लोकतंत्र के प्रहरी, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी से सीखें मर्यादा की पालना करने वाला चरित्र कैसा होता है?

अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा "नहीं बनानी ऐसी सरकार जो लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हो, हम सदस्यों की खरीद फरोख्त नहीं करेंगे, राजनीति को सौदे का विषय नहीं बनने देंगे", वाजपेयी की बात सुन छोटा मुंह लेकर लौट गए थे प्रमोद महाजन

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Atal Bihari Vajpayee 1534508941
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Politalks.News/Bharat. भाजपा ने जिस चाल, चेहरा और चरित्र के दम पर पूरे देश में अपनी अलग राजनीतिक तस्वीर पेश की थी, उस तस्वीर पर एक ही चेहरा था, अटल बिहारी वाजपेयी. तीन बार प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी के संबंध में कोई एक कहानी और किस्सा नहीं है. वो किसी पार्टी के सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि असल जननायक थे. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भरी सर्दियों की रातों में लोग 12 – 1 बजे तक अटलजी को सुनने के लिए उनका इंतजार करते थे.

जब अटल बिहारी वाजपेयी मंच पर बोलने के लिए पहुंचते थे और भाजपा के कार्यकर्ता नारा लगाते थे “देश का नेता कैसा हो, अटल बिहारी जैसा हो,” तो अटलजी अपने संबोधन की शुरूआत इस बात से करते थे कि, “सवाल ये नहीं कि देश का नेता कैसा हो, सवाल ये है कि देश कैसा हो.” जिंदगी भर देश के कई राज्यों की खाक छानने वाले अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्त्तिव का ही करिश्मा था कि उन्होंने देश की जनता का ध्यान भाजपा के विचार की ओर खींच लिया.

अटल बिहारी वाजपेयी एक पत्रकार थे, एक कवि थे, भाजपा के नेता थे और देश के जननेता थे, उनके लिए ना तो शब्दों की कोई कमी हो सकती है और ना ही उनके जीवन को पूरी तरह से शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है.

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अब आते हैं, भाजपा के उस चाल, चेहरा और चरित्र की बात पर, जिसकी बुनियाद अटल बिहारी वाजपेई की महान छवि से जुड़ी हुई है. इंडिया शाइनिंग और फीलगुड के इंग्लिश नारों के साथ 2004 में लोकसभा का चुनाव लड़ने वाली भाजपा के नारे जनता को समझ में नहीं आए. उस समय भाजपा के दूसरे बड़े नेता प्रमोद महाजन के हाथ में चुनाव प्रचार की कमान थी. उन्होंने चुनाव प्रचार को बहुत हाईटेक कर दिया.
लेकिन हिंदी के नारों से इंगलिश के नारों पर जाते ही भाजपा ढेर हो गई.

इस चुनाव में भाजपा 182 से घटकर 138 पर आ चुकी थी. कांग्रेस को भी भाजपा से केवल 7 सीटें ज्यादा यानि 145 सीट मिली थी. केंद्र में सरकार बनाने के लिए राजनीतिक दलों की भाग दौड़ शुरू हो चुकी थी. इसी भागदौड़ से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है, जो आज ही नहीं भविष्य में भी हमेशा प्रासंगिक रहेगा. यह किस्सा जुड़ा है, अटल बिहारी वाजपेयी के विराट व्यक्तित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों से.

प्रमोद महाजन अटल बिहारी वाजपेयी के पास उनकी सरकार बनाने का जोड़तोड़ की राजनीति से जुड़े गणित का एक पर्चा लेकर पहुंचे. कहते हैं इस पर्चे में वाजपेयी की सरकार को विभिन्न दलों के सांसदों को जोड़-तोड़ कर बीजेपी की सरकार बनाने का पूरा समीकरण था. जब प्रमोद महाजन ने वाजपेयी सेे इस पर चर्चा करनी शुरू की ही थी कि अटक बिहारी वाजपेयी बोले- “यह नहीं हो सकता, यह पूरी तरह गलत है, लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, हमें जनादेश का सम्मान करना चाहिए. हम लोकसभा सदस्यों की खरीद फरोख्त नहीं करेंगे, राजनीति को सौदे का विषय नहीं बनाएंगे.”

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अटल बिहारी वाजपेयी ने महाजन से आगे कहा कि, “अभी जनता ने हमें बहुमत नहीं दिया है. जरूर जनता की कोई नाराजगी रही होगी, हम उसका पता करेंगे. अगले चुनाव तक कोशिश करेंगे कि जन नाराजगी को दूर कर सकें. लेकिन चुनाव के बाद जोड़-तोड़ करके सरकार बनाना जनादेश का अपमान करना होगा.” इसके बाद प्रमोद महाजन को अपना छोटा सा मुंह लेकर लौटना पड़ा.

तो ऐसे थे जनता के सच्चे हीरो, असली जननायक अटल बिहारी वाजपेयी. आज क्या हो रहा है, भाजपा के आलाकमानों को अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन से सीख, सबक और प्रेरणा सबकुछ लेनी होगी.

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