महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना बनाम शिवसेना का संघर्ष सुर्खियों में है. इस बार विवाद विधानसभा या पार्टी के चुनाव चिह्न का नहीं, बल्कि लोकसभा में छह सांसदों के दल बदल और उनके विलय की वैधता का है. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दिए जाने के बाद अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है.
शिवसेना (UBT) ने इस फैसले को संविधान और दल-बदल कानून की भावना के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी है. सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल विलय पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय और अन्य पक्षों से जवाब तलब कर मामले को गंभीरता से लिया है. इससे साफ है कि आने वाले दिनों में यह मामला महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का भी बड़ा मुद्दा बन सकता है.
क्या है पूरा मामला?
लोकसभा चुनाव 2024 में शिवसेना (UBT) के नौ सांसद चुनकर आए थे. इनमें से छह सांसदों ने जुलाई 2026 में एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होने का फैसला किया. इसके बाद उद्धव ठाकरे गुट के लोकसभा में केवल तीन सांसद रह गए. 18 जुलाई 2026 को मानसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इन छह सांसदों के शिंदे गुट में विलय को मान्यता दे दी. इस फैसले के बाद शिंदे गुट की लोकसभा में संख्या बढ़कर 13 हो गई, जिससे संसद में उसकी राजनीतिक ताकत और प्रभाव दोनों बढ़े.
सुप्रीम कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?
शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ सांसद अरविंद सावंत ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी है. उनका तर्क है कि यह विलय संविधान की दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के अनुरूप नहीं है और स्पीकर ने जल्दबाजी में फैसला लिया.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए लोकसभा सचिवालय, स्पीकर कार्यालय और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है. हालांकि अदालत ने फिलहाल विलय पर रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन मामले की विस्तृत सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी.
विवाद की जड़ में क्या है दल-बदल कानून?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची दल-बदल को रोकने के उद्देश्य से बनाई गई थी. पहले राजनीतिक दलों के विभाजन (Split) को भी मान्यता मिलती थी, लेकिन 91वें संविधान संशोधन के बाद यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई.
अब केवल तभी किसी दल के विलय को वैध माना जाता है, जब मूल राजनीतिक दल का दूसरे दल में विलय हो, या कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद सामूहिक रूप से विलय का समर्थन करें.
यही कानूनी बिंदु इस पूरे विवाद का केंद्र है.
UBT की दलील क्या है?
उद्धव ठाकरे गुट का कहना है :—
केवल संसदीय दल का बहुमत किसी राजनीतिक दल का विलय नहीं माना जा सकता.
मूल राजनीतिक दल यानी शिवसेना (UBT) आज भी स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में है.
छह सांसदों का शिंदे गुट में जाना व्यक्तिगत या समूहगत दल-बदल है, न कि वैध विलय.
इसलिए लोकसभा अध्यक्ष का फैसला संविधान और दल-बदल कानून की भावना के विपरीत है.
शिंदे गुट का पक्ष
इधर, एकनाथ शिंदे की शिवसेना का कहना है :—
छह सांसद कुल नौ सांसदों में दो-तिहाई से अधिक हैं.
इसलिए दसवीं अनुसूची के तहत विलय पूरी तरह वैध है.
लोकसभा अध्यक्ष ने सभी दस्तावेजों की जांच के बाद ही मान्यता दी है.
इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की संवैधानिक त्रुटि नहीं हुई.
यदि फैसला UBT के पक्ष में आया तो क्या होगा?
यदि सुप्रीम कोर्ट लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को रद्द कर देता है, तो छह सांसदों का विलय निरस्त हो सकता है. उनकी संसदीय स्थिति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है.
दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता पर भी प्रश्न खड़े हो सकते हैं.
लोकसभा में दोनों शिवसेना गुटों की संख्या फिर बदल सकती है.
हालांकि अंतिम परिणाम अदालत के विस्तृत फैसले और कानूनी व्याख्या पर निर्भर करेगा.
यदि अदालत उद्धव ठाकरे गुट के पक्ष में फैसला देती है तो यह उनके लिए बड़ी राजनीतिक और नैतिक जीत होगी. वहीं यदि स्पीकर का फैसला बरकरार रहता है तो शिंदे गुट की वैधता और मजबूत होगी तथा लोकसभा में उसका प्रभाव और बढ़ेगा. इसका असर आगामी स्थानीय निकाय चुनावों, मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव और भविष्य की महाराष्ट्र की राजनीति पर भी दिखाई दे सकता है.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है. फिलहाल छह सांसद शिंदे गुट के सदस्य बने रहेंगे क्योंकि अदालत ने कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है.
अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर होगी, जहां यह तय हो सकता है कि लोकसभा अध्यक्ष का फैसला संवैधानिक कसौटी पर कितना खरा उतरता है. यह फैसला न केवल शिवसेना की आंतरिक राजनीति बल्कि भविष्य में दल-बदल कानून की व्याख्या के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है.












