25 हजार करोड़ के बैंक घोटाले में डिप्टी सीएम अजित पवार सहित 69 आरोपियों को मिली क्लीन चिट

महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक घोटाले से जुड़ा मामला, मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी है रजिटर्ड, एक साल पुराना है मामला, अजित पवार सहित पार्टी के हसन मुश्रीफ, जयंत पाटिल और कांग्रेस नेता मुधकर चव्हाण का नाम भी शामिल, बैंक के तत्कालीन निदेशक थे पवार

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Ajit Pawar Free In Maharashtra State Cooperative Bank Scam
Ajit Pawar Free In Maharashtra State Cooperative Bank Scam

Politalks.News/Maharashtra. महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक घोटाला मामले में महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार समेत 69 आरोपियों को क्लीन चिट मिल गई है. इस मामले में मुंबई पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) ने एफआईआर दर्ज किए जाने के एक साल बाद सत्र अदालत में मामले की क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है. अजित पवार सहित सभी 69 आरोपियों के खिलाफ सबूत न होने के चलते क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई है. इस कथित घोटाले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने EOW को एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए थे. इसी मामले में मनी लॉन्ड्रिंग का केस भी दर्ज किया गया था. मामला 25 हजार करोड़ का है. राज्य की गठबंधन सरकार में मंत्री जयंत पाटिल भी इसमें आरोपी हैं.

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दरअसल, नाबार्ड व महाराष्ट्र सहकारिता विभाग की ओर से दायर की गई एक रिपोर्ट में महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक को हुए नुकसान के लिए एनसीपी नेता अजित पवार व बैंक के दूसरे निदेशकों को जिम्मेदार ठहराया गया था. घोटाले के संबंध में की गई शिकायत में अजित पवार के अलावा पार्टी के ही हसन मुश्रीफ एवं जयंत पाटिल और कांग्रेस नेता मुधकर चव्हाण के अलावा बैंक के अलग-अलग जिलों में खुली बैंक की शाखाओं के वरिष्ठ अधिकारियों को आरोपी बनाया गया था. ये सभी नेता इस बैंक के संचालक रह चुके हैं. शिकायत में दावा किया गया है कि 2007 से 2011 के बीच महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक को करीब एक हजार करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है. तत्कालीन समय में अजित पवार बैंक के निदेशक थे.

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रिपोर्ट में ये कहा गया कि बैंक अधिकारियों की निष्क्रियता व उनके द्वारा लिए गए निर्णय के चलते बैंक को काफी नुकसान हुआ है. नाबार्ड की ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी मिलों को कर्ज देने में बड़े पैमाने पर बैंक के नियमों का उल्लंघन हुआ है. नाबार्ड की इस रिपोर्ट के बावजूद कोई केस नहीं दर्ज किया गया था. इसके बाद सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र अरोड़ा ने इस मामले की शिकायत आर्थिक अपराध शाखा में की और इसे संज्ञान लेते हुए पुलिस ने केस रजिस्टर्ड किया.

मामले को लेकर नाबार्ड व महाराष्ट्र सहकारिता विभाग की ओर से मामले को लेकर दायर की गई रिपोर्ट में बैंक को हुए नुकसान के लिए अजित पवार सहित बैंक के दूसरे निदेशकों को जिम्मेदार ठहराया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंक अधिकारियों की निष्क्रियता व उनके द्वारा लिए गए निर्णय के चलते बैंक को काफी नुकसान हुआ है.

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मामले में धारा 420 (ठगी और बेईमानी), धारा 409 (नौकरशाह या बैंकर, व्यवसायी या एजेंट द्वारा आपराधिक विश्वासहनन), धारा 406 (आपराधिक विश्वासहनन के लिए सजा), धारा 465 (धोखाधड़ी के लिए सजा), धारा 467 (मूल्यवान चीजों की धोखाधड़ी) और 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र की सजा) की धाराएं जोड़ी गई थीं. मामले की जांच के दौरान प्रवर्तन निदेशालय ने अजित पवार और एनसीपी चीफ शरद पवार का बयान भी दर्ज किया था.

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इस कथित घोटाले पर एक साल तक चली जांच में मुंबई पुलिस को किसी भी तरह की अनियमितता या उसके सबूत नहीं मिले हैं. अदालत में पुलिस ने कहा कि हमने हजारों दस्तावेजों और ऑडिट रिपोर्ट्स की जांच की है. इसमें 100 से ज्यादा लोगों के बयान दर्ज किए हैं. जांच में यह भी सामने आया कि टेंडरिंग की प्रक्रिया में अजित पवार के शामिल होने के कोई सबूत नहीं मिले और ना ही उन्होंने कभी किसी मीटिंग में हिस्सा लिया था.

एक साल चले मामले के बाद और कोई सबूत न मिलने के कारण मुंबई पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) ने सत्र अदालत में मामले की क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की है. जल्दी ही सभी 69 आरोपियों को क्लीन चिट दे दी जाएगी. हालांकि अंग्रेजी अखबार मुंबई मिरर की एक रिपोर्ट के अनुसार, सत्र अदालत में दाखिल की गई क्लोजर रिपोर्ट का ईडी ने विरोध किया है.

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