हिमाचल प्रदेश चुनाव में कांग्रेस के गढ़ रहे सोलन जिले में बागियों ने बढ़ाई बीजेपी की टेंशन

सोलन जिले की पांचों विधानसभा सीटें अर्की, दून, कसौली, सोलन और नालागढ़ में कांटे की टक्कर, पीएम मोदी, जेपी नड्डा और फायर ब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रियंका गांधी वाड्रा तक कर चुके चुनावी रैलियां, कांग्रेस के इस गढ़ को हर कीमत पर हासिल करना चाहती है बीजेपी

solan himachal pradesh election 2022
solan himachal pradesh election 2022

HimachalAssemblyElection. हिमाचल प्रदेश की 68 सीटों पर होने जा रहे विधानसभा चुनावों को अब गिनती के दिन बचे है. 12 नवंबर को मतदान और 8 दिसम्बर को चुनावी परिणाम आने हैं. आज बात करें हिम प्रदेश के सोलन जिले की तो सोलन हिमाचल का एक महत्वपूर्ण जिला है. सोलन को दवा कारोबार का हब माना जाता है. सियासी मायनों में देखें तो सोलन जिला कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, जिसमें कुल 4 लाख 04 हजार 618 मतदाता हैं. सोलन जिले के अंतर्गत पांच विधानसभा सीटें आती हैं.

आपको बता दें पिछले 2017 के हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में सोलन जिले की 5 विधानसभा सीटों में से तीन सीट कांग्रेस के खाते में गई थीं. हालांकि, इन तीन में से एक सीट, जिस पर लखविंद्र राणा विधायक थे, कुछ महीने पहले ही भाजपा में शामिल हो गए. अन्य दो सीटों पर बीजेपी ने कब्जा जमाया. अब बीजेपी चाहती है कि सोलन जिले सभी पांचों सीटों पर पार्टी का परचम फहराया जाए.

इसलिए बीजेपी कांग्रेस के इस गढ़ को हर कीमत पर ढहाना चाहती है. वैसे, पार्टी को यहां एक नहीं, बल्कि तीन मोर्चे पर जूझना पड़ रहा है. कांग्रेस के अलावा, इस बार आम आदमी पार्टी भी मैदान में है. इसके अलावा, पार्टी को अपने ही दलों के बागी नेताओं से भी जूझना पड़ रहा है. नालागढ़ विधानसभा सीट पर भाजपा को टिकट को लेकर विरोध झेलना पड़ा. इसी सीट पर कांग्रेस से बीजेपी में आए लखविंद्र राणा को टिकट थमाया गया है. ऐसे में भाजपा के कद्दावर नेता रहे केएल ठाकुर निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए भाजपा के लिए मुसीबत बने हुए हैं.

आइए जानते हैं सोलन जिले की 5 विधानसभाओं का सियासी गणित –

Patanjali ads

कांग्रेस बचा पाएगी अर्की का अपना गढ़?
सबसे पहले बात करें सोलन जिले की अर्की विधानसभा सीट की तो, अर्की जिले की सबसे बड़ी विधानसभा और एक वीआईपी सीट है. यहां से हिमाचल के के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह विधायक रह चुके हैं. 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में वीरभद्र सिंह ने अर्की विस सीट पर जीत दर्ज की थी. वीरभद्र सिंह को यहां की जनता ने लगभग 54 फीसद वोट दिया. बीजेपी के रतन सिंह पाली को 44 फीसदी वोटों से साथ हार का सामना करना पड़ा.

यहां आपको बता दें 8 जुलाई, 2021 को वीरभद्र सिंह की मृत्यु के बाद खाली हुई सीट पर 2021 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस के संजय अवस्थी ने जीत दर्ज की थी. कांग्रेस प्रत्याशी संजय अवस्थी ने उपचुनाव में भाजपा के रत्नपाल सिंह को 3277 वोटों के अंतर से हराया. भाजपा के रत्नपाल सिंह को 27,216 वोट मिले जबकि कांग्रेस प्रत्याशी 30,493 वोट मिले.

यह भी पढ़ें: क्या बिलासपुर का अपना गढ़ बचा पाएगी बीजेपी या कांग्रेस रोकेगी विजयी रथ?

