दिल्ली की सियासत में एक बार फिर मोदी कैबिनेट में फेरबदल की अटकलें तेज हो गई हैं. भारतीय जनता पार्टी संगठन में बड़े बदलाव के बाद अब केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में भी व्यापक फेरबदल की चर्चा शुरू हो गई है. सूत्रों के मुताबिक, अगस्त के अंत तक मोदी कैबिनेट में बदलाव का ऐलान हो सकता है. इस फेरबदल में कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं, कुछ का कद बढ़ सकता है और कुछ नए चेहरों को केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है. इस पूरी कवायद में सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान की संभावित वापसी को लेकर है.
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के बाद प्रधान को शिक्षा मंत्रालय से हटना पड़ा था. तब उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन बीजेपी के भीतर उनके प्रभाव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके समीकरण को देखते हुए अब माना जा रहा है कि उनकी सरकार में वापसी की पटकथा तैयार हो चुकी है.
मंत्रालय गया, सियासी कद नहीं
धर्मेन्द्र प्रधान का शिक्षा मंत्रालय से हटना उनके राजनीतिक सफर का अंत नहीं माना जा रहा है. बल्कि जिस तरह से उन्हें संसद भवन में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के पास कार्यालय कक्ष आवंटित किया गया, उसने उनकी संभावित वापसी की चर्चाओं को और हवा दे दी है. आमतौर पर ऐसे कार्यालय मंत्रियों को आवंटित किए जाते हैं.
हालांकि, प्रधान को कौन सा मंत्रालय मिलेगा, इसे लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है. लेकिन भाजपा के सत्ता गलियारों में चर्चा है कि अगर उनकी वापसी होती है तो उन्हें कोई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली मंत्रालय सौंपा जा सकता है.
शिक्षा मंत्रालय से उनके इस्तीफे के बाद संसद परिसर में एनडीए सांसदों के बीच उन्हें मिले समर्थन ने भी संकेत दिया था कि संगठन और सरकार में उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता बरकरार है.
पीयूष गोयल पर भरोसा, हरदीप पुरी पर सस्पेंस
कैबिनेट फेरबदल में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की स्थिति फिलहाल मजबूत मानी जा रही है. अमेरिका के साथ व्यापार और टैरिफ को लेकर चल रही बातचीत के बीच सरकार वाणिज्य मंत्रालय में बड़ा बदलाव करने से बच सकती है. ऐसे में गोयल के अपने मौजूदा मंत्रालय में बने रहने की संभावना जताई जा रही है.
वहीं पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी को लेकर स्थिति कुछ अलग है. उनका राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है और उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजे जाने को लेकर अभी तक स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं. ऐसे में कैबिनेट फेरबदल के दौरान पेट्रोलियम मंत्रालय में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा.
महाराष्ट्र में शिंदे की मांग, बिहार में चिराग की नजर
महाराष्ट्र और बिहार भी संभावित फेरबदल में अहम भूमिका निभा सकते हैं. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का लोकसभा में प्रभाव बढ़ने के बाद पार्टी की ओर से केंद्र में एक और मंत्री पद की मांग की चर्चा है. उद्धव ठाकरे गुट के सांसदों के टूटने के बाद शिंदे खेमे की संख्या बढ़ी है. ऐसे में सहयोगी दल के बढ़ते राजनीतिक वजन के अनुरूप केंद्र में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग स्वाभाविक मानी जा रही है. बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीच भी चर्चा हुई है.
दूसरी तरफ बिहार में चिराग पासवान की महत्वाकांक्षा भी एनडीए के लिए महत्वपूर्ण हो गई है. मौजूदा खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय से चिराग पूरी तरह संतुष्ट नहीं बताए जा रहे और बड़े मंत्रालय की उनकी इच्छा की चर्चा राजनीतिक गलियारों में है. अब सवाल यह है कि क्या कैबिनेट फेरबदल में उनकी मांग पूरी होती है या भाजपा नेतृत्व मौजूदा समीकरण को ही जारी रखता है.
यूपी चुनाव से पहले केंद्र में बड़ा राजनीतिक संदेश?
2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में संभावित कैबिनेट फेरबदल में यूपी का राजनीतिक गणित भी निर्णायक हो सकता है. चर्चा है कि उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य या ब्रजेश पाठक में से किसी एक को केंद्र में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है.
यदि ऐसा होता है तो यह सिर्फ प्रशासनिक फेरबदल नहीं बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर भारतीय जनता पार्टी की रणनीतिक तैयारी के तौर पर भी देखा जाएगा.
हिमाचल से दक्षिण भारत तक नजर
हिमाचल प्रदेश में आगामी चुनावों को देखते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की संभावित वापसी की चर्चा भी है. ठाकुर को संगठन और सरकार के बीच एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरे के रूप में देखा जाता रहा है.
इसके अलावा भाजपा दक्षिण भारत में भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर विचार कर सकती है. मौजूदा समय में दक्षिण भारत से करीब दस मंत्री केंद्र में हैं, जिनमें कैबिनेट और राज्य मंत्री दोनों शामिल हैं. आगामी राजनीतिक विस्तार को देखते हुए दक्षिण के राज्यों को और प्रतिनिधित्व देने की रणनीति बनाई जा सकती है.
अब फैसला मोदी-शाह के हाथ में
संगठन में नई टीम के गठन के बाद अब केंद्र सरकार में बदलाव की चर्चाओं ने दिल्ली के राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है. अगर अगस्त के अंत तक कैबिनेट फेरबदल होता है तो यह महज विभागों की अदला-बदली नहीं होगी, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनावों, सहयोगी दलों के बढ़ते दबाव और आगामी राजनीतिक चुनौतियों को ध्यान में रखकर मोदी सरकार के दूसरे बड़े रणनीतिक पुनर्गठन के रूप में देखा जा सकता है.
सबसे बड़ा सवाल धर्मेन्द्र प्रधान को लेकर है - क्या शिक्षा मंत्रालय जाने के बाद अब उन्हें मोदी सरकार में पहले से भी ज्यादा प्रभावशाली भूमिका मिलने जा रही है? अगर प्रधान की वापसी होती है, तो यह संदेश साफ होगा कि शिक्षा मंत्रालय से विदाई को बीजेपी नेतृत्व ने उनके राजनीतिक कद में कमी के तौर पर नहीं देखा है.










