पटना (बिहार) की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट के लिए होने वाले उपचुनाव अब प्रतिष्ठा/साख का सवाल बन गयी है. यह सीट भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद खाली हुई है. इस सीट पर 30 जुलाई को मतदान होगा. अब सीट पर बीजेपी, कांग्रेस/राजद के साथ अन्य पार्टियां भी अपनी किस्मत आजमा रही है. खबर है कि अपनी पार्टी के पहले चुनाव में खुद चुनावी जंग में न उतरने वाले जन सुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर बांकीपुर से किस्मत आजमाने जा रहे हैं. अब पीके जीत दर्ज करने में कामयाब होते हैं तो ये उनकी पार्टी के लिए संजीवनी साबित होगी. वहीं बीजेपी अपनी साख बचाने के लिए पुरजोर के साथ चुनाव लड़ेगी.
बांकीपुर
विधानसभा बीजेपी का अभेद किला रही है. 1995 से अब तक यह सीट बीजेपी के खाते में आई
है. नितिन नवीन खुद 5 बार यहां से विधायक रहे हैं. इस साल की शुरुआत में बीजेपी अध्यक्ष
के तौर पर जेपी नड्डा के उत्तराधिकारी बने नितिन नवीन के राज्यसभा भेजे जाने के बाद
उन्होंने विधायकी से इस्तीफा दे दिया. इस सीट की अहमियत को देखते हुए बीजेपी जीत के
लिए हर संभव प्रयास करेगी, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन प्रशांत किशोर का इस जंग में
उतरना एक बड़ा कदम माना जा रहा है.
यह
सीट बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए भी एक कड़ी चुनौती साबित हो सकती है.
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने और चौधरी के सीएम बनने के बाद यह राज्य का पहला चुनाव
है. ऐसे में एक हार न केवल बीजेपी की साख पर दाग लगाएगी, सीएम चौधरी के नेतृत्व एवं
राजनीतिक पकड़ को भी नुकसान पहुंचेगी. इधर, चूंकि अब नवीन नितिन बीजेपी के राष्ट्रीय
अध्यक्ष हैं, इसलिए पदोन्नती के बाद अपने गृह क्षेत्र को खोना राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी
के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका होगा.
वहीं
प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी के लिए यह उपचुनाव राजनीतिक वापसी का एक महत्वपूर्ण
अवसर होगा. बिहार चुनावों में पार्टी ने राज्य की 243 सीटों में से 238 सीटों पर उम्मीदवार
उतारे थे, लेकिन उसे एक भी सीट नहीं मिली और वह केवल 3.4% वोट शेयर हासिल हुए. अगर
प्रशांत किशोर इस सीट से चुनाव लड़ते हैं, तो उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक साख दांव पर
लग जाएगी.
उन्होंने
इस उपचुनाव को "सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के पिछले दरवाजे पर जनमत संग्रह
करार दिया है. अगर किशोर चुनाव लड़ते हैं और जीत जाते हैं या बीजेपी के आधार को तोड़कर
मजबूत दूसरे स्थान पर भी आ जाते हैं तो इससे जन सुराज पार्टी राज्य की राजनीति में
एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. हालांकि, खराब प्रदर्शन से बिहार के पहले से ही
प्रतिस्पर्धी राजनीतिक परिदृश्य में पार्टी हाशिए पर जा सकती है.
बांकीपुर
मुख्य तौर पर शहरी मतदाताओं का क्षेत्र है और बीजेपी का प्रमुख आधार हमेशा से शहरी
इलाका रहा है. ऐसे में पटना के शिक्षित, पारंपरिक रूप से बीजेपी समर्थक शहरी मतदाताओं
को एक नई पार्टी के साथ प्रयोग करने के लिए राजी करना पीके एवं उनकी पार्टी के लिए
एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकती है. जहां एक ओर बीजेपी अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए
संघर्ष कर रही है और जन सुराज पार्टी यथास्थिति को बदलने की कोशिश कर रही है. वहीं
राजद भी शहरी वोटों में किसी भी तरह के विभाजन का फायदा उठाकर सफलता हासिल करने की
तलाश में है. अब देखना होगा कि बीजेपी अपनी साख बरकरार रख पाती है या फिर राजद या पीके
बीजेपी की साख में सेंध लगाकर अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने में कामयाब हो पाते हैं.










