मायावती की बौखलाहट स्वाभाविक, लेकिन बसपा के हालत बिगड़ने के पीछे वह खुद जिम्मेदार

राजस्थान (Rajasthan) में चुनाव जीते सभी छह बसपा विधायकों के कांग्रेस में जाने के बाद मायावती (Mayawati) की बौखलाहट स्वभाविक है. उन्होंने आरोप लगाया है कि कांग्रेस पैसे खर्च करके उनकी पार्टी के विधायकों को तोड़ रही है. यह आरोप लगाने से पहले उन्हें आत्मविश्लेषण की जरूरत है कि जो बहुजन समाज पार्टी कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ दलित आंदोलन के रूप में उभरकर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के साथ ही राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बन गई थी, वह सिर्फ मायावती की मनमानी के कारण इस हालत में पहुंच गई है कि उत्तर प्रदेश से बाहर पार्टी के विधायकों पर उनका नियंत्रण नहीं रह गया है. दूसरे शब्दों में कहें तो बसपा का केंद्रीय ढांचा चरमरा गया है.

मायावती को यह आरोप नहीं लगाना चाहिए कि उनके विधायक पैसे लेकर दूसरी पार्टी में जा रहे हैं. हकीकत यह है कि मायावती पर पैसे लेकर टिकट बांटने के आरोप पहले से लगते रहे हैं. राजस्थान में एक बसपा नेता खुलेआम कह चुके हैं उनकी पार्टी प्रमुख पैसे लेकर टिकट देती है और उससे ज्यादा पैसे मिल जाएं तो वह उम्मीदवार भी बदल देती है. मायावती ने इन आरोपों का कभी खंडन नहीं किया है. अपने जन्मदिन पर करोड़ों रुपए के नोटों की माला पहने हुए मायावती की तस्वीरें अभी तक लोगों को याद है.

मौजूदा स्थिति में राजनीति पर भाजपा का वर्चस्व हो चुका है. कांग्रेस प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में अपना अस्तित्व बनाए हुए है. भाजपा और कांग्रेस, दोनों में ही दलित मतदाताओं पर पकड़ बनाने की होड़ है, जो कि बड़ी संख्या में बसपा से जुड़े हुए हैं. उत्तर प्रदेश से बाहर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में बसपा टिकट पर चुनाव जीतकर जो विधायक बन गए हैं, उन पर उनकी पार्टी के हाईकमान का नियंत्रण नहीं है. बसपा में मायावती एकमात्र हाईकमान है. उन्होंने पार्टी में अपने अलावा और किसी का कद बढ़ने ही नहीं दिया. इस वजह से कई दलित नेता बसपा से किनारा कर गए हैं.

राजस्थान में जिन छह विधायकों ने बसपा छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ले ली है, उनमें से पांच करोड़पति हैं और एक की संपत्ति एक करोड़ से पांच लाख रुपए कम है. मतलब सभी अच्छे-खासे संपन्न हैं. ज्यादातर विधायक ऐसे हैं, जो कांग्रेस से या भाजपा से टिकट नहीं मिलने के बाद बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े हैं. ऐसे विधायकों को अब पार्टी के हित से ज्यादा अपना निजी राजनीतिक भविष्य ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगा है. देश में ऐसे कई नेता हैं, जो किसी विचारधारा से बंधे हुए नहीं हैं और राजनीति उनके लिए व्यवसाय है. वे एक पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर दूसरी पार्टी का टिकट लेने का प्रयास करते हैं. बसपा ऐसे लोगों को टिकट दे देती है, जो प्लेटफार्म की तरह बसपा का इस्तेमाल कर लेते हैं. पार्टी को इस स्थिति में पहुंचाने के लिए मायावती के अलावा और कौन जिम्मेदार है?

