कई राज्यों में बीजेपी के अंदर भारी घमासान, मजबूत केंद्रीय नेतृत्व के चलते जमीन के नीचे सुलग रहा लावा

भाजपा की राज्य इकाइयों में जारी है भारी घमासान! राष्ट्रीय मीडिया में दिखाई जा रही केवल कांग्रेस की कलह, बड़े राज्यों में नेतृत्व को लेकर घमासान जोरदार, सख्त और मजबूत केन्द्रीय नेतृत्व की वजह से खुलकर नहीं उठा पा रही कोई आवाज

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Politalks.News/Bharat. भारत की सियासत में इस बात पर कोई संदेह नहीं है की भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बहुत मजबूत है और उसकी मर्जी के बगैर पत्ता तक नहीं हिलता है. लेकिन यह भी हकीकत है कि कई राज्यों में भाजपा के अंदर जबरदस्त घमासान छिड़ा है. यह अलग बात है कि राष्ट्रीय मीडिया में सिर्फ कांग्रेस संगठन के झगड़ों की ही खबरें चलती हैं. केरल से लेकर पंजाब तक कांग्रेस के झगड़े तो राष्ट्रीय मीडिया में दिख रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ़ से लेकर त्रिपुरा और कर्नाटक से लेकर राजस्थान, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली आदि राज्यों में चल रहे भाजपा के झगड़ों पर किसी की नजर नहीं है.

सबसे पहले बात करते हैं मरुधरा यानी राजस्थान की, मरुधरा की बीजेपी इकाई में तो जबरदस्त तपिश है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर प्रदेश नेतृत्व की ओर से कई बार बयानबाजी की गई है. बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां ने वसुंधरा खेमे के एक खास सिपहसालार पूर्व मंत्री रोहिताश्व को बयानबाजी के लिए 6 साल के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया. इधर मैडम वसुंधरा राजे खुद एक्टिव हो गई हैं. उन्होंने भारी बारिश से प्रभावित हाड़ौती अंचल का सरकार से पहले दौरा किया और समय समय पर विभिन्न मुद्दों पर गहलोत सरकार को घेरती रहती हैं. राजस्थान बीजेपी के लिए तो यहां तक कहा जाता है कि पार्टी में 8 से 9 मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं जो समय समय पर अपना शक्ति प्रदर्शन करते रहते हैं.

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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के बीच कुर्सी को लेकर चल रही खींचतान की खबरें कई दिन तक देश भर में चलीं लेकिन उसी छत्तीसगढ़ में भाजपा के अंदर भी कम घमासान नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के बीच ऐसी तनातनी है कि जगदलपुर में हुए चिंतन शिविर में दोनों खेमों ने अपनी ताकत दिखाई. कुछ केंद्रीय नेताओं की मदद से अग्रवाल खेमे ने रमन सिंह खेमे को हाशिए में डाल दिया. विवाद इतना साफ दिखने लगा था कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के क्षेत्रीय प्रचारक दीपक विस्फुटे और प्रांत प्रचारक प्रेमशंकर सिदार चिंतन शिविर में गए ही नहीं.

उधर त्रिपुरा में मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने लंबी जद्दोजहद के बाद अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया. बुधवार को तीन नए मंत्रियों को शपथ दिलाई गई लेकिन भाजपा के पांच बागी विधायक शपथ समारोह में शामिल नहीं हुए. पूर्व मंत्री सुदीप रॉय बर्मन के नेतृत्व में उन्होंने अलग बैठक की. पश्चिम बंगाल में पार्टी का एक खेमा अलग उत्तर बंगाल राज्य के गठन की मांग कर रहा है तो दूसरा खेमा इसका विरोध कर रहा है. एक खेमा तृणमूल नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई का समर्थन कर रहा है तो दूसरा इसके विरोध में पार्टी छोड़ रहा है. मुकुल राय के बाद पिछले दो दिन में दो विधायकों- तन्मय घोष और बिस्वजीत दास ने पाला बदल कर तृणमूल का दामन थाम लिया.

कर्नाटक में मंत्री बनने से रह गए भाजपा विधायकों ने सीधा मोर्चा खोला है और मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा उन्हें समझाने में लगे हैं. हालांकि येदियुरप्पा के बेटे को मंत्री नहीं बनाने से उनके समर्थक खुद ही नाराज हैं. झारखंड में कुछ समय पहले ही अपनी पार्टी का विलय करके लौटे बाबूलाल मरांडी अपने दो-तीन चेले चपाटों के सहारे सरकार गिराने की मुहिम में लगे हैं. लेकिन खुद भाजपा मुख्यमंत्री और दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के तीन खेमे में बंटी है.

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महाराष्ट्र में पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस, केंद्रीय मंत्री नारायण राणे और प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल के तीन खेमे बने हैं और तीनों अलग अलग रास्ते चल रहे हैं. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और कैलाश विजयवर्गीय ने ‘ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे’ गा तो दिया लेकिन इससे अंदरूनी कलह थमी नहीं है. केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर का खेमा तो ताक में बैठा ही है. वहीं केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की जन आशीर्वाद यात्रा को जोरदार समर्थन मिला है. जिसके बाद से उनकी महत्वकांक्षाएं उछाले मार रही हैं.

उत्तर प्रदेश में कुछ भी कहे बीजेपी लेकिन यहां भी अंतर्कलह तो है. योगी आदित्यनाथ, केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश शर्मा के बीच कोल्ड वॉर है. तो योगी जी और संगठन महामंत्री सुनील बंसल की टशल तो जगजाहिर है. गुजरात में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटील और प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी के बीच सब कुछ ठीक नहीं है. पीएम मोदी ने मुख्यमंत्री विजय रुपाणी के साथ ताउते तूफान से प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया. लेकिन इस सर्वेक्षण के बाद मोदी ने गुजरात बीजेपी के अध्यक्ष सी आर पाटिल के साथ एक अलग बैठक की और इस बैठक में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी को नहीं बुलाया गया. शायद सी आर पाटिल यह संदेश देना चाहते थे कि वह मोदी के ज्यादा करीब हैं और आने वाले समय में उन्हें गुजरात में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है.

दरअसल, विजय रुपाणी के समर्थकों का सीआर पाटिल पर हमेशा आरोप रहता है कि उन्होंने संगठन पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है और विजय रुपाणी के समर्थकों को नजरअंदाज करने की कोशिश करते हैं. वहीं बिहार में NDA की सरकार है लेकिन सुशील मोदी की सरकार से दिल्ली ट्रांसफर नए उप मुख्यमंत्रियों बनाए जाना आने वाले तूफान की आशंका जताता है. वहीं हरियाणा और दिल्ली में भी हाल कुछ ऐसे ही है.

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