पंचायत चुनाव पर सस्पेंस: सरकार चाहती है दिसंबर तक टलें चुनाव!

ओबीसी आरक्षण, भीषण गर्मी और मानसून का हवाला – 15 अप्रैल तक चुनाव कराने में जताई असमर्थता, अब टिकी हाईकोर्ट के फैसले पर निगाहें

राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर जारी अनिश्चितता के बीच राज्य सरकार ने हाईकोर्ट का रुख किया है. सरकार ने राजस्थान हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र दायर कर 15 अप्रैल तक चुनाव कराने के पूर्व आदेशों पर असमर्थता जताई है. महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद के माध्यम से दायर इस अर्जी में सरकार ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान परिस्थितियों में दिसंबर से पहले चुनाव कराना संभव नहीं है. सरकार ने अपनी दलील में ओबीसी आरक्षण की जटिलताओं, भीषण गर्मी और मानसून जैसे व्यावहारिक कारणों का हवाला देते हुए चुनाव आगे टालने की मांग की है.

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सरकार का ‘मंथली कैलेंडर’तर्क

सरकार ने अदालत को बताया कि वर्ष के हर महीने में ऐसी परिस्थितियां हैं जो चुनाव प्रक्रिया में बाधा बन सकती हैं:

  • अप्रैल: नया शैक्षणिक सत्र और प्रवेश प्रक्रिया के चलते शिक्षकों की चुनाव ड्यूटी के लिए उपलब्धता सीमित.
  • मई-जून: भीषण गर्मी और लू के कारण प्रशासन का फोकस आपदा प्रबंधन पर रहता है.
  • जुलाई-सितंबर: मानसून और कृषि कार्यों के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान प्रभावित होने की आशंका.
  • अक्टूबर-दिसंबर: कई निकायों का कार्यकाल समाप्तइस दौरान चुनाव कराने से ‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’ की अवधारणा को बल.

ओबीसी आरक्षण बना बड़ा मुद्दा

सरकार ने अपने पक्ष में ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को अहम आधार बताया है. अर्जी के अनुसार, बिना नए सिरे से ओबीसी आरक्षण लागू किए चुनाव कराना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा.

रिपोर्ट के बाद ही एससी, एसटी, ओबीसी और महिलाओं के लिए सीटों का सही निर्धारण संभव हो सकेगा. उल्लेखनीय है कि 9 मई 2025 को गठित आयोग को रिपोर्ट तैयार करने में समय लगा है.

तैयारियों का बड़ा गणित

सरकार ने चुनाव प्रक्रिया को एक विशाल प्रशासनिक चुनौती बताते हुए आंकड़े भी प्रस्तुत किए:

ग्रामीण (पंचायत):

  • मतदान केंद्र: 45,380
  • कर्मचारियों की आवश्यकता: 2,26,900

शहरी निकाय:

  • मतदान केंद्र: 22,891
  • कर्मचारियों की आवश्यकता: 1,14,455
  • कुल: मतदान केंद्र: 68,271
  • कर्मचारी: 3,41,355

इसके अलावा बड़ी संख्या में ईवीएम मशीनों की व्यवस्था और उन्हें रीसेट करना भी समय लेने वाली प्रक्रिया बताया गया है.

अब आगे क्या?

यह प्रार्थना पत्र पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिरिराज देवंदा की जनहित याचिकाओं के संदर्भ में दायर किया गया है. अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हैं…क्या अदालत सरकार की दलीलों को स्वीकार करते हुए चुनाव दिसंबर तक टालने की अनुमति देती है या समयबद्ध चुनाव कराने के अपने निर्देश पर कायम रहती है.