जयपुर के बगरू विधानसभा क्षेत्र के कंवरापुरा स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय के जर्जर भवन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब महज एक स्कूल तक सीमित नहीं रह गया है. राजस्थान सरकार ने स्कूल के नवनिर्माण के लिए 18 लाख रुपये की वित्तीय स्वीकृति जारी कर दी है. इसमें 12 लाख रुपये DMFT फंड और 6 लाख रुपये स्थानीय विधायक कोष से दिए जाएंगे. सरकार के मुताबिक निर्माण कार्य 1 सितंबर 2026 से शुरू होगा.
इस फैसले ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल भी खड़ा कर दिया है - क्या यह सरकार की पहले से तैयार योजना का हिस्सा था या फिर
CJP के ‘स्कूल ठीक करो’अभियान के दबाव का असर?
दरअसल, कंवरापुरा स्कूल उस समय चर्चा में आया जब CJP कार्यकर्ताओं
ने स्कूल की बदहाल स्थिति का मुद्दा उठाया. आरोप था कि बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल
भवन के बजाय बेहद खराब परिस्थितियों में व्यवस्था चल रही थी. निरीक्षण के दौरान
CJP कार्यकर्ताओं के साथ कथित मारपीट के बाद मामला और गरमा गया. इसके बाद प्रशासनिक
स्तर पर तेजी दिखाई दी और स्कूल को नए भवन की सौगात मिल गई.
18 लाख की मंजूरी, लेकिन सियासत 12,500 करोड़ की
कंवरापुरा के स्कूल के लिए 18 लाख रुपये की मंजूरी के साथ
ही सरकार ने प्रदेश के सरकारी स्कूलों के बुनियादी ढांचे को लेकर अगले तीन वर्षों का
बड़ा रोडमैप भी सामने रखा है. सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक स्कूलों के कायाकल्प पर
करीब 12,500 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.
इस योजना में 3,587 नए स्कूल भवन, 83,783 नए कक्षा-कक्ष,
2,256 विज्ञान प्रयोगशालाएं, फर्नीचर और 13,616 नए शौचालयों का प्रावधान बताया गया
है. वहीं डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए दिसंबर तक स्मार्ट क्लासरूम, ICT लैब
और टैबलेट जैसी सुविधाओं पर 1,087 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की बात कही गई है. यानी
कंवरापुरा की कहानी अब राजस्थान के सरकारी स्कूलों के बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंडे
से जुड़ गई है.
सवाल यह नहीं कि योजना बनी, सवाल यह है कि कब बनी?
सरकार के इस मास्टर प्लान को लेकर विपक्षी और राजनीतिक हलकों
में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इतनी बड़ी योजना अचानक तैयार हुई है?
अगर सरकार पहले से ही सरकारी स्कूलों के कायाकल्प की तैयारी
कर रही थी, तो फिर इसकी घोषणा कंवरापुरा जैसे विवाद के बीच ही क्यों सामने आई? और अगर
योजना पहले से तैयार थी, तो क्या CJP के आंदोलन ने इसे जमीन पर तेजी से लागू कराने
का काम किया?
यही वह सवाल है जिसने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रंग दे
दिया है.
CJP इसे अपने ‘स्कूल ठीक करो’अभियान की शुरुआती जीत के तौर पर पेश कर रही है. पार्टी का
तर्क है कि जिस स्कूल की बदहाली को लेकर उसने आवाज उठाई, वहां विवाद के बाद महज कुछ
ही दिनों में वैकल्पिक व्यवस्था से लेकर नए भवन के निर्माण तक की प्रक्रिया शुरू हो
गई.
दीपके-रांका की वीडियो कॉल ने बढ़ाया सियासी संदेश
सरकारी मंजूरी सामने आने के बाद CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके
और सह-संयोजक आशुतोष रांका की वीडियो कॉल भी चर्चा में आ गई. CJP ने इस बातचीत को अपने
सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया.
वीडियो कॉल में रांका ने सरकार के फैसले की जानकारी देते
हुए कहा कि जिस स्कूल में बच्चे बेहद खराब परिस्थितियों में पढ़ने को मजबूर थे, वहां
अब 1 सितंबर से निर्माण कार्य शुरू होगा. दोनों नेताओं ने इस फैसले पर खुशी जताई, लेकिन
साथ ही यह संदेश भी दिया कि उनकी लड़ाई सिर्फ एक स्कूल के निर्माण तक सीमित नहीं है.
अभिजीत दीपके ने साफ संकेत दिया कि CJP का एजेंडा सरकारी
स्कूलों की बदहाली को राजनीतिक मुद्दा बनाकर आगे बढ़ाने का है. उनका कहना है कि सरकार
यदि आंदोलन को लेकर कार्रवाई करना चाहती है तो करे, लेकिन बच्चों के भविष्य से समझौता
नहीं होना चाहिए.
कंवरापुरा के बाद अब जोधावास पर नजर
CJP ने अलवर के जोधावास स्थित प्राथमिक विद्यालय का मामला
भी सोशल मीडिया पर उठाया है. पार्टी के मुताबिक कार्यकर्ताओं के दौरे के बाद प्रशासन
ने जर्जर भवन को गिराने और नए क्लासरूम के निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है. यही
वजह है कि CJP अब इसे किसी एक स्कूल की लड़ाई नहीं, बल्कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों
की स्थिति को लेकर शुरू हुई व्यापक मुहिम के रूप में पेश कर रही है.
पहले 48 घंटे का अल्टीमेटम, फिर स्कूलों के निरीक्षण और अब
सरकार के फैसलों को लेकर CJP लगातार अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर
रही है.
सरकार के लिए असली चुनौती अब शुरू
कंवरापुरा स्कूल के लिए 18 लाख रुपये की मंजूरी निश्चित तौर
पर स्थानीय स्तर पर बड़ी राहत है. लेकिन सरकार की असली परीक्षा अब 12,500 करोड़ रुपये
के बड़े रोडमैप को जमीन पर उतारने में होगी. कागज पर 3,587 भवन, 83 हजार से ज्यादा
कक्षाएं, हजारों प्रयोगशालाएं और शौचालयों का लक्ष्य बड़ा दिखाई देता है. सवाल यह है
कि इन योजनाओं की रफ्तार कितनी होगी और कितने जर्जर स्कूल वास्तव में नए भवन में बदल
पाएंगे?
CJP के लिए भी यह एक राजनीतिक परीक्षा है. कंवरापुरा में
सरकार का फैसला उसकी मुहिम की उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन अब उसे यह साबित
करना होगा कि ‘स्कूल ठीक करो’सिर्फ सोशल मीडिया अभियान नहीं,
बल्कि राजस्थान के सरकारी स्कूलों को लेकर लगातार चलने वाला जमीनी आंदोलन है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है - क्या कंवरापुरा से शुरू हुई यह कहानी राजस्थान के हजारों
जर्जर सरकारी स्कूलों तक पहुंचेगी, या फिर 18 लाख की यह मंजूरी सिर्फ एक स्थानीय विवाद
का समाधान बनकर रह जाएगी?