बहरहाल मायावती का विलाप चलता रहेगा और बसपा के टिकट जीतने वाले संपन्न विधायक मौका परस्त बने रहेंगे. बसपा का चुनाव चिन्ह हाथी है. मायावती समझती होंगी कि हाथी पर काबू करना बहुत मुश्किल है और उनका हाथी पूरे देश में मंथर गति से आगे बढ़ भी रहा था, लेकिन राजस्थान में अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने हाथी पर काबू करने की जादूगरी दिखा दी है. दस साल पहले भी बसपा के छह विधायक गहलोत सरकार के साथ जुड़ गए थे और कांग्रेस में शामिल हो गए थे. इस बार भी बसपा के छह विधायक गहलोत के समर्थन में कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. मायावती का विलाप फिजूल है. विधायकों के बसपा छोड़ने के लिए पैसे के लालच के अलावा अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं. मायावती को कोई भी आरोप लगाने से पहले अपनी पार्टी का सांगठनिक ढांचा दुरुस्त करना चाहिए.

वीडियो खबर: गहलोत ने पूरा किया अपना होमवर्क

राजस्थान (Rajasthan) में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के छह विधायक बगैर किसी दबाव या प्रलोभन के कांग्रेस में शामिल हो गए. ऐसा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) का कहना है. बहरहाल राज्य के सभी BSP MLAs ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली और अब मंत्रिमंडल के विस्तार और फेरबदल की अटकलें जोर पकड़ रही हैं. ऐसे में गहलोत ने न सिर्फ राज्य में सरकार का बहुमत पहले से मजबूत किया है, साथ ही राजनीति में अपनी दूरदर्शिता का उम्दा परिचय भी दिया है.

गहलोत के राजनीतिक कौशल के पीछे सरकार के इस मंत्री की भूमिका

राजस्थान (Rajasthan) में बसपा (BSP) के छह विधायकों को कांग्रेस (Congress) में लाने के पीछे सुभाष गर्ग (Subhash Garg) की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है, जो कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खास हैं और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के विधायक के रूप में गहलोत सरकार को समर्थन देते हुए मंत्री भी बने हुए हैं. इन खबरों के बीच कई कांग्रेस नेता सवाल उठाने लगे हैं कि सुभाष गर्ग अगर दूसरी पार्टी के विधायकों को कांग्रेस में ला सकते हैं तो खुद कांग्रेस में शामिल क्यों नहीं हो जाते? विधानसभा चुनावों से पहले सुभाष गर्ग भरतपुर सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे. यह ब्राह्मण बहुल क्षेत्र है, इसलिए पार्टी में … Read more

पायलट निवास पर बढ़ी हलचल, वरिष्ठ कांग्रेस नेता और विधायकों का जमावडा

बसपा (BSP) के सभी 6 विधायकों के कांग्रेस (Congress) में विलय के बाद राजस्थान (Rajasthan) में एक बार फिर से राजनीतिक हलचल तेज हो गयी है. बुधवार को पूरे दिन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (Rajasthan Congress) और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट (Sachin Pilot) के निवास पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं व विधायकों कि हलचल देखी गई. पार्टी के कई वरिष्ठ नेता, विधायक और कार्यकर्ता पायलट से मिलने उनके निवास पहुंचे, जहां कई नेताओं के साथ तो पायलट की काफी लंबी मंत्रणा चली.

पायलट के निवास पहुंचने वालों में वरिष्ठ नेता रघुवीर मीना, मांगीलाल गरसिया, डाॅ. चयनिका उनियाल, भगवाना राम, रिछपाल मिर्धा, करण सिंह राठौड, गोपाल सिंह शेखावत, नागराज मीना, नाना लाल नीनामा, भानुप्रताप सिंह, चुन्नीलाल राजपुरोहित, विधायक संयम लोढा, वीरेंद्र सिंह, गजेंद्र सिंह शक्तावत, महेंद्र मालवीय, दीपेंद्र सिंह शेखावत, गणेश घोगरा, रामलाल मीना, गोविंद राम मेंघवाल, पं. भॅवर लाल शर्मा, इंद्र राज गुर्जर, वेद प्रकाश सोलंकी सहित कई अन्य नेता और कार्यकर्ता शामिल थे.

