारी कर रहे हैं?

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आम चुनाव के आखिरी चरण में 19 मई को बिहार की आठ सीटों के लिए वोटिंग होगी.  इन सीटों में से महज एक नालंदा सीट पर जेडीयू का कब्जा है. पांच सीटें सासाराम, पटना साहिब, पाटलीपुत्र, आरा और बक्सर बीजेपी के खाते में है जबकि एक सीट पर रालोसपा और एक पर निर्दलीय का कब्जा है. यानी कि सातवें चरण का चुनाव बीजेपी के लिए काफी अहम है.

सातवें चरण के मतदान ठीक पहले एनडीए की सहयोगी जेडीयू ने बिहार को विशेष राज्य दिए जाने की अपनी पुरानी मांग फिर से दोहराना शुरू कर दिया है. पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘हम पंद्रहवें वित्त आयोग के सामने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग रखेंगे, क्योंकि बिहार के सर्वांगीण विकास के लिए यही स्थाई समाधान है. बिहार का सर्वांगीण विकास तभी संभव है, जब बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाएगा.’

जेडीयू के दूसरे नेताओं ने भी केसी त्यागी के बयान का समर्थन किया है. इतना ही नहीं, जदयू ने ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक की उस मांग का भी समर्थन किया है, जिसमें उन्होंने ओडिशा को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की है. पार्टी का मानना है कि पिछड़ेपन के चलते बिहार और ओडिशा दोनों को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए.

जेडीयू के अनुसार बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं और अब नवीन पटनायक ने भी यही मांग की है. दोनों ही राज्य पिछड़े हैं और बाढ़, तूफान और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं अक्सर आती हैं. इन राज्यों के संसाधन का एक बड़ा हिस्सा इन आपदाओं से निबटने में जाया हो जाता हैं इसलिए दोनों राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए.

लोकसभा चुनाव का आखिरी चरण पूरा होने से पहले ही जेडीयू का फिर से विशेष राज्य का मुद्दा उठाना कई सवाल खड़े करता है. क्या जेडीए के रुख में यह बदलाव नतीजे आने के बाद बिहार की राजनीति में बड़े उलटफेर की ओर इशारा कर रहा है? क्या नीतीश कुमार का बीजेपी से फिर से मोहभंग हो गया है? क्या जेडीयू ने विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है?

जानकार बताते हैं कि तमाम सर्वेक्षणों में बीजेपी को कम सीट मिलने का अनुमान लगाया गया है. अगर ऐसा होता है तो बीजेपी को अन्य सहयोगी दलों की जरूरत पड़ेगी. इतना ही नहीं, अभी जो पार्टियां उनके साथ हैं, संभव है कि बीजेपी को कम सीट आने की सूरत में उसे छोड़ कर दूसरे खेमे में चली जाएं. इसलिए बीजेपी को मौजूदा सहयोगियों का साथ भी चाहिए होगा. जदयू का शीर्ष नेतृत्व इससे अच्छी तरह वाकिफ है और उसे यह भी पता है कि ऐसे मौकों पर ही बीजेपी पर दबाव डाला जा सकता है.

सातवें चरण के चुनाव से ठीक पहले विशेष राज्य का दर्जा देने के घिसे राग को फिर से अलाप कर जेडीयू बीजेपी नेतृत्व को दबाव में रखने की कवायद कर रही है. केसी त्यागी के बयान से पहले जदयू एमएलसी गुलाम रसूल बलियावी भी एक बयान देकर सियासी अटकलों को हवा दे चुके हैं. आपको बता दें कि बलियावी ने पिछले दिनों नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की मांग की थी.

गुलाम रसूल बलियावी ने कहा था, ‘अगर बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं को महसूस हो रहा है कि उनकी पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिल पाएगा, तो एनडीए को चाहिए कि वह नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री का चेहरा बनाए.’ बलियावी के इस बयान के राजनीतिक विश्लेषक कई मतलब निकाल रहे हैं. कोई इसे बीजेपी पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कवायद बता रहा है तो कोई तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की स्थिति में नीतीश को चेहरा बनाने की कोशिश बता रहा है.

