केरल का महासंग्राम: गठबंधन की बैसाखी के सहारे सियासी जमीन तलाश रही बड़ी पार्टियां

केरल में पैर जमाने की जद्दोजहद, स्थानीय राजनीति के सामने बाहरी दलों की अग्नि परीक्षा, क्या बदलेगा सियासी समीकरण?

Kerala Election 2026: केरल की राजनीति में इस बार एक दिलचस्प ट्रेंड साफ नजर आ रहा है : उत्तर भारत की क्षेत्रीय पार्टियां गठबंधन के सहारे राज्य में अपनी सियासी जमीन तलाशने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि, केरल की मजबूत वैचारिक राजनीति और स्थानीय मुद्दों की पकड़ इन दलों के लिए अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है.

इस विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) के साथ मिलकर तीन सीटों पर चुनाव लड़ रही है. वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी-शरद पवार) भी इसी गठबंधन के साथ तीन सीटों पर मैदान में है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश का प्रमुख राजनीतिक दल – बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और पंजाब की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) जैसी पार्टियां भी लगभग 60 सीटों पर किस्मत आजमा रही हैं. हालांकि इनका मुख्य आधार केरल के बाहर ही रहा है.
गठबंधन के सहारे की राजनीति.

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स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इन बाहरी दलों की केरल में मौजूदगी नई नहीं है. 1990 के दशक के अंत से ही कई पार्टियां यहां सक्रिय रही हैं, लेकिन उनकी सफलता लगभग पूरी तरह गठबंधन पर निर्भर रही है.

जो भी दल वाम मोर्चे के साथ जुड़ा, उसे कभी-कभार 1-2 सीटों पर जीत जरूर मिली, लेकिन स्वतंत्र रूप से कोई भी पार्टी मजबूत आधार तैयार नहीं कर सकी. राजद ने भी केरल में खुद को एक सहयोगी दल के रूप में बनाए रखा है, लेकिन उसकी राजनीतिक पकड़ सीमित ही रही है.

बसपा और आप: जमीन की तलाश जारी

बसपा ने 1990 के दशक से केरल में लगातार चुनाव लड़ा है और दलित वोट बैंक तैयार करने की कोशिश की है, लेकिन उसे अब तक विधानसभा में एक भी सीट नहीं मिल सकी. 2021 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 72 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए लेकिन उनका वोट शेयर केवल 0.23% रहा, जो 2016 की तुलना में कम है.
इसी तरह आम आदमी पार्टी भी इस बार बड़े पैमाने पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन राज्य में संगठनात्मक मजबूती अभी शुरुआती दौर में है.

एनसीपी और छोटे दल: सीमित लेकिन प्रभावी

शरद पवार के नेतृत्व वाली एकीकृत एनसीपी ने गठबंधन के सहारे कुछ हद तक सफलता हासिल की है. 2021 में 3 सीटों पर चुनाव लड़ा और 0.99% वोट शेयर के साथ दो सीटों पर जीत हासिल की. 2016 में पार्टी ने 4 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए दो सीटों पर जीत दर्ज की.

वहीं, लोकतांत्रिक जनता दल (2018 में गठित) ने 2021 में वाम गठबंधन के साथ 3 सीटों पर चुनाव लड़कर एक सीट जीती थी.

क्यों मुश्किल है केरल में पैर जमाना?

केरल की राजनीति कई मायनों में अलग है. यहां उच्च राजनीतिक जागरूकता, मजबूत वैचारिक आधार, स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित चुनाव और सामाजिक संरचना का विशिष्ट स्वरूप जैसे कारणों से बाहरी क्षेत्रीय दलों के लिए मजबूत आधार बनाना आसान नहीं रहा है.

यही वजह रही कि केरल में अब तक मुकाबला मुख्य रूप से स्थानीय और वैचारिक राजनीति के बीच ही रहा है, जहां वाम दलों और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का दबदबा कायम रहा है.

भारतीय जनता पार्टी जैसी राष्ट्रीय पार्टी भी यहां अभी तक सत्ता से दूर रही है, जो इस राज्य की राजनीतिक जटिलता को दर्शाता है.

उम्मीदें बरकरार, रास्ता कठिन

हालांकि चुनावी मैदान में सभी दल अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं, लेकिन केरल की सियासत में पैर जमाना अब भी आसान नहीं है. गठबंधन के सहारे कुछ सीटें हासिल करना संभव है, लेकिन स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.

अब देखना यह होगा कि क्या इस बार ये बाहरी दल अपने प्रदर्शन में सुधार कर पाते हैं या फिर केरल की राजनीति में स्थानीय वर्चस्व ही कायम रहता है.