पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) के भीतर उठे राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद अब पंजाब कांग्रेस भी अंदरूनी खींचतान को लेकर सुर्खियों में है. पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से सांसद चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनाए जाने के बाद पार्टी में असंतोष की चर्चाएं तेज हो गई हैं. राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या चन्नी भी पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की तरह अलग राजनीतिक राह चुन सकते हैं. हालांकि, इस तरह की संभावनाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति से बढ़ी नाराजगी
पंजाब कांग्रेस में संगठनात्मक फेरबदल के दौरान कई नेताओं और समर्थकों को उम्मीद थी कि प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी चरणजीत सिंह चन्नी को मिल सकती है. लेकिन पार्टी नेतृत्व ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को ही प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया. इसके बाद चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया, जिसे लेकर उनके समर्थकों में असंतोष की चर्चा शुरू हो गई.
बताया जा रहा है कि चन्नी गुट लंबे समय से राजा वड़िंग के नेतृत्व पर सवाल उठाता रहा है. समर्थकों का तर्क है कि हाल के उपचुनावों और निकाय चुनावों में कांग्रेस के अपेक्षित प्रदर्शन नहीं करने के कारण संगठन में बदलाव की जरूरत थी.
गुप्त बैठक ने बढ़ाई अटकलें
राजनीतिक चर्चाओं को उस समय और बल मिला जब चरणजीत सिंह चन्नी ने अपने आवास पर कुछ विधायकों और पार्टी नेताओं के साथ बैठक की. बैठक में शामिल कांग्रेस विधायक तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा ने मीडिया से कहा कि प्रदेश अध्यक्ष के मुद्दे पर पार्टी नेतृत्व से बातचीत की जानी चाहिए क्योंकि कई नेता मौजूदा फैसले से संतुष्ट नहीं हैं.
हालांकि बैठक को लेकर अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं की जा रही हैं, लेकिन कांग्रेस की ओर से इसे किसी संभावित टूट या बगावत से जोड़कर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है.
BJP के बयान से बढ़ी राजनीतिक हलचल
इसी बीच पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों के एक बयान ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी. उन्होंने कहा कि यदि चरणजीत सिंह चन्नी भारतीय जनता पार्टी में आना चाहें तो उनका स्वागत किया जाएगा. इस बयान के बाद विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच नई चर्चाएं शुरू हो गईं कि क्या पंजाब की राजनीति किसी बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है.
फिलहाल चन्नी या उनके करीबी नेताओं ने भाजपा में शामिल होने जैसी किसी संभावना पर सार्वजनिक रूप से कोई पुष्टि नहीं की है.
क्यों अहम होता है प्रदेश अध्यक्ष का पद?
पंजाब कांग्रेस की राजनीति में प्रदेश अध्यक्ष का पद हमेशा से बेहद प्रभावशाली माना जाता रहा है. संगठन की कमान संभालने वाले नेता की चुनावी रणनीति, टिकट वितरण और कार्यकर्ताओं पर मजबूत पकड़ होती है. यही कारण है कि कई बार प्रदेश अध्यक्ष को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार भी माना जाता है.
कैप्टन अमरिंदर सिंह इसका प्रमुख उदाहरण रहे हैं. वे चुनाव से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने और कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री भी बने. इसी राजनीतिक परंपरा के चलते प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर हमेशा विशेष महत्व रहा है.
चन्नी समर्थकों की दलील
चन्नी समर्थकों का मानना है कि वे दलित समुदाय के सबसे बड़े कांग्रेस चेहरों में से एक हैं और राज्य में उनकी लोकप्रियता पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है. समर्थकों का दावा है कि यदि उन्हें संगठन की कमान मिलती है तो कांग्रेस विधानसभा चुनाव में अधिक मजबूती के साथ उतर सकती है. हालांकि यह राजनीतिक दावा है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं की जा सकती.
हाईकमान के सामने चुनौती
पंजाब कांग्रेस पहले भी गुटबाजी और नेतृत्व विवाद का सामना कर चुकी है. नवजोत सिंह सिद्धू, कैप्टन अमरिंदर सिंह और अन्य नेताओं के बीच हुए मतभेदों का असर पार्टी के संगठन और चुनावी प्रदर्शन पर पड़ा था. ऐसे में यदि मौजूदा असंतोष लंबा खिंचता है तो आगामी चुनावों से पहले कांग्रेस नेतृत्व के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती और बढ़ सकती है.
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि चरणजीत सिंह चन्नी आगे कौन-सी राजनीतिक रणनीति अपनाएंगे. कांग्रेस नेतृत्व की ओर से भी इस पूरे घटनाक्रम पर कोई बड़ा सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है. ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि पंजाब कांग्रेस में किसी बड़ी टूट की स्थिति बनने जा रही है. लेकिन इतना तय है कि प्रदेश अध्यक्ष को लेकर उठे विवाद ने पंजाब की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है और आने वाले दिनों में कांग्रेस हाईकमान के फैसलों पर सभी की नजर रहेगी.