इस चर्चा के बीच यह काबिलेगौर है कि चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार एनडीए सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज की जगह अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं. ऐसा इसलिए है ताकि बाद में जेडीयू को अच्छी सीट मिलने की सूरत में बीजेपी यह न जता सके कि उसके चलते जेडीयू ने ज्यादा सीटें जीतीं. बिहार में जेडीयू ही नहीं, लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के तेवर भी बदलने लगे हैं. हाल ही में पार्टी के सांसद और राम विलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान ने कहा कि बीजेपी को राम मंदिर की जगह विकास के मुद्दे पर फोकस करना चाहिए.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव परिणाम के बाद बिहार में सियासी उलटफेर की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जेडीयू और एलजेपी हर हाल में ये कोशिश करेंगे कि सत्ता में बने रहें. अगर केंद्र में एनडीए की सरकार बनने की संभावना कमजोर होती है तो जेडीयू और एलजेपी खेमा भी बदल भी सकते हैं. एलजेपी मुखिया को तो वैसे भी चुनावी मौसम विज्ञानी कहा जाता है, क्योंकि वह हमेशा सत्ताधारी पार्टियों के साथ ही गठबंधन करते हैं.

इधर, पिछले सात-आठ सालों में जेडीयू ने भी जिस तेजी से अपना खेमा बदला, उसे देख कर पुख्ता तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि आने वाले समय में वे अन्य गठबंधन में शामिल नहीं होंगे. गौरतलब है कि आम चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे को लेकर भी जेडीयू ने बीजेपी पर खासा दबाव बनाया था, जिसके चलते ही बीजेपी जीती हुई पांच सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और महज दो लोकसभा सीटें जीतनेवाले जेडीयू को 17 सीटें दी गईं.

जानकार बताते हैं कि क्षेत्रीय पार्टियों के लिए इस तरह के मौकों का फायदा उठाना आम बात है. पूर्व में भी ये पार्टियां अपनी सहूलियत के हिसाब से खेमा बदलती रही हैं, इसलिए इस बार भी ऐसा ही कुछ हो, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. जेडीयू के बयान को लेकर विपक्षी पार्टियों ने एनडीए पर हमला शुरू कर दिया है. पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव लगातार कह रहे हैं कि चुनाव के बाद नीतीश कुमार एनडीए को छोड़ सकते हैं.

आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने विशेष राज्य के दर्जे की जेडीयू की मांग पर कहा कि नीतीश कुमार आखिरी चरण के चुनाव से पहले पैंतरा बदल रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह बीच में लंबे समय तक इसको लेकर चुप्पी साधे रहे और अब दोबारा यह मुद्दा उछाल रहे हैं. शिवानंद तिवारी मानते हैं कि नीतीश कुमार बीजेपी पर दबाव भी बनाना चाहते हैं, लेकिन वह ये एहसास भी जताते रहना चाहते हैं कि वह लालू प्रसाद यादव को लेकर सॉफ्ट नहीं हैं.

शिवानंद तिवारी ने कहा, ‘लालू प्रसाद यादव पर जुबानी हमले को नीतीश कुमार ने और तीखा कर दिया है. वह बीजेपी को बताना चाहते हैं कि उनके लिए लालू यादव विकल्प नहीं हैं. आखिरी चरण के मतदान से पहले एनडीए की सहयोगी पार्टियों का ये रुख चुनाव बाद बीजेपी के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है. ऐसे में ये देखने वाली बात होगी कि बीजेपी इस चुनौती से कैसे निपटती है.

बंगाल में बवाल पर वीडियो-वीडियो खेल रही टीएमसी और बीजेपी

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कोलकाता में बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के कल किए गए रोड शो के दौरान भड़की हिंसा में हुए उत्पात की आग तो शायद ठंड़ी नहीं हुई लेकिन अब इस मामले पर टीएमसी और बीजेपी एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए वीडियो-वीडियो का खेल रही हैं. दोनों पार्टियों ने कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर जारी करते हुए इन्हें सबूतों के तौर पर पेश किया है और हिंसा की वजह एक-दूसरे पर मढ़ दिया. बात दें, मंगलवार शाम को कोलकाता में अमित शाह के एक रोड शो में टीएमसी और बीजेपी समर्थक एक-दूसरे से भिड़ गए थे. हिंसा भड़कती देख रोड शो को रद्द कर दिया गया. इस मामले पर तृणमूल कांग्रेस … Read more

राहुल ने मोदी पर ली चुटकी, पूछा- क्या बारिश में सभी विमान हो जाते हैं रडार से गायब?

