रुपाणी के इस्तीफे में चला संघ का डंडा या मोदी-शाह के बीच वर्चस्व की लड़ाई में बने ‘बलि का बकरा’!

गुजरात के CM के इस्तीफे की इनसाइड स्टोरी, जनवरी में RSS की बैठक में लिखी गई रुपाणी के इस्तीफे की स्क्रिप्ट, अगस्त के आखिर में भागवत के गुप्त दौरे में तारीख तय हुई, कोविड मिस मैनेजमेंट ने पिटवाई थी भद, विश्वस्त सूत्र बता दे रहे बड़ी खबर, मोदी-शाह में वर्चस्व की लड़ाई में गई रूपाणी की कुर्सी

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...तो इसलिए चली रुपाणी पर तलवार !
...तो इसलिए चली रुपाणी पर तलवार !
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Politalks.News/Gujrat. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अपने पद इस्तीफा दे दिया है. बिना किसी हलचल आखिर इस इस्तीफे के मायने क्या हैं? भाजपा सोर्सेस के मुताबिक विजय रुपाणी गुजरात के लिए कभी भी स्थाई CM थे ही नहीं, उनका जाना तो तय था, बस तारीख तय नहीं थी. तारीख पर मुहर संघ प्रमुख के हाल ही में हुए गुप्त दौरे में मिले फीडबैक के बाद लगा दी गई. हालांकि उन्हें 2022 की जनवरी या फरवरी में इस्तीफा देना था, लेकिन भागवत के गुप्त दौरे ने रुपाणी के CM पद की उम्र थोड़ी कम कर दी. दरअसल, संघ नए मुख्यमंत्री के साथ चुनावी रणनीति पर फाइनल ड्राफ्ट तैयार करना चाहता है. वहीं आनंदी बेन पटेल के हटाए जाने के बाद नितिन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया जाना था. लेकिन अमित शाह की जिद के चलते रूपाणी की लॉटरी लगी थी. सूत्रों को कहना है कि

दरअसल रुपाणी के इस्तीफे की नींव इस साल जनवरी में हुई RSS की बैठक में रखी गई और मुहर अगस्त के आखिर में हुए भागवत के दौरे में लगी. दरअसल अगले साल होने वाले चुनाव की रणनीति लगभग बनकर तैयार है. सूत्रों की मानें तो 15-16 सितंबर के बाद RSS दो बैठकें कर सकता है. एक बैठक राज्य स्तर की होगी, जिसमें भाजपा के नेता भी शामिल रहेंगे तो दूसरी बैठक RSS के पदाधिकारियों के बीच होगी. इसमें अखिल भारतीय स्तर की टॉप RSS लीडरशिप भी शामिल होगी.

जनवरी में अहमदाबाद में RSS की बैठक में भाजपा नेताओं के कार्यों की समीक्षा हुई थी. इसके बाद रुपाणी को इस्तीफे का संदेश दे दिया गया था, लेकिन उन्हें जनवरी-फरवरी 2022 तक का वक्त दिया गया था. सूत्रों की मानें तो उनके सितंबर 2021 में हटने की वजह संघ प्रमुख भागवत के गुप्त बैठक के दौरान मिले फीडबैक का नतीजा है. संघ सूत्रों की मानें तो 28-29 अगस्त को हुई गुप्त बैठक में संघ प्रमुख भागवत ने रुपाणी से साफ कहा था, कोरोना काल में गुजरात की छवि को भारी क्षति पहुंची है. इतना ही नहीं, पिछले चुनाव में भाजपा 99 का आंकड़ा जैसे तैसे छू सकी. दोनों बातों का गुजरात की जनता पर गहरा असर पड़ा है. रुपाणी जितने दिन पद पर रहेंगे, मतदाता की नाराजगी उतनी ही गहरी होती जाएगी. लिहाजा उन्हें RSS की सितंबर के दूसरे पखवाड़े में प्रस्तावित बैठक से पहले इस्तीफा देना होगा. रुपाणी के इस्तीफे को प्रीपोंड करने के पीछे RSS की सितंबर के दूसरे पखवाड़े में प्रस्तावित बैठक है. दरअसल, इस बैठक में संघ नए मुख्यमंत्री के साथ चुनावी रणनीति पर फाइनल ड्राफ्ट तैयार करना चाहता है.