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माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के स्तर पर बिना किसी प्रलोभन और लालच के स्वेच्छा से बसपा छोड़ कांग्रेस में आये सभी विधायकों को सम्मान स्वरूप ईनाम देने की तैयारियां जोरों पर है. इसके लिए आने वाले दिनों में प्रदेश में बहुप्रतीक्षित राजनीतिक नियुक्तियों के साथ ही मन्त्रिमण्डल विस्तार-फेरबदल देखने को मिलेगा. ऐसे में वर्षों से पार्टी की सेवा कर रहे कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं. उनका डर ये है कि बसपा से आये विधायकों को एडजस्ट करने में उनका नम्बर कट सकता है दूसरी और उनके कैम्प को भी देखा जायेगा, मतलब की अमुख नेता-विधायक गहलोत कैम्प से आता है या पायलट कैम्प से.

गौरतलब है कि राजस्थान में जब एक व्यक्ति एक पद की मांग ने जोर नहीं पकड़ा और सोनिया गांधी ने भी संगठन में किसी तरह के बदलाव की सहमति नहीं दी तो पायलट का उत्साह बढ़ गया था. लेकिन इसके एक हफ्ते बाद ही गहलोत ने राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी के सभी छह विधायकों को कांग्रेस में शामिल करवाने की जादूगरी दिखा पार्टी में अपना रुतबा बढ़ा लिया है. इस कारण पायलट कैम्प के नेता-विधायकों को चिंता सताने लगी है, की पालयट और गहलोत की आपसी खींचतान का खामियाजा उन्हें नहीं उठाना पड़ जाये.

वहीं राजनीतिक नियुक्तियों के संदर्भ में सचिन पायलट ने साफ तौर पर कहा है कि खून-पसीना बहाकर राजस्थान में कांग्रेस की सरकार लाने वाले कार्यकर्ताओं को पूरा सम्मान मिलना चाहिए. राजनीतिक नियुक्तियों में पार्टी के सच्चे और मेहनती कार्यकर्ताओं को ही आगे लाया जाएगा. पार्टी की अंतरिम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) भी कह चुकी हैं कि सत्ता और संगठन में बेहतर तालमेल होना चाहिए. इसका मतलब यह भी निकलता है कि कांग्रेस सरकार में पार्टी बदलने वाले बसपा विधायकों (BSP MLAs) को राजनीतिक नियुक्तियों की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

कांग्रेस में शामिल होने वाले बसपा विधायकों का पार्टी बदलने का इतिहास

राजस्थान (Rajasthan) में BSP के जो छह विधायक कांग्रेस (Congress) में शामिल हुए हैं, उनमें से पांच करोड़पति हैं पहले भी पार्टी बदलते रहे हैं. ये अपने क्षेत्र के ऐसे दबंग नेता हैं, जिन्हें जो पार्टी महत्व देती है, उसका दामन थाम लेते हैं. पार्टियां भी क्षेत्र के मतदाताओं में इनकी पकड़ को देखते हुए इन्हें अपने साथ जोड़ने का जैसे इंतजार ही करती रहती हैं. इन दबंग नेताओं ने बड़ी मेहनत करके राजनीति में अपना मुकाम बनाया है. ये सभी अत्यंत संपन्न नेता हैं. हालांकि विधायक वाजिब अली (Wajib Ali) ने पहली बार पार्टी बदली है.