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सियासत में बयानों का बड़ा महत्व है. कई बार ऐसा होता है कि बयान नेता के लिए परेशानी का सबब बन जाता है. ऐसा ही कुछ प्रकरण प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के साथ हुआ है. पीएम मोदी ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान बादल छाए रहने से भारतीय वायुसेना के विमानों को रडार से बचने में मदद मिली थी. उनके इस बयान पर राहुल गांधी ने चुटकी ली है. राहुल गांधी ने बयान पर कहा, ‘मोदीजी के अनुसार जब भी भारत में तुफान और बारिश आती है तो सारे विमान रडार की रेंज से बाहर हो जाते है.’ अभिनेता अक्षय कुमार को … Read more

राजनीति के ‘मौसम विज्ञानी’ इस बार दो मोर्चों पर गच्चा खाते हुए क्यों दिख रहे हैं?

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भारत की राजनीति में रामविलास पासवान ऐसे नेता हैं, जो हमेशा सत्ता के साथ रहते हैं. सरकार चाहे किसी की भी आए, पासवान कभी चुनाव से पहले तो कभी चुनाव के बाद सत्ता के सिरमौर बनने वाले दल के साथ हो लेते हैं. इसी वजह से कई नेता उन्हें राजनीति का ‘मौसम विज्ञानी’ कहते हैं. पासवान फिलहाल एनडीए का हिस्सा हैं और दावा कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे.

रामविलास पासवान का यह दावा कितना सही होगा यह तो यह चुनाव परिणाम आने के बाद पता चलेगा, लेकिन उनकी सियासत पर सबकी नजर है. आपको बता दें कि रामविलास पासवान बिहार की हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से आठ बार सांसद चुने गए. जीत का यह आंकड़ा इस बात की तस्दीक करता है कि राजनीति में उनका कद कितना बड़ा है.

पासवान पहली बार भारतीय लोकदल के टिकट पर साल 1977 में चुनाव जीतकर संसद पहुंचे. साल 1980 में वे जनता पार्टी के टिकट पर सांसद बने, लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी के निधन के बाद हुए चुनाव में उन्हें कांग्रेस के रामरात्न राम के सामने हार का सामना करना पड़ा. हालांकि 1989 के चुनाव में उन्होंने फिर से जीत हासिल की. इस चुनाव के साथ जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ वो 2004 तक जारी रहा.

इस दौरान रामविलास पासवान की दलीय निष्ठा बार—बार बदलती रही. वे एनडीए और यूपीए, दोनों सरकारों में रहे. पासवान अकेले तो बिहार में इतने ताकतवर नहीं हैं कि वे कुछ बड़ा कर सकें, लेकिन प्रदेश के दलित वर्ग पर उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. पहले यूपीए और बाद में एनडीए में उनकी एंट्री की वजह भी यही थी.

2014 के चुनाव में पासवान की पार्टी लोजपा ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. पार्टी ने सात सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, जिनमें से छह ने फतह हासिल की. इनमें हाजीपुर से रामविलास पासवान खुद और जमुई से उनके पुत्र चिराग पासवान सांसद चुने गए. पासवान इस बार के चुनाव में एनडीए में शामिल हैं. इस बार उनकी पार्टी को छह सीटें मिली हैं.

इस बार रामविलास पासवान चुनावी मैदान में नहीं हैं. 1977 के बाद यह पहला मौका है जब वे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. उनकी परंपरागत हाजीपुर सीट से इस बार रामविलास पासवान के भाई और बिहार सरकार के मंत्री पशुपति कुमार पारस चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं, जमुई से रामविलास के पुत्र चिराग एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं.

