मंडावा में रीटा का राजनीतिक भविष्य दाव पर, वहीं सुशीला सिंगड़ा की भी अग्निपरीक्षा

दो बार चुनाव हार चुकीं रीटा चौधरी का राजनीतिक करियर दाव पर तो वहीं टिकट के दावेदार स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करना सुशीला की अग्निपरीक्षा

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पॉलिटॉक्स ब्यूरो. राजस्थान के खींवसर और मंडावा में होने वाले विधानसभा उप चुनाव की बिसात पूरी तरह से बिछ चुकी है, मोहरे भी पूरी तरह टकराने के लिए तैयार हैं. बात करें मंडावा की तो यहां भाजपा ने कांग्रेस की आपसी फूट का फायदा उठाने के लिए अंतिम समय तक अपने पत्ते नहीं खोले और नामांकन भरने से डेढ़ घंटे पहले भाजपा में शामिल हुई और कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में हिस्सेदार रह चुकी सुशीला सिगरा (Sushila Sigra) को टिकट थमा दिया. इस सियासी दांव के पीछे भाजपा की रणनीति ये रही कि कांग्रेस ने मंडावा में रीटा चौधरी को प्रत्याशी के तौर पर उतारा है जिनकी सुशीला सिगरा से अदावत पुरानी है.

रीटा चौधरी (Rita Choudhary) यहां से दो बार पहले ही यहां से चुनाव हार चुकी है. इसके बाद भी उन्हें टिकट मिला जिससे स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है. इसी बात का फायदा उठाने के लिए भाजपा ने सुशीला सिंगड़ा को मंडावा से उम्मीदवार बनाया. लेकिन यहां बीजेपी को यही फायदा नुकसान भी दे सकता है, ऐसी कुछ संभावना यहां पनप रही है. ये स्थितियां सुशीला सिंगड़ा को परेशान कर रही है.

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दरअसल वर्तमान में झुंझुनूं पंचायत समिति प्रधान सुशीला सिगरा कांग्रेस की पूर्व नेता हैं जिन्होंने नामांकन के दिन ही भाजपा ज्वॉइन की. सुशीला सिगरा (Sushila Sigra) कांग्रेस से वर्ष 2000 से 2005 तक पहली बार प्रधान चुनी गई. फिर 2005 से 2010 तक जिला परिषद की सदस्य रही और 2010 से लगातार प्रधान पद पर आसीन हैं. रीटा चौधरी और सुशीला सिगरा (Sushila Sigra) में अदावत शुरू हुई पिछले साल. विधानसभा चुनाव 2018 में मंडावा से भाजपा के नरेंद्र खीचड़ के सामने चुनाव हारी रीटा चौधरी की शिकायत पर कांग्रेस ने सुशीला सिंगड़ा को पार्टी से निलंबित कर दिया. हालांकि वे पार्टी में ही रहीं.

सुशीला कांग्रेस नेता बृजलाल की पुत्रवधु हैं. वहीं सुशीला जिस झुंझुनूं पंचायत समिति की लगातार तीन बार प्रधान चुनी जा चुकी हैं, उनकी 14 ग्राम पंचायतें मंडावा विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है. सुशीला व उनका परिवार दिग्गज नेता शीशराम ओला का भी निकटस्थ रहा है. ऐसे में उनका जमीनी आधार और कांग्रेस की फूट का सीधा फायदा उठाने के लिए ही भाजपा ने सिंगड़ा को अपना चुनावी उम्मीदवार बनाया. जाट लैंड होने और हनुमान बेनीवाल के रूप में आरएलपी का साथ भी उनके वोटबैंक को मजबूती दे रहा है. वहीं विधायक रहने के बाद एक बार निर्दलीय और एक बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव हार चुकी रीटा चौधरी यहां जाना पहचाना नाम है. ये बात भी सुशीला के विपक्ष में जाती दिख रही है.

अब अंदर की कहानी ये है कि झुंझुनूं सांसद और मंडावा सीट से पूर्व विधायक नरेंद्र खींचड़ के बेटे अतुल खींचड़ का नाम उप चुनाव में संभावित प्रत्याशी के तौर पर सबसे ऊपर माना जा रहा था. अधिकांश कार्यकर्ता इससे सहमत भी थे. उनके बाद दो और नाम राजेश बाबल व गिरधारीलाल पैनल में प्रत्याशी के लिए भेजे गए थे. लेकिन प्रत्याशी चयन को लेकर परिवारवाद की तोहमत से बचने के लिए भाजपा ने कांग्रेस के कुनबे में ही सेंध लगाते हुए आनन-फानन में सुशीला सीगड़ा को पार्टी में शामिल कर उनके नाम पर मुहर लगाई. अब भाजपा का यही कदम स्थानीय कार्यकर्ताओं में नाराजगी का सबब बन गया.

यहां वर्षों से मेहनत कर रहे अतुल खींचड़ और उनके समर्थकों में भी इस बात की खासी नाराजगी है कि पार्टी नेताओं को छोड़ किसी बाहरी नेता को टिकट दिया गया. इसके बाद भाजपा में सुशीला सिगरा (Sushila Sigra) के विरोधी तो तैयार हो ही गये हैं, भाजपा नेताओं में भी कई फाड हो चली है. हालांकि अभी तक किसी भाजपाई नेता का नाम निर्दलीय के तौर पर विरोध में सामने नहीं आया लेकिन उनकी ये नाराजगी चुनाव प्रचार में साफ तौर पर दिख रही है.

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सुशीला सिगरा (Sushila Sigra) के चुनाव प्रचार में सतीश पूनिया, गुलाब चंद कटारिया, राजेंद्र राठौड़ जैसे सीनियर नेता और हनुमान बेनीवाल ही दिख रहे हैं. स्थानीय नेताओं का अभाव साफ साफ दिखाई दे रहा है. सूत्रों की माने तो इन दोनों नाराज कार्यकर्ताओं की फेहरिस्त लंबी है जिन्हें मनाने के लिए पार्टी के वरिष्ट नेता कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे. यहां निश्चित तौर पर भाजपा उम्मीदवार का पक्ष मजबूत है लेकिन कार्यकर्ताओं की नाराजगी रीटा चौधरी के पक्ष में जाती दिख रही है.

अब भाजपा के स्थानीय नेताओं की नाराजगी का फायदा उठाने की पूरी कोशिश रीटा चौधरी की है. मंडावा उप चुनाव के नतीजे निश्चित तौर पर दोनों पार्टियों के लिए चौंकाने वाले साबित हो सकते हैं. अगर सुशीला यहां से जीत दर्ज करने में कामयाब होती है तो कांग्रेस के गढ़ में एक बार फिर विजयी पताका फहराने में सफल होंगी. वहीं रीटा चौधरी मंडावा फतेह करती हैं तो ये सीट फिर से कांग्रेस की झोली में आ जाएगी. लेकिन अगर अब इस उपचुनाव में भी किसी वजह से अगर रीटा चौधरी यहां से हार जाती हैं तो भविष्य में उनके राजनीतिक करियर पर विराम भी लग सकता है.

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