नदबई विधानसभा क्षेत्र से बसपा विधायक चुने गए जोगेन्द्र सिंह अवाना उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और वहीं कांग्रेस में शामिल हुए थे. 2017 के विधानसभा चुनाव में नोएडा से टिकट चाहते थे, नहीं मिला. वह कांग्रेस छोड़कर बसपा में शामिल हो गए और राजस्थान के नदबई विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय हो गए. 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बसपा ने टिकट दे दिया. उप्र में असफल होने के बाद वह राजस्थान में चुनाव जीत गए और उनका विधानसभा में जाने का सपना पूरा हुआ. वह स्वभाव से कांग्रेसी रहे हैं और कांग्रेस में ही उनकी जड़ें हैं. बसपा का टिकट मिलने के चुनाव जीतते ही वह कांग्रेस में प्रवेश कर गए. जोगेन्द्र सिंह अवाना करीब 22 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक हैं.

उदयपुरवाटी क्षेत्र के विधायक राजेन्द्र सिंह गुढ़ा पहली बार 2008 में बसपा के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे थे. उसके बाद वह बसपा छोड़कर मामूली अल्पमत वाली गहलोत सरकार को समर्थन देने के लिए कांग्रेस में चले गए थे और मंत्री बन गए थे. 2018 में वह फिर बसपा के टिकट पर चुनाव लड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. उनकी संपत्ति करीब 95 लाख रुपए बताई जाती है.

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किशनगढ़ बास क्षेत्र के विधायक दीपचंद भी मूलतः कांग्रेसी हैं. 2013 के विधानसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस का टिकट मिला था और वह चुनाव हार गए थे. 2018 के चुनाव में उन्होंने बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और हार गए. 2018 में वह बसपा में शामिल हो गए. उन्हें किशगढ़ बास क्षेत्र से टिकट मिला. वह बसपा के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद अब फिर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. उनकी संपत्ति करीब तीन करोड़ रुपए है.

तिजारा क्षेत्र के विधायक संदीप कुमार ने भाजपा में शामिल होने के बाद राजनीति शुरू की. 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो वह बसपा में शामिल हो गए. वह बसपा का टिकट मिलने के बाद चुनाव जीत गए हैं. करीब 3.50 करोड़ के मालिक संदीप कुमार अब कांग्रेस में रहकर अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने का प्रयास करेंगे.

करौली क्षेत्र के विधायक लाखन सिंह 2013 में किरोड़ी लाल मीणा की पार्टी राजपा के टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन हार गए. किरोड़ी लाल मीणा के भाजपा में चले गए तो राजपा का भी भाजपा में विलय हो गया. तब लाखन सिंह ने बसपा का दामन थामा. 2018 में बसपा के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद वह कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. उनकी संपत्ति करीब सात करोड़ रुपए है.

भरतपुर संभाग में नगर क्षेत्र के विधायक वाजिब अली आस्ट्रेलिया में शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारत लौटे और बसपा के सदस्य बने. बसपा के टिकट पर 2013 में चुनाव लड़ा, जीत हासिल नहीं हुई, लेकिन वह क्षेत्र में सक्रिय रहे. 2018 में उन्हें बसपा ने फिर से टिकट दिए. इस बार उन्होंने विधानसभा चुनाव जीत लिया. अब वह कांग्रेस में शामिल हो गए हैं.

बसपा विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने के बाद अब गहलोत और पायलट में बढ़ेगी रार

राजस्थान (Rajasthan) में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के छह विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने के बाद उप मुख्यमंत्री एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट (Sachin Pilot) ने कहा है कि वे बगैर किसी शर्त, प्रलोभन या लोभ-लालच के कांग्रेस में शामिल हुए हैं तो उनका स्वागत है. इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए. मीडिया से बातचीत में पायलट ने अपनी इस बात को 3 से 4 बार दोहराया. बसपा विधायकों के पार्ट बदलने के बाद से ही जो मंत्रिमंडल विस्तार-फेरबदल और राजनीतिक नियुक्तियों अटकलें शुरू हो गई है, उसके बीच पायलट का यह बयान अतिमहत्वपूर्ण है. राजनीतिक नियुक्तियों के संदर्भ में पायलट ने साफ तौर पर कहा है … Read more

राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियों को था बसपा विधायकों का इंतजार!