राजनीति के जानकारों की मानें तो इस चुनाव में रामविलास पासवान की प्रतिष्ठा दांव पर है. बताया जा रहा है कि दलितों के बीच अब उनकी पहले जैसी पकड़ नहीं बची है. उनकी पार्टी के उम्मीदवार अपनी सीटों पर तो दलित वोट हासिल कर रहे हैं, लेकिन बीजेपी और जेडीयू के उम्मीदवारों के खाते में इसे ट्रांसफर नहीं करवा पा रहे. जानकारों की मुताबिक प्रदेश की कुछ सीटों को छोड़कर ज्यादातर पर दलित समाज पूरी तरह से महागठबंधन के पक्ष में लामबंद दिखाई दे रहा है.

यदि ऐसा होता है तो यह रामविलास पासवान के लिए किसी झटके से कम नहीं होगा, क्योंकि जिस दलित वोट बैंक की वजह से वे राष्ट्रीय दलों से गठबंधन और सरकार में मोलभाव कर पाते हैं यदि वो ही उनसे छिटक गया तो उनका राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव कम होना तय मानकर चलिए. लोजपा के कई नेता भी यह स्वीकार करते हैं कि मोदी सरकार के दौरान हुई दलित विरोधी घटनाओं का नुकसान उनकी पार्टी को भी हुआ है.

आपको बता दें कि बीते पांच साल में देश में दलित उत्पीड़न की कई घटनाएं हुईं. वह चाहे गुजरात के ऊना में दलित की पिटाई का मामला हो या रोहित वेमुला की आत्महत्या का मुद्दा. एससी-एसटी एक्ट में संशोधन का मामला भी खूब उछला. ये सभी मामले मोदी सरकार के साथ—साथ रामविलास पासवान के लिए भी मुसीबत का सबब बने. कहा गया कि पासवान सरकार में शामिल थे, लेकिन उन्होंने बड़े मामलों पर चुप्पी साधे रखी.

आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव इन्हीं मुद्दों पर रामविलास पासवान को घेर रहे हैं. तेजस्वी हर जनसभा में कह रहे हैं कि बीजेपी के साथ रहकर रामविलास की सोच भी आरएसएस जैसी हो गई है. वे आरएसएस की तरह दलितों की बजाय सवर्णों के लिए काम करते है. आपको बता दें कि रामविलास पासवान ने सवर्ण वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण देने की मांग की थी. इस पर तेजस्वी ने उन्हें सवर्ण समाज का नेता कहा था.

दरअसल, तेजस्वी ये भली-भांति जानते हैं कि अगर दलित वोट उनके पक्ष में एकमुश्त लामबंद होते हैं तो महागठबंधन के लिए बिहार में संभावना बढ़ेगी. तेजस्वी लोकसभा चुनाव को महागठबंधन की एक प्रयोगशाला के रूप में देख रहे हैं. वे इस चुनाव में सभी प्रकार के विकल्पों को अपनाकर देख रहे हैं. चाहे मुकेश साहनी की नई-नवेली विकासशील इंसान पार्टी को तीन लोकसभा की सीट गठबंधन में देने की बात हो या उपेंद्र कुशवाह की रालोसपा को गठबंधन में लेने की.

कांग्रेस को सिर्फ नौ लोकसभा सीटों पर ही लड़ने पर सहमत करना भी तेजस्वी की रणनीति का ही हिस्सा है. वहीं, रामविलास पासवान पर वंशवाद के भी जमकर आरोप लग रहे हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रदेश में उनके परिवार के अलावा उन्हें कोई दलित नेता नहीं मिलता, जो चुनाव लड़ सके. गौरतलब है कि लोजपा के हिस्से में आई छह में से तीन सीटों पर तो उनके परिवार के सदस्य ही चुनाव लड़ रहे हैं.

जमुई से रामविलास के पुत्र चिराग पासवान, हाजीपुर से उनके भाई पशुपति कुमार पारस और समस्तीपुर से उनके दूसरे भाई रामचंद्र पासवान चुनाव लड़ रहे हैं. विपक्ष आरोप लगा रहा है कि पशुपति कुमार पारस तो वैसे ही बिहार सरकार में मंत्री हैं, तो उनके स्थान पर किसी दलित कार्यकर्ता को क्यों नहीं चुनाव लड़ाया गया. इन तीन सीटों के अलावा लोजपा ने नवादा से चंदन कुमार, खगड़िया से महमूद अली कैसर, वैशाली से मुगेंर की वर्तमान सांसद वीना देवी को प्रत्याशी बनाया है.

