नक्शा विवाद खड़ा करना ओली को पड़ रहा भारी, भारत विरोधी राष्ट्रवाद अपनाने पर जा सकती है पीएम की कुर्सी

तीन भारतीय क्षेत्रों को नेपाली सीमा में दिखाया पीएम ओली ने, अब समर्थक दल लगा रहे सेना के जरिए देश चलाने का आरोप, आंतरिक राजनीति भी हो रही हावी, अल्पमत में आ सकती है सरकार, संकट में घिरे ओली अपना रहे भारत विरोधी राष्ट्रवाद का पुराना फॉर्मूला

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पॉलिटॉक्स न्यूज. नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को अपनी कुर्सी पर संकट मंडराता साफ तौर पर दिख रहा है, इसकी वजह है नक्शा विवाद. नेपाल संसद में हाल में देश का नया नक्शे का प्रस्ताव पारित हुआ है जिसमें भारत के तीन क्षेत्रों को नेपाल अपना बता रहा है. ये तीन क्षेत्र हैं कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा. बाद में नेपाल ने आंखे दिखाते हुए पहले भारत का पानी रोकने का प्रयास किया, बाद में नो मेंस लैंड में भी अतिक्रमण करना शुरु कर दिया है. ऐसे समय में जब भारत चीन के साथ सीमा विवाद में उलझा हुआ है, नेपाल के हौसले बुलंद हैं. हालांकि माना जा रहा है कि देश में कोरोना की परिस्थितियों को दबाने के लिए ये नक्शा कांड लाया गया जिससे नेपाली जनता का ध्यान भटकाया जा सके लेकिन इसके बाद विपक्ष के साथ स्थानीय जनता भी इस फैसले का विरोध करते हुए सड़कों पर आ गई है. समर्थक दलों ने भी अपना समर्थन सरकार से वापस लेने की तैयारी कर ली है जिससे ओली की सरकार अल्पमत में आती दिख रही है.

यहां ओली अपनी कुर्सी पर मंडराते खतरे को देखकर भारत विरोधी राष्ट्रवाद के अपने पुराने फॉर्मूले को आजमा रहे हैं. कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर और बाहर अपनी नीतियों और कामकाज को लेकर उठ रहे सवालों के बीच नेपाल के पीएम ओली ने भारत और साथ ही विपक्ष पर सत्ता से बाहर करने की साजिश रचने का आरोप लगाया है. नेपाल के नेता मदन भंडारी की 69वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा कि नई दिल्ली और काठमांडू में उन्हें सत्ता से बाहर करने के लिए साजिशें रची जा रही हैं और उन्हें पद से हटाने का खेल शुरू भी हो गया है लेकिन ये कोशिश सफल नहीं होगी. ओली ने दावा किया कि काठमांडू के एक होटल में उन्हें हटाने के लिए बैठकें की जा रही हैं और इसमें एक दूतावास भी सक्रिय है.

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ओली के अनुसार, नेपाल के कई नेताओं का कहना है कि नया नक्शा उनकी बहुत बड़ी भूल है. इसे संसद में पारित कराने की वजह से उन्हें सत्ता से बेदखल करने के लिए साजिशें रची जा रही हैं. ओली ने ये भी आरोप लगाया कि पिछले कार्यकाल में चीन के साथ ट्रेड‌ एंड ट्रांजिट समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, तब भी उनकी सरकार गिरा दी गई थी. ओली ने भारत पर भी आरोप लगाते हुए कहा कि भारत की ओर से आक्रामक बयान देकर जनभावनाएं भड़काने की कोशिश की जा रही है.

नया नक्शा ही ओली की परेशानियों का सबब नहीं है. दरअसल नया नागरिकता कानून लाने का ऐलान भी ओली की गले की फांस बन गया है. इस कानून के तहत नेपाली पुरुषों से शादी करने वाली महिलाओं को 7 साल बाद नेपाल की नागरिकता मिलेगी. इसे नेपाल-भारत के बीच कायम रोटी-बेटी के रिश्ते को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. यही नहीं, ओली ने अपने देश में कोरोना वायरस फैलने के लिए भी भारत को ही जिम्मेदार ठहराया.

