पिछले करीब तीन महीनों से देश की राजनीति और छात्र आंदोलनों के केंद्र में एक नया नाम लगातार चर्चा में है - कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके. कभी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले दीपके आज कथित 'जेन जी' के मुख्य अगुवा और जंतर मंतर पर युवा आंदोलन के रणनीतिकार के रूप में पहचाने जा रहे हैं. समर्थक उन्हें व्यवस्था परिवर्तन की आवाज बताते हैं, जबकि आलोचक उन पर आंदोलन को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाते हैं.
'झुकती है दुनिया... झुकाने वाला चाहिए' जैसे उनके चर्चित नारे ने आंदोलन को नई पहचान दी. यह नारा सोशल मीडिया से लेकर धरना स्थलों तक लगातार सुनाई देता रहा.
ऐसे हुई ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत
इस आंदोलन की शुरुआत उस समय हुई जब देश में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित प्रश्नपत्र लीक और भर्ती अनियमितताओं को लेकर छात्रों का असंतोष बढ़ रहा था. दरअसल ये कैंपेन 15 मई को भारत के सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सूर्यकांत की ओर से एक मामले में सुनवाई करते हुए की गई टिप्पणी के बाद शुरू हुआ. उनकी टिप्पणी 'कॉकरोच..' सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई, जिसे आंदोलनकारियों ने अपने अभियान का आधार बनाया.
अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र रहे अभिजीत दीपके ने एक सप्ताह पहले सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी लॉन्च किया था. दीपके ने इसी मुद्दे को लेकर देशभर के छात्रों और युवाओं को जोड़ना शुरू किया. धीरे-धीरे यह अभियान केवल परीक्षा प्रणाली तक सीमित नहीं रहा बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और भर्ती सुधार की मांग तक पहुंच गया.
84 दिनों का आंदोलन
एक सप्ताह के भीतर ही इंस्टाग्राम पर इसके सीजेपी के फॉलोअर्स दो करोड़ से ज्यादा हो गए हैं. दूसरी तरफ बीजेपी खुद को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहती है और उसके फॉलोवर्स सीजेपी से आधे से भी कम हैं. आंदोलन ने समय-समय पर केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों पर दबाव बनाने की कोशिश की. करीब 84 दिनों तक चले इस आंदोलन में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आए.
- भर्ती परीक्षाओं में सुधार और जवाबदेही की मांग.
दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विभिन्न शहरों में प्रदर्शन.
सोशल मीडिया पर व्यापक डिजिटल अभियान.
छात्रों, युवाओं और सामाजिक संगठनों की भागीदारी.
कई राज्यों में समर्थन रैलियां.
सोनम वांगचुक सहित कई हस्तियों का समर्थन, वांगचुक का अनशन.
पुलिस का सोनम को उठाना और छात्रों पर लाठीचार्ज एवं पैट गम का इस्तेमाल.
राहुल गांधी की की अगुवाई में विपक्ष का हल्ला बोल.
पीएम मोदी का वीडियो बयान, आधे घंंटे के भीतर जेपी नड्डा अस्पताल पहुंचे, सोनम की शर्तों पर अनशन तुड़वाया.
शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, तीन मांगों पर बनी सहमति, प्रहलाद जोशी को मिला शिक्षा मंत्रालय और सीजेपी का आंदोलन समाप्त, दीपके के सिर बंधा सेहरा.
सोनम वांगचुक समेत कई हस्तियों का समर्थन
आंदोलन को उस समय बड़ी चर्चा मिली जब सोनम वांगचुक सहित कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने छात्रों की मांगों का समर्थन किया. इसके अलावा फिल्म जगत और कला क्षेत्र की कुछ हस्तियों ने भी पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पर बयान दिए. हालांकि अधिकांश हस्तियों ने परीक्षा सुधार का समर्थन किया, लेकिन सभी ने सीधे तौर पर आंदोलन के संगठनात्मक नेतृत्व का समर्थन किया हो, ऐसा कहना उचित नहीं होगा.
विपक्ष के समर्थन से मिली राजनीतिक धार
शुरुआती दौर में आंदोलन को गैर-राजनीतिक बताया गया, लेकिन समय के साथ कई विपक्षी दलों के नेताओं ने धरना स्थल पर पहुंचकर समर्थन दिया. विपक्ष ने इसे युवाओं के रोजगार और परीक्षा प्रणाली से जुड़ा बड़ा मुद्दा बताया. इसके बाद आंदोलन का राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ा और संसद से लेकर चुनावी सभाओं तक इसकी चर्चा होने लगी.
कौन हैं अभिजीत दीपके?
अभिजीत दीपके की सार्वजनिक पहचान मुख्य रूप से एक आंदोलनकारी और सोशल मीडिया अभियान चलाने वाले चेहरे के रूप में बनी है. उन्होंने छात्र संगठनों और विभिन्न युवा समूहों के साथ मिलकर कथित परीक्षा सुधार आंदोलन को संगठित करने का प्रयास किया.
30 साल के अभिजीत दीपके अभी बोस्टन में हैं, जहां वह दो साल पहले पढ़ाई करने गए थे. उनकी शैली पारंपरिक राजनीतिक भाषणों से अलग मानी जाती है. वे अब 'जेन जी' के नेतृत्वकर्ता के तौर पर सोशल मीडिया लाइव, वीडियो संदेश, जनसभाओं और डिजिटल अभियानों के जरिए समर्थकों तक पहुंचते रहे हैं.
समर्थकों की नजर में
समर्थकों का कहना है कि अभिजीत दीपके ने छात्रों की लंबे समय से चली आ रही समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया. उनका दावा है कि आंदोलन के कारण परीक्षा प्रणाली में सुधार को लेकर राष्ट्रीय बहस तेज हुई.
दूसरी ओर आलोचकों का आरोप है कि समय के साथ आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से हटकर राजनीतिक रंग लेने लगा. कुछ लोगों का मानना है कि विपक्षी दलों के समर्थन के बाद इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठे, जबकि आंदोलनकारी इन आरोपों को खारिज करते हैं और इसे व्यापक जनसमर्थन का परिणाम बताते हैं.
भले ही आंदोलन के स्वरूप और नेतृत्व को लेकर अलग-अलग मत हों, लेकिन इतना स्पष्ट है कि परीक्षा प्रणाली, भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के रोजगार जैसे मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ चुके हैं. आंदोलन का प्रभाव यह रहा कि मोदी सरकार के विगत 12 सालों की सत्ता में पहली बार हुआ कि दवाब के चलते किसी मंत्री ने इस्तीफा दिया हो. सोनम के अनशन, उनको धरना स्थल से उठाने और छात्रों पर हिंसा ने आंदोलन को देशव्यापी से अंतराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया. सरकार पर दवाब बढ़ने लगा.
अभिजीत दीपके और उनके नेतृत्व वाले इस आंदोलन ने उनको एक प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित कर दिया है. मोदी राज में यह केवल एक मंत्री का इस्तीफा भर नहीं है, बल्कि एनडीए सरकार को ये बता दिया कि युवा उनके हर निर्णय एवं गलती को स्वीकार नहीं करेंगे और उनकी अनदेखी को बर्दास्त नहीं करेंगे. संभवत: आजाद भारत के इतिहास में ये सबसे बड़ा युवा आंदोलन है, जिसने एक बारगी तो केंद्र की नींद उड़ा ही दी थी.