बताया जा रहा है कि इन वजहों से रामविलास पासवान के उपर से दलितों का भरोसा उठ रहा है और लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करके अपना रुख महागठबंधन की ओर कर रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि खुद उनके समाज के (पासवान) लोगों को भी यह लगने लगा है कि दलितों और पासवानों के नाम पर राजनीति करके रामविलास सिर्फ अपने परिवार के लोगों और कुछ अमीर लोगों को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं. इनका दलित समाज से कोई सरोकार नहीं है. हालांकि रामविलास पासवान का जनाधार उनसे कितना खिसका है, इसका पता तो 23 मई को ही चल पाएगा.

अमित शाह की पश्चिम बंगाल रैली पर ‘दीदी’ का साया, नहीं मिली इजाजत

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देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा चुनाव के छह चरण पूरे हो गए हैं लेकिन नेताओं के तौर-तरीके और निशाने पहले से भी तेज हो चले हैं. इस समय सियासी गलियारों में बीजेपी और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की कैट फाइट खासी चर्चा में है. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पं.बंगाल में दीदी पर जमकर प्रहार किए थे और अब बारी ममता की है. आज बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की प्रदेश के परगना जिले के जाधवपुर में दोपहर 11:00 बजे रैली थी जिसकी इजाजत ममता बनर्जी ने नहीं दी. बताया जा रहा है कि उनके हेलिकॉप्टर को भी लैंडिंग की परमिशन नहीं मिली है जिसके चलते उनकी … Read more

सिख दंगों की इस कहानी से अधिकतर लोग हैं बेखबर

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सैम पित्रोदा के ‘हुआ तो हुआ’ वाले बयान ने देशभर में फिर से 1984 में हुए सिख दंगों की यादों को ताजा कर दिया. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद भड़के उन दंगों ने देश में एक बाद फिर से राजनीति में भूचाल सा ला दिया है. असल में उन दंगों के पीछे एक कहानी है जो अधिकतर लोगों को पता ही नहीं है. 1978 के एसजीपीसी चुनावों में कांग्रेस के नेता ज्ञानी जैल सिंह ने एक भस्मासुर को समर्थन दिया था. यह भस्मासुर कोई और नहीं बल्कि दल खालसा का चीफ जरनैल सिंह भिंडरांवाले था.

जरनैल सिंह भिंडरांवाले कोई देवता नहीं बल्कि उस वक्त भारत को तोड़कर अलग खालिस्तान की मांग कर रहा था. वैसे ही जैसे आज कश्मीर के अलगाववादी कर रहे हैं. 1971 के युद्ध के बाद उसकी अलग खालिस्तान की मांग को पाकिस्तान परोक्ष रूप से समर्थन दे रहा था. देश के भीतर अकाली दल उसके साथ खड़ी थी.

1982 में भिंडरावाले ने हरमंदिर साहिब स्थित सिखों की प्रतिष्ठित संस्था दमदमी टकसाल पर कब्जा कर लिया और अकाली दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया. अकाली दल के साथ उसका यह गठबंधन एक तरह से आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पर जनादेश की मांग था जहां अलग खालिस्तान का समर्थन किया गया था.

खैर, वह अपनी इस योजना में सफल नहीं हो सका. हरमंदिर साहब में सेना ने घुसकर भिंडरावाले को खत्म कर दिया. लेकिन भिंडरावाले तो भस्मासुर था और उसके रक्तबीज आज भी मौजूद हैं. इतने सालों बाद भी अलग खालिस्तान की मांग खत्म नहीं हुई है. आज भी सिखों का एक वर्ग ऐसा है जो भिंडरावाले को ‘संत’ मानता है. उस वक्त भिंडरावाले को खत्म करने की कीमत इंदिरा गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी.

दिल्ली में 1984 का सिख विरोधी दंगा इसी पृष्ठभूमि में हुआ था. आप कल्पना कर सकते हैं लोगों के मन-मानस में सिखों के प्रति कितना गुस्सा रहा होगा. अगर आज कश्मीर के अलगाववादियों के खिलाफ इतना गुस्सा है तो इससे कई गुना ज्यादा गुस्सा उस वक्त सिख अलगाववादियों के खिलाफ था. इसकी वजह रही कि सिखों से किसी को उम्मीद नहीं रही थी कि वो देश को तोड़ने की बात करेंगे.

