Bengal Politics: भारतीय राजनीति बड़ी दिलचस्प चीज़ है. यहां कभी कोई नेता अचानक 'जनता की आवाज़' बन जाता है, तो कभी कोई पार्टी बिना ज्यादा शोर किए सीधे विपक्ष की कप्तानी पकड़ लेती है. और अब चर्चा है NCPI की… वो पार्टी, जिसके बारे में राजनीति की मजबूत पकड़ वालों को भी खबर नहीं. पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) पार्टी में विलय किया है. हालांकि ये एक विपक्ष की पार्टी बन गयी है लेकिन इन्होंने एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया है. अब खास बात ये है कि जिस पार्टी को भारतीय राजनीति में कोई नहीं जानता, अब 20 सांसदों के साथ लोकसभा की 5वीं सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गयी है.
रिकॉर्ड के अनुसार, NCPI ने 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार उम्मीदवार उतारे थे लेकिन उसके उम्मीदवार या तो NOTA से पीछे रहे या फिर उससे थोड़ा ज्यादा वोट हासिल कर पाए. पार्टी को कुल मिलाकर लगभग 1,198 वोट मिले थे. जिन चार नेताओं ने पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, हारने के बाद सभी पार्टी से पूरी तरह से कट गए. अब अचानक से 20 सांसद आने के बाद NCPI भारतीय राजनीति की सुर्खियों में छा गयी है. इस विलय के बाद ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली टीएमसी के पास केवल 8 सांसद रह गए हैं.
क्या है लोकसभा की स्थिति
फिलहाल लोकसभा में 543 सांसद मौजूद हैं, जिसमें से 240 सदस्यों के साथ भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ा राजनीतिक दल है. कांग्रेस के पास 100, समाजवादी पार्टी 37 व डीएमके के 22 सदस्य सदन में विराजमान हैं. 20 सांसदों के साथ NCPI 5वें नंबर पर है. एक खास बात ये भी है कि NCPI अब एनडीए खेमे में बीजेपी के बाद सबसे ज्यादा सदस्यों वाली पार्टी बन गयी है. इससे पहले टीडीपी 16 और जदयू 12 सांसदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थीं. इस समर्थन के साथ एनडीए सदस्यों की संख्या बढ़कर 312 पहुंच गयी है, जबकि विपक्ष में 228 सांसद मौजूद हैं.
फर्श से अर्श तक का सफर
राजनीति का पुराना नियम है — अगर बड़ी पार्टियां अपनी जगह छोड़ दें, तो कोई न कोई कुर्सी खींचकर बैठ ही जाता है. NCPI के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ. न कोई बहुत बड़ा जादू, न कोई अचानक चमत्कार. जब बाकी लोग विपक्ष का चेहरा तय कर रहे थे, तब उन्होंने चेहरा दिखाना शुरू कर दिया.
अब हालात ऐसे हैं कि जिन पार्टियों के नेता कभी कहते थे 'इनकी कोई मौजूदगी नहीं', वही अब टीवी पर बैठकर विश्लेषण कर रहे हैं कि NCPI में संभावना है.
राजनीति में इसे ही कहते हैं - जब आप किसी को हल्के में लेते हैं, तो कभी-कभी वही अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस की मुख्य कुर्सी पर बैठा मिलता है.
लोकतंत्र का नियम भी यही है - यहां कोई स्थायी विजेता नहीं होता… लेकिन स्थायी आश्चर्य जरूर होते हैं.













