देश की राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच क्षेत्रीय दलों की स्थिति चर्चा का विषय बनी हुई है। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में विपक्षी दलों के भीतर उठे राजनीतिक घटनाक्रमों ने राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डालने की बहस को जन्म दिया है. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस बुरी तरह से टूट गई है. विधानसभा से लेकर संसद तक पार्टी दो भागों में बंट गई है. इसके बाद महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी के 6 सांसद एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना में शामिल हो गए है. आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 राज्यसभा सांसद भी बीजेपी में शामिल हो गए है.
देश की राजनीति में बदलते घटनाक्रमों के बीच एक बड़ा सवाल सामने आ रहा है - क्या क्षेत्रीय दलों की कमजोरी राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के लिए अवसर बन सकती है?
पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में विपक्षी दलों के भीतर उभर रहे राजनीतिक मतभेदों ने यह चर्चा तेज की है कि क्या आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति फिर से बड़े दलों के इर्द-गिर्द केंद्रित होगी. इसी संदर्भ में कांग्रेस की भूमिका को लेकर भी विश्लेषण सामने आ रहे हैं.
दरअसल, मौजूदा समय में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस विपक्ष की प्रमुख पार्टियों में शामिल है. संसद में भाजपा के बाद कांग्रेस का प्रतिनिधित्व सबसे बड़ा है. लेकिन दूसरी ओर विपक्ष का बड़ा आधार अभी भी कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के पास मौजूद है.
यदि भविष्य में क्षेत्रीय दल कमजोर होते हैं, तो कांग्रेस को कई स्तरों पर संभावित लाभ मिल सकता है:-
* विपक्षी वोटों के बड़े हिस्से का पुनर्संगठन
* सीट बंटवारे में अधिक राजनीतिक स्पेस
* राज्यों में संगठन विस्तार का अवसर
* गठबंधन राजनीति में बढ़ी हुई निर्णायक भूमिका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई राज्यों में कांग्रेस को अभी तक क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बनाकर चुनाव लड़ना पड़ता रहा है. ऐसे में यदि क्षेत्रीय दलों का प्रभाव घटता है तो कांग्रेस सीधे अपने जनाधार को बढ़ाने की कोशिश कर सकती है.
हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है. क्षेत्रीय दलों की कमजोरी का लाभ हमेशा कांग्रेस को ही मिले, यह तय नहीं माना जाता. कई राज्यों में मजबूत स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक समीकरण सीधे राष्ट्रीय दलों की ओर नहीं जाते और सत्ताधारी दल भी इसका लाभ उठा सकते हैं.
इसके अलावा भारत की राजनीति लंबे समय से गठबंधन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के मॉडल पर आगे बढ़ी है. ऐसे में क्षेत्रीय दलों की स्थिति में बदलाव का असर सिर्फ कांग्रेस पर नहीं, बल्कि पूरे विपक्षी ढांचे और राष्ट्रीय चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है.
आने वाले विधानसभा चुनाव और विपक्षी दलों की रणनीति यह तय करेंगे कि बदलते राजनीतिक समीकरणों में कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत कर पाती है या क्षेत्रीय दल फिर नए रूप में उभरते हैं.