इसी दबे हुए गुस्से को हवा दे दी इंदिरा गांधी की हत्या ने. दिल्ली में सिखों का कत्लेआम हुआ, ये बात सही है लेकिन इस परिस्थिति के लिए सिखों का एक वर्ग भी जिम्मेदार था. क्रिया प्रतिक्रिया का ये दौर करीब डेढ़ दशक तक चलता रहा. बाद के दिनों में एक सिख पुलिसवाले ने ही पंजाब से इस खालिस्तानी आतंकवाद को खत्म करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई, ये भी उतना ही सच है.

सिख दंगों का घोषित परिणाम ये हुआ कि देशभर में सिख अलगाववाद खत्म हो गया. वहीं अघोषित परिणाम ये हुआ कि चौरासी के चुनाव में राजीव गांधी को अभूतपूर्व बहुमत मिला. तीन चौथाई सीटें कांग्रेस को मिली. यह फायदा कुछ वैसा ही था जैसे 2002 के दंगों का फायदा आज तक मोदी को मिल रहा है. बात कड़वी है लेकिन सच्चाई यही है. अगर गुजरात का मुस्लिम विरोधी दंगा क्रिया की प्रतिक्रिया थी तो दिल्ली का सिख विरोधी दंगा भी क्रिया की प्रतिक्रिया ही थी. दोनों जगहों पर सामाजिक प्रतिक्रिया मुखर हुई जिसका राजनीतिक दलों ने अपने-अपने लाभ के मुताबिक समर्थन या विरोध किया.

खैर… वो इतिहास का ऐसा काला अध्याय है जिसके पन्ने पलटने से कुछ हासिल नहीं होगा. लेकिन आज राजनीतिक रूप से जो बीजेपी सिख दंगों के लिए कांग्रेस को दोषी करार दे रही है, उस वक्त कांग्रेस बीजेपी पर आरोप लगा रही थी कि वह देश के टुकड़े करने वालों का साथ दे रही है. कर्नाटक के शिमोगा की एक रैली में राजीव गांधी ने कहा था, ‘बीजेपी न जाने क्यों देश को तोड़ने की बात करने वालों का साथ दे रही है. फिर चाहे वह सीपीआईएम हो या अकाली दल.’

राजीव गांधी के इस बयान का उस वक्त कितना खतरनाक मतलब था, इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं जैसे कोई राजनीतिक दल आज कश्मीर में सैयद अली शाह गिलानी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतर जाए.

फिर एक बड़ी भूमिका में नजर आएंगेे गहलोत, आलाकमान ने सौंपी बड़ी जिम्मेदारी

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इस बार का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो जैसा है. इसी के चलते सियासत के जादूगर और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को चुनावी परिणाम आने से पहले कांग्रेस आलाकमान ने एक और अहम जिम्मेदारी दी है. राहुल गांधी ने खास टास्क देते हुए गहलोत को यूपीए के दलों और अन्य विपक्षी दलों से बातचीत करते हुए उन्हें साधने की जुगत में लगा दिया है. गहलोत के साथ कोषाध्यक्ष अहमद पटेल को भी इस काम में शामिल किया है. लिहाजा गहलोत ने दिल्ली में दो दिन डेरा डालते हुए इस रणनीति पर काम शुरु कर दिया है. हालांकि गहलोत अब जयपुर लौट आए हैं लेकिन फोन के जरिए लगातार अन्य दलों के प्रमुख नेताओं से संपर्क में बने हुए हैं.

दिल्ली में गहलोत ने अहमद पटेल से पहले हर राज्य के संभावित परिणाम पर मंत्रणा की. उसके बाद जोधपुर हाउस में कईं अन्य दलों के नेताओं से गुप्त मुलाकात भी की. बता दे कि कर्नाटक और गुजरात सहित कई राज्यों में गहलोत संकटमोचक की भूमिका में पार्टी के लिए उभरकर सामने आए थे, जिनकी बदौलत उन्हें फिर से राजस्थान का मुख्यमंत्री का दायित्व ​सौंपा गया.

