राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री और पंजाब कांग्रेस के प्रभारी सचिन पायलट ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है. पायलट ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए की गई नाकेबंदी, हिरासत और सुरक्षा प्रतिबंधों पर सवाल उठाते हुए इन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत बताया. उन्होंने कहा कि वह किसी राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि अपने देश और लोकतंत्र के लिए आवाज उठा रहे हैं.
सचिन पायलट का यह बयान ऐसे समय आया है, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर विपक्ष तथा चुनाव आयोग के बीच विवाद तेज हो रहा है. कांग्रेस सहित विपक्ष के कई नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. वहीं, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं से जुड़े आरोपों को खारिज किया है.
‘लोकतंत्र में ऐसी चीजें नहीं होनी चाहिए’
मीडिया से बातचीत के दौरान सचिन पायलट ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए की गई कार्रवाई पर नाराजगी जताई. उन्होंने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट को समय पर चेतावनी देनी चाहिए थी कि सरकार ने जो किया वह गैरकानूनी था, कर्फ्यू लगाना, नाकाबंदी करना और लोगों को गिरफ्तार करना पूरी तरह से गलत था. डेमोक्रेसी में ऐसी चीजें नहीं होनी चाहिए. मैं अपने देश के लिए बोल रहा हूं…इस देश के लोग चाहते हैं कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) इस्तीफा दें.'
पायलट के बयान में दो प्रमुख मुद्दे सामने आए. पहला, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार को लेकर उनकी चिंता और दूसरा, चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करने की मांग. उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध दर्ज कराने वाले लोगों के साथ की जाने वाली कार्रवाई कानून और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप होनी चाहिए.
हालांकि, सरकार की कार्रवाई को गैरकानूनी बताना पायलट का राजनीतिक पक्ष है. इस संबंध में किसी न्यायिक निष्कर्ष को अंतिम निर्णय के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता.
जंतर-मंतर प्रदर्शन में क्या हुआ?
10 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन का आह्वान किया गया था. मतदाता सूची के पुनरीक्षण और कथित अनियमितताओं को लेकर आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए कई विपक्षी नेता और कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे.
प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी थी. पुलिस ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं और अनुमति के लिए निर्धारित समय-सीमा का हवाला दिया. इसके बाद दिल्ली के कई हिस्सों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई और प्रदर्शन स्थल की ओर बढ़ रहे नेताओं, कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया.
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दिनभर चले घटनाक्रम में दिल्ली के विभिन्न इलाकों में हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया. इनमें आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल, तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन सहित कई विपक्षी नेता शामिल थे. बाद में कई नेताओं को रिहा कर दिया गया.
प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, रास्तों पर प्रतिबंध और हिरासत की कार्रवाई को लेकर विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए. दूसरी ओर, पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं होने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत को कार्रवाई का आधार बताया.
CEC के इस्तीफे की मांग क्यों तेज हुई?
इस पूरे विवाद के केंद्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया है. विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव और नामों को हटाने की प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता की कमी है. उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब दिया जाना चाहिए, ताकि मतदाताओं के अधिकारों और चुनाव व्यवस्था की निष्पक्षता पर भरोसा बना रहे.
कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेता इसी आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही तय करने तथा उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. सचिन पायलट ने भी इस मांग का समर्थन करते हुए कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए चुनाव आयोग की भूमिका और उसकी जवाबदेही पर सवालों का समाधान जरूरी है.
हालांकि, चुनाव आयोग और भाजपा विपक्ष के आरोपों से सहमत नहीं हैं. ऐसे में मतदाता सूची से संबंधित विवादों पर अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, संबंधित पक्षों के जवाब और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही निकाला जा सकता है.
विरोध के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच बहस
सचिन पायलट के बयान ने दिल्ली में हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है. उनका जोर इस बात पर है कि लोकतंत्र में असहमति और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए. वहीं, प्रशासन का पक्ष है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा संबंधी कदम जरूरी थे.
अब इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि विरोध प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबंध और हिरासत की कार्रवाई किन परिस्थितियों में की गई तथा क्या वे लागू कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप थीं. इसके साथ ही चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों का पारदर्शी समाधान भी जरूरी है.
लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना और अपनी असहमति दर्ज कराना नागरिकों का महत्वपूर्ण अधिकार है. इसी तरह, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी प्रशासन की है. इन दोनों के बीच संतुलन कानून, पारदर्शिता और जवाबदेही के आधार पर ही कायम किया जा सकता है.









