कांग्रेस का मजबूत किला है चंपारण, आपातकाल में भी भेद नहीं सका विपक्ष, क्या इस बार होगी सेंधमारी?

साढ़े चार दशकों से अभेद रहा है चंपारण, जनता पार्टी की आंधी भी नहीं हिला पाईं चंपारण की दीवारें, बापू की कर्म-भूमि से चुनावी बिगुल फूंका कांग्रेस ने, नाम है 'क्रांति महासम्मेलन'

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चंपारण बिहार विधानसभा चुनाव 2020
चंपारण बिहार विधानसभा चुनाव 2020

Politalks.News/Bihar. बिहार का चंपारण (Champaran) जिला, जिसे बापू की कर्म-भूमि कहा जाता है, पिछले साढ़े चार दशकों से कांग्रेस का मजबूत किला रहा है. इस जिले में 20 विधानसभाएं आती हैं और आज तक ऐसा नहीं हुआ कि यहां 70 फीसदी सीटों से कम पर कांग्रेस जीती हो. ये कांग्रेस का वो मजबूत गढ़ है जिसे विपक्ष या सत्ताधारी पक्ष भी कभी भेद पाया हो. यहां तक की 1974 के जेपी आंदोलन और 1977 में आपातकाल के बाद हुए बिहार चुनावों में भी जनता पार्टी की लहर के बावजूद यहां से केवल तीन सदस्य जीतकर विधानसभा पहुंच पाए. 14 सीटें अकेले कांग्रेस की झोली में गिरी.

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पिछले तीन दशक से कांग्रेस बिहार में सत्ता का वनवास झेल रही है, साथ ही बिहार की सियासत में अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने की कवायद में जुटी है. इसी के मद्देनजर कांग्रेस ने सोमवार को बापू की कर्म-भूमि चंपारण से चुनावी अभियान का शंखनाद किया, जिसे पार्टी ने क्रांति महासम्मेलन का नाम दिया है. मजबूत गढ़ होने के कारण ही कांग्रेस ने चंपारण की धरती से चुनावी बिगुल फूंका है. कांग्रेस 70 सीटों पर विधानसभा चुनाव लड़ रही है.

बात करें कांग्रेस के अभेद किले चंपारण की, जेपी आंदोलन ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ बिहार नहीं बल्कि देश की राजनीतिक दशा और दिशा को बदलकर रख दिया. 1974 के जेपी आंदोलन के बाद बिहार में 1977 में विधानसभा का चुनाव हुआ. इसके पहले केंद्र में कांग्रेस का पतन हो चुका था और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी. इसके बाद बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ. उम्मीद के मुताबिक विधानसभा चुनाव में भी जनता पार्टी की लहर रही और कांग्रेस का सफाया हो गया.

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बिहार की में 324 सदस्यों वाली विधानसभा में जनता पार्टी के 214 विधायक जीत कर आए. बिहार में पूर्ण बहुमत से जनता पार्टी ने सरकार बनाई थी. कांग्रेस के कई दिग्गज़ नेता हार की भेंट चढ़ गए. लेकिन चंपारण एकमात्र ऐसा जिला था, जहां जनता पार्टी की लहर के बार भी विपक्ष की दाल नहीं गल सकी. चंपारण की 20 विधानसभा सीटों में अधिकतर पर कांग्रेस के ही उम्मीदवार चुनाव जीते. यहां की 20 सीटों में तीन पर जनता पार्टी, दो पर सीपीआई और एक पर सीपीएम की जीत हुई. शेष 14 विधानसभा सीटें कांग्रेस की झोली में आकर गिरी.

चंपारण जिले की चनपटिया सीट पर जनता पार्टी के वीर सिंह, ढाका में सियाराम ठाकुर और हरसिद्धि में युगल किशोर प्रसाद सिंह चुनाव जीते. वहीं, सुगौली में सीपीएम के रामाश्रय सिंह, पिपरा में सीपीआई के तुलसी राम और केसरिया में पीतांबर सिंह चुनाव जीतने में कामयाब रहे. 1977 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस केवल 57 सीटें जीतने में कामयाब रही, जिनमें से 14 सीटें अकेले चंपारण जिले में थी. हालांकि, बाकी बिहार में जनता पार्टी की एकतरफा जीत हुई थी. जनता पार्टी के कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने.

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1990 के बाद से कांग्रेस का बिहार में जनाधार लगातार कम हुआ है. तीन दशक से कांग्रेस बिहार में सत्ता का वनवास झेल रही है. कांग्रेस का बिहार में सामाजिक समीकरण भी बिखर गया है. एक दौर में कांग्रेस के पास माने जाने वाले दलित वोटर दूसरी पार्टियों की ओर शिफ्ट होने लगे हैं. सवर्ण खासकर ब्राह्मण मतदाताओं को बीजेपी ने अपनी ओर आकर्षित किया. वहीं, अल्पसंख्यक मतदाता भी पूरी तरह साथ नहीं रह पाए हैं और जदयू, राजद व लोजपा में बंट गए हैं. इसके बाद भी कांग्रेस महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है, जिसका नेतृत्व राजद के हाथ में है.

बिहार विधानसभा चुनाव 2015 के चुनावी आंकड़ों पर एक नजर डालें तो कांग्रेस ने नीतीश कुमार और लालू यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. कांग्रेस ने 41 सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे, जिनमें से 27 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. हालांकि, माना जाता है कि कांग्रेस के इस प्रदर्शन में जदयू और राजद के साथ होने का फायदा मिला था. इस बार कांग्रेस का पूरा दारोमदार राजद के सामाजिक मतों के सहारे ही नैया पार लगाने की है.

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करीब 4 दशक के बाद अब कांग्रेस एक बार फिर से अपने पुराने किले से चुनावी अभियान का आगाज कर सियासी समीकरण साधने की कवायद की है. इसी के मद्देनजर कांग्रेस ने सोमवार को बापू की कर्म-भूमि चंपारण से चुनावी अभियान का शंखनाद किया है. महागठबंधन में राजद और कांग्रेस के साथ वामदल हैं जबकि एनडीए में जदयू के साथ बीजेपी, हम और वीआईपी है.

पिछले चुनावी आंकड़ों को देखें तो इस बार भी नीतीश कुमार सब पर भारी पड़ते दिख रहे हैं लेकिन राजद में लालू की अनुपस्थिति में तेजस्वी और तेजप्रताप यादव का युवा जोश नीतीश एंड कंपनी पर भारी पड़ रहा है. युवाओं को टार्गेट करने की नीति सफल हो रही है. कांग्रेस भी युवा चेहरों पर दांव खेल रही है. अब देखना होगा कि एनडीए या थर्ड फ्रंड कांग्रेस के अभेद किले की दिवारें गिराने में सफल हो पाते हैं या नहीं.

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