सोलन जिले की अर्की विधानसभा सीट को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. 2021 में हुए विधानसभा उपचुनावों में जीत-हार का अंतर करीब 3 हजार वोटों का रहा. इन तीन हजार वोटों के अंतर को पाटकर बीजेपी इस सीट पर कब्जा करना चाहेगी. इस काम को अंजाम देने के लिए बीजेपी ने इस बार गोविंद राम शर्मा को अपना प्रत्याशी बनाया है. कांग्रेस ने एक बार फिर संजय अवस्थी को टिकट थमाया है.

पहले के चुनावों में इन सीटों पर केवल कांग्रेस और बीजेपी सहित दो पार्टियों के बीच मुकाबला हुआ करता था. इस बार आम आदमी पार्टी भी मैदान में है जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है. आप पार्टी ने जीतराम शर्मा को उम्मीदवार बनाया है.

दून विधानसभा पर जनता को पसंद है परिवर्तन
सोलन जिले की दून विधानसभा एक अहम सीट है. 68,266 मतदाताओं वाली इस विधानसभा पर जनता को परिवर्तन पसंद है. दून विधानसभा सीट पर दोनों ही पार्टियों ने बारी-बारी जीत दर्ज की है. 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के परमजीत सिंह, 2012 के विस चुनाव में कांग्रेस के रामकुमार और 2007 विस चुनाव में इस सीट पर बीजेपी के विनोद कुमार ने जीत दर्ज की थी. 2007 से पहले तक यह सीट कांग्रेस का गढ़ मानी जाती रही है. इससे पहले करीब सभी विधानसभा चुनावों कांग्रेस पार्टी का इस सीट पर कब्जा रहा है.

बीते विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के परमजीत सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी रामकुमार चौधरी को हराया था. बीजेपी के परमजीत सिंह को 2017 में इस सीट पर लगभग 53 फीसद वोट मिले थे वहीं कांग्रेस के राम कुमार को लगभग 45 फीसद वोट प्राप्त हुए थे. इस चुनाव में दोनों पार्टियों ने पुराने उम्मीदवारों पर ही विश्वास जताया है. वहीं आम आदमी पार्टी ने श्रवण सिंह सैनी को मैदान में उतार अल्पसंख्यक वोटों को भी साधने का काम किया है.

कसौली में चौथी बार खिलेगा कमल!
सोलन जिले की कसौली विधानसभा अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के लिए आरक्षित सीट है. यह सोलन जिले की सबसे छोटी विधानसभा है जिसमें 67,434 मतदाता हैं. 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के विनोद सुल्तानपुरी महज 442 वोटों के अंतर से हार गए थे. उन्हें बीजेपी के राजीव सैजल ने हराया. भारतीय जनता पार्टी से वर्तमान विधायक राजीव सैजल 2007, 2012 और 2017 में लगातार 3 बार से विधायक चुनें जा रहे हैं.

यह भी पढ़ें: चंबा में बीजेपी व कांग्रेस के बीच रोचक हुआ मुकाबला, आप ने बढ़ाई टेंशन

आपको बतादें कि इससे पहले कांग्रेस पार्टी के रघु राज भी इस सीट से लगातार तीन बार विधायक रह चुके हैं. रघु राज ने 1993,1998 और 2003 के चुनावों में 3 लगातार जीत दर्ज की थी. उससे पहले 1982 और 1985 के चुनावों में भी रघु राज ने इस सीट पर कांग्रेस का परचम लहराया था. रघु राज कुल मिलाकर पांच बार इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं.

इस बार बीजेपी ने राजीव सैजल और कांग्रेस ने विनोद सुल्तानपुरी पर फिर एक बार भरोसा जताया है. आम आदमी पार्टी से हरमेल धीमान भी कसौली सीट से मैदान में हैं. यहां पर देखना रोचक रहेगा कि क्या कांग्रेस के सुल्तानपुरी पिछले चुनावों के 442 वोटों के अंतर को पाट पाते हैं या नहीं. वहीं बीजेपी को यहां अपनी सत्ता कायम रखने के लिए कांग्रेस और आप, दोहरी चुनौती से निपटना होगा.