राजस्थान (Rajasthan) में बहुजन समाज पार्टी (BSP) के छह विधायक बगैर किसी दबाव या प्रलोभन के कांग्रेस में शामिल हो गए हैं, ऐसा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) का कहना है. बहरहाल राज्य के सभी BSP विधायकों ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली और अब मंत्रिमंडल के विस्तार और फेरबदल की अटकलें जोर पकड़ रही हैं. समझा जाता है कि पार्टी बदलने वाले विधायकों को इसमें पुरस्कृत किया जाएगा. मंत्रिमंडल विस्तार में सात-आठ नए मंत्री बन सकते हैं. इनमें बसपा विधायकों और निर्दलीयों को जगह मिल सकती है. लगता है पिछले 8-9 महीनों से प्रदेश में इन राजनीतिक नियुक्तियों को भी बसपा के उक्त विधायकों का ही इंतजार था. उक्त सभी पूर्व बसपा विधायकों ने सत्ताधारी सरकार को समर्थन दे रखा था. फेरबदल के तहत दो-तीन मंत्री हटाए जा सकते हैं और कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं.

लगता है दस साल पहले का घटनाक्रम दोहराया जा रहा है. उस समय भी गहलोत सरकार का बहुमत सुनिश्चित करने के लिए बसपा के छह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए थे. उनमें से तीन को मंत्री और तीन को संसदीय सचिव बनाया गया था. इस बार जो विधायक कांग्रेस में शामिल हुए हैं, उनको विभिन्न निगमों, बोर्डों का अध्यक्ष भी बनाया जा सकता है. फिलहाल 12 निर्दलीय विधायक भी गहलोत सरकार को समर्थन दे रहे हैं. इनमें से दो विधायकों को मंत्री बनाए जाने की संभावना है. सूत्रों के मुताबिक मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं.

मौजूदा सरकार में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) सहित 15 कैबिनेट और 10 राज्यमंत्री हैं. सरकार में मंत्री और संसदीय सचिवों की अधिकतम संख्या 30 हो सकती हैं. इसका मतलब यह कि पांच पद खाली हैं. उनको भरा जाएगा. इसके साथ ही दो-तीन मंत्रियों से इस्तीफा लेकर उनकी जगह अन्य विधायकों को मंत्री बनाया जाएगा. इस तरह सात-आठ नए मंत्री बनने की संभावना है. मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल के साथ ही विभिन्न निगम, आयोग और बोर्डों में भी नियुक्तियां शुरू हो जाएंगी. समझा जाता है कि ये नियुक्तियां बसपा विधायकों के कांग्रेस में प्रवेश के इंतजार में रुकी हुई थी.

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मंत्रिमंडल विस्तार-फेरबदल की संभावना के बीच कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की धड़कनें बढ़ गई हैं. वे मंत्री बनने की संभावनाएं देखने लगे हैं. ऐसे नेताओं ने गहलोत और पायलट के पास चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं. कुछ कांग्रेस नेता यह मानते हैं कि बसपा से आए विधायकों को ज्यादा तवज्जो मिलेगी. समर्पित कांग्रेस विधायकों की उपेक्षा करते हुए उन्हें ही मंत्री बनाया जाएगा. जिन दो-तीन मंत्रियों से इस्तीफे लिए जाएंगे, उनमें जयपुर और भरतपुर संभाग के विधायक शामिल हो सकते हैं.

जो बसपा विधायक कांग्रेस में शामिल हुए हैं, वे अपने विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस के उम्मीदवारों को हराकर चुनाव जीते हैं. वे हारे हुए उम्मीदवार क्षेत्र में कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं. ऐसे कांग्रेस नेताओं को मौजूदा घटनाक्रम से निराशा हो रही है. माना जा रहा है कि इन क्षेत्रों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का उत्साह कम हो जाएगा.

