कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी की संस्मरण पुस्तक 'बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव' लॉन्च होने से पहले से ही विवादों में चल रही है। यह किताब सोनिया की आत्मकथा है जिसमें उन्होंने भारतीय राजनीति के कई अहम और भावुक पलों को याद किया है. इस पुस्तक में 1984 में इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी की हत्या के बाद के भावुक पल एवं अन्य घटनाएं शामिल हैं। इसमें बाबरी मस्जिद की घटना का भी जिक्र है, जिसमें सोनिया गांधी ने लिखा, 'दिसंबर 1992 में जब वह टेलीविजन पर अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस देख रही थीं तो उनकी आंखों से आंसू निकल आए थे.' अब यह बयान कांग्रेस के गले की फांस बनता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने सोनिया गांधी के इस बयान पर सोनिया को घेरा और कांग्रेस को एंटी हिन्दू पार्टी करार दिया। सोनिया गांधी की यह किताब 10 नवंबर को लॉन्च हो रही है।
इस पुस्तक के प्रमोशन में हाल में दिए एक इंटरव्यू में सोनिया गांधी ने कहा, '6 दिसंबर 1992 को बाबरी मज्जिद को टेलीविजन पर गिरते हुए देखा, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए थे।' उन्होंने आगे कहा कि यह ऐसा दिन था जिसे मैं कभी नहीं भूल सकती। उस दिन केवल आंसू ही नहींआए, बल्कि हम सभी बेहद व्यथित थे। इस घटना ने मुझे अहसास दिलाया था कि भारत को अपने धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाए रखने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी होगी।' बाबरी मस्जिद पर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष की तरफ से आए इस बयान पर केंद्र सत्ताधारी पार्टी ने तीखा हमला बोला।
सोनिया ने राम विरोधी रवैया अपनाया
वरिष्ठ कांग्रेस नेता के इस बयान को लेकर बीजेपी ने कहा कि इस बयान से जाहिर होता है कि बाबर उस समय भी कांग्रेस के दिल में था और आज भी उसके दिल में है। पार्टी ने पूछा कि कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों, अफजल गुरु की फांसी और गाजा जैसे मुद्दों पर कांग्रेस का रुख अलग क्यों रहा?
बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया सह-प्रभारी और राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कहा, ‘सोनिया गांधी ने बाबरी के लिए आंसू बहाए। सोनिया गांधी ने बाटला हाउस के लिए आंसू बहाए। सोनिया गांधी ने साबित कर दिया है कि कांग्रेस बाबर की समर्थक और भगवान राम की विरोधी है। सोनिया गांधी की वोट बैंक की राजनीति हमेशा हारती रहेगी। आज सोनिया गांधी बाबरी का जिक्र करके, गाजा के लिए दुख जताकर और बाटला हाउस मुठभेड़ के आरोपियों के लिए आंसू बहाकर कांग्रेस की असली सोच उजागर कर रही हैं।’
पहले अफजल और अब बाबरी में आंसू क्यों?
सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने इस मामले को लेकर कहा, ‘रामलीला मैदान पर भारत विरोधी शक्तियों के साथ मिलकर भारत की संवैधानिक संस्था पर आक्रमण करने वाली कांग्रेस पार्टी का राम विरोधी चेहरा उभरकर सामने आ गया है।’ त्रिवेदी ने आगे कहा कि बाटला हाउस एनकाउंटर के आतंकवादी आरोपियों के लिए जिनकी आंखों में आंसू आए थे, मगर संसद भवन के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले जांबाज सैनिकों ने जब अफजल गुरु को फांसी दिए जाने में हो रही देरी को लेकर जब अपने मेडल वापस किए थे, तो सोनिया गांधी जी की आंखों में आंसू नहीं आए थे।'
वहीं दिल्ली सरकार के कैबिनेट मंत्री प्रवेश वर्मा ने सोशल मीडिया पर लिखा, '33 साल बाद आई बाबरी की याद है, फिर वही घड़ियाली आंसू, फिर वही फरियाद है। आज ही क्यों छिड़ी ये पुरानी बात? लगता है कहीं चुनाव है।'
इससे पहले सोनिया गांधी ने स्वीकार किया कि उनकी पार्टी की विफलताओं ने भाजपा और उसकी कट्टर हिंदुत्व की राजनीति के उभार में कुछ हद तक योगदान दिया। उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि कई मायनों में हम बहुत निश्चिंत रहे हैं। हमारा रवैया कुछ हद तक लापरवाही भरा था।' इस बयानबाजी ने देश की राजनीति को पूरी तरह से उफान पर लाकर खड़ा कर दिया है। साथ ही साथ धार्मिक एवं कट्टरता से भी जोड़ा है। अब देखना ये है कि सोनिया गांधी की 'बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव' पुस्तक लॉन्च होने के बाद राजनीति कितनी प्रभावित होती है।