सोलन में उम्मीदवार को हर बार मिला दूसरा मौका
नालागढ़ विधानसभा के बाद सोलन सीट जिले की सबसे बड़ी विधानसभा सीट है. यह SC आरक्षित सीट है जिसमें मतदाताओं की संख्या 85,238 है. यहां का मुकाबला हमेशा रोचक रहा है क्योंकि यहां की जनता हर पार्टी के उम्मीदवार को दूसरा मौका देती है. पिछले दो चुनावों से इस सीट पर कांग्रेस के धनीराम शाडिल विधायक का कब्जा है, जबकि 2000 के उपचुनाव, 2003 व 2007 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी के राजीव बिंदल ने जीत दर्ज की है. 1993 और 1998 में भी कांग्रेस प्रत्याशी ने यहां विजय हासिल की. दो बार सीट जीतने का ये ट्रेंड तीन दशक पुराना है.

इस बार कांग्रेस को ये सीट बचाने और बीजेपी को हासिल की मशक्कत रहने वाली है. कांग्रेस ने वर्तमान उम्मीदवार पर फिर से दांव खेला है. बीजेपी ने राजेश कश्यप और आप पार्टी ने अंजु राठौड़ को मैदान में उतारा है. यहां आम आदमी पार्टी को महिला वोटर्स का फायदा मिल सकता है.

नालागढ़ विस में अपनों से ही जूझ रही पार्टियां
अब बात करें नालागढ़ सीट की तो नालागढ़ सोलन जिले की सबसे बड़ी विधानसभा सीट है. 89,828 मतदाता वाली नालागढ़ विधानसभा पर कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां अपनो की नाराजगी झेल रही हैं. भाजपा इसे हर कीमत पर हासिल करना चाहती है लेकिन पार्टी के बागी इसमें खलल डाल रहे हैं. नालागढ़ विधानसभा सीट पर भाजपा को टिकट को लेकर विरोध झेलना पड़ा. पिछले विस चुनाव में नालागढ़ कांग्रेस के हिस्से में आई थी.

1998 से पहले यहां कांग्रेस का एक छत्र राज रहा. इसके बाद हरी नारायण सिंह ने लगातार चुनावों में जीत की हैट्रिक लगाते हुए यहां बीजेपी को स्थापित कर दिया. उसके बाद कांग्रेस उम्मीदवार लखविंदर सिंह राणा ने 2011 में हुए उपचुनाव और 2017 में जीत हासिल की. राणा ने करीबी मुकाबले में बीजेपी के किशनलाल ठाकुर को 1242 वोटों के अंतर से हराया था.

यह भी पढ़ें: हिमाचल की 15 सीटें ऐसी जहां रही कांटे की टक्कर, 120 वोटों से भी कम रहा जीत का अंतर

गौरतलब है कि हाल ही में राणा ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी का हाथ थाम लिया और भाजपा के टिकट पर चुनावी मैदान में है. ऐसे में बीजेपी के कद्दावर नेता रहे और पिछली बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके किशनलाल ठाकुर खुद भी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. ठाकुर 2012 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के विधायक रह चुके हैं. इस बार कांग्रेस ने हरदीप सिंह बावा और आम आदमी पार्टी ने धरमपाल चौहान पर दांव लगाया है.

हिमाचल प्रदेश की सोलन जिले की पांचों विधानसभा सीटें अर्की, दून, कसौली, सोलन और नालागढ़ सभी अपने अपने हिसाब से महत्वपूर्ण है. मेडिसन इंडस्ट्री के नाम से प्रख्यात सोलन जिला राजनीतिक दृष्टि से भी काफी महत्व रखता है. सोलन जिले में भाजपा को लाने के लिए यहां की सभी सीटों पर भाजपा के कई बड़े नेता प्रचार के लिए आ चुके हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित राज्य के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी सोलन की अर्की विधानसभा सीट पर 7 नवंबर को बीजेपी प्रत्याशी गोविंद राम के समर्थन में रैली कर चुके हैं.

इससे पहले 6 नवंबर को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने भी सोलन में रोड शो किया था. वहीं, चुनाव का ऐलान होने से पहले ही प्रियंका गांधी वाड्रा भी कांग्रेस की ओर से रैली कर चुकीं है. इससे ही सोलन जिले की सभी विस का महत्व समझ आता है. यहां सभी सीटों पर टक्कर कांटे की रहने वाली है. आम आदमी पार्टी के शामिल होने से अधिकांश सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय बनने की आसार भी दिख रहे हैं.

Leave a Reply