केंद्र में कांग्रेस की संभावित सरकार बनाने के आधार में जुटे गहलोत
दिल्ली में अहमद पटेल से चर्चा करने के बाद चाणक्य गहलोत यूपीए सरकार बनाने के आंंकड़े पर काम में जुट गए हैं. गहलोत सहित कांग्रेस के कद्दावर नेताओं का मानना है कि बीजेपी इस बार केवल 200 सीटें ही जीत पाएगी. ऐसे में यूपीए के अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई जा सकती है. सहयोगी दलों की सीटें कम पड़ने पर गैर यूपीए-एनडीए दल या फिर एनडीए के साथ वाली पार्टियों को कैसे तोड़ा जाए, इस कार्य में सियासी जादूगर का अनुभव और सहयोग लिया जाए. अगर कांग्रेस की उम्मीदों के तहत बीजेपी की गाड़ी 200 सीटों पर अटक जाती है तो फिर गहलोत जैसे वरिष्ठ नेताओं का लंबा सियासी तजुर्बा और उनकी अन्य दलों से ट्यूनिंग यूपीए की सरकार बनानेे में मददगार साबित होगी.

अगर बीजेपी 225 सीटों का आंकड़ा पार करती है तो नरेंद्र मोदी को पीएम बनने से कैसा रोका जाए, इसमें जादूगर के दांवपेंच बेहद काम आ सकते हैं. गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता ही अन्य दलों को बीजेपी के किसी अन्य नेता को पीएम प्रोजेक्ट के लिए आगे करने की शर्त के लिए तैयार करा सकते हैं.

गहलोत के साथ अन्य वरिष्ठ नेता भी देखेंगे काम
अशोक गहलोत के साथ कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को भी ऐसी जिम्मेदारियां दी गई हैं. गहलोत के साथ अहमद पटेल, एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल, पी.चिदंबरम, मुकुल वासनिक और गुलाम नबी आजाद आदि उन प्रमुख नेताओं की लिस्ट में शामिल हैं जो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के निर्देश पर चुनावी गणित के आंकड़ों को देख रहे हैं. गहलोत ने दो दिन दिल्ली में नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठक करते हुए गहनता से हर राज्य की लोकसभा सीटों के संभावित परिणाम को लेकर फीडबैक जुटाया है. वैसे भी गहलोत के राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं से अच्छे रिश्ते जगजाहिर हैं.

कर्नाटक-गुजरात में गहलोत ने दिखाया था जलवा
बताया जा रहा है कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद जेडीएस को देने का आईडिया अशोक गहलोत ने ही दिया था. इस पर आलाकमान ने उन्हें फ्री हैंड दे दिया. उसके बाद गहलोत ने कर्नाटक में कई दिनों तक डेरा डालते हुए कांग्रेस के समर्थन से जेडीएस की सरकार बना डाली. उससे पहले गुजरात के प्रभारी रहते हुए उन्होंने पीएम मोदी के गृहराज्य में मजबूती से विधानसभा चुनाव लड़ते हुए एक बार तो बीजेपी के छक्के छुड़ा दिए थे. यह गहलोत की रणनीति का ही कमाल था कि कांग्रेस 80 सीटों तक पहुंच गई. उसके बाद से गहलोत आलाकमान के लिए एक बार फिर आंखों का तारा बन गए.

अलवर की बेटी के साथ रेप होने पर अवॉर्ड वापसी गैंग चुप क्यों: मोदी

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उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और राजस्थान सरकार पर जमकर धावा बोला. पीएम मोदी ने अलवर में एक महिला के साथ गैंग रेप मामले को याद दिलाते हुए कहा, ‘बीते दो-तीन दिन से राजस्थान के अलवर की एक खबर आप पढ़ रहे होंगे. वहां एक दलित बेटी के साथ दो हफ्ते पहले कुछ दरिंदों ने बलात्कार किया. लेकिन उन दरिंदों को पकड़ने के बजाय वहां की पुलिस और वहां की कांग्रेस सरकार इस केस को ही छिपाने-दबाने में जुट गई. राजस्थान में भी चुनाव थे इसलिए वहां की कांग्रेस सरकार उस बिटिया को न्याय दिलाने के बजाय चुनाव बीतने … Read more