पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले किसान आंदोलन एक बार फिर सियासी गर्मी बढ़ाता नजर आ रहा है. किसानों ने अपनी मांगों को लेकर दिल्ली कूच का आह्वान किया है. इसके मद्देनजर हरियाणा सरकार और पुलिस प्रशासन भी अलर्ट मोड पर है. पंजाब-हरियाणा सीमा पर खनौरी बॉर्डर को सील कर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है. किसानों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए कई स्तरों पर बैरिकेडिंग की गई है.
किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के ऐलान के बाद संयुक्त किसान
मोर्चा ने 228 किलोमीटर लंबी ‘किसान बचाओ पदयात्रा’ का आह्वान किया है. किसान
भारत-अमेरिका प्रस्तावित व्यापार समझौते का विरोध कर रहे हैं. उनका दावा है कि ऐसे
समझौते का असर कृषि क्षेत्र और किसानों की आय पर पड़ सकता है. इसके साथ ही किसान फसलों
के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP की कानूनी गारंटी और एमएस स्वामीनाथन आयोग की
सिफारिशों को लागू करने की मांग भी उठा रहे हैं.
किसानों की इस लामबंदी ने पंजाब की सियासत में भी नई हलचल
पैदा कर दी है. विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले किसानों का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक
दलों के लिए अहम हो गया है. पंजाब की राजनीति में किसान आंदोलन का प्रभाव पहले भी देखने
को मिल चुका है और ऐसे में सरकार के सामने आंदोलन को संभालने के साथ-साथ किसानों की
नाराजगी दूर करने की चुनौती भी है.
व्यापार समझौते पर सरकार और किसानों के दावे आमने-सामने
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर किसानों में आशंका है
कि इससे कृषि उत्पादों के आयात और घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ सकता है. हालांकि केंद्र
सरकार लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि किसी भी व्यापार समझौते में किसानों के हितों
से समझौता नहीं किया जाएगा. सरकार का कहना है कि किसानों को इस मुद्दे पर गुमराह किया
जा रहा है.
ऐसे में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार और किसान
संगठनों के बीच बातचीत के जरिए रास्ता निकलेगा या फिर दिल्ली कूच की कोशिश आंदोलन को
एक बार फिर बड़े टकराव की ओर ले जाएगी?
शंभू बॉर्डर के बाद अब खनौरी पर बढ़ा तनाव
किसानों और हरियाणा पुलिस के बीच सीमा पर टकराव का मुद्दा
नया नहीं है. इससे पहले भी पंजाब के किसानों ने अंबाला स्थित शंभू बॉर्डर से दिल्ली
की ओर बढ़ने की कोशिश की थी. उस दौरान भी हरियाणा पुलिस ने किसानों को आगे बढ़ने से
रोक दिया था और दिल्ली जाने की अनुमति नहीं दी गई थी.
अब एक बार फिर खनौरी बॉर्डर पर भारी सुरक्षा व्यवस्था की
गई है. बैरिकेडिंग और पुलिस तैनाती से साफ है कि प्रशासन किसानों को हरियाणा में प्रवेश
कर दिल्ली की ओर बढ़ने से रोकने की तैयारी में है.
2020 का किसान आंदोलन अभी भी सियासी सबक
किसानों की मौजूदा नाराजगी को 2020 के किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि
में भी देखा जा रहा है. मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब
और हरियाणा समेत कई राज्यों के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर लंबा आंदोलन किया था.
सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर आंदोलन के प्रमुख केंद्र बन गए थे.
लगातार विरोध और लंबे राजनीतिक गतिरोध के बाद केंद्र सरकार
ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए थे. इसके बाद पंजाब विधानसभा चुनाव में कृषि और किसान
आंदोलन बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना और भारतीय जनता पार्टी को राज्य में अपेक्षित सफलता
नहीं मिल सकी.
2027 से पहले किसानों की नाराजगी बनी बड़ी चुनौती
अब परिस्थितियां फिर चुनावी दौर की ओर बढ़ रही हैं. पंजाब
में विधानसभा चुनाव से पहले किसानों की नाराजगी अगर व्यापक आंदोलन का रूप लेती है,
तो इसका सीधा असर राज्य की चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है. सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्षी
दल भी किसानों के मुद्दे को अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाने की कोशिश कर सकते
हैं.
हालांकि इस बार मुद्दे अलग हैं, लेकिन किसान आंदोलन का राजनीतिक
प्रभाव अभी भी उतना ही महत्वपूर्ण है. ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों
के बीच बातचीत, आंदोलन की दिशा और दिल्ली कूच की रणनीति पर पूरे देश की नजर रहेगी.
पंजाब में किसानों की नाराजगी सिर्फ कृषि नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा
चुनाव से पहले एक बड़ा राजनीतिक संकेत भी बन सकती है.