गौरतलब है कि बसपा प्रमुख मायावती (Mayawati) ने अपनी पार्टी के विधायकों के दलबदल के बाद लगातार तीन ट्वीट किए. एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी राजस्थान में कांग्रेस सरकार को पहले ही बिना शर्त दे रही थी. इसके बावजूद कांग्रेस ने बसपा विधायकों को तोड. इस तरह कांग्रेस ने एक बार फिर धोखेबाज पार्टी होने का प्रमाण दिया है. यह बसपा मूवमेंट के साथ विश्वासघात है. दूसरे ट्वीट में मायावती ने लिखा है कि कांग्रेस अपनी कटु विरोधी पार्टी/संगठनों से लड़ने के बजाय हर जगह उन पार्टियों को ही सदा आघात पहुंचाने काम करती है जो उन्हें सहयोग/समर्थन देते हैं. कांग्रेस इस प्रकार एससी, एसटी, ओबीसी विरोधी पार्टी है. तीसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा है, कांग्रेस हमेशा ही अंबेडकर विरोधी रही. इसी कारण अंबेडकर को देश के पहले कानून मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. कांग्रेस ने उन्हें न तो कभी लोकसभा में चुनकर जाने दिया और न ही भारत रत्न से सम्मानित किया. जो अति दुखद एवं शर्मनाक है.

इस पर मायावती के ट्वीट के जवाब में गहलोत ने छह ट्वीट किए. पहले-दूसरे ट्वीट में लिखा, बसपा विधायकों ने स्टेबल गवर्नमेंट की सोच से फैसला किया. मैं स्वागत करता हूं. तीसरा ट्वीट था, मायावतीजी का ऐसा रिएक्शन स्वाभाविक है… परंतु उनको यह भी समझना पड़ेगा कि यह सरकार में बैठे हुए लोगों ने मैनेज नहीं किया है. कोई प्रलोभन नहीं दिया है. गहलोत ने चौथे ट्वीट में लिखा, पहले भी हम लोग सरकार में थे, तब भी बीएसपी 6 लोग साथ आए थे. आज तक हमने कभी किसी को प्रलोभऩ नहीं दिया है. पांचवां ट्वीट था, हमने उन पर दबाव नहीं बनाया, उसके बाद फैसला होना स्वाभाविक फैसला है. छठा ट्वीट था, देश में जब कभी एलायंस हुआ है तो हम उन लोगों में हैं जो सोनिया गांधी, राहुलजी की भावना को समझते हुए हमेशा मायावतीजी के साथ में खड़े मिले हैं….इस बात वे स्वयं मेरे बारे में जानती हैं.

मायावती के ‘धोखेबाज पार्टी’ वाले ट्वीट पर गहलोत का पलटवार

BSP विधायकों के कांग्रेस में विलय पर मायावती (Mayawati) को जवाब देते हुए राजस्थान (Rajasthan) के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने कहा कि हमने कभी हॉर्स ट्रेडिंग नहीं की. उक्त सभी विधायकों ने राज्य में एक स्थिर सरकार की चाहत रखते हुए राजस्थान कांग्रेस (Rajasthan Congress) में शामिल होने का फैसला किया है. उन्हें कोई प्रलोभन नहीं दिया गया है.

सीएम गहलोत ने कहा कि मैं मायावती जी का रिएक्शन समझ सकता हूं जो स्वाभाविक भी है. लेकिन उनको भी यह समझना पड़ेगा कि यह सरकार में बैठे हुए लोगों ने मैनेज नहीं किया है, कोई प्रलोभन नहीं दिया है. यह हमारे प्रदेश की खूबी है कि हमने कभी हॉर्स ट्रेडिंग नहीं की.

गहलोत ने कहा कि पिछली सरकार में 6 बीएसपी विधायकों ने कांग्रेस ज्वॉइन की थी. आज तक इतिहास में हमने कभी किसी को प्रलोभन नहीं दिया है यह कोई कम बात है क्या? उन्होंने कहा कि अगर ऐसी स्थिति किसी अन्य राज्यों में होती तो बड़े रूप में हॉर्स ट्रेडिंग होती.

