20 जुलाई से शुरू होने जा रहे संसद के मानसून सत्र में इस बार सिर्फ सरकार और विपक्ष के बीच मुद्दों की टक्कर ही नहीं, बल्कि लोकसभा के भीतर बदले हुए राजनीतिक समीकरण भी साफ दिखाई देंगे. पिछले कुछ महीनों में कई क्षेत्रीय दलों में हुई टूट और दल-बदल के बाद सदन का स्वरूप पहले से अलग नजर आएगा. सबसे बड़ा असर पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और महाराष्ट्र की शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) में हुए राजनीतिक घटनाक्रम का दिखाई देगा.
टीएमसी
और शिवसेना (यूबीटी) में हुई टूट केवल संबंधित राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका
असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखाई देगा. बदले हुए संख्या बल से संसद में दलों की रणनीति,
विपक्ष की एकजुटता और सत्ता पक्ष की राजनीतिक बढ़त पर असर पड़ सकता है. सदन के भीतर
नई बैठने की व्यवस्था इस बदलाव का सबसे प्रत्यक्ष संकेत होगी.
TMC
के 20 सांसदों को मिली अलग पहचान
लोकसभा
अध्यक्ष ओम बिरला ने तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए 20 सांसदों को सदन में अलग बैठने की
अनुमति दे दी है. ये सांसद जून में टीएमसी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया
(NCPI) में शामिल हो गए थे. अलग बैठने की मंजूरी को संसद के भीतर उनके नए राजनीतिक
समूह की पहली औपचारिक मान्यता माना जा रहा है. इसके बाद लोकसभा में टीएमसी की संसदीय
ताकत और उसकी रणनीति दोनों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है.
शिवसेना
की तस्वीर भी बदली
महाराष्ट्र
में भी उद्धव ठाकरे खेमे को बड़ा झटका लगा है. उद्धव गुट छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व
वाली शिवसेना में शामिल हुए छह सांसद अब लोकसभा में शिंदे गुट के साथ बैठेंगे. इससे
संसद में शिवसेना का शक्ति संतुलन भी बदल जाएगा और एनडीए को संख्या बल के साथ राजनीतिक
संदेश देने का अवसर मिलेगा.
सत्र
में दिखेगा नया राजनीतिक गणित
20
जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र में कुल 19 बैठकें प्रस्तावित
हैं. इस दौरान सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयक और नीतिगत प्रस्ताव पेश कर सकती है, जबकि
विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, कृषि, कानून-व्यवस्था और अन्य समसामयिक मुद्दों पर सरकार
को घेरने की तैयारी में है. लेकिन इन मुद्दों के समानांतर सदन में बदले हुए राजनीतिक
समीकरण भी लगातार चर्चा का विषय रहेंगे.
क्या
पड़ेगा राजनीतिक असर?
इस
बार का मानसून सत्र केवल विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहेगा. लोकसभा में बदलते राजनीतिक
समीकरण, क्षेत्रीय दलों में हुई टूट और नए संसदीय समूहों की मौजूदगी इसे राजनीतिक दृष्टि
से भी बेहद महत्वपूर्ण बनाएगी. सदन के भीतर सीटों की बदली व्यवस्था इस बात का संकेत
होगी कि पिछले कुछ महीनों में भारतीय राजनीति का परिदृश्य किस तेजी से बदला है और आने
वाले समय में इसका प्रभाव संसद की कार्यवाही से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक देखने को
मिल सकता है.










