‘दिखावे की राजनीति बंद करे केंद्र’: हनुमान बेनीवाल ने सदन में गिनाए परिसीमन से राजस्थान के नुकसान

Hanuman Beniwal Big statement: राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के संयोजक और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने लोकसभा में संविधान संशोधन और परिसीमन विधेयकों पर चर्चा के दौरान केंद्र सरकार को जमकर घेरा. सांसद हनुमान बेनीवाल ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण के समर्थन में है, लेकिन सरकार जिस तरह से ‘मनमाना’ परिसीमन थोपने की कोशिश कर रही है, वह दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के राजनीतिक हितों के खिलाफ है. उन्होंने सदन में जोर देकर कहा कि महिला सशक्तिकरण के नाम पर सामाजिक न्याय की मूल भावना से समझौता नहीं किया जाना चाहिए.

सांसद बेनीवाल ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम के सिद्धांतों का हवाला देते हुए “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का नारा बुलंद किया। उन्होंने मांग की कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व पूरी तरह से जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए। बेनीवाल ने असम और जम्मू-कश्मीर के परिसीमन का उदाहरण देते हुए कहा कि इन उदाहरणों ने देशभर में डर पैदा कर दिया है कि सरकार की मंशा चुनावी लाभ के लिए संवैधानिक ढांचे से छेड़छाड़ करने की है.

चर्चा के दौरान हनुमान बेनीवाल ने राजस्थान के साथ होने वाले संभावित ‘अन्याय’ का मुद्दा प्रमुखता से उठाया. उन्होंने आंकड़ों के जरिए गणित समझाते हुए कहा कि 2011 की जनगणना के आधार पर राजस्थान की जनसंख्या के हिसाब से राज्य में 48 लोकसभा सीटें होनी चाहिए. लेकिन यदि सरकार सीटों में केवल 50% की वृद्धि का फॉर्मूला अपनाती है, तो राजस्थान को महज 38 सीटें ही मिलेंगी। बेनीवाल ने सीधा सवाल किया कि राजस्थान की 10 सीटों के इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा और सरकार इस पर अपनी चुप्पी क्यों नहीं तोड़ रही है?

सदन में तीखे सवाल दागते हुए सांसद हनुमान बेनीवाल ने सरकार से पूछा कि इन विधेयकों को लाने में इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई और क्या राज्यों व आम जनता से इस पर राय ली गई थी? उन्होंने दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों की रक्षा और संघीय ढांचे को कमजोर होने से बचाने पर भी सरकार का रुख स्पष्ट करने को कहा. बेनीवाल ने परिसीमन आयोग के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की सीमा को लेकर भी चिंता जताई और इसे लोकतांत्रिक संतुलन के लिए जरूरी बताया.

सांसद बेनीवाल ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनाव और आचार संहिता के बीच इस तरह के विधेयक लाना केवल ‘दिखावे की राजनीति’ है. उन्होंने तर्क दिया कि यदि सरकार वास्तव में ईमानदार होती, तो वह पहले जातिगत जनगणना कराती और उसके आधार पर ओबीसी वर्ग को आरक्षण तथा एससी-एसटी सीटों में वृद्धि सुनिश्चित करती. बेनीवाल ने चेतावनी दी कि देश की जनता अब केंद्र की चालों को समझ चुकी है और बिना जन-सहमति के किए जा रहे ये बदलाव लोकतंत्र के लिए घातक हैं.