उन्होंने कहा कि विधायकों ने राजस्थान की स्थिति और भावनाएं देखते हुए सोच समझकर ये फैसला लिया है. हमने उन पर कोई दबाव नहीं बनाया.

वहीं बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर ट्वीट करते हुए कांग्रेस को गैर भरोसेमंद और धोखेबाज पार्टी बताया. मायावती ने कहा कि कांग्रेस ने दूसरी बार उनके साथ विश्वासघात किया है वो भी उस समय जब बीएसपी कांग्रेस सरकार को बाहर से बिना शर्त समर्थन दे रही थी.

उन्होंने इस मुद्दे को जातिगत मोड़ते हुए कहा कि कांग्रेस दलित विरोधी पार्टी है तथा इन वर्गों के आरक्षण के हक के प्रति कभी गंभीर व ईमानदार नहीं रही है. मायावती ने कांग्रेस पर संविधान निर्माता डॉ.भीमराव अंबेडकर की विचारधारा विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि कांग्रेस ने उन्हें न तो कभी लोकसभा में चुनकर जाने दिया और न ही भारतरत्न से सम्मानित किया. ये अति-दुःखद व शर्मनाक है.

गौरतलब है कि राजस्थान में बसपा के 6 विधायकों ने सोमवार देर रात मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से मिलकर कांग्रेस में शामिल होने की इच्छा व्यक्त करते हुए विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी को विलय पत्र पेश किया. इसके बाद राजेन्द्र गुढा (विधायक, उदयपुरवाटी), जोगेंद्र सिंह अवाना (विधायक, नदबई), वाजिब अली (विधायक, नगर), लाखन सिंह मीणा (विधायक, करोली), संदीप यादव (विधायक, तिजारा) और बसपा विधायक दीपचंद खेरिया ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की. इसके बाद कांग्रेस के पास विधानसभा में स्वयं का पूर्ण बहुमत हो गया है. इससे पहले उनके पास 100 सीटें थीं जो बढ़कर 106 हो गई हैं.

कांग्रेस की पिछली सत्ता में भी कमोबेश यही स्थिति थी जब 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 96 सीटें ही मिलीं थी. बाहरी विधायकों के समर्थन से अशोक गहलोत ने सरकार तो बना ली लेकिन अल्प बहुमत के चलते सरकार पर हमेशा सत्ता परिवर्तन की तलवार लटकी रहती थी. उस समय भी तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अप्रैल, 2009 में बसपा के सभी छह विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया और कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 102 हो गई.

वीडियो खबर: बसपा विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने पर क्या बोले पायलट

राजस्थान (Rajasthan) के डिप्टी सीएम सचिन पायलट (Sachin Pilot) ने BSP के 6 विधायकों के प्रदेश कांग्रेस में शामिल होने पर कहा कि मैं तहे दिल से उनका स्वागत करता हूं. इससे कांग्रेस सरकार (Rajasthan Congress) और मजबूत होगी. उन्होंने कहा कि सभी बसपा विधायक बिना लोभ और लालच के कांग्रेस में शामिल हुए हैं.

वीडियो खबर: अब नहीं होगा राजस्थान में बीजेपी का ऑपरेशन लोट्स

कर्नाटक और गोवा के बाद कयास यही लग रहे थे कि BJP का ‘ऑपरेशन लोट्स’ (Operation lots) का अगला शिकार राजस्थान की कांग्रेस सरकार हो सकती है. लेकिन यहां ‘जादूगर गहलोत’ ने इस संदेह को पूरी तरह से खत्म कर दिया. यहां प्रदेश के बहुजन समाज पार्टी (BSP) के सभी छह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गये जिससे न केवल बीजेपी बल्कि बसपा सुप्रीमो मायावती (Mayawati) को बड़ा झटका लगा है.