घरेलू राजनीति में भी ओली को चौतरफा आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है. कोरोना की महामारी को ठीक तरह से हैंडल ना कर पाने को लेकर ओली के खिलाफ नेपाल की सड़कों पर लोग विरोध-प्रदर्शन करने भी उतरे. इसी से जनता का ध्यान भटकाने के लिए ओली ने नए नक्शे का स्वांग रचा. हालांकि वे अपने मकसद में कुछ समय सफल रहे लेकिन नक्शा पास होने के कुछ वक्त बाद ही ओली के आलोचकों ने फिर से बहस शुरू कर दी.

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पिछले कुछ दिनों में ओली की पार्टी के भीतर ही उनके इस्तीफे की मांग तेज हो गई है. ओली को भी ये बात अच्छी तरह से पता है कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उनके खिलाफ एकजुट हो गए हैं और इसीलिए वह समिति की बैठक में भी जाने से बच रहे हैं. नेपाल के पूर्व पीएम और वरिष्ठ नेता पुष्प कमल दहल ने ओली के पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री सहित दो पदों पर होने का भी अप्रत्यक्ष तौर पर विरोध जता चुके हैं.

पार्टी के सूत्रों और विश्लेषकों का मानना है कि दहल और उनके सहयोगी यह मांग करने जा रहे हैं कि ओली या तो पार्टी अध्यक्ष रहें या फिर प्रधानमंत्री पद पर. दहल के नेतृत्व वाले धड़े में माधव कुमार नेपाल, झाला नाथ खनाल, बामदेव दौतम, नारायम काजी श्रेष्ठ जैसे वरिष्ठ नेता भी हें जो ओली पर पार्टी पर कब्जा करने और एक तरफा फैसले लेने का आरोप लगा रहा है. अंदरूनी सूत्रों से ये भी सुनने को मिला है कि अगर ओली अपने कामकाज की शैली नहीं बदलते हैं तो पार्टी उनके खिलाफ फैसला ले सकती है.

वैसे ओली का राष्ट्रवादी राग नया नहीं है खासकर जब कोई भी संकट की घड़ी हो. 2015 में भारतीय सीमा पर हुई अघोषित आर्थिक नाकेबंदी का विरोध कर और चीन के साथ ट्रेड ऐंड ट्रांजिट पर हस्ताक्षर करने के बाद भी ओली ने इसी तरह भारत के खिलाफ अपना राष्ट्रवादी राग छेड़ा था. वैसे अगर समर्थक दलों के साथ मतभेद खत्म नहीं होते और ओली के खिलाफ अगर अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है तो ओली को 8 सीटों की कमी पड़ सकती है. मतलब साफ है कि ओली की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है.

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यही वजह है कि ओली एक बार फिर से अहम मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए राष्ट्रवाद का कार्ड खेल रहे हैं. खैर, ओली कुछ गलत भी नहीं कर रहे क्योंकि मझधार में फंसे शासक की यही रणनीति होती है. उनकी रणनीति में चीन का भी काफी अहम योगदान है. चीन के पूर्व में लगाए बंकरों में अब चीन की सेना आराम फरमा रही है और नो मैंस लैंड में भी भारतीय सेना की गतिविधियों में रोड़े अटका रही है. चीन से नेपाली सरकार के कई प्रकार के समझौतों से कोई इनकार नहीं किया जा सकता. खबर ये भी है कि नेपाल वक्त की नजाकत को भांपते हुए भारत के कुछ अन्य हिस्सों पर भी ऐसा करने की फिराक में है क्योंकि इस समय भारत पहले से ही चीन से सीमा विवाद में उलझा हुआ है और नेपाल सहित अन्य पड़ौसी देशों पर ध्यान नहीं दे पा रहा.

हालांकि ये भी सच है कि चीन के इशारे पर भारत के साथ कटुता का व्यवहार करना ही नेपाली प्रधानमंत्री ओली को भारी पड़ रहा है. यही वजह है कि समर्थक दल सरकार से हाथ खींच रहे हैं. कम्युनिष्ट पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का तो यहां तक कहना है कि ओली पाकिस्तान की तरह सेना की मदद से सरकार चलाना चाहते हैं लेकिन ये नेपाल में संभव नहीं है. जनता और विपक्ष के आक्रोश को दबाने के लिए नए नक्शे का मुद्दा उछालना भी अब किसी से छिपा नहीं है. इन राजनीतिक परिस्थितियों में कहना गलत न होगा कि नए नक्शा विवाद में पड़ना ओली को भारी पड़ता दिख रहा है.

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