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कोविड-19 क्राइसिस से निपटने में नाकामी
गुजरात में कोविड-19 को लेकर मिस-मैनेजमेंट देखने को मिला. पिछले साल खबरें आई थीं कि खुद मोदी और शाह भी रुपाणी से नाराज थे. यह इस्तीफा तो 2022 के विधानसभा चुनावों को लेकर लिया गया है

केंद्रीय नेतृत्व नहीं था खुश
विजय रुपाणी के इस्तीफे की मुख्य वजह उनके नॉन-परफॉर्मंस से जोड़ा जा रहा है. सूत्र इसे ‘कोर्स करेक्शन’ कह रहे हैं. केंद्रीय नेतृत्व रुपाणी के परफॉर्मंस से संतुष्ट नहीं था. स्ट्रैटजी सिम्पल है- अगर राज्य में नेतृत्व के खिलाफ कोई विरोध है तो उसे अभी ही खत्म किया जाए. चुनावों का इंतजार न किया जाए. उत्तराखंड और कर्नाटक में हम ऐसा देख चुके हैं. कर्नाटक में येदियुरप्पा को हटाया गया और उत्तराखंड में दो-दो रावत को.

पाटीदार आंदोलन को दबाने में नाकामी
भाजपा ने रुपाणी को विधानसभा चुनावों से ठीक एक साल पहले हटाया है. पार्टी ने 2017 में भले ही रुपाणी के नेतृत्व में सरकार बनाई थी, उसकी सीटें दो अंकों में रह गई थीं. रुपाणी से पाटीदार आंदोलन का गढ़ रहे सौराष्ट्र में अपना दबदबा बढ़ाने की उम्मीद की गई थी. रुपाणी को जब अगस्त 2016 में अमित शाह ने मुख्यमंत्री के तौर पर चुना तो लग रहा था कि वे पाटीदार आंदोलन को दबा देंगे, पर ऐसा हुआ नहीं.

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सभी समुदायों को नहीं साध सके रुपाणी
रुपाणी जैन-बनिया कम्युनिटी से ताल्लुक रखते हैं, जिसकी गुजरात की आबादी में हिस्सेदारी 5% है. 2016 में रुपाणी को न्यूट्रल कैंडिडेट के तौर पर आगे बढ़ाया गया था. उम्मीद की जा रही थी कि वे बाकी समुदायों के साथ सामंजस्य बिठा लेंगे, पर वे ऐसा नहीं कर सके. राजनीतिक पंडितों का कहना है कि पार्टी 2022 के विधानसभा चुनाव ऐसे नेता के नेतृत्व में नहीं लड़ना चाहती, जिसके साथ ज्यादातर समुदाय न हो. रुपाणी के खिलाफ कुछ समुदायों के नेता लामबंद भी हो रहे थे.

मोदी-शाह में वर्चस्व की लड़ाई!
गुजरात भाजपा के सूत्रों का कहना है कि विजय रुपाणी की ‘बलि’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के बीच चल रही कद की लड़ाई का परिणाम है. भले ही इसे दायित्व बदलने की स्वाभाविक कसरत या फिर अगले साल होने वाले चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर उठा कदम बताया या दिखाया जाए. हकीकत तो यही है कि मोदी और शाह के संबंध अब वैसे नहीं रह गए हैं, जैसे पहले हुआ करते थे. समय ने इस रिश्ते की गर्माहट को कम किया है और अब इस जोड़ी के दोनों किरदार एक दूसरे के कद से सशंकित होने लगे हैं. शाह की बढ़ती लोकप्रियता और कद को देखते हुए मोदी लगातार ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिससे अमित शाह के बढ़ते कदम को थामा जा सके.

आनंदी पटेल के बाद नितिन पटेल को सीएम बनाना चाहते थे शाह!
रुपाणी का इस्तीफा इसी की एक कड़ी है. आपको बता दें कि पीएम मोदी की करीबी रहीं आनंदीबेन पटेल को जब मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था, तब भी ऐसी चर्चाएं उठी थीं कि इसमें अमित शाह की भूमिका रही है. अमित शाह के पार्टी संगठन में बढ़ते कदम की बातें कही गई थीं. आनंदीबेन की जगह उनके व मोदी के करीबी नितिन पटेल को लाख कोशिशों के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल नहीं हो पाई थी. पटेल की जगह शाह के करीबी विजय रुपाणी ने कुर्सी हासिल करने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

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सीआर पाटिल के प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने के बाद जगजाहिर हुई कलह!
पिछले दिनों सीआर पाटिल को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनवाकर पीएम मोदी ने शाह को सबक देने का ही काम किया था. सीआर पाटिल पीएम मोदी के विश्वस्तों में रहे हैं. अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने गुजरात में शाह के करीबी नेताओं के कद कम करने से गुरेज नहीं किया. रुपाणी को भी इसका असर झेलना पड़ा. हालत तो यह थी कि सीआर पाटिल और विजय रुपाणी के मतभेद खुलकर सामने आ गए थे. मुख्यमंत्री के कामकाज पर पाटिल की दखलंदाजी का आलम यह हो गया था कि कभी किसी मसले पर रुपाणी से पत्रकार कोई सवाल करते तो वे कहते थे कि सीआर पाटिल से जाकर पूछिए.

 

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